श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ पचीसवाँ सर्ग
एक सौ पचीसवाँ सर्ग
हनुमान्जीका निषादराज गुह तथा भरतजीको श्रीरामके आगमनकी सूचना देना और प्रसन्न हुए भरतका उन्हें उपहार देनेकी घोषणा करना
(भरद्वाज-आश्रमपर उतरनेसे पहले) विमानसे ही अयोध्यापुरीका दर्शन करके अयोध्यावासियों तथा सुग्रीव आदिका प्रिय करनेकी इच्छावाले शीघ्रपराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने यह विचार किया कि कैसे इन सबका प्रिय हो?॥ १ ॥
विचार करके तेजस्वी एवं बुद्धिमान् श्रीरामने वानरोंपर दृष्टि डाली और वानर-वीर हनुमान्जीसे कहा—॥ २ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! तुम शीघ्र ही अयोध्यामें जाकर पता लो कि राजभवनमें सब लोग सकुशल तो हैं न?॥ ३ ॥
‘शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर वनवासी निषादराज गुहसे भी मिलना और मेरी ओरसे कुशल कहना॥ ४ ॥
‘मुझे सकुशल, नीरोग और चिन्तारहित सुनकर निषादराज गुहको बड़ी प्रसन्नता होगी; क्योंकि वह मेरा मित्र है। मेरे लिये आत्माके समान है॥ ५ ॥
‘निषादराज गुह प्रसन्न होकर तुम्हें अयोध्याका मार्ग और भरतका समाचार बतायेगा॥ ६ ॥
‘भरतके पास जाकर तुम मेरी ओरसे उनका कुशल पूछना और उन्हें सीता एवं लक्ष्मणसहित मेरे सफलमनोरथ होकर लौटनेका समाचार बताना॥ ७ ॥
‘बलवान् रावणके द्वारा सीताजीके हरे जानेका, सुग्रीवसे बातचीत होनेका, रणभूमिमें वालीके वधका, सीताजीकी खोजका, तुमने जो महान् जलराशिसे भरे हुए अपार महासागरको लाँघकर जिस तरह सीताका पता लगाया था उसका, फिर समुद्रतटपर मेरे जानेका, सागरके दर्शन देनेका, उसपर पुल बनानेका, रावणके वधका, इन्द्र, ब्रह्मा और वरुणसे मिलने एवं वरदान पानेका और महादेवजीके प्रसादसे पिताजीके दर्शन होनेका वृत्तान्त उन्हें सुनाना॥ ८—११ ॥
‘सौम्य! फिर भरतसे यह भी निवेदन करना कि श्रीराम शत्रुओंको जीतकर, परम उत्तम यश पाकर, सफलमनोरथ हो राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अपने अन्य महाबली
मित्रोंके साथ आ रहे हैं और प्रयागतक आ पहुँचे हैं॥ १२-१३ ॥
‘यह बात सुनकर भरतकी जैसी मुख-मुद्रा हो, उसपर ध्यान रखना और समझना तथा भरतका मेरे प्रति जो कर्तव्य या बर्ताव हो, उसको भी जाननेका प्रयत्न करना॥ १४ ॥
‘वहाँके सारे वृत्तान्त तथा भरतकी चेष्टाएँ तुम्हें यथार्थरूपसे जाननी चाहिये। मुखकी कान्ति, दृष्टि और बातचीतसे उनके मनोभावको समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये॥ १५ ॥
‘समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे भरपूर बाप-दादोंका राज्य सुलभ हो तो वह किसके मनको नहीं पलट देता?॥ १६ ॥
‘यदि कैकेयीकी संगति अथवा चिरकालतक राज्यवैभवका संसर्ग होनेसे श्रीमान् भरत स्वयं ही राज्य पानेकी इच्छा रखते हों तो वे रघुकुलनन्दन भरत बेखटके समस्त भूमण्डलका राज्य करें (मुझे उस राज्यको नहीं लेना है। उस दशामें हम कहीं अन्यत्र रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे)॥ १७ ॥
‘वानरवीर! तुम भरतके विचार और निश्चयको जानकर जबतक हमलोग इस आश्रमसे दूर न चले जायँ तभीतक शीघ्र लौट आओ’॥ १८ ॥
श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी मनुष्यका रूप धारण करके तीव्रगतिसे अयोध्याकी ओर चल दिये॥ १९ ॥
जैसे गरुड़ किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़नेके लिये बड़े वेगसे झपट्टा मारते हैं, उसी तरह पवनपुत्र हनुमान् तीव्र वेगसे उड़ चले॥ २० ॥
अपने पिता वायुके मार्ग—अन्तरिक्षको, जो पक्षिराज गरुड़का सुन्दर गृह है, लाँघकर गङ्गा और यमुनाके वेगशाली संगमको पार करके शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर पराक्रमी हनुमान्जी निषादराज गुहसे मिले और बड़े हर्षके साथ सुन्दर वाणीमें बोले—॥ २१-२२ ॥
‘तुम्हारे मित्र ककुत्स्थकुलभूषण सत्यपराक्रमी श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आ रहे हैं और उन्होंने तुम्हें अपना कुशल-समाचार कहलाया है। वे प्रयागमें हैं और भरद्वाजमुनिके कहनेसे उन्हींके आश्रममें आज पञ्चमीकी रात बिताकर कल उनकी आज्ञा ले वहाँसे चलेंगे। तुम्हें यहीं श्रीरघुनाथजीका दर्शन होगा’॥ २३-२४ ॥
गुहसे यों कहकर महातेजस्वी और वेगशाली हनुमान्जी बिना कोई सोच-विचार किये बड़े वेगसे आगेको उड़ चले। उस समय उनके सारे अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया था॥ २५
॥
मार्गमें उन्हें परशुराम-तीर्थ, वालुकिनी नदी, वरूथी, गोमती और भयानक सालवनके दर्शन हुए॥ २६ ॥
कँइ सहस्र प्रजाओं तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी तीव्रगतिसे दूरतकका रास्ता लाँघ गये और नन्दिग्रामके समीपवर्ती खिले हुए वृक्षोंके पास जा पहुँचे। वे वृक्ष देवराज इन्द्रके नन्दनवन और कुबेरके चैत्ररथ-वनके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे॥ २७-२८ ॥
उनके आस-पास बहुत-सी स्त्रियाँ अपने उन पुत्रों और पौत्रोंके साथ, जो वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे, विचरती और उनके पुष्पोंका चयन करती थीं। अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर उन्होंने आश्रमवासी भरतको देखा, जो चीर-वस्त्र और काला मृगचर्म धारण किये दुःखी एवं दुर्बल दिखायी देते थे। उनके सिरपर जटा बढ़ी हुँइ थी, शरीरपर मैल जम गयी थी, भाँइके वनवासके दुःखने उन्हें बहुत ही कृश कर दिया था, फल-मूल ही उनका भोजन था, वे इन्द्रियोंका दमन करके तपस्यामें लगे हुए थे और धर्मका आचरण करते थे। सिरपर जटाका भार बहुत ही ऊँचा दिखायी देता था, वल्कल और मृगचर्मसे उनका शरीर ढका था। वे बड़े नियमसे रहते थे। उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे ब्रह्मर्षिके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। रघुनाथजीकी दोनों चरणपादुकाओंको आगे रखकर वे पृथ्वीका शासन करते थे॥ २९—३२ ॥
भरतजी चारों वर्णोंकी प्रजाओंको सब प्रकारके भयसे सुरक्षित रखते थे। उनके पास मन्त्री, पुरोहित और सेनापति भी योगयुक्त होकर रहते और गेरुए वस्त्र पहनते थे॥ ३३ १/२ ॥
अयोध्याके वे धर्मानुरागी पुरवासी भी उन चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले राजकुमार भरतको उस दशामें छोड़कर स्वयं भोग भोगनेकी इच्छा नहीं करते थे॥ ३४ १/२ ॥
मनुष्यदेह धारण करके आये हुए दूसरे धर्मकी भाँति उन धर्मज्ञ भरतके पास पहुँचकर पवनकुमार हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले— ॥ ३५ १/२ ॥
‘देव! आप दण्डकारण्यमें चीरवस्त्र और जटा धारण करके रहनेवाले जिन श्रीरघुनाथजीके लिये निरन्तर चिन्तित रहते हैं, उन्होंने आपको अपना कुशल-समाचार कहलाया है और आपका भी पूछा है। अब आप इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दीजिये। मैं आपको बड़ा प्रिय समाचार सुना रहा हूँ। आप शीघ्र ही अपने भाँइ श्रीरामसे मिलेंगे॥ ३६-३७ १/२ ॥
‘भगवान् श्रीराम रावणको मारकर मिथिलेशकुमारीको वापस ले सफलमनोरथ हो अपने महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं। उनके साथ महातेजस्वी लक्ष्मण और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता भी हैं। जैसे देवराज इन्द्रके साथ शची शोभा पाती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके साथ पूर्णकामा सीताजी सुशोभित हो रही हैं’॥ ३८-३९॥
हनुमान्जीके ऐसा कहते ही कैकेयी-कुमार भरत सहसा आनन्दविभोर हो पृथ्वीपर गिर पड़े और हर्षसे मूर्च्छित हो गये॥ ४०॥
तत्पश्चात् दो घड़ीके बाद उन्हें होश हुआ और वे उठकर खड़े हो गये। उस समय रघुकुलभूषण श्रीमान् भरतने प्रियवादी हनुमान्जीको बड़े वेगसे पकड़कर दोनों भुजाओंमें भर लिया और शोक-संसर्गसे शून्य परमानन्दजनित विपुल अश्रुबिन्दुओंसे वे उन्हें नहलाने लगे। फिर इस प्रकार बोले—॥ ४१-४२॥
‘भैया! तुम कोई देवता हो या मनुष्य, जो मुझपर कृपा करके यहाँ पधारे हो? सौम्य! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तुम्हें कौन-सी प्रिय वस्तु प्रदान करूँ? (मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखायी देता, जो इस प्रिय संवादके तुल्य हो)॥
‘(तथापि) मैं तुम्हें इसके लिये एक लाख गौएँ, सौ उत्तम गाँव तथा उत्तम आचार-विचारवाली सोलह कुमारी कन्याएँ पत्नीरूपमें समर्पित करता हूँ। उन कन्याओंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान होगी। उनकी नासिका सुघड़, ऊरु मनोहर और मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर होंगे। वे कुलीन होनेके साथ ही सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होंगी’॥ ४४-४५॥
उन प्रमुख वानर-वीर हनुमान्जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका अद्भुत समाचार सुनकर राजकुमार भरतको श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे अत्यन्त हर्ष हुआ और उस हर्षातिरेकसे ही वे फिर इस प्रकार बोले—
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२५ ॥