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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

अड़तालीसवाँ सर्ग

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अड़तालीसवाँ सर्ग

राजा सुमतिसे सत्कृत हो एक रात विशालामें रहकर मुनियोंसहित श्रीरामका मिथिलापुरीमें पहुँचना और वहाँ सूने आश्रमके विषयमें पूछनेपर विश्वामित्रजीका उनसे अहल्याको शाप प्राप्त होनेकी कथा सुनाना


वहाँ परस्पर समागमके समय एक-दूसरेका कुशल-मंगल पूछकर बातचीतके अन्तमें राजा सुमतिने महामुनि विश्वामित्रसे कहा—॥ १ ॥

‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। ये दोनों कुमार देवताओंके तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं। इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंहकी गतिके समान है। ये दोनों वीर सिंह और साँड़के समान प्रतीत होते हैं॥ २ ॥

इनके बड़े-बड़े नेत्र विकसित कमलदलके समान शोभा पाते हैं। ये दोनों तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं। अपने सुन्दर रूपके द्वारा दोनों अश्विनीकुमारोंको लज्जित करते हैं तथा युवावस्थाके निकट आ पहुँचे हैं॥

‘इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो दो देवकुमार दैवेच्छावश देवलोकसे पृथ्वीपर आ गये हों। मुने! ये दोनों किसके पुत्र हैं और कैसे, किसलिये यहाँ पैदल ही आये हैं?॥ ४ ॥

‘जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये दोनों कुमार इस देशको सुशोभित कर रहे हैं। शरीरकी ऊँचाई, मनोभावसूचक संकेत तथा चेष्टा (बोलचाल) में ये दोनों एक-दूसरेके समान हैं॥ ५ ॥

‘श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले ये दोनों नरश्रेष्ठ वीर इस दुर्गम मार्गमें किसलिये आये हैं? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’॥ ६ ॥

सुमतिका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने उन्हें सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे निवेदन किया। सिद्धाश्रममें निवास और राक्षसोंके वधका प्रसंग भी यथावत् रूपसे कह सुनाया। विश्वामित्रजीकी बात सुनकर राजा सुमतिको बड़ा विस्मय हुआ॥ ७ ॥

उन्होंने परम आदरणीय अतिथिके रूपमें आये हुए उन दोनों महाबली दशरथ-पुत्रोंका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ८ ॥

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सुमतिसे उत्तम आदर-सत्कार पाकर वे दोनों रघुवंशी कुमार वहाँ एक रात रहे और सबेरे उठकर मिथिलाकी ओर चल दिये॥ ९ ॥

मिथिलामें पहुँचकर जनकपुरीकी सुन्दर शोभा देख सभी महर्षि साधु-साधु कहकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ १० ॥

मिथिलाके उपवनमें एक पुराना आश्रम था, जो अत्यन्त रमणीय होकर भी सूनसान दिखायी देता था। उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिवर विश्वामित्रजीसे पूछा— ॥ ११ ॥

‘भगवन्! यह कैसा स्थान है, जो देखनेमें तो आश्रम-जैसा है; किंतु एक भी मुनि यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पहले यह आश्रम किसका था?’॥ १२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह प्रश्न सुनकर प्रवचनकुशल महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्रने इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १३ ॥

‘रघुनन्दन! पूर्वकालमें यह जिस महात्माका आश्रम था और जिन्होंने क्रोधपूर्वक इसे शाप दे दिया था, उनका तथा उनके इस आश्रमका सब वृत्तान्त तुमसे कहता हूँ। तुम यथार्थरूपसे इसको सुनो॥ १४ ॥

‘नरश्रेष्ठ! पूर्वकालमें यह स्थान महात्मा गौतमका आश्रम था। उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य जान पड़ता था। देवता भी इसकी पूजा एवं प्रशंसा किया करते थे॥ १५ ॥

‘महायशस्वी राजपुत्र! पूर्वकालमें महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्याके साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे। उन्होंने बहुत वर्षोंतक यहाँ तप किया था॥ १६ ॥

‘एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रमपर नहीं थे, उपयुक्त अवसर समझकर शचीपति इन्द्र गौतम मुनिका वेष धारण किये वहाँ आये और अहल्यासे इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥

“सदा सावधान रहनेवाली सुन्दरी! रतिकी इच्छा रखनेवाले प्रार्थी पुरुष ऋतुकालकी प्रतीक्षा नहीं करते हैं। सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी! मैं (इन्द्र) तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ' ॥ १८ ॥

‘रघुनन्दन! महर्षि गौतमका वेष धारण करके आये हुए इन्द्रको पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारीने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहलवश उनके साथ समागमका निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया॥

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‘रतिके पश्चात् उसने देवराज इन्द्रसे संतुष्टचित्त होकर कहा—‘सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागमसे कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँसे चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतमके कोपसे आप अपनी और मेरी भी सब प्रकारसे रक्षा कीजिये’॥ २० १/२ ॥

‘तब इन्द्रने अहल्यासे हँसते हुए कहा—‘सुन्दरी! मैं भी संतुष्ट हो गया। अब जैसे आया था, उसी तरह चला जाऊँगा’॥ २१ १/२ ॥

‘श्रीराम! इस प्रकार अहल्यासे समागम करके इन्द्र जब उस कुटीसे बाहर निकले, तब गौतमके आ जानेकी आशङ्कासे बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक भागनेका प्रयत्न करने लगे॥ २२ १/२ ॥

‘इतनेहीमें उन्होंने देखा, देवताओं और दानवोंके लिये भी दुर्धर्ष, तपोबलसम्पन्न महामुनि गौतम हाथमें समिधा लिये आश्रममें प्रवेश कर रहे हैं। उनका शरीर तीर्थके जलसे भीगा हुआ है और वे प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे हैं॥ २३-२४ १/२ ॥

‘उनपर दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र भयसे थर्रा उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया। दुराचारी इन्द्रको मुनिका वेष धारण किये देख सदाचारसम्पन्न मुनिवर गौतमजीने रोषमें भरकर कहा—॥ २५-२६ ॥

‘“दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करनेयोग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल (अण्डकोषोंसे रहित) हो जायगा’॥ २७ ॥

‘रोषमें भरे हुए महात्मा गौतमके ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्रके दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २८ ॥

इन्द्रको इस प्रकार शाप देकर गौतमने अपनी पत्नीको भी शाप दिया—‘दुराचारिणी! तू भी यहाँ कऽइ हजार वर्षोंतक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुऽइ राखमें पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियोंसे अदृश्य रहकर इस आश्रममें निवास करेगी। जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वनमें पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करनेसे तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी’॥ २९—३२ ॥

‘अपनी दुराचारिणी पत्नीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम इस आश्रमको छोड़कर चले गये और सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हिमालयके रमणीय शिखरपर रहकर तपस्या

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करने लगे’॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

उनचासवाँ सर्ग

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उनचासवाँ सर्ग

पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़के अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार

तदनन्तर इन्द्र अण्डकोषसे रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रोंमें त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणोंसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘देवताओ! महात्मा गौतमकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओंका कार्य ही सिद्ध किया है॥ २ ॥

‘मुनिने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोषसे रहित कर दिया और अपनी पत्नीका भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्याका अपहरण हुआ है॥ ३ ॥

‘(यदि मैं उनकी तपस्यामें विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओंका राज्य ही छीन लेते। अतः ऐसा करके) मैंने देवताओंका ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोषसे युक्त करनेका प्रयत्न करो’ ॥ ४ ॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर मरुद्गणोंसहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओंके पास जाकर बोले— ॥ ५ ॥

‘पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोषसे युक्त है और इन्द्र अण्डकोषरहित कर दिये गये हैं। अतः इस भेड़ेके दोनों अण्डकोषोंको लेकर आप शीघ्र ही इन्द्रको अर्पित कर दें॥ ६ ॥

‘अण्डकोषसे रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थानमें आपलोगोंको परम संतोष प्रदान करेगा। अतः जो मनुष्य आपलोगोंकी प्रसन्नताके लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आपलोग उस दानका उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे’ ॥ ७ ॥

अग्निकी यह बात सुनकर पितृदेवताओंने एकत्र हो भेड़ेके अण्डकोषोंको उखाड़कर इन्द्रके शरीरमें उचित स्थानपर जोड़ दिया॥ ८ ॥

ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभीसे वहाँ आये हुए समस्त पितृ-देवता अण्डकोषरहित भेड़ोंको ही उपयोगमें लाते हैं और दाताओंको उनके दानजनित फलोंके भागी बनाते हैं॥ ९ ॥

रघुनन्दन! उसी समयसे महात्मा गौतमके तपस्याजनित प्रभावसे इन्द्रको भेड़ोंके अण्डकोष धारण करने पड़े॥ १० ॥

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महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतमके इस आश्रमपर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्याका उद्धार करो॥ ११ ॥

विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन महर्षिको आगे करके उस आश्रममें प्रवेश किया॥ १२ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा—महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्यासे देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोकके मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे॥ १३ ॥

उनका स्वरूप दिव्य था। विधाताने बड़े प्रयत्नसे उनके अंगोंका निर्माण किया था। वे मायामयी-सी प्रतीत होती थीं। धूमसे घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलोंसे ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जलके भीतर उद्भासित होनेवाली सूर्यकी दुर्धर्ष प्रभाके समान दृष्टिगोचर होती थीं॥ १४-१५ ॥

गौतमके शापवश श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन होनेसे पहले तीनों लोकोंके किसी भी प्राणीके लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीरामका दर्शन मिल जानेसे जब उनके शापका अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं॥

उस समय श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ अहल्याके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षि गौतमके वचनोंका स्मरण करके अहल्याने बड़ी सावधानीके साथ उन दोनों भाइयोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार अहल्याका वह आतिथ्य ग्रहण किया॥ १७-१८ ॥

उस समय देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा॥ १९ ॥

महर्षि गौतमके अधीन रहनेवाली अहल्या अपनी तपःशक्तिसे विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुईं—यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ २० ॥

महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्याको अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीरामकी विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की॥ २१ ॥

महामुनि गौतमकी ओरसे विधिपूर्वक उत्तम पूजा— आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजीके साथ मिथिलापुरीको चले गये॥ २२ ॥

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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ४९॥

पचासवाँ सर्ग

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पचासवाँ सर्ग

श्रीराम आदिका मिथिला-गमन, राजा जनकद्वारा विश्वामित्रका सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मणके विषयमें जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना

तदनन्तर लक्ष्मणसहित श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके महर्षि गौतमके आश्रमसे ऽईशानकोणकी ओर चले और मिथिलानरेशके यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे॥ १ ॥

वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे कहा—'महाभाग! महात्मा जनकके यज्ञका समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँ नाना देशोंके निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदोंके स्वाध्यायसे शोभा पा रहे हैं॥ २-३ ॥

'ऋषियोंके बाड़े सैकड़ों छकड़ोंसे भरे दिखायी दे रहे हैं। ब्रह्मन्! अब ऐसा कोऽइ स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हमलोग भी ठहरें'॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने एकान्त स्थानमें डेरा डाला, जहाँ पानीका सुभीता था॥ ५ ॥

अनिन्द्य (उत्तम) आचार-विचारवाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनकने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्दको आगे करके [अर्घ्य लिये विनीतभावसे उनका स्वागत करनेको चल दिये]॥ ६ ॥

उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज् भी शीघ्रतापूर्वक चले। राजाने विनीतभावसे सहसा आगे बढ़कर महर्षिकी अगवानी की तथा धर्मशास्त्रके अनुसार विश्वामित्रको धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया॥ ७ १/२ ॥

महात्मा राजा जनककी वह पूजा ग्रहण करके मुनिने उनका कुशल-समाचार पूछा तथा उनके यज्ञकी निर्बाध स्थितिके विषयमें जिज्ञासा की॥ ८ १/२ ॥

राजाके साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल-मंगल पूछकर विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ उन सभी महर्षियोंसे यथायोग्य मिले॥ ९ १/२ ॥

इसके बाद राजा जनकने मुनिवर विश्वामित्रसे हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! आप इन मुनीश्वरोंके साथ आसनपर विराजमान होइये'॥ १० १/२ ॥

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यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसनपर बैठ गये। फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियोंसहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनोंपर विराजमान हो गये॥

तत्पश्चात् राजा जनकने विश्वामित्रजीकी ओर देखकर कहा— 'भगवन्! आज देवताओंने मेरे यज्ञकी आयोजना सफल कर दी॥ १३ ॥

'आज पूज्य चरणोंके दर्शनसे मैंने यज्ञका फल पा लिया। ब्रह्मन्! आप मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने इतने महर्षियोंके साथ मेरे यज्ञमण्डपमें पदार्पण किया, इससे मैं धन्य हो गया। यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है॥ १४ १/२ ॥

'ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजोंका कहना है कि 'मेरी यज्ञदीक्षाके बारह दिन ही शेष रह गये हैं। अतः कुशिकनन्दन! बारह दिनोंके बाद यहाँ भाग ग्रहण करनेके लिये आये हुए देवताओंका दर्शन कीजियेगा'॥

मुनिवर विश्वामित्रसे ऐसा कहकर उस समय प्रसन्नमुख हुए जितेन्द्रिय राजा जनकने पुनः उनसे हाथ जोड़कर पूछा—॥ १६ १/२ ॥

'महामुने! आपका कल्याण हो। देवताके समान पराक्रमी और सुन्दर आयुध धारण करनेवाले ये दोनों वीर राजकुमार जो हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, सिंह और साँड़के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूपसे अश्विनीकुमारोंको भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी-अभी यौवनावस्थामें प्रवेश किया है तथा जो स्वेच्छानुसार देवलोकसे उतरकर पृथ्वीपर आये हुए दो देवताओंके समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्यसे पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य

आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये अपनी उपस्थितिसे इस देशको विभूषित कर रहे हैं। ये दोनों एक-दूसरेसे बहुत मिलते-जुलते हैं। इनके शरीरकी ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ प्रायः एक-सी हैं। मैं इन दोनों काकपक्षधारी वीरोंका परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ'॥ १७—२१ ॥

महात्मा जनकका यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबलसे सम्पन्न विश्वामित्रजीने कहा— 'राजन्! ये दोनों महाराज दशरथके पुत्र हैं'॥ २२ ॥

इसके बाद उन्होंने उन दोनोंके सिद्धाश्रममें निवास, राक्षसोंके वध, बिना किसी घबराहटके मिथिलातक आगमन, विशालापुरीके दर्शन, अहल्याके साक्षात्कार तथा महर्षि गौतमके साथ

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समागम आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। फिर अन्तमें यह भी बताया कि ‘ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुषके सम्बन्धमें कुछ जाननेकी इच्छासे यहाँतक आये हैं’॥ २३-२४ ॥

महात्मा राजा जनकसे ये सब बातें निवेदन करके महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥

इक्यावनवाँ सर्ग

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इक्यावनवाँ सर्ग

शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीकी वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजीके शरीरमें रोमाञ्च हो आया॥ १ ॥

वे गौतमके ज्येष्ठ पुत्र थे। तपस्यासे उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी। वे श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनमात्रसे ही बड़े विस्मित हुए॥ २ ॥

उन दोनों राजकुमारोंको सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीसे पूछा— ॥ ३ ॥

‘मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनोंसे तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीरामको उनका दर्शन कराया?॥ ४ ॥

‘क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वनमें होनेवाले फल-फूल आदिसे समस्त देहधारियोंके लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजीका पूजन (आदर-सत्कार) किया था?॥ ५ ॥

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीरामसे वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माताके प्रति देवराज इन्द्रद्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचारद्वारा घटित हुआ था?॥

‘मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो। क्या श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन आदिके प्रभावसे मेरी माता शापमुक्त हो पिताजीसे जा मिलीं?॥ ७ ॥

‘कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिताने श्रीरामका पूजन किया था? क्या उन महात्माकी पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं?॥ ८ ॥

‘विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता-पिताद्वारा सम्मानित हुए श्रीरामने मेरे पूज्य पिताका शान्त चित्तसे अभिवादन किया था?’॥ ९ ॥

शतानन्दका यह प्रश्न सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्रने बातचीत करनेमें कुशल शतानन्दको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १० ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतमसे उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्निसे रेणुका मिली

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है'॥ ११ ॥

बुद्धिमान् विश्वामित्रकी यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्दने श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात कही—॥ १२ ॥

'नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्रको आगे करके यहाँतक पधारनेका कष्ट उठाया॥ १३ ॥

'महर्षि विश्वामित्रके कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्यासे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत्के परम आश्रय (हितैषी) हैं॥ १४ ॥

'श्रीराम! इस पृथ्वीपर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोऽइ नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है॥ १५ ॥

'मैं महात्मा कौशिकके बल और स्वरूपका यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये॥ १६ ॥

'ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे। इन्होंने शत्रुओंके दमनपूर्वक दीर्घकालतक राज्य किया था। ये धर्मज्ञ और विद्वान् होनेके साथ ही प्रजावर्गके हितसाधनमें तत्पर रहते थे॥ १७ ॥

'प्राचीनकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे प्रजापतिके पुत्र थे। कुशके बलवान् पुत्रका नाम कुशनाभ हुआ। वह बड़ा ही धर्मात्मा था॥ १८ ॥

'कुशनाभके पुत्र गाधि नामसे विख्यात थे। उन्हीं गाधिके महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं॥ १९ ॥

'महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने कऽइ हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन तथा राज्यका शासन किया॥ २० ॥

'एक समयकी बात है महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे॥ २१ ॥

'वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों और आश्रमोंमें क्रमशः विचरते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे, जो नाना प्रकारके फूलों, लताओं और वृक्षोंसे शोभा पा रहा

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था। नाना प्रकारके मृग (वन्यपशु) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रममें निवास करते थे॥ २२-२३ ॥

‘देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढ़ाते थे। शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे। बहुत-से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंके समुदाय उसका सेवन करते थे॥ २४ १/२ ॥

‘तपस्यासे सिद्ध हुए अग्निके समान तेजस्वी महात्मा तथा ब्रह्माके समान महामहिम महात्मा सदा उस आश्रममें भरे रहते थे। उनमेंसे कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर। कितने ही महात्मा फल-मूल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे। राग आदि दोषोंको जीतकर मन और इन्द्रियोंपर काबू रखनेवाले बहुत-से ऋषि जप-होममें लगे रहते थे। वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मा सब ओरसे उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे। इन सब विशेषताओंके कारण महर्षि वसिष्ठका वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाबली विश्वामित्रने उसका दर्शन किया’॥ २५—२८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥

बावनवाँ सर्ग

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बावनवाँ सर्ग

महर्षि वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रका सत्कार और कामधेनुको अभीष्ट वस्तुओंकी सृष्टि करनेका आदेश

‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठका दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ १ ॥

‘तब महात्मा वसिष्ठने कहा— ‘राजन्! तुम्हारा स्वागत है।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया॥ २ ॥

‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसनपर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठने उन्हें विधिपूर्वक फल-मूलका उपहार अर्पित किया॥ ३ ॥

‘वसिष्ठजीसे वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्रने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदिका कुशल-समाचार पूछा। फिर वसिष्ठजीने उन नृपश्रेष्ठसे सबके सकुशल होनेकी बात बतायी॥ ४-५ ॥

‘फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा— ॥ ६ ॥

‘राजन्! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजाको प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीतिसे प्रजावर्गका पालन करते हो?॥ ७ ॥

‘शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्योंका अच्छी तरह भरण-पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओंपर विजय पा ली है?॥ ८ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्र-पौत्र आदि सब सकुशल हैं?’॥ ९ ॥

‘तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने विनयशील महर्षि वसिष्ठको उत्तर दिया— ‘हाँ भगवन्! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है?’॥ १० ॥

‘तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे। उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया॥ ११ ॥

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‘रघुनन्दन! बातचीत करनेके पश्चात् भगवान् वसिष्ठने विश्वामित्रसे हँसते हुए-से इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है। मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेनाका यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ। तुम मेरे इस अनुरोधको स्वीकार करो॥ १३ ॥

‘राजन्! तुम अतिथियोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है। अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कारको तुम ग्रहण करो’॥ १४ ॥

‘वसिष्ठके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्रने कहा— ‘मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनोंसे ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया॥ १५ ॥

‘भगवन्! आपके आश्रमपर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओंसे मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ है। सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसीसे मेरी पूजा हो गयी॥ १६ ॥

‘महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया। आपको नमस्कार है। अब मैं यहाँसे जाऊँगा। आप मैत्रीपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखिये’॥ १७ ॥

ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्रसे उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठने निमन्त्रण स्वीकार करनेके लिये बारम्बार आग्रह किया॥ १८ ॥

तब गाधिनन्दन विश्वामित्रने उन्हें उत्तर देते हुए कहा— ‘बहुत अच्छा। मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है। मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं। आपकी जैसी रुचि हो— आपको जो प्रिय लगे, वही हो’॥ १९ ॥

‘राजाके ऐसा कहनेपर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनुको बुलाया, जिसके पाप (अथवा मैल) घुल गये थे(वह कामधेनु थी)॥ २० ॥

‘(उसे बुलाकर ऋषिने कहा—) शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षिका महाराजाओंके योग्य उत्तम भोजन आदिके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करनेका निश्चय किया है। तुम मेरे इस मनोरथको सफल करो॥ २१ ॥

‘षड्रस भोजनोंमेंसे जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो। दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहनेसे इन अतिथियोंके लिये अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करो॥ २२ ॥

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‘शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य (चटनी आदि) और चोष्य (चूसनेकी वस्तु) से युक्त भाँतिभाँतिके अन्नोंकी ढेरी लगा दो। सभी आवश्यक वस्तुओंकी सृष्टि कर दो। शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे’॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

तिरपनवाँ सर्ग

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तिरपनवाँ सर्ग

कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न-पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना और उनका देनेसे अस्वीकार करना

‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर चितकबरे रंगकी उस कामधेनुने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥ १ ॥

‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥ २ ॥

‘गरम-गरम भातके पर्वतके सदृश ढेर लग गये। मिष्ठान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥ ३ ॥

‘भाँति-भाँतिके सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकारके भोजनोंसे भरी हुईं चाँदीकी सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥ ४ ॥

‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठने विश्वामित्रजीकी सारी सेनाके लोगोंको भलीभाँति तृप्त किया। उस सेनामें बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥ ५ ॥

‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुरकी रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितोंके साथ बहुत ही हृष्ट-पुष्ट हो गये॥ ६ ॥

‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोले— ‘ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। बातचीत करनेमें कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥ ८ ॥

‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेनेका अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन्! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है’॥ ९ १/२ ॥

‘विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजाको उत्तर देते हुए बोले—॥ १० १/२ ॥

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‘शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदीके ढेर लेकर भी बदलेमें इस शबला गौको नहीं दूँगा। यह मेरे पाससे अलग होने योग्य नहीं है॥ १२॥

‘जैसे मनस्वी पुरुषकी अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखनेवाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसीपर निर्भर है॥ १३॥

‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँतिकी विद्याएँ इस कामधेनुके ही अधीन हैं॥ १४॥

‘राजर्षे! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है। मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकारसे संतुष्ट करनेवाली है। राजन्! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’॥ १५ १/२॥

‘वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥

‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसनेवाले रस्से, गलेके आभूषण और अंकुश भी सोनेके बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥ १७ १/२॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभाके लिये सोनेके घुँघुरु लगे होंगे और हर एक रथमें चारचार सफेद रंगके घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देशमें उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवामें अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकारके रंगवाली नयी अवस्थाकी एक करोड़ गौएँ भी दूँगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥ १८—२०॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’॥ २१॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर भगवान् वसिष्ठ बोले—‘राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूँगा॥ २२॥

‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥ २३॥

‘राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँतिके पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसीपर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥ २४॥

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‘नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मोंका मूल यही है, इसमें संशय नहीं है। बहुत व्यर्थ बात करनेसे क्या लाभ। मैं इस कामधेनुको कदापि नहीं दूँगा’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

चौवनवाँ सर्ग

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चौवनवाँ सर्ग

विश्वामित्रका वसिष्ठजीकी गौको बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजीसे इसका कारण पूछना और उनकी आज्ञासे शक, यवन, पह्लव आदि वीरोंकी सृष्टि करके उनके द्वारा विश्वामित्रजीकी सेनाका संहार करना

'श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देनेके लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंगकी धेनुको बलपूर्वक घसीट ले चले॥ १ ॥

'रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्रके द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन-ही-मन रो पड़ी और अत्यन्त दुःखित हो विचार करने लगी—॥ २ ॥

'अहो! क्या महात्मा वसिष्ठने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजाके सिपाही मुझ दीन और अत्यन्त दुखिया गौको इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं?'॥ ३ ॥

'पवित्र अन्तःकरणवाले उन महर्षिका मैंने क्या अपराध किया है कि वे धर्मात्मा मुनि मुझे निरपराध और अपना भक्त जानकर भी त्याग रहे हैं?'॥ ४ ॥

'शत्रुसूदन! यह सोचकर वह गौ बारम्बार लंबी साँस लेने लगी और राजाके उन सैकड़ों सेवकोंको झटककर उस समय महातेजस्वी वसिष्ठ मुनिके पास बड़े वेगसे जा पहुँची॥ ५ १/२ ॥

'वह शबला गौ वायुके समान वेगसे उन महात्माके चरणोंके समीप गयी और उनके सामने खड़ी हो मेघके समान गम्भीर स्वरसे रोती-चीत्कार करती हुई उनसे इस प्रकार बोली—॥ ६-७ ॥

'भगवन्! ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ये राजाके सैनिक मुझे आपके पाससे दूर लिये जा रहे हैं?'॥ ८ ॥

'उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ शोकसे संतप्त हृदयवाली दुःखिया बहिनके समान उस गौसे इस प्रकार बोले—॥ ९ ॥

'शबले! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। ये महाबली राजा अपने बलसे मतवाले होकर तुमको मुझसे छीनकर ले जा रहे हैं॥ १० ॥

'मेरा बल इनके समान नहीं है। विशेषतः आजकल ये राजाके पदपर प्रतिष्ठित हैं। राजा, क्षत्रिय तथा इस पृथ्वीके पालक होनेके कारण ये बलवान् हैं॥ ११ ॥