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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

सत्ताइसवाँ सर्ग

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सत्ताइसवाँ सर्ग

सेनासहित रावणका इन्द्रलोकपर आक्रमण, इन्द्रकी भगवान् विष्णुसे सहायताके लिये प्रार्थना, भविष्यमें रावण-वधकी प्रतिज्ञा करके विष्णुका इन्द्रको लौटाना, देवताओं और राक्षसोंका युद्ध तथा वसुके द्वारा सुमालीका वध

कैलास-पर्वतको पार करके महातेजस्वी दशमुख रावण सेना और सवारियोंके साथ इन्द्रलोकमें जा पहुँचा॥

सब ओरसे आती हुई राक्षस-सेनाका कोलाहल देवलोकमें ऐसा जान पड़ता था, मानो महासागरके मथे जानेका शब्द प्रकट हो रहा हो॥ २ ॥

रावणका आगमन सुनकर इन्द्र अपने आसनसे उठ गये और अपने पास आये हुए समस्त देवताओंसे बोले— ॥ ३ ॥

उन्होंने आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों तथा मरुद्गणोंसे भी कहा— ‘तुम सब लोग दुरात्मा रावणके साथ युद्ध करनेके लिये तैयार हो जाओ’॥ ४ ॥

इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्धमें उन्हींके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली देवता कवच आदि धारण करके युद्धके लिये उत्सुक हो गये॥ ५ ॥

देवराज इन्द्रको रावणसे भय हो गया था। अतः वे दुःखी हो भगवान् विष्णुके पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ६ ॥

‘विष्णुदेव! मैं राक्षस रावणके लिये क्या करूँ? अहो! वह अत्यन्त बलशाली निशाचर मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है॥ ७ ॥

‘वह केवल ब्रह्माजीके वरदानके कारण प्रबल हो गया है; दूसरे किसी हेतुसे नहीं। कमलयोनि ब्रह्माजीने जो वर दे दिया है, उसे सत्य करना हम सब लोगोंका काम है॥ ८ ॥

‘अतः जैसे पहले आपके बलका आश्रय लेकर मैंने नमुचि, वृत्रासुर, बलि, नरक और शम्बर आदि असुरोंको दग्ध कर डाला है, उसी प्रकार इस समय भी इस असुरका अन्त हो जाय, ऐसा कोई उपाय आप ही कीजिये॥ ९ ॥

‘मधुसूदन! आप देवताओंके भी देवता एवं ईश्वर हैं। इस चराचर त्रिभुवनमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो हम देवताओंको सहारा दे सके। आप ही हमारे परम आश्रय हैं॥

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१० ॥

‘आप पद्मनाभ हैं—आपहीके नाभिकमलसे जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप ही सनातनदेव श्रीमान् नारायण हैं। आपने ही इन तीनों लोकोंको स्थापित किया है और आपने ही मुझे देवराज इन्द्र बनाया है॥ ११ ॥

‘भगवन्! आपने ही स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है और प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूत आपमें ही प्रवेश करते हैं॥ १२ ॥

‘इसलिये देवदेव! आप ही मुझे कोई ऐसा अमोघ उपाय बताइये, जिससे मेरी विजय हो। क्या आप स्वयं चक्र और तलवार लेकर रावणसे युद्ध करेंगे?’॥ १३ ॥

इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् नारायणदेव बोले—‘देवराज! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। मेरी बात सुनो—॥ १४ ॥

‘पहली बात तो यह है इस दुष्टात्मा रावणको सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी न तो मार सकते हैं और न परास्त ही कर सकते हैं; क्योंकि वरदान पानेके कारण यह इस समय दुर्जय हो गया है॥ १५ ॥

‘अपने पुत्रके साथ आया हुआ यह उत्कट बलशाली राक्षस सब प्रकारसे महान् पराक्रम प्रकट करेगा। यह बात मुझे अपनी स्वाभाविक ज्ञानदृष्टिसे दिखायी दे रही है॥ १६ ॥

‘सुरेश्वर! दूसरी बात जो मुझे कहनी है, इस प्रकार है—तुम जो मुझसे कह रहे थे कि ‘आप ही उसके साथ युद्ध कीजिये’ उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं इस समय युद्धस्थलमें राक्षस रावणका सामना करनेके लिये नहीं जाऊँगा॥ १७ ॥

‘मुझ विष्णुका यह स्वभाव है कि मैं संग्राममें शत्रु‌का वध किये बिना पीछे नहीं लौटता; परंतु इस समय रावण वरदानसे सुरक्षित है, इसलिये उसकी ओरसे मेरी इस विजय-सम्बन्धिनी इच्छाकी पूर्ति होनी कठिन है॥ १८ ॥

‘परंतु देवेन्द्र! शतक्रतो! मैं तुम्हारे समीप इस बातकी प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आनेपर मैं ही इस राक्षसकी मृत्युका कारण बनूँगा॥ १९ ॥

‘मैं ही रावणको उसके अग्रगामी सैनिकोंसहित मारूँगा और देवताओंको आनन्दित करूँगा; परंतु यह तभी होगा जब मैं जान लूँगा कि इसकी मृत्युका समय आ पहुँचा है॥ २० ॥

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‘देवराज! ये सब बातें मैंने तुम्हें ठीक-ठीक बता दीं। महाबलशाली शचीवल्लभ! इस समय तो तुम्हीं देवताओंसहित जाकर उस राक्षसके साथ निर्भय हो युद्ध करो’॥ २१ ॥

तदनन्तर रुद्र, आदित्य, वसु, मरुद्गण और अश्विनीकुमार आदि देवता युद्धके लिये तैयार होकर तुरंत अमरावतीपुरीसे बाहर निकले और राक्षसोंका सामना करनेके लिये आगे बढ़े॥ २२ ॥

इसी बीचमें रात बीतते-बीतते सब ओरसे युद्धके लिये उद्यत हुई रावणकी सेनाका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा॥ २३ ॥

वे महापराक्रमी राक्षससैनिक सबेरे जागनेपर एक-दूसरेकी ओर देखते हुए बड़े हर्ष और उत्साहके साथ युद्धके लिये ही आगे बढ़ने लगे॥ २४ ॥

तदनन्तर युद्धके मुहानेपर राक्षसोंकी उस अनन्त एवं विशाल सेनाको देखकर देवताओंकी सेनामें बड़ा क्षोभ हुआ॥ २५ ॥

फिर तो देवताओंका दानवों और राक्षसोंके साथ भयंकर युद्ध छिड़ गया। भयंकर कोलाहल होने लगा और दोनों ओरसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार आरम्भ हो गयी॥ २६ ॥

इसी समय रावणके मन्त्री शूरवीर राक्षस, जो बड़े भयंकर दिखायी देते थे, युद्धके लिये आगे बढ़ आये॥

मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक, सारण, संह्लाद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्लाद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक—इन सभी महापराक्रमी राक्षसोंसे घिरे हुए महाबली सुमालीने, जो रावणका नाना था, देवताओंकी सेनामें प्रवेश किया॥ २८—३१ १/२ ॥

उसने कुपित हो नाना प्रकारके पैने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा समस्त देवताओंको उसी तरह मार भगाया, जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है॥ ३२ १/२ ॥

श्रीराम! निशाचरोंकी मार खाकर देवताओंकी वह सेना सिंहद्वारा खदेड़े गये मृगोंकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली॥ ३३ १/२ ॥

इसी समय वसुओंमेंसे आठवें वसुने, जिनका नाम सावित्र है, समराङ्गणमें प्रवेश किया॥ ३४ १/२ ॥

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वे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एवं उत्साहित सैनिकोंसे घिरे हुए थे। उन्होंने शत्रुसेनाओंको संत्रस्त करते हुए रणभूमिमें पदार्पण किया॥ ३५ १/२ ॥

इनके सिवा अदितिके दो महापराक्रमी पुत्र त्वष्टा और पूषाने अपनी सेनाके साथ एक ही समय युद्धस्थलमें प्रवेश किया, वे दोनों वीर निर्भय थे॥ ३६ १/२ ॥

फिर तो देवताओंका राक्षसोंके साथ घोर युद्ध होने लगा। युद्धसे पीछे न हटनेवाले राक्षसोंकी बढ़ती हुई कीर्ति देख-सुनकर देवता उनके प्रति बहुत कुपित थे॥

तत्पश्चात् समस्त राक्षस समरभूमिमें खड़े हुए लाखों देवताओंको नाना प्रकारके घोर अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मारने लगे॥ ३८ १/२ ॥

इसी तरह देवता भी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न घोर राक्षसोंको समराङ्गणमें चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे मार-मारकर यमलोक भेजने लगे॥ ३९ १/२ ॥

श्रीराम! इसी बीचमें सुमाली नामक राक्षसने कुपित होकर नाना प्रकारके आयुधोंद्वारा देवसेनापर आक्रमण किया। उसने अत्यन्त क्रोधसे भरकर बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाली वायुके समान अपने भाँतिभाँतिके तीखे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा समस्त देवसेनाको तितरबितर कर दिया॥ ४०-४१ १/२ ॥

उसके महान् बाणों और भयङ्कर शूलों एवं प्रासोंकी वर्षासे मारे जाते हुए सभी देवता युद्धक्षेत्रमें संगठित होकर खड़े न रह सके॥ ४२ १/२ ॥

सुमालीद्वारा देवताओंके भगाये जानेपर आठवें वसु सावित्रको बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी रथसेनाओंके साथ आकर उस प्रहार करनेवाले निशाचरके सामने खड़े हो गये॥ ४३-४४ ॥

महातेजस्वी सावित्रने युद्धस्थलमें अपने पराक्रमद्वारा सुमालीको आगे बढ़नेसे रोक दिया। सुमाली और वसु दोनोंमेंसे कोई भी युद्धसे पीछे हटनेवाला नहीं था; अतः उन दोनोंमें महान् एवं रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया॥ ४५ १/२ ॥

तदनन्तर महात्मा वसुने अपने विशाल बाणोंद्वारा सुमालीके सर्प जुते हुए रथको क्षणभरमें तोड़-फोड़कर गिरा दिया॥ ४६ १/२ ॥

युद्धस्थलमें सैकड़ों बाणोंसे छिदे हुए सुमालीके रथको नष्ट करके वसुने उस निशाचरके वधके लिये कालदण्डके समान एक भयङ्कर गदा हाथमें ली, जिसका अग्रभाग अग्निके समान

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प्रज्वलित हो रहा था। उसे लेकर सावित्रने सुमालीके मस्तकपर दे मारा॥ ४७-४८ १/२ ॥

उसके ऊपर गिरती हुई वह गदा उल्काके समान चमक उठी, मानो इन्द्रके द्वारा छोड़ी गयी विशाल अशनि भारी गड़गड़ाहटके साथ किसी पर्वतके शिखरपर गिर रही हो॥ ४९ १/२ ॥

उसकी चोट लगते ही समराङ्गणमें सुमालीका काम तमाम हो गया। न उसकी हड्डीका पता लगा, न मस्तकका और न कहीं उसका मांस ही दिखायी दिया। वह सब कुछ उस गदाकी आगसे भस्म हो गया॥ ५० १/२ ॥

युद्धमें सुमालीको मारा गया देख वे सब राक्षस एक-दूसरेको पुकारते हुए एक साथ चारों ओर भाग खड़े हुए। वसुके द्वारा खदेड़े जानेवाले वे राक्षस समरभूमिमें खड़े न रह सके॥ ५१-५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्ताइसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७ ॥

अट्ठाइसवाँ सर्ग

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अट्ठाइसवाँ सर्ग

मेघनाद और जयन्तका युद्ध, पुलोमाका जयन्तको अन्यत्र ले जाना, देवराज इन्द्रका युद्धभूमिमें पदार्पण, रुद्रों तथा मरुद्गणोंद्वारा राक्षससेनाका संहार और इन्द्र तथा रावणका युद्ध

सुमाली मारा गया, वसुने उसके शरीरको भस्म कर दिया और देवताओंसे पीड़ित होकर मेरी सेना भागी जा रही है, यह देख रावणका बलवान् पुत्र मेघनाद कुपित हो समस्त राक्षसोंको लौटाकर देवताओंसे लोहा लेनेके लिये स्वयं खड़ा हुआ॥ १-२ ॥

वह महारथी वीर इच्छानुसार चलनेवाले अग्नितुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वनमें फैलानेवाले प्रज्वलित दावानलके समान उस देवसेनाकी ओर दौड़ा॥ ३ ॥

नाना प्रकारके आयुध धारण करके अपनी सेनामें प्रवेश करनेवाले उस मेघनादको देखते ही सब देवता सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले॥ ४ ॥

उस समय युद्धकी इच्छावाले मेघनादके सामने कोई भी खड़ा न हो सका। तब भयभीत हुए उन समस्त देवताओंको फटकारकर इन्द्रने उनसे कहा— ॥ ५ ॥

‘देवताओ! भय न करो, युद्ध छोड़कर न जाओ और रणक्षेत्रमें लौट आओ। यह मेरा पुत्र जयन्त, जो कभी किसीसे परास्त नहीं हुआ है, युद्धके लिये जा रहा है’॥ ६ ॥

तदनन्तर इन्द्रपुत्र जयन्तदेव अद्भुत सजावटसे युक्त रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये आया॥ ७ ॥

फिर तो सब देवता शचीपुत्र जयन्तको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें आये और रावणके पुत्रपर प्रहार करने लगे॥ ८ ॥

उस समय देवताओंका राक्षसोंके साथ और महेन्द्रकुमारका रावणपुत्रके साथ उनके बल-पराक्रमके अनुरूप युद्ध होने लगा॥ ९ ॥

रावणकुमार मेघनाद जयन्तके सारथि मातलिपुत्र गोमुखपर सुवर्णभूषित बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ १० ॥

शचीपुत्र जयन्तने भी मेघनादके सारथिको घायल कर दिया। तब कुपित हुए मेघनादने जयन्तको भी सब ओरसे क्षत-विक्षत कर दिया॥ ११ ॥

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उस समय क्रोधसे भरा हुआ बलवान् मेघनाद इन्द्रपुत्र जयन्तको आँखें फाड़-फाड़कर देखने और बाणोंकी वर्षासे पीड़ित करने लगा॥ १२ ॥

अत्यन्त कुपित हुए रावणकुमारने देवताओंकी सेनापर भी तीखी धारवाले नाना प्रकारके सहस्रों अस्त्र-शस्त्र बरसाये॥ १३ ॥

उसने शतघ्नी, मूसल, प्रास, गदा, खड्ग और फरसे गिराये तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर भी चलाये॥ १४ ॥

शत्रुसेनाओंके संहारमें लगे हुए रावणकुमारकी मायासे उस समय चारों ओर अन्धकार छा गया; अतः समस्त लोक व्यथित हो उठे॥ १५ ॥

तब शचीकुमारके चारों ओर खड़ी हुई देवताओंकी वह सेना बाणोंद्वारा पीड़ित हो अनेक प्रकारसे अस्वस्थ हो गयी॥ १६ ॥

राक्षस और देवता आपसमें किसीको पहचान न सके। वे जहाँ-तहाँ बिखरे हुए चारों ओर चक्कर काटने लगे॥ १७ ॥

अन्धकारसे आच्छादित होकर वे विवेकशक्ति खो बैठे थे। अतः देवता देवताओंको और राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगे तथा बहुतेरे योद्धा युद्धसे भाग खड़े हुए॥ १८ ॥

इसी बीचमें पराक्रमी वीर दैत्यराज पुलोमा युद्धमें आया और शचीपुत्र जयन्तको पकड़कर वहाँसे दूर हटा ले गया॥ १९ ॥

वह शचीका पिता और जयन्तका नाना था, अतः अपने दौहित्रको लेकर समुद्रमें घुस गया॥ २० ॥

देवताओंको जब जयन्तके गायब होनेकी बात मालूम हुई, तब उनकी सारी खुशी छिन गयी और वे दुःखी होकर चारों ओर भागने लगे॥ २१ ॥

उधर अपनी सेनाओंसे घिरे हुए रावणकुमार मेघनादने अत्यन्त कुपित हो देवताओंपर धावा किया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ २२ ॥

पुत्र लापता हो गया और देवताओंकी सेनामें भगदड़ मच गयी है—यह देखकर देवराज इन्द्रने मातलिसे कहा—'मेरा रथ ले आओ'॥ २३ ॥

मातलिने एक सजा-सजाया महाभयंकर, दिव्य एवं विशाल रथ लाकर उपस्थित कर दिया। उसके द्वारा हाँका जानेवाला वह रथ बड़ा ही वेगशाली था॥ २४ ॥

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तदनन्तर उस रथपर बिजलीसे युक्त महाबली मेघ उसके अग्र-भागमें वायुसे चञ्चल हो बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ २५ ॥

देवेश्वर इन्द्रके निकलते ही नाना प्रकारके बाजे बज उठे, गन्धर्व एकाग्र हो गये और अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे॥ २६ ॥

तत्पश्चात् रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्र नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लिये पुरीसे बाहर निकले॥ २७ ॥

इन्द्रके निकलते ही प्रचण्ड वायु चलने लगी। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाशसे बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं॥ २८ ॥

इसी बीचमें प्रतापी वीर दशग्रीव भी विश्वकर्माके बनाये हुए दिव्य रथपर सवार हुआ॥ २९ ॥

उस रथमें रोंगटे खड़े कर देनेवाले विशालकाय सर्प लिपटे हुए थे। उनकी निःश्वास-वायुसे वह रथ उस युद्धस्थलमें ज्वलित-सा जान पड़ता था॥ ३० ॥

दैत्यों और निशाचरोंने उस रथको सब ओरसे घेर रखा था। समराङ्गणकी ओर बढ़ता हुआ रावणका वह दिव्य रथ महेन्द्रके सामने जा पहुँचा॥ ३१ ॥

रावण अपने पुत्रको रोककर स्वयं ही युद्धके लिये खड़ा हुआ। तब रावणपुत्र मेघनाद युद्धस्थलसे निकलकर चुपचाप अपने रथपर जा बैठा॥ ३२ ॥

फिर तो देवताओंका राक्षसोंके साथ घोर युद्ध होने लगा। जलकी वर्षा करनेवाले मेघोंके समान देवता युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ ३३ ॥

राजन्! दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये किसके साथ युद्ध करता था, इसका पता नहीं लगता था (अर्थात् मतवाला होनेके कारण अपने और पराये सभी सैनिकोंके साथ जूझने लगता था)॥ ३४ ॥

वह अत्यन्त कुपित हो दाँत, लात, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर आदि जो ही पाता उसीसे देवताओंको पीटता था॥ ३५ ॥

वह निशाचर महाभयङ्कर रुद्रोंके साथ भिड़कर घोर युद्ध करने लगा। संग्राममें रुद्रोंने अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा उसे ऐसा क्षत-विक्षत कर दिया था कि उसके शरीरमें थोड़ी-सी भी जगह बिना घावके नहीं रह गयी थी॥ ३६ ॥

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कुम्भकर्णका शरीर शस्त्रोंसे व्याप्त हो खूनकी धारा बहा रहा था। उस समय वह बिजली तथा गर्जनासे युक्त जलकी धारा गिरानेवाले मेघके समान जान पड़ता था॥

तदनन्तर घोर युद्धमें लगी हुंई उस सारी राक्षससेनाको रणभूमिमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले रुद्रों और मरुद्गणोंने मार भगाया॥ ३८ ॥

कितने ही निशाचर मारे गये। कितने ही कटकर धरतीपर लोटने और छटपटाने लगे और बहुत-से राक्षस प्राणहीन हो जानेपर भी उस रणभूमिमें अपने वाहनोंपर ही चिपटे रहे॥ ३९ ॥

कुछ राक्षस रथों, हाथियों, गदहों, ऊँटों, सर्पों, घोड़ों, शिशुमारों, वराहों तथा पिशाचमुख वाहनोंको दोनों भुजाओंसे पकड़कर उनसे लिपटे हुए निश्चेष्ट हो गये थे। कितने ही जो पहलेसे मूर्छित होकर पड़े थे, मूर्च्छा दूर होनेपर उठे, किंतु देवताओंके शस्त्रोंसे छिन्नभिन्न हो मौतके मुखमें चले गये॥ ४०-४१ ॥

प्राणोंसे हाथ धोकर धरतीपर पड़े हुए उन समस्त राक्षसोंका इस तरह युद्धमें मारा जाना जादू-सा आश्चर्यजनक जान पड़ता था॥ ४२ ॥

युद्धके मुहानेपर खूनकी नदी बह चली, जिसके भीतर अनेक प्रकारके शस्त्र ग्राहोंका भ्रम उत्पन्न करते थे। उस नदीके तटपर चारों ओर गीध और कौए छा गये थे॥ ४३ ॥

इसी बीचमें प्रतापी दशग्रीवने जब देखा कि देवताओंने हमारे समस्त सैनिकोंको मार गिराया है, तब उसके क्रोधकी सीमा न रही॥ ४४ ॥

वह समुद्रके समान दूरतक फैली हुंई देवसेनामें घुस गया और समराङ्गणमें देवताओंको मारता एवं धराशायी करता हुआ तुरंत ही इन्द्रके सामने जा पहुँचा॥ ४५ ॥

तब इन्द्रने जोर-जोरसे टङ्कार करनेवाले अपने विशाल धनुषको खींचा। उसकी टङ्कार-ध्वनिसे दसों दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं॥ ४६ ॥

उस विशाल धनुषको खींचकर इन्द्रने रावणके मस्तकपर अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी बाण मारे॥ ४७ ॥

इसी प्रकार महाबाहु निशाचर दशग्रीवने भी अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी वर्षासे इन्द्रको ढक दिया॥ ४८ ॥

वे दोनों घोर युद्धमें तत्पर हो जब बाणोंकी वृष्टि करने लगे, उस समय सब ओर सब कुछ अन्धकारसे आच्छादित हो गया। किसीको किसी भी वस्तुकी पहचान नहीं हो पाती थी॥ ४९ ॥

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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ २८ ॥

उनतीसवाँ सर्ग

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उनतीसवाँ सर्ग

रावणका देवसेनाके बीचसे होकर निकलना, देवताओंका उसे कैद करनेके लिये प्रयत्न, मेघनादका मायाद्वारा इन्द्रको बन्दी बनाना तथा विजयी होकर सेनासहित लङ्काको लौटना

जब सब ओर अन्धकार छा गया, तब बलसे उन्मत्त हुए वे समस्त देवता और राक्षस एक-दूसरेको मारते हुए परस्पर युद्ध करने लगे॥ १ ॥

उस समय देवताओंकी सेनाने राक्षसोंके विशाल सैन्य-समूहका केवल दसवाँ हिस्सा युद्धभूमिमें खड़ा रहने दिया। शेष सब राक्षसोंको यमलोक पहुँचा दिया॥

उस तामस युद्धमें समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे॥

इन्द्र, रावण और रावणपुत्र महाबली मेघनाद— ये तीन ही उस अन्धकाराच्छन्न समराङ्गणमें मोहित नहीं हुए थे॥ ४ ॥

रावणने देखा, मेरी सारी सेना क्षणभरमें मारी गयी, तब उसके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने बड़ी भारी गर्जना की॥ ५ ॥

उस दुर्जय निशाचरने रथपर बैठे हुए अपने सारथिसे क्रोधपूर्वक कहा—'सूत! शत्रुओंकी इस सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक तुम इस सेनाके मध्यभागसे होकर मुझे ले चलो॥ ६ ॥

'आज मैं स्वयं अपने पराक्रमद्वारा नाना प्रकारके शस्त्रोंकी मूसलाधार वृष्टि करके इन सब देवताओंको यमलोक पहुँचा दूँगा॥ ७ ॥

'मैं इन्द्र, कुबेर, वरुण और यमका भी वध करूँगा। सब देवताओंका शीघ्र ही संहार करके स्वयं सबके ऊपर स्थित होऊँगा॥ ८ ॥

'तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। शीघ्र मेरे रथको ले चलो। मैं तुमसे दो बार कहता हूँ, देवताओंकी सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक मुझे अभी ले चलो॥ ९ ॥

'यह नन्दनवनका प्रदेश है, जहाँ इस समय हम दोनों मौजूद हैं। यहींसे देवताओंकी सेनाका आरम्भ होता है। अब तुम मुझे उस स्थानतक ले चलो, जहाँ उदयाचल है (नन्दनवनसे उदयाचलतक देवताओंकी सेना फैली हुई है)'॥ १० ॥

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रावणकी यह बात सुनकर सारथिने मनके समान वेगशाली घोड़ोंको शत्रुसेनाके बीचसे हाँक दिया॥ ११ ॥

रावणके इस निश्चयको जानकर समरभूमिमें रथपर बैठे हुए देवराज इन्द्रने उन देवताओंसे कहा— ॥ १२ ॥

‘देवगण! मेरी बात सुनो। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस निशाचर दशग्रीवको जीवित अवस्थामें ही भलीभाँति कैद कर लिया जाय॥ १३ ॥

‘यह अत्यन्त बलशाली राक्षस वायुके समान वेगशाली रथके द्वारा इस सेनाके बीचमें होकर उसी तरह तीव्रगतिसे आगे बढ़ेगा, जैसे पूर्णिमाके दिन उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त समुद्र बढ़ता है॥ १४ ॥

‘यह आज मारा नहीं जा सकता; क्योंकि ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे पूर्णतः निर्भय हो चुका है। इसलिये हमलोग इस राक्षसको पकड़कर कैद कर लेंगे। तुमलोग युद्धमें इस बातके लिये पूरा प्रयत्न करो॥ १५ ॥

‘जैसे राजा बलिके बाँध लिये जानेपर ही मैं तीनों लोकोंके राज्यका उपभोग कर रहा हूँ, उसी प्रकार इस पापी निशाचरको बंदी बना लिया जाय, यही मुझे अच्छा लगता है’॥ १६ ॥

महाराज श्रीराम! ऐसा कहकर इन्द्रने रावणके साथ युद्ध करना छोड़ दिया और दूसरी ओर जाकर समराङ्गणमें राक्षसोंको भयभीत करते हुए वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥ १७ ॥

युद्धसे पीछे न हटनेवाले रावणने उत्तरकी ओरसे देवसेनामें प्रवेश किया और देवराज इन्द्रने दक्षिणकी ओरसे राक्षससेनामें॥ १८ ॥

देवताओंकी सेना चार सौ कोसतक फैली हुई थी। राक्षसराज रावणने उसके भीतर घुसकर समूची देवसेनाको बाणोंकी वर्षासे ढक दिया॥ १९ ॥

अपनी विशाल सेनाको नष्ट होती देख इन्द्रने बिना किसी घबराहटके दशमुख रावणका सामना किया और उसे चारों ओरसे घेरकर युद्धसे विमुख कर दिया॥ २० ॥

इसी समय रावणको इन्द्रके चंगुलमें फँसा हुआ देख दानवों तथा राक्षसोंने ‘हाय! हम मारे गये’ ऐसा कहकर बड़े जोरसे आर्तनाद किया॥ २१ ॥

तब रावणका पुत्र मेघनाद क्रोधसे अचेत-सा हो गया और रथपर बैठकर अत्यन्त कुपित हो उसने शत्रुको भयंकर सेनामें प्रवेश किया॥ २२ ॥

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पूर्वकालमें पशुपति महादेवजीसे उसको जो तमोमयी महामाया प्राप्त हुई थी, उसमें प्रवेश करके उसने अपनेको छिपा लिया और अत्यन्त क्रोधपूर्वक शत्रुसेनामें घुसकर उसे खदेड़ना आरम्भ किया॥ २३ ॥

वह सब देवताओंको छोड़कर इन्द्रपर ही टूट पड़ा, परंतु महातेजस्वी इन्द्र अपने शत्रुके उस पुत्रको देख न सके॥ २४ ॥

महापराक्रमी देवताओंकी मार खानेसे यद्यपि वहाँ रावणकुमारका कवच नष्ट हो गया था, तथापि उसने अपने मनमें तनिक भी भय नहीं किया॥ २५ ॥

उसने अपने सामने आते हुए मातलिको उत्तम बाणोंसे घायल करके सायकोंकी झड़ी लगाकर पुनः देवराज इन्द्रको भी ढक दिया॥ २६ ॥

तब इन्द्रने रथको छोड़कर सारथिको विदा कर दिया और ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो वे रावणकुमारकी खोज करने लगे॥ २७ ॥

मेघनाद अपनी मायाके कारण बहुत प्रबल हो रहा था। वह अदृश्य होकर आकाशमें विचरने लगा और इन्द्रको मायासे व्याकुल करके बाणोंद्वारा उनपर आक्रमण किया॥ २८ ॥

रावणकुमारको जब अच्छी तरह मालूम हो गया कि इन्द्र बहुत थक गये हैं, तब उन्हें मायासे बाँधकर अपनी सेनामें ले आया॥ २९ ॥

महेन्द्रको उस महासमरसे मेघनादद्वारा बलपूर्वक ले जाये जाते देख सब देवता यह सोचने लगे कि अब क्या होगा?॥ ३० ॥

‘यह युद्धविजयी मायावी राक्षस स्वयं तो दिखायी देता नहीं, इसीलिये इन्द्रपर विजय पानेमें सफल हुआ है। यद्यपि देवराज इन्द्र राक्षसी मायाका संहार करनेकी विद्या जानते हैं, तथापि इस राक्षसने मायाद्वारा बलपूर्वक इनका अपहरण किया है’॥ ३१ ॥

ऐसा सोचते हुए वे सब देवता उस समय रोषसे भर गये और रावणको युद्धसे विमुख करके उसपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे॥ ३२ ॥

रावण आदित्यों और वसुओंका सामना पड़ जानेपर युद्धमें उनके सम्मुख ठहर न सका; क्योंकि शत्रुओंने उसे बहुत पीड़ित कर दिया था॥ ३३ ॥

मेघनादने देखा पिताका शरीर बाणोंके प्रहारसे जर्जर हो गया है और वे युद्धमें उदास दिखायी देते हैं। तब वह अदृश्य रहकर ही रावणसे इस प्रकार बोला—॥

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‘पिताजी! चले आइये। अब हमलोग घर चलें। युद्ध बंद कर दिया जाय। हमारी जीत हो गयी; अतः आप स्वस्थ, निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जाइये॥ ३५ ॥

‘ये जो देवताओंकी सेना तथा तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्र हैं, इन्हें मैं देवसेनाके बीचसे कैद कर लाया हूँ। ऐसा करके मैंने देवताओंका घमंड चूर कर दिया है॥ ३६ ॥

‘आप अपने शत्रुको बलपूर्वक कैद करके इच्छानुसार तीनों लोकोंका राज्य भोगिये। यहाँ व्यर्थ श्रम करनेसे आपको क्या लाभ है? अब युद्धसे कोऽइ प्रयोजन नहीं है’॥ ३७ ॥

मेघनादकी यह बात सुनकर सब देवता युद्धसे निवृत्त हो गये और इन्द्रको साथ लिये बिना ही लौट गये॥ ३८ ॥

अपने पुत्रके उस प्रिय वचनको आदरपूर्वक सुनकर महान् बलशाली देवद्रोही तथा सुविख्यात राक्षसराज रावण युद्धसे निवृत्त हो गया और अपने बेटेसे बोला— ॥ ३९ ॥

‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अपने अत्यन्त बलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करके आज तुमने जो इन अनुपम बलशाली देवराज इन्द्रको जीता और देवताओंको भी परास्त किया है, इससे यह निश्चय हो गया कि तुम मेरे कुल और वंशके यश और सम्मानकी वृद्धि करनेवाले हो॥ ४० ॥

‘बेटा! इन्द्रको रथपर बैठाकर तुम सेनाके साथ यहाँसे लङ्कापुरीको चलो! मैं भी अपने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहा हूँ’॥ ४१ ॥

पिताकी यह आज्ञा पाकर पराक्रमी रावणकुमार मेघनाद देवराजको साथ ले सेना और सवारियोंसहित अपने निवासस्थानको लौटा। वहाँ पहुँचकर उसने युद्धमें भाग लेनेवाले निशाचरोंको विदा कर दिया॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९ ॥

तीसवाँ सर्ग

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तीसवाँ सर्ग

ब्रह्माजीका इन्द्रजित्‌को वरदान देकर इन्द्रको उसकी कैदसे छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्मको याद दिलाकर उनसे वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करनेके लिये कहना, उस यज्ञको पूर्ण करके इन्द्रका स्वर्गलोकमें जाना

रावणपुत्र मेघनाद जब अत्यन्त बलशाली इन्द्रको जीतकर अपने नगरमें ले गया, तब सम्पूर्ण देवता प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके लङ्कामें पहुँचे॥ १ ॥

ब्रह्माजी आकाशमें खड़े-खड़े ही पुत्रों और भाइयोंके साथ बैठे हुए रावणके निकट जा उसे कोमल वाणीमें समझाते हुए बोले—॥ २ ॥

‘वत्स रावण! युद्धमें तुम्हारे पुत्रकी वीरता देखकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ। अहो! इसका उदार पराक्रम तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर है॥ ३ ॥

‘तुमने अपने तेजसे समस्त त्रिलोकीपर विजय पायी है और अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली है। इसलिये पुत्रसहित तुमपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ ४ ॥

‘रावण! तुम्हारा यह पुत्र अतिशय बलशाली और पराक्रमी है। आजसे यह संसारमें इन्द्रजित्‌के नामसे विख्यात होगा॥ ५ ॥

‘राजन्! यह राक्षस बड़ा बलवान् और दुर्जय होगा, जिसका आश्रय लेकर तुमने समस्त देवताओंको अपने अधीन कर लिया॥ ६ ॥

‘महाबाहो! अब तुम पाकशासन इन्द्रको छोड़ दो और बताओ इन्हें छोड़नेके बदलेमें देवता तुम्हें क्या दें’॥ ७ ॥

तब युद्धविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्‌ने स्वयं ही कहा— ‘देव! यदि इन्द्रको छोड़ना है तो मैं इसके बदलेमें अमरत्व लेना चाहता हूँ’॥ ८ ॥

यह सुनकर महातेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजीने मेघनादसे कहा— ‘बेटा! इस भूतलपर पक्षियों, चौपायों तथा महातेजस्वी मनुष्य आदि प्राणियोंमेंसे कोई भी प्राणी सर्वथा अमर नहीं हो सकता’॥ ९ १/२ ॥

भगवान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह बात सुनकर इन्द्रविजयी महाबली मेघनादने वहाँ खड़े हुए अविनाशी ब्रह्माजीसे कहा—॥ १० १/२ ॥

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‘भगवन्! (यदि सर्वथा अमरत्व प्राप्त होना असम्भव है) तब इन्द्रको छोड़नेके सम्बन्धमें जो मेरी दूसरी शर्त है—जो दूसरी सिद्धि प्राप्त करना मुझे अभीष्ट है, उसे सुनिये। मेरे विषयमें यह सदाके लिये नियम हो जाय कि जब मैं शत्रुपर विजय पानेकी इच्छासे संग्राममें उतरना चाहूँ और मन्त्रयुक्त हव्यकी आहुतिसे अग्निदेवकी पूजा करूँ, उस समय अग्निसे मेरे लिये एक ऐसा रथ प्रकट हो जाया करे, जो घोड़ोंसे जुता-जुताया तैयार हो और उसपर जबतक मैं बैठा रहूँ, तबतक मुझे कोऽइ भी मार न सके, यही मेरा निश्चित वर है॥ ११—१३ ॥

‘यदि युद्धके निमित्त किये जानेवाले जप और होमको पूर्ण किये बिना ही मैं समराङ्गणमें युद्ध करने लगूँ, तभी मेरा विनाश हो॥ १४ ॥

‘देव! सब लोग तपस्या करके अमरत्व प्राप्त करते हैं; परंतु मैंने पराक्रमद्वारा इस अमरत्वका वरण किया है’॥ १५ ॥

यह सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने कहा—‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’। इसके बाद इन्द्रजित्ने इन्द्रको मुक्त कर दिया और सब देवता उन्हें साथ लेकर स्वर्गलोकको चले गये॥ १६ ॥

श्रीराम! उस समय इन्द्रका देवोचित तेज नष्ट हो गया था। वे दुःखी हो चिन्तामें डूबकर अपनी पराजयका कारण सोचने लगे॥ १७ ॥

भगवान् ब्रह्माजीने उनकी इस अवस्थाको लक्ष्य किया और कहा—‘शतक्रतो! यदि आज तुम्हें इस अपमानसे शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकालमें तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था?॥ १८ ॥

‘प्रभो! देवराज! पहले मैंने अपनी बुद्धिसे जिन प्रजाओंको उत्पन्न किया था, उन सबकी अङ्गकान्ति, भाषा, रूप और अवस्था सभी बातें एक-जैसी थीं॥ १९ ॥

‘उनके रूप और रंग आदिमें परस्पर कोऽइ विलक्षणता नहीं थी। तब मैं एकाग्रचित्त होकर उन प्रजाओंके विषयमें विशेषता लानेके लिये कुछ विचार करने लगा॥ २० ॥

‘विचारके पश्चात् उन सब प्रजाओंकी अपेक्षा विशिष्ट प्रजाको प्रस्तुत करनेके लिये मैंने एक नारीकी सृष्टि की। प्रजाओंके प्रत्येक अङ्गमें जो-जो अद्भुत विशिष्टता—सारभूत सौन्दर्य था, उसे मैंने उसके अङ्गोंमें प्रकट किया॥ २१ ॥

‘उन अद्भुत रूप-गुणोंसे उपलक्षित जिस नारीका मेरे द्वारा निर्माण हुआ था, उसका नाम हुआ अहल्या। इस जगत्में हल कहते हैं कुरूपताको, उससे जो निन्दनीयता प्रकट होती है उसका नाम हल्य है। जिस नारीमें हल्य (निन्दनीय रूप) न हो, वह अहल्या कहलाती है; इसीलिये वह

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नवनिर्मित नारी अहल्या नामसे विख्यात हुई। मैंने ही उसका नाम अहल्या रख दिया था॥ २२-२३ ॥

‘देवेन्द्र! सुरश्रेष्ठ! जब उस नारीका निर्माण हो गया, तब मेरे मनमें यह चिन्ता हुई कि यह किसकी पत्नी होगी?॥ २४ ॥

‘प्रभो! पुरंदर! देवेन्द्र! उन दिनों तुम अपने स्थान और पदकी श्रेष्ठताके कारण मेरी अनुमतिके बिना ही मन-ही-मन यह समझने लगे थे कि यह मेरी ही पत्नी होगी॥ २५ ॥

‘मैंने धरोहरके रूपमें महर्षि गौतमके हाथमें उस कन्याको सौंप दिया। वह बहुत वर्षोंतक उनके यहाँ रही। फिर गौतमने उसे मुझे लौटा दिया॥ २६ ॥

‘महामुनि गौतमके उस महान् स्थैर्य (इन्द्रिय-संयम) तथा तपस्याविषयक सिद्धिको जानकर मैंने वह कन्या पुनः उन्हींको पत्नीरूपमें दे दी॥ २७ ॥

‘धर्मात्मा महामुनि गौतम उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। जब अहल्या गौतमको दे दी गयी, तब देवता निराश हो गये॥ २८ ॥

‘तुम्हारे तो क्रोधकी सीमा न रही। तुम्हारा मन कामके अधीन हो चुका था; इसलिये तुमने मुनिके आश्रमपर जाकर अग्निशिखाके समान प्रज्वलित होनेवाली उस दिव्य सुन्दरीको देखा॥ २९ ॥

‘इन्द्र! तुमने कुपित और कामसे पीड़ित होकर उसके साथ बलात्कार किया। उस समय उन महर्षिने अपने आश्रममें तुम्हें देख लिया॥ ३० ॥

‘देवेन्द्र! इससे उन परम तेजस्वी महर्षिको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया। उसी शापके कारण तुमको इस विपरीत दशामें आना पड़ा है— शत्रुाका बंदी बनना पड़ा है॥ ३१ ॥

‘उन्होंने शाप देते हुए कहा—‘वासव! शक्र! तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नीके साथ बलात्कार किया है; इसलिये तुम युद्धमें जाकर शत्रुके हाथमें पड़ जाओगे॥ ३२ ॥

‘दुर्बुद्धे! तुम-जैसे राजाके दोषसे मनुष्यलोकमें भी यह जारभाव प्रचलित हो जायगा, जिसका तुमने स्वयं यहाँ सूत्रपात किया है; इसमें संशय नहीं है॥ ३३ ॥

‘जो जारभावसे पापाचार करेगा, उस पुरुषपर उस पापका आधा भाग पड़ेगा और आधा तुमपर पड़ेगा; क्योंकि इसके प्रवर्तक तुम्हीं हो। निःसंदेह तुम्हारा यह स्थान स्थिर नहीं होगा॥ ३४

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॥

'जो कोई भी देवराजके पदपर प्रतिष्ठित होगा, वह वहाँ स्थिर नहीं रहेगा। यह शाप मैंने इन्द्रमात्रके लिये दे दिया है।' यह बात मुनिने तुमसे कही थी॥ ३५ ॥

'फिर उन महातपस्वी मुनिने अपनी उस पत्नीको भी भलीभाँति डाँट-फटकारकर कहा—'दुष्टे! तू मेरे आश्रमके पास ही अदृश्य होकर रह और अपने रूप-सौन्दर्यसे भ्रष्ट हो जा। रूप और यौवनसे सम्पन्न होकर मर्यादामें स्थित नहीं रह सकी है, इसलिये अब लोकमें तू अकेली ही रूपवती नहीं रहेगी (बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ उत्पन्न हो जायँगी)॥ ३६-३७ ॥

'जिस एक रूप-सौन्दर्यको लेकर इन्द्रके मनमें यह काम-विकार उत्पन्न हुआ था, तेरे उस रूप-सौन्दर्यको समस्त प्रजाएँ प्राप्त कर लेंगी; इसमें संशय नहीं है'॥

'तभीसे अधिकांश प्रजा रूपवती होने लगी। अहल्याने उस समय विनीत-वचनोंद्वारा महर्षि गौतमको प्रसन्न किया और कहा—'विप्रवर! ब्रह्मर्षे! देवराजने आपका ही रूप धारण करके मुझे कलङ्कित किया है। मैं उसे पहचान न सकी थी। अतः अनजानमें मुझसे यह अपराध हुआ है, स्वेच्छाचारवश नहीं। इसलिये आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये'॥ ३९-४० ॥

'अहल्याके ऐसा कहनेपर गौतमने उत्तर दिया— 'भद्रे! इक्ष्वाकुवंशमें एक महातेजस्वी महारथी वीरका अवतार होगा, जो संसारमें श्रीरामके नामसे विख्यात होंगे। महाबाहु श्रीरामके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु ही मनुष्य-शरीर धारण करके प्रकट होंगे। वे ब्राह्मण (विश्वामित्र आदि)-के कार्यसे तपोवनमें पधारेंगे। जब तुम उनका दर्शन करोगी, तब पवित्र हो जाओगी। तुमने जो पाप किया है, उससे तुम्हें वे ही पवित्र कर सकते हैं॥ ४१—४३ ॥

'वरवर्णिनि! उनका आतिथ्य-सत्कार करके तुम मेरे पास आ जाओगी और फिर मेरे ही साथ रहने लगोगी'॥

'ऐसा कहकर ब्रह्मर्षि गौतम अपने आश्रमके भीतर आ गये और उन ब्रह्मवादी मुनिकी पत्नी वह अहल्या बड़ी भारी तपस्या करने लगी॥ ४५ ॥

'महाबाहो! उन ब्रह्मर्षि गौतमके शाप देनेसे ही तुमपर यह सारा संकट उपस्थित हुआ है। अतः तुमने जो पाप किया था, उसको याद करो॥ ४६ ॥

'वासव! उस शापके ही कारण तुम शत्रुके कैदमें पड़े हो, दूसरे किसी कारणसे नहीं। अतः अब एकाग्रचित्त हो शीघ्र ही वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करो॥ ४७ ॥

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‘देवेन्द्र! उस यज्ञसे पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। तुम्हारा पुत्र जयन्त उस महासमरमें मारा नहीं गया है। उसका नाना पुलोमा उसे महासागरमें ले गया है। इस समय वह उसीके पास है’॥

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्रने वैष्णवयज्ञका अनुष्ठान किया। वह यज्ञ पूरा करके देवराज स्वर्गलोकमें गये और वहाँ देवराज्यका शासन करने लगे॥ ४९ १/२ ॥

रघुनन्दन! यह है इन्द्रविजयी मेघनादका बल, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है। उसने देवराज इन्द्रको भी जीत लिया था; फिर दूसरे प्राणियोंकी तो बिसात ही क्या थी॥ ५० १/२ ॥

अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तत्काल बोल उठे—‘आश्चर्य है।’ साथ ही वानरों और राक्षसोंको भी इस बातसे बड़ा विस्मय हुआ॥ ५१ १/२ ॥

उस समय श्रीरामके बगलमें बैठे हुए विभीषणने कहा—‘मैंने पूर्वकालमें जो आश्चर्यकी बातें देखी थीं, उनका आज महर्षिने स्मरण दिला दिया है’॥ ५२ १/२ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यजीसे कहा—‘आपकी बात सत्य है। मैंने भी विभीषणके मुखसे यह बात सुनी थी।’ फिर अगस्त्यजी बोले—‘श्रीराम! इस प्रकार पुत्रसहित रावण सम्पूर्ण जगत्के लिये कण्टकरूप था, जिसने देवराज इन्द्रको भी संग्राममें जीत लिया था’॥ ५३-५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३० ॥

इकतीसवाँ सर्ग

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इकतीसवाँ सर्ग

रावणका माहिष्मतीपुरीमें जाना और वहाँके राजा अर्जुनको न पाकर मन्त्रियोंसहित उसका विन्ध्यगिरिके समीप नर्मदामें नहाकर भगवान् शिवकी आराधना करना

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम करके पुनः विस्मयपूर्वक पूछा—॥ १ ॥

‘भगवन्! द्विजश्रेष्ठ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वीपर विजय करता घूम रहा था, उस समय क्या यहाँके सभी लोग शौर्यसम्बन्धी गुणोंसे शून्य ही थे?॥

‘क्या उन दिनों यहाँ कोऽइ भी क्षत्रिय-नरेश अथवा क्षत्रियेतर राजा अधिक बलवान् नहीं था, जिससे इस भूतलपर पहुँचकर राक्षसराज रावणको पराजित या अपमानित होना नहीं पड़ा॥ ३ ॥

‘अथवा उस समयके सभी राजा पराक्रमशून्य तथा शस्त्रज्ञानसे हीन थे, जिसके कारण उन बहुसंख्यक श्रेष्ठ नरपालोंको रावणसे परास्त होना पड़ा’॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर भगवान् अगस्त्य-मुनि ठठाकर हँस पड़े और जैसे ब्रह्माजी महादेवजीसे कोऽइ बात कहते हों, इसी तरह वे श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥

‘पृथ्वीनाथ! भूपालशिरोमणे! श्रीराम! इसी प्रकार सब राजाओंको सताता और पराजित करता हुआ रावण इस पृथ्वीपर विचरने लगा॥ ६ ॥

‘घूमते-घूमते वह स्वर्गपुरी अमरावतीके समान सुशोभित होनेवाली माहिष्मती नामक नगरीमें जा पहुँचा, जहाँ अग्निदेव सदा विद्यमान रहते थे॥ ७ ॥

‘उन अग्निदेवके प्रभावसे वहाँ अग्निके ही समान तेजस्वी अर्जुन नामक राजा राज्य करता था, जिसके राज्यकालमें कुशास्तरणसे युक्त अग्निकुण्डमें सदा अग्निदेवता निवास करते थे॥ ८ ॥

‘जिस दिन रावण वहाँ पहुँचा, उसी दिन बलवान् हैहयराज राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-क्रीड़ा करनेके लिये चला गया था॥ ९ ॥

‘उसी दिन रावण माहिष्मतीपुरीमें आया। वहाँ आकर राक्षसराज रावणने राजाके मन्त्रियोंसे पूछा—॥ १० ॥