श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
प्रक्षिप्त सर्ग
प्रक्षिप्त सर्ग*
ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवराज इन्द्रका निद्रासहित लङ्कामें जाकर सीताको दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना
जब सीताका लङ्कामें प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजीने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘देवराज! तीनों लोकोंके हित और राक्षसोंके विनाशके लिये दुरात्मा रावणने सीताको लङ्कामें पहुँचा दिया॥ २ ॥
‘पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुखमें ही पली हैं। इस समय वे अपने पतिके दर्शनसे वंचित हो गयी हैं और राक्षसियोंसे घिरी रहनेके कारण सदा उन्हींको अपने सामने देखती हैं। उनके हृदयमें अपने पतिके दर्शनकी तीव्र लालसा बनी हुई है॥ ३ १/२ ॥
‘लङ्कापुरी समुद्रके तटपर बसी हुई है। वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीताका पता श्रीरामचन्द्रजीको कैसे लगेगा॥ ४ १/२ ॥
‘सीता दुःखके साथ नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबी रहती हैं। पतिके लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं। प्राणयात्रा (भोजन) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशामें निःसंदेह वे अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगी। सीताके प्राणोंका क्षय हो जानेपर हमारे उद्देश्यकी सिद्धिमें पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा॥ ५-६ ॥
‘अतः तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरीमें प्रवेश करके सुमुखी सीतासे मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो’॥ ७ ॥
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्राको साथ लेकर रावणद्वारा पालित लङ्कापुरीमें आये॥ ८ ॥
वहाँ आकर इन्द्रने निद्रासे कहा—‘तुम राक्षसोंको मोहित करो।’ इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्होंने राक्षसोंको मोह (निद्रा) में डाल दिया॥ ९ १/२ ॥
इसी बीचमें सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिकाactionमें बैठी हुई सीताके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ १० १/२ ॥
‘पवित्र मुसकानवाली देवि! आपका भला हो। मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ। जनककिशोरी! मैं आपके उद्धारकार्यकी सिद्धिके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीकी सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें॥ ११-१२ ॥
‘वे मेरे प्रसादसे बड़ी भारी सेनाके साथ समुद्रको पार करेंगे। शुभे! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियोंको अपनी मायासे मोहित किया है॥ १३ ॥
‘विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन—यह हविष्यान्न लेकर निद्राके साथ तुम्हारे पास आया हूँ॥ १४ ॥
‘शुभे! रम्भोरु! यदि मेरे हाथसे इस हविष्यको लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षोंतक भूख और प्यास नहीं सतायेगी’॥ १५ ॥
देवराजके ऐसा कहनेपर शङ्कित हुईं सीताने उनसे कहा—‘मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं?॥ १६ ॥
‘देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप देवताओंके लक्षण अपनी आँखों देखे हैं। यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणोंको दिखाइये’॥ १७ ॥
सीताकी यह बात सुनकर शचीपति इन्द्रने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया—आकाशमें निराधार खड़े रहे। उनकी आँखोंकी पलकें नहीं गिरती थीं। उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उसपर धूलका स्पर्श नहीं होता था। उनके कण्ठमें जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणोंसे इन्द्रको पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं॥ १८-१९ ॥
वे भगवान् श्रीरामके लिये रोती हुई बोलीं— ‘भगवन्! सौभाग्यकी बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीरामका नाम मेरे कानोंमें पड़ा है॥ २० ॥
‘मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूपमें मैं आज आपको देखती हूँ। मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं॥ २१ ॥
‘देवेन्द्र! आपकी आज्ञासे मैं यह पायसरूप हविष्य (दूधकी बनी हुई खीर), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी। यह रघुकुलकी वृद्धि करनेवाला हो’॥ २२ ॥
इन्द्रके हाथसे उस खीरको लेकर उन पवित्र मुसकानवाली मैथिलीने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मणको निवेदन किया और इस प्रकार कहा—॥ २३ ॥
‘यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाईके साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभावसे उन दोनोंके लिये समर्पित है।’ इतना कहनेके पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीरको खाया॥ २४ ॥
इस प्रकार उस हविष्यको खाकर सुन्दर मुखवाली जानकीने भूख-प्यासके कष्टको त्याग दिया और इन्द्रके मुखसे श्रीराम तथा लक्ष्मणका समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं॥ २५ ॥
तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीतासे विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निवासस्थान देवलोकको चले गये॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ॥
* यह सर्ग प्रसंगके अनुकूल और उत्तम है। कुछ प्रतियोंमें यह सानुवाद प्रकाशित भी है, परंतु इसपर तिलक आदि संस्कृत टीकाएँ नहीं उपलब्ध होती हैं; इसलिये कुछ लोगोंने इसे प्रक्षिप्त माना है। उपयोगी होनेके कारण इसे भी यहाँ सानुवाद प्रकाशित किया जाता है। ४६७