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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पाँचवाँ सर्ग

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पाँचवाँ सर्ग

श्रीराम और सुग्रीवकी मैत्री तथा श्रीरामद्वारा वालिवधकी प्रतिज्ञा

श्रीराम और लक्ष्मणको ऋष्यमूक पर्वतपर सुग्रीवके वास-स्थानमें बिठाकर हनुमान्जी वहाँसे मलयपर्वतपर गये (जो ऋष्यमूकका ही एक शिखर है) और वहाँ वानरराज सुग्रीवको उन दोनों रघुवंशी वीरोंका परिचय देते हुए इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘महाप्राज्ञ! जिनका पराक्रम अत्यन्त दृढ़ और अमोघ है, वे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मणके साथ पधारे हैं॥ २ ॥

‘इन श्रीरामका आविर्भाव इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है। ये महाराज दशरथके पुत्र हैं और स्वधर्मपालनके लिये संसारमें विख्यात हैं। अपने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये इस वनमें इनका आगमन हुआ है॥ ३ ॥

‘जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करके अग्निदेवको तृप्त किया था, ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणाएँ बाँटी थीं और लाखों गौएँ दानमें दी थीं। जिन्होंने सत्यभाषणपूर्वक तपके द्वारा वसुधाका पालन किया था, उन्हीं महाराज दशरथके पुत्र ये श्रीराम पिताद्वारा अपनी पत्नी कैकेयीके लिये दिये हुए वरका पालन करनेके निमित्त इस वनमें आये हैं॥ ४-५ ॥

‘महात्मा श्रीराम मुनियोंकी भाँति नियमका पालन करते हुए दण्डकारण्यमें निवास करते थे। एक दिन रावणने आकर सूने आश्रमसे इनकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया। उन्हींकी खोजमें आपसे सहायता लेनेके लिये ये आपकी शरणमें आये हैं॥ ६ ॥

‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आपसे मित्रता करना चाहते हैं। आप चलकर इन्हें अपनावें और इनका यथोचित सत्कार करें; क्योंकि ये दोनों ही वीर हमलोगोंके लिये परम पूजनीय हैं’॥ ७ ॥

हनुमान्जीका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव स्वेच्छासे अत्यन्त दर्शनीय रूप धारण करके श्रीरघुनाथजीके पास आये और बड़े प्रेमसे बोले— ॥ ८ ॥

‘प्रभो! आप धर्मके विषयमें भलीभाँति सुशिक्षित, परम तपस्वी और सबपर दया करनेवाले हैं। पवनकुमार हनुमान्जीने मुझसे आपके यथार्थ गुणोंका वर्णन किया है॥ ९ ॥

‘भगवान्! मैं वानर हूँ और आप नर। मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं, इसमें मेरा ही सत्कार है और मुझे ही उत्तम लाभ प्राप्त हो रहा है॥ १० ॥

‘यदि मेरी मैत्री आपको पसंद हो तो मेरा यह हाथ फैला हुआ है। आप इसे अपने हाथमें ले लें और परस्पर मैत्रीका अटूट सम्बन्ध बना रहे—इसके लिये स्थिर मर्यादा बाँध दें’॥ ११ ॥

सुग्रीवका यह सुन्दर वचन सुनकर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपने हाथसे उनका हाथ पकड़कर दबाया और सौहार्दका आश्रय ले बड़े हर्षके साथ शोकपीड़ित सुग्रीवको छातीसे लगा लिया॥ १२ १/२ ॥

(सुग्रीवके पास जानेसे पूर्व हनुमान्‌जीने पुनः भिक्षुरूप धारण कर लिया था।) श्रीराम-सुग्रीवकी मैत्रीके समय शत्रुदमन हनुमान्‌जीने भिक्षुरूपको त्यागकर अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया और दो लकड़ियोंको रगड़कर आग पैदा की॥ १३ १/२ ॥

तत्पश्चात् उस अग्निको प्रज्वलित करके उन्होंने फूलोंद्वारा अग्निदेवका सादर पूजन किया; फिर एकाग्रचित्त हो श्रीराम और सुग्रीवके बीचमें साक्षीके रूपमें उस अग्निको प्रसन्नतापूर्वक स्थापित कर दिया॥ १४ १/२ ॥

इसके बाद सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजीने उस प्रज्वलित अग्निकी प्रदक्षिणा की और दोनों एक-दूसरेके मित्र बन गये॥ १५ १/२ ॥

इससे उन वानरराज तथा श्रीरघुनाथजी दोनोंके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए तृप्त नहीं होते थे॥ १६ १/२ ॥

उस समय सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आजसे हम दोनोंका दुःख और सुख एक है’॥ १७ १/२ ॥

यह कहकर सुग्रीवने अधिक पत्ते और फूलोंवाली शाल वृक्षकी एक शाखा तोड़ी और उसे बिछाकर वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ उसपर बैठे॥ १८ १/२ ॥

तदनन्तर पवनपुत्र हनुमान्ने अत्यन्त प्रसन्न हो चन्दन-वृक्षकी एक डाली, जिसमें बहुत-से फूल लगे हुए थे, तोड़कर लक्ष्मणको बैठनेके लिये दी॥ १९ १/२ ॥

इसके बाद हर्षसे भरे हुए सुग्रीवने जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे, उस समय भगवान् श्रीरामसे स्निग्ध मधुर वाणीमें कहा—॥ २० १/२ ॥

‘श्रीराम! मैं घरसे निकाल दिया गया हूँ और भयसे पीड़ित होकर यहाँ विचरता हूँ। मेरी पत्नी भी मुझसे छीन ली गयी। मैंने आतङ्कित होकर वनमें इस दुर्गम पर्वतका आश्रय लिया है॥ २१ १/२ ॥

‘रघुनन्दन! मेरे बड़े भाई वालीने मुझे घरसे निकालकर मेरे साथ वैर बाँध लिया है। उसीके त्रास और भयसे उद्भ्रान्तचित्त होकर मैं इस वनमें निवास करता हूँ॥ २२ १/२ ॥

‘महाभाग! वालीके भयसे पीड़ित हुए मुझ सेवकको आप अभय-दान दीजिये। काकुत्स्थ! आपको ऐसा करना चाहिये, जिससे मेरे लिये किसी प्रकारका भय न रह जाय’॥ २३ १/२ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर धर्मके ज्ञाता, धर्मवत्सल, ककुत्स्थकुलभूषण तेजस्वी श्रीरामने हँसते हुए-से वहाँ सुग्रीवको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २४ १/२ ॥

‘महाकपे! मुझे मालूम है कि मित्र उपकाररूपी फल देनेवाला होता है। मैं तुम्हारी पत्नीका अपहरण करनेवाले वालीका वध कर दूँगा॥ २५ १/२ ॥

‘मेरे तूणीरमें संगृहीत हुए ये सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण अमोघ हैं—इनका वार खाली नहीं जाता। ये बड़े वेगशाली हैं। इनमें कंक पक्षीके परोंके पंख लगे हुए हैं, जिनसे ये आच्छादित हैं। इनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं और गाँठें भी सीधी हैं। ये रोषमें भरे हुए सर्पोंके समान छूटते हैं और इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर चोट करते हैं। उस दुराचारी वालीपर मेरे ये बाण अवश्य गिरेंगे॥ २६-२७ १/२ ॥

‘आज देखना, मैं अपने विषधर सर्पोंके समान तीखे बाणोंसे मारकर वालीको पृथ्वीपर गिरा दूँगा। वह इन्द्रके वज्रसे टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतके समान दिखायी देगा’॥ २८ १/२ ॥

अपने लिये परम हितकर वह श्रीरघुनाथजीका वचन सुनकर सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम वाणीमें बोले—॥ २९ ॥

‘वीर! पुरुषसिंह! मैं आपकी कृपासे अपनी प्यारी पत्नी तथा राज्यको प्राप्त कर सकूँ, ऐसा यत्न कीजिये। नरदेव! मेरा बड़ा भाई वैरी हो गया है। आप उसकी ऐसी अवस्था कर दें जिससे वह फिर मुझे मार न सके’॥ ३० ॥

सुग्रीव और श्रीरामकी इस प्रेमपूर्ण मैत्रीके प्रसङ्गमें सीताके प्रफुल्ल कमल-जैसे, कपिराज वालीके सुवर्ण-जैसे तथा निशाचरोंके प्रज्वलित अग्नि-जैसे बायें नेत्र एक साथ ही फड़कने लगे॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ५॥