श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ बारहवाँ सर्ग
एक सौ बारहवाँ सर्ग
विभीषणका राज्याभिषेक और श्रीरघुनाथजीका हनुमान्जीके द्वारा सीताके पास संदेश भेजना
देवता, गन्धर्व और दानवगण रावण-वधका दृश्य देखकर उसीकी शुभ चर्चा करते हुए अपने-अपने विमानसे यथास्थान लौट गये॥ १ ॥
रावणके भयंकर वध, श्रीरघुनाथजीके पराक्रम, वानरोंके उत्तम युद्ध, सुग्रीवकी मन्त्रणा, लक्ष्मण और हनुमान्जीकी श्रीरामके प्रति भक्ति, उन दोनोंके पराक्रम, सीताके पातिव्रत्य तथा हनुमान्जीके पुरुषार्थकी बातें कहते हुए वे महाभाग देवता आदि जैसे आये थे, उसी तरह प्रसन्नतापूर्वक चले गये॥ २-३ १/२ ॥
इसके बाद महाबाहु भगवान् श्रीरामने इन्द्रके दिये हुए दिव्य रथको, जो अग्निके समान देदीप्यमान था, ले जानेकी आज्ञा देकर मातलिका बड़ा सम्मान किया॥ ४ १/२ ॥
तब इन्द्रसारथि मातलि श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे उस दिव्य रथपर बैठकर पुनः दिव्य लोकको ही चले गये॥ ५ १/२ ॥
मातलिके रथसहित देवलोकको चले जानेपर रथियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ सुग्रीवको हृदयसे लगा लिया॥ ६ १/२ ॥
सुग्रीवका आलिङ्गन करनेके पश्चात् जब उन्होंने लक्ष्मणकी ओर दृष्टि डाली, तब लक्ष्मणने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वानरसैनिकोंसे सम्मानित हो वे सेनाकी छावनीपर लौट आये॥ ७ १/२ ॥
वहाँ आकर रघुनाथजीने अपने समीप खड़े हुए बल एवं उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे कहा— ‘सौम्य! अब तुम लङ्कामें जाकर इन विभीषणका राज्याभिषेक करो; क्योंकि ये मेरे प्रेमी, भक्त तथा पहले उपकार करनेवाले हैं॥ ८-९ १/२ ॥
‘सौम्य! यह मेरी बड़ी इच्छा है कि रावणके छोटे भाई इन विभीषणको मैं लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त देखूँ’॥
महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर सोनेका घड़ा हाथमें लिया और उसे वानरयूथ पतियोंके हाथमें
देकर उन महान् शक्तिशाली तथा मनके समान वेगवाले वानरोंको समुद्रका जल ले आनेकी आज्ञा दी॥ ११-१२ १/२ ॥
वे मनके समान वेगशाली श्रेष्ठ वानर तुरंत ही गये और समुद्रसे जल लेकर लौट आये॥ १३ १/२ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने एक घट जल लेकर उसे उत्तम आसनपर स्थापित कर दिया और उस घटके जलसे विभीषणका वेदोक्त विधिके अनुसार लङ्काके राजपदपर अभिषेक किया। यह अभिषेक श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे हुआ था। उस समय राक्षसोंके बीचमें सुहृदोंसे घिरे हुए विभीषण राजसिंहासनपर विराजमान थे। लक्ष्मणके बाद सभी राक्षसों और वानरोंने भी उनका अभिषेक किया॥
वे अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीरामकी ही स्तुति करने लगे। राक्षसराज विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त देख उनके मन्त्री और प्रेमी राक्षस बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १७-१८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए उस विशाल राज्यको पाकर विभीषण अपनी प्रजाको सान्त्वना दे श्रीरामचन्द्रजीके पास आये॥ १९ ॥
उस समय हर्षसे भरे हुए नगरनिवासी निशाचर विभीषणको अर्पित करनेके लिये दही, अक्षत, मिठाई, लावा और फूल लाये॥ २० ॥
दुर्धर्ष पराक्रमी विभीषणने वे सब मङ्गलजनक माङ्गलिक वस्तुएँ लेकर श्रीराम और लक्ष्मणको भेंट की॥ २१ ॥
श्रीरघुनाथजीने विभीषणको कृतकार्य एवं सफलमनोरथ देख उनकी प्रसन्नताके लिये ही उन सब माङ्गलिक वस्तुओंको ले लिया॥ २२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए पर्वताकार वीर वानर हनुमान्जीसे कहा— ॥ २३ ॥
‘सौम्य! तुम इन महाराज विभीषणकी आज्ञा ले लङ्कानगरीमें प्रवेश करके मिथिलेशकुमारी सीतासे उनका कुशल-समाचार पूछो॥ २४ ॥
‘साथ ही उन विदेहराजकुमारीसे सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरा कुशल-समाचार निवेदन करो। वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरीश्वर! तुम वैदेहीको यह प्रिय समाचार सुना दो कि रावण युद्धमें मारा
गया। तत्पश्चात् उनका संदेश लेकर लौट आओ'॥ २५-२६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११२ ॥