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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बारहवाँ सर्ग

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बारहवाँ सर्ग

सीताके मरणकी आशंकासे हनुमान्‌जीका शिथिल होना, फिर उत्साहका आश्रय लेकर अन्य स्थानोंमें उनकी खोज करना और कहीं भी पता न लगनेसे पुनः उनका चिन्तित होना

उस राजभवनके भीतर स्थित हुए हनुमान्‌जी सीताजीके दर्शनके लिये उत्सुक हो क्रमशः लतामण्डपोंमें, चित्रशालाओंमें तथा रात्रिकालिक विश्रामगृहोंमें गये; परंतु वहाँ भी उन्हें परम सुन्दरी सीताका दर्शन नहीं हुआ॥ १ ॥

रघुनन्दन श्रीरामकी प्रियतमा सीता जब वहाँ भी दिखायी न दीं, तब वे महाकपि हनुमान् इस प्रकार चिन्ता करने लगे— 'निश्चय ही अब मिथिलेशकुमारी सीता जीवित नहीं हैं; इसीलिये बहुत खोजनेपर भी वे मेरे दृष्टिपथमें नहीं आ रही हैं॥ २ ॥

‘सती-साध्वी सीता उत्तम आर्यमार्गपर स्थित रहनेवाली थीं। वे अपने शील और सदाचारकी रक्षामें तत्पर रही हैं; इसलिये निश्चय ही इस दुराचारी राक्षसराजने उन्हें मार डाला होगा॥ ३ ॥

‘राक्षसराज रावणके यहाँ जो दास्यकर्म करनेवाली राक्षसियाँ हैं, उनके रूप बड़े बेडौल हैं। वे बड़ी विकट और विकराल हैं। उनकी कान्ति भी भयंकर है। उनके मुँह विशाल और आँखें भी बड़ी-बड़ी एवं भयानक हैं। उन सबको देखकर जनकराजनन्दिनीने भयके मारे प्राण त्याग दिये होंगे॥ ४ ॥

‘सीताका दर्शन न होनेसे मुझे अपने पुरुषार्थका फल नहीं प्राप्त हो सका। इधर वानरोंके साथ सुदीर्घकालतक इधर-उधर भ्रमण करके मैंने लौटनेकी अवधि भी बिता दी है; अतः अब मेरा सुग्रीवके पास जानेका भी मार्ग बंद हो गया; क्योंकि वह वानर बड़ा बलवान् और अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाला है॥ ५ ॥

‘मैंने रावणका सारा अन्तःपुर छान डाला, एक-एक करके रावणकी समस्त स्त्रियोंको भी देख लिया; किंतु अभीतक साध्वी सीताका दर्शन नहीं हुआ; अतः मेरा समुद्रलङ्घनका सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया॥ ६ ॥

‘जब मैं लौटकर जाऊँगा, तब सारे वानर मिलकर मुझसे क्या कहेंगे; वे पूछेंगे, वीर! वहाँ जाकर तुमने क्या किया है—यह मुझे बताओ॥ ७ ॥

‘किंतु जनकनन्दिनी सीताको न देखकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा। सुग्रीवके निश्चित किये हुए समयका उल्लङ्घन कर देनेपर अब मैं निश्चय ही आमरण उपवास करूँगा॥ ८॥

‘बड़े-बूढ़े जाम्बवान् और युवराज अंगद मुझसे क्या कहेंगे? समुद्रके पार जानेपर अन्य वानर भी जब मुझसे मिलेंगे, तब वे क्या कहेंगे?’॥ ९॥

(इस प्रकार थोड़ी देरतक हताश-से होकर वे फिर सोचने लगे—) ‘हताश न होकर उत्साहको बनाये रखना ही सम्पत्तिका मूल कारण है। उत्साह ही परम सुखका हेतु है; अतः मैं पुनः उन स्थानोंमें सीताकी खोज करूँगा, जहाँ अबतक अनुसन्धान नहीं किया गया था॥ १०॥

‘उत्साह ही प्राणियोंको सर्वदा सब प्रकारके कर्मोंमें प्रवृत्त करता है और वही उन्हें वे जो कुछ करते हैं उस कार्यमें सफलता प्रदान करता है॥ ११॥

‘इसलिये अब मैं और भी उत्तम एवं उत्साह-पूर्वक प्रयत्नके लिये चेष्टा करूँगा। रावणके द्वारा सुरक्षित जिन स्थानोंको अबतक नहीं देखा था, उनमें भी पता लगाऊँगा॥ १२॥

‘आपानशाला, पुष्पगृह, चित्रशाला, क्रीड़ागृह, गृहोद्यानकी गलियाँ और पुष्पक आदि विमान—इन सबका तो मैंने चप्पा-चप्पा देख डाला (अब अन्यत्र खोज करूँगा)।’ यह सोचकर उन्होंने पुनः खोजना आरम्भ किया॥ १३-१४॥

वे भूमिके भीतर बने हुए घरों (तहखानों)-में, चौराहोंपर बने हुए मण्डपोंमें तथा घरोंको लाँघकर उनसे थोड़ी ही दूरपर बने हुए विलास-भवनोंमें सीताकी खोज करने लगे। वे किसी घरके ऊपर चढ़ जाते, किसीसे नीचे कूद पड़ते, कहीं ठहर जाते और किसीको चलते-चलते ही देख लेते थे॥ १५॥

घरोंके दरवाजोंको खोल देते, कहीं किंवाड़ बंदकर देते, किसीके भीतर घुसकर देखते और फिर निकल आते थे। वे नीचे कूदते और ऊपर उछलते हुए-से सर्वत्र खोज करने लगे॥ १६॥

उन महाकपिने वहाँके सभी स्थानोंमें विचरण किया। रावणके अन्तःपुरमें कोई चार अंगुलका भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ कपिवर हनुमान्जी न पहुँचे हों॥

उन्होंने परकोटेके भीतरकी गलियाँ, चौराहेके वृक्षोंके नीचे बनी हुई वेदियाँ, गड्ढे और पोखरियाँ—सबको छान डाला॥ १८॥

हनुमान्जीने जगह-जगह नाना प्रकारके आकारवाली, कुरूप और विकट राक्षसियाँ देखीं; किंतु वहाँ उन्हें जानकीजीका दर्शन नहीं हुआ॥ १९॥

संसारमें जिनके रूप-सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी ऐसी बहुत-सी विद्याधरियाँ भी हनुमान्जीकी दृष्टिमें आयीं; परंतु वहाँ उन्हें श्रीरघुनाथजीको आनन्द प्रदान करनेवाली सीता नहीं दिखायी दीं॥ २० ॥

हनुमान्जीने सुन्दर नितम्ब और पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली बहुत-सी नागकन्याएँ भी वहाँ देखीं; किंतु जनककिशोरीका उन्हें दर्शन नहीं हुआ॥ २१ ॥

राक्षसराजके द्वारा नागसेनाको मथकर बलात् हरकर लायी हुईं नागकन्याओंको तो पवनकुमारने वहाँ देखा; किंतु जानकीजी उन्हें दृष्टिगोचर नहीं हुईं॥ २२ ॥

महाबाहु पवनकुमार हनुमान्‌को दूसरी बहुत-सी सुन्दरियाँ दिखायी दीं; परंतु सीताजी उनके देखनेमें नहीं आयीं। इसलिये वे बहुत दुःखी हो गये॥ २३ ॥

उन वानरशिरोमणि वीरोंके उद्योग और अपने द्वारा किये गये समुद्रलंघनको व्यर्थ हुआ देखकर पवनपुत्र हनुमान् वहाँ पुनः बड़ी भारी चिन्तामें पड़ गये॥

उस समय वायुनन्दन हनुमान् विमानसे नीचे उतर आये और बड़ी चिन्ता करने लगे। शोकसे उनकी चेतनाशक्ति शिथिल हो गयी॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२ ॥