श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ दोवाँ सर्ग
एक सौ दोवाँ सर्ग
इन्द्रके भेजे हुए रथपर बैठकर श्रीरामका रावणके साथ युद्ध करना
लक्ष्मणकी कही हुई उस बातको सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी श्रीरामने धनुष लेकर उसपर बाणोंका संधान किया॥ १ ॥
उन्होंने सेनाके मुहानेपर रावणको लक्ष्य करके उन भयंकर बाणोंको छोड़ना आरम्भ किया। इतनेमें राक्षसराज रावण भी दूसरे रथपर सवार हो श्रीरामपर उसी तरह चढ़ आया, जैसे राहु सूर्यपर आक्रमण करता है॥ २ १/२ ॥
दशमुख रावण रथपर बैठा हुआ था। वह अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा श्रीरामको उसी तरह बींधने लगा, जैसे मेघ किसी महान् पर्वतपर जलकी धारावाहिक वृष्टि करता है॥ ३ ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी एकाग्रचित्त हो रणभूमिमें दशमुख रावणपर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुवर्णभूषित बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ ४ ॥
‘श्रीरघुनाथजी भूमिपर खड़े हैं और वह राक्षस रथपर बैठा हुआ है, ऐसी दशामें इन दोनोंका युद्ध बराबर नहीं है’ वहाँ आकाशमें खड़े हुए देवता, गन्धर्व और किन्नर इस तरहकी बातें करने लगे॥ ५ ॥
उनकी ये अमृतके समान मधुर बातें सुनकर तेजस्वी देवराज इन्द्रने मातलिको बुलाकर कहा— ॥ ६ ॥
‘सारथे! रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी भूमिपर खड़े हैं। मेरा रथ लेकर तुम शीघ्र उनके पास जाओ। भूतलपर पहुँचकर श्रीरामको पुकारकर कहो— ‘यह रथ देवराजने आपकी सेवामें भेजा है।’ इस तरह उन्हें रथपर बिठाकर तुम देवताओंके महान् हितका कार्य सिद्ध करो’॥
देवराजके इस प्रकार कहनेपर देव-सारथि मातलिने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यह बात कही— ‘देवेन्द्र! मैं शीघ्र ही आपके उत्तम रथमें हरे रंगके घोड़े जोतकर उसे साथ लिये जाऊँगा और श्रीरघुनाथजीके सारथिका कार्य भी करूँगा’॥ ९ ॥
तदनन्तर देवराज इन्द्रका जो शोभाशाली श्रेष्ठ रथ है, जिसके सभी अवयव सुवर्णमय होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करते हैं, जिसे सैकड़ों घुँघुरुओंसे विभूषित किया गया है, जिसकी कान्ति प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण है, जिसके कूबरमें वैदूर्यमणि (नीलम) जड़ी
गयी है, जिसमें सूर्यतुल्य तेजस्वी, हरे रंगवाले, सुवर्णजालसे विभूषित तथा सोनेके साज-बाजसे सजे हुए अच्छे घोड़े जुते हैं और उन घोड़ोंको श्वेत चँवर आदिसे अलंकृत किया गया है तथा जिसके ध्वजका दण्ड सोनेका बना हुआ है, उस रथपर आरूढ़ हो मातलि देवराजका संदेश ले स्वर्गसे भूतलपर उतरकर श्रीरामचन्द्रजीके सामने खड़ा हुआ॥ १०—१२ ॥
सहस्रलोचन इन्द्रका सारथि मातलि चाबुक लिये रथपर बैठा हुआ हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोला— 'महाबली शत्रुसूदन श्रीमान् रघुवीर! सहस्र नेत्रधारी देवराज इन्द्रने विजयके लिये आपको यह रथ समर्पित किया है॥ १४ ॥
'यह इन्द्रका विशाल धनुष है। यह अग्निके समान तेजस्वी कवच है। ये सूर्यसदृश प्रकाशमान बाण हैं तथा यह कल्याणमयी निर्मल शक्ति है॥ १५ ॥
'वीरवर महाराज! आप इस रथपर आरूढ़ हो मुझ सारथिकी सहायतासे राक्षसराज रावणका उसी तरह वध कीजिये, जैसे महेन्द्र दानवोंका संहार करते हैं'॥ १६ ॥
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी परिक्रमा की और उसे प्रणाम करके वे उसपर सवार हुए। उस समय अपनी शोभासे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करने लगे॥ १७ ॥
तत्पश्चात् महाबाहु श्रीराम और राक्षस रावणमें द्वैरथ युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो बड़ा ही अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ १८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने राक्षसराजके चलाये हुए गान्धर्व-अस्त्रको गान्धर्व-अस्त्रसे और दैव-अस्त्रको दैव-अस्त्रसे नष्ट कर दिया॥
तब राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने अत्यन्त कुपित हो पुनः परम भयानक राक्षसास्त्रका प्रयोग किया॥ २० ॥
फिर तो रावणके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण महाविषैले सर्प हो-होकर श्रीरामचन्द्रजीके निकट पहुँचने लगे॥ २१ ॥
उन सर्पोंके मुख आगके समान प्रज्वलित होते थे। वे अपने मुखोंसे जलती आग उगल रहे थे और मुँह फैलाये होनेके कारण बड़े भयंकर दिखायी देते थे। वे सब-के-सब श्रीरामके ही सामने आने लगे॥ २२ ॥
उनका स्पर्श वासुकि नागके समान असह्य था। उनके फन प्रज्वलित हो रहे थे और वे महान् विषसे भरे थे। उन सर्पाकार बाणोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ
आच्छादित हो गयीं॥ २३ ॥
युद्धस्थलमें उन सर्पोंको आते देख भगवान् श्रीरामने अत्यन्त भयंकर गरुडास्त्रको प्रकट किया॥ २४ ॥
फिर तो श्रीरघुनाथजीके धनुषसे छूटे हुए सुनहरे पंखवाले अग्नितुल्य तेजस्वी बाण सर्पोंके शत्रुभूत सुवर्णमय गरुड़ बनकर सब ओर विचरने लगे॥ २५ ॥
श्रीरामके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन गरुड़ाकार बाणोंने रावणके महान् वेगशाली उन समस्त सर्पाकार सायकोंका संहार कर डाला॥ २६ ॥
इस प्रकार अपने अस्त्रके प्रतिहत हो जानेपर राक्षसराज रावण क्रोधसे जल उठा और उस समय श्रीरघुनाथजीपर भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २७ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामको सहस्रों बाणोंसे पीड़ित करके उसने मातलिको भी अपने बाण-समूहोंसे घायल कर दिया॥ २८ ॥
तत्पश्चात् रावणने इन्द्रके रथकी ध्वजाको लक्ष्य करके एक बाण मारा और उससे उस ध्वजको काट डाला। उस कटे हुए सुवर्णमय ध्वजको रथके ऊपरसे उसके निचले भागमें गिराकर रावणने अपने बाणोंके जालसे इन्द्रके घोड़ोंको भी क्षत-विक्षत कर दिया॥ २९ १/२ ॥
यह देख देवता, गन्धर्व, चारण तथा दानव विषादमें डूब गये। श्रीरामको पीड़ित देख सिद्धों और महर्षियोंके मनमें भी बड़ी व्यथा हुई। विभीषणसहित सारे वानरयूथ पति भी बहुत दुःखी हो गये॥ ३०-३१ ॥
श्रीरामरूपी चन्द्रमाको रावणरूपी राहुसे ग्रस्त हुआ देख बुध नामक ग्रह जिसके देवता प्रजापति हैं, उस चन्द्रप्रिया रोहिणी नामक नक्षत्रपर आक्रमण करके प्रजावर्गके लिये अहितकारक हो गया॥ ३२ १/२ ॥
समुद्र प्रज्वलित-सा होने लगा। उसकी लहरोंसे धुआँ-सा उठने लगा और वह कुपित-सा होकर ऊपरकी ओर इस प्रकार बढ़ने लगा, मानो सूर्यदेवको छू लेना चाहता है॥ ३३ १/२ ॥
सूर्यकी किरणें मन्द हो गयीं। उसकी कान्ति तलवारकी भाँति काली पड़ गयी। वह अत्यन्त प्रखर कबन्धके चिह्नसे युक्त और धूमकेतु नामक उत्पात ग्रहसे संसक्त दिखायी देने लगा॥ ३४ १/२ ॥
आकाशमें इक्ष्वाकुवंशियोंके नक्षत्र विशाखापर, जिसके देवता इन्द्र और अग्नि हैं, आक्रमण करके मंगल जा बैठा॥ ३५ १/२ ॥
उस समय दस मस्तक और बीस भुजाओंसे युक्त दशग्रीव रावण हाथोंमें धनुष लिये मैनाक पर्वतके समान दिखायी देता था॥ ३६ १/२ ॥
राक्षस रावणके बाणोंसे बारम्बार निरस्त (आहत) होनेके कारण भगवान् श्रीराम युद्धके मुहानेपर अपने सायकोंका संधान नहीं कर पाते थे॥ ३७ १/२ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने क्रोधका भाव प्रकट किया। उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, नेत्र कुछ-कुछ लाल हो गये और उन्हें ऐसा महान् क्रोध हुआ, जिससे जान पड़ता था कि वे समस्त राक्षसोंको भस्म कर डालेंगे॥ ३८ १/२ ॥
उस समय कुपित हुए बुद्धिमान् श्रीरामके मुखकी ओर देखकर समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे और पृथ्वी काँपने लगी॥ ३९ ॥
सिंहों और व्याघ्रोंसे भरा हुआ पर्वत हिल गया। उसके ऊपरके वृक्ष झूमने लगे और सरिताओंके स्वामी समुद्रमें ज्वार आ गया॥ ४० ॥
आकाशमें सब ओर उत्पातसूचक गर्दभाकार प्रचण्ड गर्जना करनेवाले रूखे बादल गर्जते हुए चक्कर लगाने लगे॥
श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त कुपित और दारुण उत्पातोंका प्राकट्य देखकर समस्त प्राणी भयभीत हो गये तथा रावणके भीतर भी भय समा गया॥ ४२ ॥
उस समय विमानपर बैठे हुए देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, दानव, दैत्य तथा गरुड़—ये सब आकाशमें स्थित होकर युद्धपरायण शूरवीर श्रीराम और रावणके समस्त लोकोंके प्रलयकी भाँति उपस्थित हुए नाना प्रकारके भयानक प्रहारोंसे युक्त उस युद्धका दृश्य देखने लगे॥ ४३-४४ ॥
उस अवसरपर युद्ध देखनेके लिये आये हुए समस्त देवता और असुर उस महासमरको देखकर भक्तिभावसे हर्षपूर्वक बातें करने लगे॥ ४५ ॥
वहाँ खड़े हुए असुर दशग्रीवको सम्बोधित करते हुए बोले—'रावण! तुम्हारी जय हो।' उधर देवता श्रीरामको पुकारकर बारम्बार कहने लगे—'रघुनन्दन! आपकी जय हो, जय हो'॥ ४६ ॥
इसी समय दुष्टात्मा रावणने क्रोधमें आकर श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा हथियार उठाया॥ ४७ ॥
वह वज्रके समान शक्तिशाली, महान् शब्द करनेवाला तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहारक था। उसकी शिखाएँ शैल-शिखरोंके समान थीं। वह मन और नेत्रोंको भी भयभीत करनेवाला था। उसके अग्रभाग बहुत तीखे थे। वह प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निराशिके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसे पाना या नष्ट करना कालके लिये भी कठिन एवं असम्भव था॥ ४८-४९ ॥
उसका नाम था शूल। वह समस्त भूतोंको छिन्नभिन्न करके उन्हें भयभीत करनेवाला था। रोषसे उद्दीप्त हुए रावणने उस शूलको हाथमें ले लिया॥ ५० ॥
समरभूमिमें अनेक सेनाओंमें विभक्त शूरवीर राक्षसोंसे घिरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने बड़े क्रोधके साथ उस शूलको ग्रहण किया था॥ ५१ ॥
उसे ऊपर उठाकर उस विशालकाय राक्षसने युद्धस्थलमें बड़ी भयानक गर्जना की। उस समय उसके नेत्र रोषसे लाल हो रहे थे और वह अपनी सेनाका हर्ष बढ़ा रहा था॥ ५२ ॥
राक्षसराज रावणके उस भयंकर सिंहनादने उस समय पृथ्वी, आकाश, दिशाओं और विदिशाओंको भी कम्पित कर दिया॥ ५३ ॥
उस महाकाय दुरात्मा निशाचरके भैरवनादसे सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और सागर भी विक्षुब्ध हो उठा॥ ५४ ॥
उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महापराक्रमी रावणने बड़े जोरसे गर्जना करके श्रीरामसे कठोर वाणीमें कहा—॥ ५५ ॥
‘राम! यह शूल वज्रके समान शक्तिशाली है। इसे मैंने रोषपूर्वक अपने हाथमें लिया है। यह भाऽईसहित तुम्हारे प्राणोंको तत्काल हर लेगा॥ ५६ ॥
‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले राघव! आज तुम्हारा वध करके सेनाके मुहानेपर जो शूरवीर राक्षस मारे गये हैं, उन्हींके समान अवस्थामें तुम्हें भी पहुँचा दूँगा॥ ५७ ॥
‘रघुकुलके राजकुमार! ठहरो, अभी इस शूलके द्वारा तुम्हें मौतके घाट उतारता हूँ।’ ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने श्रीरघुनाथजीके ऊपर उस शूलको चला दिया॥
रावणके हाथसे छूटते ही वह शूल आकाशमें आकर चमक उठा। वह विद्युन्मालाओंसे व्याप्त-सा जान पड़ता था। आठ घंटोंसे युक्त होनेके कारण उससे गम्भीर घोष प्रकट हो रहा था॥ ५९ ॥
परम पराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने उस भयंकर एवं प्रज्वलित शूलको अपनी ओर आते देख धनुष तानकर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६० ॥
श्रीरघुनाथजीने बाणसमूहोंद्वारा अपनी ओर आते हुए शूलको उसी तरह रोकनेका प्रयास किया, जैसे देवराज इन्द्र ऊपरकी ओर उठती हुई प्रलयाग्निको संवर्तक मेघोंके बरसाये हुए जलप्रवाहके द्वारा शान्त करनेकी चेष्टा करते हैं॥ ६१ ॥
परंतु जैसे आग पतंगोंको जला देती है, उसी तरह रावणके उस महान् शूलने श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए समस्त बाणोंको जलाकर भस्म कर दिया॥ ६२ ॥
श्रीरघुनाथजीने जब देखा मेरे सायक अन्तरिक्षमें उस शूलका स्पर्श होते ही चूर-चूर हो राखके ढेर बन गये हैं, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ॥ ६३ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रघुकुलनन्दन रघुवीरने मातलिकी लायी हुई देवेन्द्रद्वारा सम्मानित शक्तिको हाथमें ले लिया॥ ६४ ॥
बलवान् श्रीरामके द्वारा उठायी हुई वह शक्ति प्रलयकालमें प्रज्वलित होनेवाली उल्काके समान प्रकाशमान थी। उसने समस्त आकाशको अपनी प्रभासे उद्भासित कर दिया तथा उससे घंटानाद प्रकट होने लगा॥ ६५ ॥
श्रीरामने जब उसे चलाया, तब वह शक्ति राक्षसराजके उस शूलपर ही पड़ी। उसके प्रहारसे टूक-टूक और निस्तेज हो वह महान् शूल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६६ ॥
इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने सीधे जानेवाले महावेगवान् वज्रतुल्य पैने बाणोंके द्वारा रावणके अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया॥ ६७ ॥
फिर अत्यन्त सावधान होकर उन्होंने तीन तीखे तीरोंसे रावणकी छाती छेद डाली और तीन पंखदार बाणोंसे उसके ललाटमें भी चोट पहुँचायी॥ ६८ ॥
उन बाणोंकी मारसे रावणके सारे अङ्ग क्षतवि क्षत हो गये। उसके सारे शरीरसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय अपने सैन्यसमूहमें खड़ा हुआ राक्षसराज रावण फूलोंसे भरे हुए अशोकवृक्षके समान शोभा पाने लगा॥ ६९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे जब सारा शरीर अत्यन्त घायल हो लहूलुहान हो गया, तब निशाचरराज रावणको उस रणभूमिमें बड़ा खेद हुआ। साथ ही उस समय उसने बड़ा भारी क्रोध प्रकट किया॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२ ॥