श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बत्तीसवाँ सर्ग
बत्तीसवाँ सर्ग
अर्जुनकी भुजाओंसे नर्मदाके प्रवाहका अवरुद्ध होना, रावणके पुष्पोपहारका बह जाना, फिर रावण आदि निशाचरोंका अर्जुनके साथ युद्ध तथा अर्जुनका रावणको कैद करके अपने नगरमें ले जाना
‘नर्मदाजीके तटपर जहाँ क्रूर राक्षसराज रावण महादेवजीको फूलोंका उपहार अर्पित कर रहा था, उस स्थानसे थोड़ी दूरपर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ माहिष्मतीपुरीका शक्तिशाली राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदाके जलमें उतरकर क्रीडा कर रहा था॥ १-२ ॥
‘उन सुन्दरियोंके बीचमें विराजमान राजा अर्जुन सहस्रों हथिनियोंके मध्यभागमें स्थित हुए गजराजके समान शोभा पाता था॥ ३ ॥
‘अर्जुनके हजार भुजाएँ थीं। उनके उत्तम बलको जाँचनेके लिये उसने उन बहुसंख्यक भुजाओंद्वारा नर्मदाके वेगको रोक दिया॥ ४ ॥
‘कृतवीर्य-पुत्र अर्जुनकी भुजाओंद्वारा रोका हुआ नर्मदाका वह निर्मल जल तटपर पूजा करते हुए रावणके पासतक पहुँच गया और उसी ओर उलटी गतिसे बहने लगा॥ ५ ॥
‘नर्मदाके जलका वह वेग मत्स्य, नक्र, मगर, फूल और कुशास्तरणके साथ बढ़ने लगा। उसमें वर्षाकालके समान बाढ़ आ गयी॥ ६ ॥
‘जलका वह वेग, जिसे मानो कार्तवीर्य अर्जुनने ही भेजा हो, रावणके समस्त पुष्पोपहारको बहा ले गया॥ ७ ॥
‘रावणका वह पूजन-सम्बन्धी नियम अभी आधा ही समाप्त हुआ था, उसी दशामें उसे छोड़कर वह प्रतिकूल हुर्ऽइ कमनीय कान्तिवाली प्रेयसीकी भाँति नर्मदाकी ओर देखने लगा॥ ८ ॥
‘पश्चिमसे आते और पूर्व दिशामें प्रवेश करके बढ़ते हुए जलके उस वेगको उसने देखा। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो समुद्रमें ज्वार आ गया हो॥ ९ ॥
‘उसके तटवर्ती वृक्षोंपर रहनेवाले पक्षियोंमें कोर्ऽइ घबराहट नहीं थी। वह नदी अपनी परम उत्तम स्वाभाविक स्थितिमें स्थित थी—उसका जल पहले ही जैसा स्वच्छ एवं निर्मल
दिखायी देता था। उसमें वर्षाकालिक बाढ़के समय जो मलिनता आदि विकार होते थे, उनका उस समय सर्वथा अभाव था। रावणने उस नदीको विकारशून्य हृदयवाली नारीके समान देखा॥
‘उसके मुखसे एक शब्द भी नहीं निकला। उसने मौनव्रतकी रक्षाके लिये बिना बोले ही दाहिने हाथकी अङ्गुलीसे संकेतमात्र करके बाढ़के कारणका पता लगानेके निमित्त शुक और सारणको आदेश दिया॥ ११ ॥
‘रावणका आदेश पाकर दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाशमार्गसे पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए॥ १२ ॥
‘केवल आधा योजन जानेपर ही उन दोनों निशाचरोंने एक पुरुषको स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीडा करते देखा॥ १३ ॥
‘उसका शरीर विशाल सालवृक्षके समान ऊँचा था। उसके केश जलसे ओतप्रोत हो रहे थे। नेत्रप्रान्तमें मदकी लाली दिखायी दे रही थी और चित्त भी मदसे व्याकुल जान पड़ता था॥ १४ ॥
‘वह शत्रुमर्दन वीर अपनी सहस्र भुजाओंसे नदीके वेगको रोककर सहस्रों चरणोंसे पृथ्वीको थामे रखनेवाले पर्वतके समान शोभा पाता था॥ १५ ॥
‘नयी अवस्थाकी सहस्रों सुन्दरियाँ उसे घेरे हुए ऐसी जान पड़ती थीं, मानो सहस्रों मदमत्त हथिनियोंने किसी गजराजको घेर रखा हो॥ १६ ॥
‘उस परम अद्भुत दृश्यको देखकर राक्षस शुक और सारण लौट आये और रावणके पास जाकर बोले— ॥ १७ ॥
‘राक्षसराज! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर कोई सालवृक्षके समान विशालकाय पुरुष है, जो बाँधकी तरह नर्मदाके जलको रोककर स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है॥ १८ ॥
‘उसकी सहस्र भुजाओंसे नदीका जल रुक गया है। इसीलिये यह बारम्बार समुद्रके ज्वारकी भाँति जलके उद्गारकी सृष्टि कर रही है’॥ १९ ॥
‘इस प्रकार कहते हुए शुक और सारणकी बातें सुनकर रावण बोल उठा—‘वही अर्जुन है’ ऐसा कहकर वह युद्धकी लालसासे उसी ओर चल दिया॥ २० ॥
‘राक्षसराज रावण जब अर्जुनकी ओर चला, तब धूल और भारी कोलाहलके साथ वायु प्रचण्ड वेगसे चलने लगी॥ २१ ॥
‘बादलोंने रक्तबिन्दुओंकी वर्षा करके एक बार ही बड़े जोरसे गर्जना की। इधर राक्षसराज रावण महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारणको साथ ले उस स्थानकी ओर चला, जहाँ अर्जुन क्रीडा कर रहा था॥ २२ १/२ ॥
‘काजल या कोयलेके समान काला वह बलवान् राक्षस थोड़ी ही देरमें नर्मदाके उस भयंकर जलाशयके पास जा पहुँचा॥ २३ १/२ ॥
‘वहाँ पहुँचकर राक्षसोंके राजा रावणने मैथुनकी इच्छावाली हथिनियोंसे घिरे हुए गजराजके समान सुन्दरी स्त्रियोंसे परिवेष्टित महाराज अर्जुनको देखा॥ २४ १/२ ॥
‘उसे देखते ही रावणके नेत्र रोषसे लाल हो गये। अपने बलके घमंडसे उद्दण्ड हुए राक्षसराजने अर्जुनके मन्त्रियोंसे गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
‘मन्त्रियो! तुम हैहयराजसे जल्दी जाकर कहो कि रावण तुमसे युद्ध करनेके लिये आया है’॥ २६ १/२ ॥
‘रावणकी बात सुनकर अर्जुनके वे मन्त्री हथियार लेकर खड़े हो गये और रावणसे इस प्रकार बोले—
‘वाह रे रावण! वाह! तुम्हें युद्धके अवसरका अच्छा ज्ञान है। हमारे महाराज जब मदमत्त होकर स्त्रियोंके बीचमें क्रीडा कर रहे हैं, ऐसे समयमें तुम उनके साथ युद्ध करनेके लिये उत्साहित हो रहे हो॥ २८ १/२ ॥
‘जैसे कोई व्याघ्र कामवासनासे वासित हथिनियोंके बीचमें खड़े हुए गजराजसे जूझना चाहता हो, उसी प्रकार तुम स्त्रियोंके समक्ष क्रीडा-विलासमें तत्पर हुए राजा अर्जुनके साथ युद्ध करनेका हौसला दिखा रहे हो॥ २९ १/२ ॥
‘तात! दशग्रीव! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धके लिये उत्साह है, तो रातभर क्षमा करो और आजकी रातमें यहीं ठहरो। फिर कल सबेरे तुम राजा अर्जुनको समराङ्गणमें उपस्थित देखोगे॥ ३० ॥
‘युद्धकी तृष्णासे घिरे हुए राक्षसराज! यदि तुम्हें जूझनेके लिये बड़ी जल्दी लगी हो तो पहले रणभूमिमें हम सबको मार गिराओ। उसके बाद महाराज अर्जुनके साथ युद्ध करने पाओगे’॥ ३१ ॥
‘यह सुनकर रावणके भूखे मन्त्री युद्धस्थलमें अर्जुनके अमात्योंको मार-मारकर खाने लगे॥ ३२ ॥
‘इससे अर्जुनके अनुयायियों तथा रावणके मन्त्रियोंका नर्मदाके तटपर बड़ा कोलाहल होने लगा॥ ३३ ॥
‘अर्जुनके योद्धा बाणों, तोमरों, भालों, त्रिशूलों और वज्रकर्षण नामक शस्त्रोंद्वारा चारों ओरसे धावा करके रावणसहित समस्त राक्षसोंको घायल करने लगे॥ ३४ ॥
‘हैहयराजके योद्धाओंका वेग नाकों, मत्स्यों और मकरोंसहित समुद्रकी भीषण गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था॥ ३५ ॥
‘रावणके वे मन्त्री प्रहस्त, शुक और सारण आदि कुपित हो अपने बल-पराक्रमसे कार्तवीर्य अर्जुनकी सेनाका संहार करने लगे॥ ३६ ॥
‘तब अर्जुनके सेवकोंने भयसे विह्वल होकर क्रीडामें लगे हुए अर्जुनसे मन्त्रीसहित रावणके उस क्रूर कर्मका समाचार सुनाया॥ ३७ ॥
‘सुनकर अर्जुनने अपनी स्त्रियोंसे कहा—‘तुम सब लोग डरना मत।’ फिर उन सबके साथ वह नर्मदाके जलसे उसी तरह बाहर निकला, जैसे कोई दिग्गज (हथिनियोंके साथ) गङ्गाजीके जलसे बाहर निकला हो॥ ३८ ॥
‘उसके नेत्र रोषसे रक्तवर्णके हो गये। वह अर्जुनरूपी अनल प्रलयकालके महाभयंकर पावककी भाँति प्रज्वलित हो उठा॥ ३९ ॥
‘सुन्दर सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले वीर अर्जुनने तुरंत ही गदा उठा ली और उन राक्षसोंपर आक्रमण किया, मानो सूर्यदेव अन्धकार-समूहपर टूट पड़े हों॥ ४० ॥
‘जो भुजाओंद्वारा घुमायी जाती थी उस विशाल गदाको ऊपर उठाकर गरुड़के समान तीव्र वेगका आश्रय ले राजा अर्जुन तत्काल ही उन निशाचरोंपर टूट पड़ा॥ ४१ ॥
‘उस समय मूसलधारी प्रहस्त, जो विन्ध्यगिरिके समान अविचल था, उसका मार्ग रोककर खड़ा हो गया। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें विन्ध्याचलने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया था॥ ४२ ॥
‘मदसे उद्दण्ड हुए प्रहस्तने कुपित हो अर्जुनपर लोहेसे मढ़ा हुआ एक भयंकर मूसल चलाया और कालके समान भीषण गर्जना की॥ ४३ ॥
‘प्रहस्तके हाथसे छूटे हुए उस मूसलके अग्रभागमें अशोक-पुष्पके समान लाल रंगकी आग प्रकट हो गयी, जो जलाती हुई-सी जान पड़ती थी॥ ४४ ॥
‘किंतु कार्तवीर्य अर्जुनको इससे तनिक भी भय नहीं हुआ। उसने अपनी ओर वेगपूर्वक आते हुए उस मूसलको गदा मारकर पूर्णतः विफल कर दिया॥ ४५ ॥
‘तत्पश्चात् गदाधारी हैहयराज, जिसे पाँच सौ भुजाओंसे उठाकर चलाया जाता था, उस भारी गदाको घुमाता हुआ प्रहस्तकी ओर दौड़ा॥ ४६ ॥
‘उस गदासे अत्यन्त वेगपूर्वक आहत होकर प्रहस्त तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो कोई पर्वत वज्रधारी इन्द्रके वज्रका आघात पाकर ढह गया हो॥
‘प्रहस्तको धराशायी हुआ देख मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष समराङ्गणसे भाग खड़े हुए॥
‘प्रहस्तके गिरने और अमात्योंके भाग जानेपर रावणने नृपश्रेष्ठ अर्जुनपर तत्काल धावा किया॥ ४९ ॥
‘फिर तो हजार भुजाओंवाले नरनाथ और बीस भुजाओंवाले निशाचरनाथमें वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ ५० ॥
‘विक्षुब्ध हुए दो समुद्रों, जिनकी जड़ हिल रही हों ऐसे दो पर्वतों, दो तेजस्वी आदित्यों, दो दाहक अग्नियों, बलसे उन्मत्त हुए दो गजराजों, कामवासनावाली गायके लिये लड़नेवाले दो साँड़ों, जोर-जोरसे गर्जनेवाले दो मेघों, उत्कट बलशाली दो सिंहों तथा क्रोधसे भरे हुए रुद्र और कालदेवके समान वे रावण और अर्जुन गदा लेकर एक-दूसरेपर गहरी चोटें करने लगे॥ ५१—५३ ॥
‘जैसे पूर्वकालमें पर्वतोंने वज्रके भयंकर आघात सहे थे, उसी प्रकार वे अर्जुन और रावण वहाँ गदाओंके प्रहार सहन करते थे॥ ५४ ॥
‘जैसे बिजलीकी कड़कसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठती हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी गदाओंके आघातोंसे सभी दिशाएँ गूँजने लगीं॥ ५५ ॥
‘जैसे बिजली चमककर आकाशको सुनहरे रंगसे युक्त कर देती है, उसी प्रकार रावणकी छातीपर गिरायी जाती हुई अर्जुनकी गदा उसके वक्षःस्थलको सुवर्णकी-सी प्रभासे पूर्ण कर देती थी॥ ५६ ॥
‘उसी प्रकार रावणके द्वारा भी अर्जुनकी छातीपर बारम्बार गिरायी जाती हुई गदा किसी महान् पर्वतपर गिरनेवाली उल्काके समान प्रकाशित हो उठती थी॥ ५७॥
‘उस समय न तो अर्जुन थकता था और न राक्षसगणोंका राजा रावण ही। पूर्वकालमें परस्पर जूझनेवाले इन्द्र और बलिकी भाँति उन दोनोंका युद्ध एक समान जान पड़ता था॥ ५८॥
‘जैसे साँड़ अपने सींगोंसे और हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे नरेश और निशाचरराज एक-दूसरेपर गदाओंसे चोट करते थे॥ ५९॥
‘इसी बीचमें अर्जुनने कुपित होकर रावणके विशाल वक्षःस्थलपर दोनों स्तनोंके बीचमें अपनी पूरी शक्तिसे गदाका प्रहार किया॥ ६०॥
‘परंतु रावण तो वरके प्रभावसे सुरक्षित था, अतः रावणकी छातीपर वेगपूर्वक चोट करके भी वह गदा किसी दुर्बल गदाकी भाँति उसके वक्षकी टक्करसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ६१॥
‘तथापि अर्जुनकी चलायी हुई गदाके आघातसे पीड़ित हो रावण एक धनुष पीछे हट गया और आर्तनाद करता हुआ बैठ गया॥ ६२॥
‘दशग्रीवको व्याकुल देख अर्जुनने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया, मानो गरुड़ने झपट्टा मारकर किसी सर्पको धर दबाया हो॥ ६३॥
‘जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने बलिको बाँधा था, उसी तरह बलवान् राजा अर्जुनने दशाननको बलपूर्वक पकड़कर अपने हजार हाथोंके द्वारा उसे मजबूत रस्सोंसे बाँध दिया॥ ६४ ॥
‘दशग्रीवके बाँधे जानेपर सिद्ध, चारण और देवता ‘शाबाश! शाबाश!’ कहते हुए अर्जुनके सिरपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ६५॥
‘जैसे व्याघ्र किसी हिरणको दबोच लेता है अथवा सिंह हाथीको धर दबाता है, उसी प्रकार रावणको अपने वशमें करके हैहयराज अर्जुन हर्षातिरेकसे मेघके समान बारम्बार गर्जना करने लगा॥ ६६॥
‘इसके बाद प्रहस्तने होश सँभाला। दशमुख रावणको बँधा हुआ देख वह राक्षस सहसा कुपित हो हैहयराजकी ओर दौड़ा॥ ६७॥
‘जैसे वर्षाकाल आनेपर समुद्रमें बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था॥ ६८ ॥
‘छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो’ ऐसा बारम्बार कहते हुए राक्षस अर्जुनकी ओर दौड़े। उस समय प्रहस्तने रणभूमिमें अर्जुनपर मूसल और शूलके प्रहार किये॥ ६९ ॥
‘परंतु अर्जुनको उस समय घबराहट नहीं हुई। उस शत्रुसूदन वीरने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरोंके छोड़े हुए उन अस्त्रोंको अपने शरीरतक आनेसे पहले ही पकड़ लिया॥ ७० ॥
‘फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधोंसे उन सब राक्षसोंको घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा ले जाती है॥ ७१ ॥
‘उस समय कार्तवीर्य अर्जुनने समस्त राक्षसोंको भयभीत कर दिया और रावणको लेकर वह अपने सुहृदोंके साथ नगरमें आया॥ ७२ ॥
‘नगरके निकट आनेपर ब्राह्मणों और पुरवासियोंने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेशपर फूलों और अक्षतोंकी वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलिको बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुनने बँधे हुए रावणको साथ लेकर अपनी पुरीमें प्रवेश किया’॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२ ॥
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