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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छियालीसवाँ सर्ग

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छियालीसवाँ सर्ग

सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रात्रिमें तमसा-तटपर निवास, माता-पिता और अयोध्याके लिये चिन्ता तथा पुरवासियोंको सोते छोड़कर वनकी ओर जाना

तदनन्तर तमसाके रमणीय तटका आश्रय लेकर श्रीरामने सीताकी ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हमलोग जो वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवासकी आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगरके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥ २ ॥

‘इन सूने वनोंकी ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु-पक्षी अपने-अपने स्थानपर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्दसे सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्थामें देखकर खिन्न हो सब ओरसे रो रहे हैं॥ ३ ॥

‘आज मेरे पिताकी राजधानी अयोध्या नगरी वनमें आये हुए हमलोगोंके लिये समस्त नर-नारियोंसहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है॥ ४ ॥

‘पुरुषसिंह! अयोध्याके मनुष्य बहुत-से सद्गुणोंके कारण महाराजमें, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्नमें भी अनुरक्त हैं॥ ५ ॥

‘इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माताके लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहनेके कारण अंधे हो जायँ॥ ६ ॥

‘परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं। अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम—तीनोंके अनुकूल वचनोंद्वारा पिताजीको और मेरी माताको भी सान्त्वना देंगे॥ ७ ॥

‘महाबाहो! जब मैं भरतके कोमल स्वभावका बार-बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता-पिताके लिये अधिक चिन्ता नहीं होती॥ ८ ॥

‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तो मुझे विदेहकुमारी सीताकी रक्षाके लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता॥ ९ ॥

‘सुमित्रानन्दन! यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके जंगली फल-मूल मिल सकते हैं तथापि आजकी यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है’॥ १० ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रसे भी कहा—‘सौम्य! अब आप घोड़ोंकी रक्षापर ध्यान दें, उनकी ओरसे असावधान न हों’॥ ११ ॥

सुमन्त्रने सूर्यास्त हो जानेपर घोड़ोंको लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत-सा चारा डालकर वे श्रीरामके पास आ गये॥ १२ ॥

फिर (वर्णानुकूल) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मणसहित सुमन्त्रने श्रीरामचन्द्रजीके शयन करनेयोग्य स्थान और आसन ठीक किया॥ १३ ॥

तमसाके तटपर वृक्षके पत्तोंसे बनी हुई वह शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके साथ उसपर बैठे॥ १४ ॥

थोड़ी देरमें सीतासहित श्रीरामको थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्रसे उनके नाना प्रकारके गुणोंका वर्णन करने लगे॥ १५ ॥

सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसाके किनारे श्रीरामके गुणोंकी चर्चा करते हुए रातभर जागते रहे। इतनेहीमें सूर्योदयका समय निकट आ पहुँचा॥ १६ ॥

तमसाका वह तट गौओंके समुदायसे भरा हुआ था। श्रीरामचन्द्रजीने प्रजाजनोंके साथ वहीं रात्रिमें निवास किया। वे प्रजाजनोंसे कुछ दूरपर सोये थे॥ १७ ॥

महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनोंको सोते देख पवित्र लक्षणोंवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ १८ ॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! इन पुरवासियोंकी ओर देखो, ये इस समय वृक्षोंकी जड़से सटकर सो रहे हैं। इन्हें केवल हमारी चाह है। ये अपने घरोंकी ओरसे भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं॥ १९ ॥

‘हमें लौटा ले चलनेके लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे॥ २० ॥

‘अतः जबतक ये सो रहे हैं तभीतक हमलोग रथपर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दें। फिर हमें इस मार्गपर और किसीके आनेका भय नहीं रहेगा॥ २१ ॥

‘अयोध्यावासी हमलोगोंके अनुरागी हैं। जब हम यहाँसे निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षोंकी जड़ोंसे सटकर नहीं सोना पड़ेगा॥ २२ ॥

‘राजकुमारोंका यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियोंको अपने द्वारा होनेवाले दुःखसे मुक्त करें, न कि अपना दुःख देकर उन्हें और दुःखी बना दें’॥ २३ ॥

यह सुनकर लक्ष्मणने साक्षात् धर्मके समान विराजमान भगवान् श्रीरामसे कहा— 'परम बुद्धिमान् आर्य! मुझे आपकी राय पसंद है। शीघ्र ही रथपर सवार होइये'॥ २४॥

तब श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा— 'प्रभो! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये। फिर मैं जल्दी ही यहाँसे वनकी ओर चलूँगा'॥ २५॥

आज्ञा पाकर सुमन्त्रने उन उत्तम घोड़ोंको तुरंत ही रथमें जोत दिया और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर निवेदन किया—॥ २६॥

‘महाबाहो! रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! आपका कल्याण हो। आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है। अब सीता और लक्ष्मणके साथ शीघ्र इसपर सवार होइये'॥ २७॥

श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथपर बैठकर तीव्र-गतिसे बहनेवाली भँवरोंसे भरी हुई तमसा नदीके उस पार गये॥ २८॥

नदीको पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्गपर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टकरहित तथा सर्वत्र भय देखनेवालोंके लिये भी भयसे रहित था॥ २९॥

उस समय श्रीरामने पुरवासियोंको भुलावा देनेके लिये सुमन्त्रसे यह बात कही— 'सारथे! (हमलोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथपर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशाकी ओर जाइये। दो घड़ीतक तीव्र गतिसे उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्गसे रथको यहीं लौटा लाइये। जिस तरह भी पुरवासियोंको मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये'॥ ३०-३१॥

श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारथिने वैसा ही किया और लौटकर पुनः श्रीरामकी सेवामें रथ उपस्थित कर दिया॥ ३२॥

तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथपर चढ़े। तदनन्तर सारथिने घोड़ोंको उस मार्गपर बढ़ा दिया, जिससे तपोवनमें पहुँचा जा सकता था॥ ३३॥

तदनन्तर सारथिसहित महारथी श्रीरामने यात्राकालिक मङ्गलसूचक शकुन देखनेके लिये पहले तो उस रथको उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथपर आरूढ़ होकर वनकी ओर चल दिये॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥