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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

छियालीसवाँ सर्ग

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छियालीसवाँ सर्ग

श्रीराम और लक्ष्मणको मूर्च्छित देख वानरोंका शोक, इन्द्रजित्का हर्षोद्गार, विभीषणका सुग्रीवको समझाना, इन्द्रजित्का लङ्कामें जाकर पिताको शत्रुवधका वृत्तान्त बताना और प्रसन्न हुए रावणके द्वारा अपने पुत्रका अभिनन्दन

तदनन्तर जब उपर्युक्त दस वानर पृथ्वी और आकाशकी छानबीन करके लौटे, तब उन्होंने दोनों भाऽइ श्रीराम और लक्ष्मणको बाणोंसे बिंधा हुआ देखा॥ १ ॥

जैसे वर्षा करके देवराज इन्द्र शान्त हो गये हों, उसी प्रकार वह राक्षस इन्द्रजित् जब अपना काम बनाकर बाणवर्षासे विरत हो गया, तब सुग्रीवसहित विभीषण भी उस स्थानपर आये॥ २ ॥

हनुमान्जीके साथ नील, द्विविद, मैन्द, सुषेण, कुमुद और अङ्गद तुरंत ही श्रीरघुनाथजीके लिये शोक करने लगे॥ ३ ॥

उस समय वे दोनों भाऽइ खूनसे लथपथ होकर बाण-शय्यापर पड़े थे। बाणोंसे उनका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। वे निश्चल होकर धीरे-धीरे साँस ले रहे थे। उनकी चेष्टाएँ बंद हो गयी थीं॥ ४ ॥

सर्पोंके समान साँस खींचते और निश्चेष्ट पड़े हुए उन दोनों भाइयोंका पराक्रम मन्द हो गया था। उनके सारे अङ्ग रक्त बहाकर उसीमें सन गये थे। वे दोनों टूटकर गिरे हुए दो सुवर्णमय ध्वजोंके समान जान पड़ते थे॥ ५ ॥

वीरशय्यापर सोये हुए मन्द चेष्टावाले वे दोनों वीर आँसूभरे नेत्रोंवाले अपने यूथपतियोंसे घिरे हुए थे॥ ६ ॥

बाणोंके जालसे आवृत्त होकर पृथ्वीपर पड़े हुए उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको देखकर विभीषणसहित सब वानर व्यथित हो उठे॥ ७ ॥

समस्त वानर सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें बारम्बार दृष्टिपात करनेपर भी मायाच्छन्न रावणकुमार इन्द्रजित्को रणभूमिमें नहीं देख पाते थे॥ ८ ॥

तब विभीषणने मायासे ही देखना आरम्भ किया। उस समय उन्होंने मायासे ही छिपे हुए अपने उस भतीजेको सामने खड़ा देखा, जिसके कर्म अनुपम थे और युद्धस्थलमें जिसका सामना

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करनेवाला कोई योद्धा नहीं था॥ ९ ॥

तेज, यश और पराक्रमसे युक्त विभीषणने मायाके द्वारा ही वरदानके प्रभावसे छिपे हुए वीर इन्द्रजित्को देख लिया॥ १० ॥

श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धभूमिमें सोते देख इन्द्रजित्को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने समस्त राक्षसोंका हर्ष बढ़ाते हुए अपने पराक्रमका वर्णन आरम्भ किया—॥

वह देखो, जिन्होंने खर और दूषणका वध किया था, वे दोनों भाई महाबली श्रीराम और लक्ष्मण मेरे बाणोंसे मारे गये॥ १२ ॥

‘यदि सारे मुनिसमूहोंसहित समस्त देवता और असुर भी आ जायँ तो वे इस बाण-बन्धनसे इन दोनोंको छुटकारा नहीं दिला सकते॥ १३ ॥

‘जिसके कारण चिन्ता और शोकसे पीड़ित हुए मेरे पिताको सारी रात शय्याका स्पर्श किये बिना ही बितानी पड़ती थी तथा जिसके कारण यह सारी लङ्का वर्षाकालमें नदीकी भाँति व्याकुल रहा करती थी, हम सबकी जड़को काटनेवाले उस अनर्थको आज मैंने शान्त कर दिया॥ १४-१५ ॥

‘जैसे शरद्-ऋतुके सारे बादल पानी न बरसानेके कारण व्यर्थ होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम, लक्ष्मण और सम्पूर्ण वानरोंके सारे बल-विक्रम निष्फल हो गये’॥ १६ ॥

अपनी ओर देखते हुए उन सब राक्षसोंसे ऐसा कहकर रावणकुमार इन्द्रजित्ने वानरोंके उन समस्त सुप्रसिद्ध यूथपतियोंको भी मारना आरम्भ किया॥ १७ ॥

उस शत्रुसूदन निशाचर वीरने नीलको नौ बाणोंसे घायल करके मैन्द और द्विविदको तीन-तीन उत्तम सायकोंद्वारा मारकर संतप्त कर दिया॥ १८ ॥

महाधनुर्धर इन्द्रजित्ने जाम्बवान्की छातीमें एक बाणसे गहरी चोट पहुँचाकर वेगशाली हनुमान्जीको भी दस बाण मारे॥ १९ ॥

रावणकुमारका वेग उस समय बहुत बढ़ा हुआ था। उसने युद्धस्थलमें अमित पराक्रमी गवाक्ष और शरभको भी दो-दो बाण मारकर घायल कर दिया॥ २० ॥

तदनन्तर बड़ी उतावलीके साथ बाण चलाते हुए रावणकुमार इन्द्रजित्ने पुनः बहुसंख्यक बाणोंद्वारा लंगूरोंके राजा-(गवाक्ष)-को और वालिपुत्र अङ्गदको भी गहरी चोट पहुँचायी॥ २१ ॥

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इस प्रकार अग्नितुल्य तेजस्वी सायकोंसे उन मुख्य-मुख्य वानरोंको घायल करके महान् धैर्यशाली और बलवान् रावणकुमार वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ २२ ॥

अपने बाणसमूहोंसे उन वानरोंको पीड़ित तथा भयभीत करके महाबाहु इन्द्रजित् अट्टहास करने लगा और इस प्रकार बोला—॥ २३ ॥

‘राक्षसो! देख लो, मैंने युद्धके मुहानेपर भयंकर बाणोंके पाशसे इन दोनों भाइयों श्रीराम और लक्ष्मणको एक साथ ही बाँध लिया है’॥ २४ ॥

इन्द्रजित्के ऐसा कहनेपर कूट-युद्ध करनेवाले वे सब राक्षस बड़े चकित हुए और उसके उस कर्मसे उन्हें बड़ा हर्ष भी हुआ॥ २५ ॥

वे सब-के-सब मेघोंके समान गम्भीर स्वरसे महान् सिंहनाद करने लगे तथा यह समझकर कि श्रीराम मारे गये, उन्होंने रावणकुमारका बड़ा अभिनन्दन किया॥

इन्द्रजित्ने भी जब यह देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण—दोनों भांऽइ पृथ्वीपर निश्चेष्ट पड़े हैं तथा उनका श्वास भी नहीं चल रहा है, तब उन दोनोंको मरा हुआ ही समझा॥ २७ ॥

इससे युद्धविजयी इन्द्रजित्को बड़ा हर्ष हुआ तथा वह समस्त राक्षसोंका हर्ष बढ़ाता हुआ लङ्कापुरीमें चला गया॥ २८ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरों तथा सभी अङ्ग-उपाङ्गोंको बाणोंसे व्याप्त देख सुग्रीवके मनमें भय समा गया॥ २९ ॥

उनके मुखपर दीनता छा गयी, आसुओंकी धारा बह चली और नेत्र शोकसे व्याकुल हो उठे। उस समय अत्यन्त भयभीत हुए वानरराजसे विभीषणने कहा— ‘सुग्रीव! डरो मत। डरनेसे कोऽइ लाभ नहीं। आँसुओंका यह वेग रोको॥ ३० १/२ ॥

‘वीर! सभी युद्धोंकी प्रायः ऐसी ही स्थिति होती है, उनमें विजय निश्चित नहीं हुआ करती। यदि हमलोगोंका भाग्य शेष होगा तो ये दोनों महाबली महात्मा अवश्य मूर्छा त्याग देंगे। वानरराज! तुम अपनेको और मुझ अनाथको भी सँभालो। जो लोग सत्य-धर्ममें अनुराग रखते हैं, उन्हें मृत्युका भय नहीं होता है’॥ ३१—३३ ॥

ऐसा कहकर विभीषणने जलसे भीगे हुए हाथसे सुग्रीवके दोनों सुन्दर नेत्र पोंछ दिये॥ ३४ ॥

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तत्पश्चात् हाथमें जल लेकर उसे मन्त्रपूत करके धर्मात्मा विभीषणने सुग्रीवके नेत्रोंमें लगाया॥ ३५ ॥

फिर बुद्धिमान् वानरराजके भीगे हुए मुखको पोंछकर उन्होंने बिना किसी घबराहटके यह समयोचित बात कही— ॥ ३६ ॥

‘वानरसम्राट्! यह समय घबरानेका नहीं है। ऐसे समयमें अधिक स्नेहका प्रदर्शन भी मौतका भय उपस्थित कर देता है॥ ३७ ॥

‘इसलिये सब कामोंको बिगाड़ देनेवाली इस घबराहटको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी जिनके अगुआ अथवा स्वामी हैं, उन सेनाओंके हितका विचार करो॥

‘अथवा जबतक श्रीरामचन्द्रजीको चेत न हो, तबतक इनकी रक्षा करनी चाहिये। होशमें आ जानेपर ये दोनों रघुवंशी वीर हमारा सारा भय दूर कर देंगे॥

‘श्रीरामके लिये यह संकट कुछ भी नहीं है। ये मर नहीं सकते हैं; क्योंकि जिनकी आयु समाप्त हो चली है, उनके लिये जो दुर्लभ लक्ष्मी (शोभा) है, वह इनका त्याग नहीं कर रही है॥ ४० ॥

‘अतः तुम अपनेको सँभालो और अपनी सेनाको आश्वासन दो। तबतक मैं इस घबरायी हुई सेनाको फिरसे धैर्य बँधाकर सुस्थिर करता हूँ॥ ४१ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! देखो, इन वानरोंके मनमें भय समा गया है, इसीलिये ये आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं और आपसमें कानाफूसी करते हैं॥ ४२ ॥

‘(अतः मैं इन्हें आश्वासन देने जाता हूँ) मुझे हर्षपूर्वक इधर-उधर दौड़ते देख और मेरे द्वारा धैर्य बँधायी हुई सेनाको प्रसन्न होती जान ये सभी वानर पहलेकी भोगी हुई मालाकी भाँति अपनी सारी भय-शङ्काको त्याग दें’॥ ४३ ॥

इस प्रकार सुग्रीवको आश्वासन दे राक्षसराज विभीषणने भागनेके लिये उद्यत हुई वानर-सेनाको फिरसे सान्त्वना दी॥ ४४ ॥

इधर महामायावी इन्द्रजित् सारी सेनाके साथ लङ्कापुरीमें लौटा और अपने पिताके पास आया॥ ४५ ॥

वहाँ रावणके पास पहुँचकर उसने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया और श्रीराम-लक्ष्मणके मारे जानेका प्रिय संवाद सुनाया॥ ४६ ॥

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राक्षसोंके बीचमें अपने दोनों शत्रुओंके मारे जानेका समाचार सुनकर रावण हर्षसे उछल पड़ा और उसने अपने पुत्रको हृदयसे लगा लिया॥ ४७ ॥

फिर उसका मस्तक सूँघकर उसने प्रसन्नचित्त होकर उस घटनाका पूरा विवरण पूछा। पूछनेपर इन्द्रजित्ने पिताको सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों निवेदन किया और यह बताया कि किस प्रकार बाणोंके बन्धनमें बाँधकर श्रीराम और लक्ष्मणको निश्चेष्ट एवं निस्तेज किया गया है॥ ४८-४९ ॥

महारथी इन्द्रजित्की उस बातको सुनकर रावणकी अन्तरात्मा हर्षके उद्रेकसे खिल उठी। दशरथनन्दन श्रीरामकी ओरसे जो उसे भय और चिन्ता प्राप्त हुई थी, उसे उसने त्याग दिया और प्रसन्नतापूर्ण वचनोंद्वारा अपने पुत्रका अभिनन्दन किया॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६ ॥

सैंतालीसवाँ सर्ग

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सैंतालीसवाँ सर्ग

वानरोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणकी रक्षा, रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका सीताको पुष्पकविमानद्वारा रणभूमिमें ले जाकर श्रीराम और लक्ष्मणका दर्शन कराना और सीताका दुःखी होकर रोना

रावणकुमार इन्द्रजित् जब अपना काम बनाकर लङ्कामें चला गया, तब सभी श्रेष्ठ वानर श्रीरघुनाथजीको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करने लगे॥ १ ॥

हनुमान्, अङ्गद, नील, सुषेण, कुमुद, नल, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, ऋषभ, स्कन्ध, रम्भ, शतबलि और पृथु—ये सब सावधान हो अपनी सेनाकी व्यूहरचना करके हाथोंमें वृक्ष लिये सब ओरसे पहरा देने लगे॥ २-३ ॥

वे सब वानर सम्पूर्ण दिशाओंमें ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें भी देखते रहते थे तथा तिनकोंके भी हिल जानेपर यही समझते थे कि राक्षस आ गये॥ ४ ॥

उधर हर्षसे भरे हुए रावणने भी अपने पुत्र इन्द्रजित्को विदा करके उस समय सीताजीकी रक्षा करनेवाली राक्षसियोंको बुलवाया॥ ५ ॥

आज्ञा पाते ही त्रिजटा तथा अन्य राक्षसियाँ उसके पास आयीं। तब हर्षमें भरे हुए राक्षसराजने उन राक्षसियोंसे कहा— ॥ ६ ॥

‘तुमलोग विदेहकुमारी सीतासे जाकर कहो कि इन्द्रजित्ने राम और लक्ष्मणको मार डाला। फिर पुष्पकविमानपर सीताको चढ़ाकर रणभूमिमें ले जाओ और उन मारे गये दोनों बन्धुओंको उसे दिखा दो॥ ७ ॥

‘जिसके आश्रयसे गर्वमें भरकर यह मेरे पास नहीं आती थी, वह इसका पति अपने भाईके साथ युद्धके मुहानेपर मारा गया॥ ८ ॥

‘अब मिथिलेशकुमारी सीताको उसकी अपेक्षा नहीं रहेगी। वह समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो भय और शङ्काको त्यागकर मेरी सेवामें उपस्थित होगी॥ ९ ॥

आज रणभूमिमें कालके अधीन हुए राम और लक्ष्मणको देखकर वह उनकी ओरसे अपना मन हटा लेगी तथा अपने लिये दूसरा कोई आश्रय न देखकर उधरसे निराश हो विशाललोचना सीता स्वयं ही मेरे पास चली आयेगी’॥ १० १/२ ॥

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दुरात्मा रावणकी वह बात सुनकर वे सब राक्षसियाँ ‘बहुत अच्छा’ कह उस स्थानपर गयीं, जहाँ पुष्पकविमान था॥ ११ १/२ ॥

रावणकी आज्ञासे उस पुष्पकविमानको वे राक्षसियाँ अशोकवाटिकामें बैठी हुई मिथिलेशकुमारीके पास ले आयीं॥ १२ १/२ ॥

उन राक्षसियोंने पतिके शोकसे व्याकुल हुई सीताको तत्काल पुष्पकविमानपर चढ़ाया॥ १३ १/२ ॥

सीताको पुष्पकविमानपर बिठाकर त्रिजटा-सहित वे राक्षसियाँ उन्हें राम-लक्ष्मणका दर्शन करानेके लिये चलीं। इस प्रकार रावणने उन्हें ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत लङ्कापुरीके ऊपर विचरण करवाया॥ १४-१५ ॥

इधर हर्षसे भरे हुए राक्षसराज रावणने लङ्कामें सर्वत्र यह घोषणा करा दी कि राम और लक्ष्मण रणभूमिमें इन्द्रजित्के हाथसे मारे गये॥ १६ ॥

त्रिजटाके साथ उस विमानद्वारा वहाँ जाकर सीताने रणभूमिमें जो वानरोंकी सेनाएँ मारी गयी थीं, उन सबको देखा॥ १७ ॥

उन्होंने मांसभक्षी राक्षसोंको तो भीतरसे प्रसन्न देखा और श्रीराम तथा लक्ष्मणके पास खड़े हुए वानरोंको अत्यन्त दुःखसे पीड़ित पाया॥ १८ ॥

तदनन्तर सीताने बाणशय्यापर सोये हुए दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको भी देखा, जो बाणोंसे पीड़ित हो संज्ञाशून्य होकर पड़े थे॥ १९ ॥

उन दोनों वीरोंके कवच टूट गये थे, धनुष-बाण अलग पड़े थे, सायकोंसे सारे अङ्ग छिद गये थे और वे बाणसमूहोंके बने हुए पुतलोंकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे॥

जो प्रमुख वीर और समस्त पुरुषोंमें उत्तम थे, वे दोनों भाई कमलनयन राम और लक्ष्मण अग्निपुत्र कुमार शाख और विशाखकी भाँति शरसमूहमें सो रहे थे। उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंको उस अवस्थामें बाणशय्यापर पड़ा देख दुःखसे पीड़ित हुई सीता करुणाजनक स्वरमें जोर-जोरसे विलाप करने लगीं॥ २१-२२ ॥

निर्दोष अङ्गोंवाली श्यामलोचना जनकनन्दिनी सीता अपने पति श्रीराम और देवर लक्ष्मणको धूलमें लोटते देख फूट-फूटकर रोने लगीं॥ २३ ॥

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उनके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे और हृदय शोकके आघातसे पीड़ित था। देवताओंके तुल्य प्रभावशाली उन दोनों भाइयोंको उस अवस्थामें देखकर उनके मरणकी आशङ्का करती हुई वे दुःख एवं चिन्तामें डूब गयीं और इस प्रकार बोलीं॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७ ॥

अड़तालीसवाँ सर्ग

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अड़तालीसवाँ सर्ग

सीताका विलाप और त्रिजटाका उन्हें समझा-बुझाकर श्रीराम-लक्ष्मणके जीवित होनेका विश्वास दिलाकर पुनः लङ्कामें ही लौटा लाना

अपने स्वामी श्रीरामको तथा महाबली लक्ष्मणको भी मारा गया देख शोकसे पीड़ित हुई सीता बारम्बार करुणाजनक विलाप करने लगीं— ॥ १ ॥

‘सामुद्रिक लक्षणोंके ज्ञाता विद्वानोंने मुझे पुत्रवती और सधवा बताया था। आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सब लक्षण-ज्ञानी पुरुष असत्यवादी हो गये॥ २ ॥

‘जिन्होंने मुझे यज्ञपरायण तथा विविध सत्रोंका संचालन करनेवाले राजाधिराजकी पत्नी बताया था, आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष झूठे हो गये॥ ३ ॥

‘जिन लोगोंने लक्षणोंद्वारा मुझे वीर राजाओंकी पत्नियोंमें पूजनीय और पतिके द्वारा सम्मानित समझा था, आज श्रीरामके न रहनेसे वे सभी लक्षणज्ञ पुरुष मिथ्यावादी हो गये॥ ४ ॥

‘ज्योतिषशास्त्रके सिद्धान्तको जाननेवाले जिन ब्राह्मणोंने मेरे सामने ही मुझे नित्य मङ्गलमयी कहा था, वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष आज श्रीरामके मारे जानेपर असत्यवादी सिद्ध हो गये॥ ५ ॥

‘जिन लक्षणभूत कमलोंके हाथ-पैर आदिमें होनेपर कुलवती स्त्रियाँ अपने पति राजाधिराजके साथ सम्राज्ञीके पदपर अभिषिक्त होती हैं, वे मेरे दोनों पैरोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान हैं॥ ६ ॥

‘जिन अशुभ लक्षणोंके कारण सौभाग्य दुर्लभ होता है और स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं, मैं बहुत देखनेपर भी अपने अङ्गोंमें ऐसे लक्षणोंको नहीं देख पाती, तथापि मेरे सारे शुभ लक्षण निष्फल हो गये॥ ७ ॥

‘स्त्रियोंके हाथ-पैरोंमें जो कमलके चिह्न होते हैं, उन्हें लक्षणवेत्ता विद्वानोंने अमोघ बताया है; किंतु आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सारे शुभ लक्षण मेरे लिये व्यर्थ हो गये॥ ८ ॥

‘मेरे सिरके बाल महीन, बराबर और काले हैं। भौंहें परस्पर जुड़ी हुई नहीं हैं। मेरी पिंडलियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) गोल-गोल तथा रोमरहित हैं तथा मेरे दाँत भी परस्पर सटे हुए

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हैं॥ ९ ॥

‘मेरे नेत्रोंके आसपासके भाग, दोनों नेत्र, दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों गुल्फ (तखने) और जाँघें बराबर, विशाल एवं मांसल (पुष्ट) हैं। दोनों हाथोंकी अंगुलियाँ बराबर एवं चिकनी हैं और उनके नख गोल एवं उतारचढ़ाववाले हैं॥ १० ॥

‘मेरे दोनों स्तन परस्पर सटे हुए और स्थूल हैं। इनके अग्रभाग भीतरकी ओर दबे हुए हैं। मेरी नाभि गहरी और उसके आसपासके भाग ऊँचे हैं। मेरे पार्श्वभाग तथा छाती मांसल हैं॥ ११ ॥

‘मेरी अङ्गकान्ति खरादी हुई मणिके समान उज्ज्वल है। शरीरके रोएँ कोमल हैं तथा पैरोंकी दसों अँगुलियाँ और दोनों तलवे—ये बारहों पृथ्वीसे अच्छी तरह सट जाते हैं। इन सबके कारण लक्षणज्ञोंने मुझे शुभलक्षणा बताया था॥ १२ ॥

‘मेरे हाथ-पैर लाल एवं उत्तम कान्तिसे युक्त हैं। उनमें जौकी समूची रेखाएँ हैं तथा मेरे हाथोंकी अंगुलियाँ जब परस्पर सटी होती हैं, उस समय उनमें तनिक भी छिद्र नहीं रह जाता है। कन्याके शुभलक्षणोंको जाननेवाले विद्वानोंने मुझे मन्द-मुसकानवाली बताया था॥ १३ ॥

ज्योतिषके सिद्धान्तको जाननेवाले निपुण ब्राह्मणोंने यह बताया था कि मेरा पतिके साथ राज्याभिषेक होगा, किंतु आज वे सारी बातें झूठी हो गयीं॥ १४ ॥

‘इन दोनों भाइयोंने मेरे लिये जनस्थानको छान डाला तथा मेरा समाचार पाकर अक्षोभ्य समुद्रको पार किया, किंतु हाय! इतना सब कर लेनेके बाद थोड़ी-सी राक्षससेनाके द्वारा जिसे हराना इनके लिये गोपदको लाँघनेके समान था, वे दोनों मारे गये॥ १५ ॥

‘परंतु ये दोनों रघुवंशी बन्धु तो वारुण, आग्नेय, ऐन्द्र, वायव्य और ब्रह्मशिर आदि अस्त्रोंको भी जानते थे। मरनेसे पहले इन्होंने उन अस्त्रोंका प्रयोग क्यों नहीं किया?॥ १६ ॥

‘मुझ अनाथाके रक्षक श्रीराम और लक्ष्मण इन्द्रतुल्य पराक्रमी थे, किंतु इन्द्रजित्ने स्वयं मायासे अदृश्य रहकर ही इन्हें रणभूमिमें मार डाला है॥ १७ ॥

‘अन्यथा युद्धस्थलमें इन श्रीरघुनाथजीके दृष्टिपथमें आकर कोई भी शत्रु, वह मनके समान वेगशाली क्यों न हो, जीवित नहीं लौट सकता था॥ १८ ॥

‘परंतु कालके लिये कुछ भी अधिक बोझ नहीं है (वह सब कुछ कर सकता है)। उसके लिये दैवको भी जीतना विशेष कठिन नहीं है। इस कालके ही वशमें पड़कर आज श्रीराम अपने

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भाईके साथ मारे जाकर युद्धभूमिमें सो रहे हैं॥ १९ ॥

‘मैं श्रीराम, महारथी लक्ष्मण, अपने और अपनी माताके लिये भी उतना शोक नहीं करती हूँ जितना अपनी तपस्विनी सासुजीके लिये कर रही हूँ। वे तो प्रतिदिन यही सोचती होंगी कि वह दिन कब आयेगा जब कि वनवासका व्रत समाप्त करके वनसे लौटे हुए श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको मैं देखूँगी’॥ २०-२१ ॥

इस प्रकार विलाप करती हुई सीतासे राक्षसी त्रिजटाने कहा—‘देवि! विषाद न करो। तुम्हारे ये पतिदेव जीवित हैं॥ २२ ॥

‘देवि! मैं तुम्हें कई ऐसे महान् और उचित कारण बताऊँगी, जिनसे यह सूचित होता है कि ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जीवित हैं॥ २३ ॥

‘युद्धमें स्वामीके मारे जानेपर योद्धाओंके मुँह क्रोध और हर्षकी उत्सुकतासे युक्त नहीं रहते (किंतु यहाँ वे दोनों बातें पायी जाती हैं। इसलिये ये दोनों जीवित हैं)॥ २४ ॥

‘विदेहनन्दिनि! यह पुष्पक नामक विमान दिव्य है। यदि इन दोनोंके प्राण चले गये होते तो (वैधव्यावस्थामें) यह तुम्हें धारण न करता॥ २५ ॥

‘इसके सिवा जब प्रधान वीर मारा जाता है, तब उसकी सेना उत्साह और उद्योगसे हीन हो युद्धस्थलमें उसी तरह मारी-मारी फिरती है, जैसे कर्णधारके नष्ट हो जानेपर नौका जलमें ही बहती रहती है। परंतु तपस्विनि! इस सेनामें किसी प्रकारकी घबराहट या उद्वेग नहीं है। यह इन दोनों राजकुमारोंकी रक्षा कर रही है। इस प्रकार मैंने प्रेमपूर्वक तुम्हें यह बताया है कि ये दोनों भाई जीवित हैं॥ २६-२७ ॥

‘इसलिये अब तुम इन भावी सुखकी सूचना देनेवाले अनुमानों (हेतुओं) से निश्चिन्त हो जाओ— विश्वास करो कि ये जीवित हैं। तुम इन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको इसी रूपमें देखो कि ये मारे नहीं गये हैं। यह बात मैं तुमसे स्नेहवश कह रही हूँ॥ २८ ॥

‘मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा शील-स्वभाव तुम्हारे निर्मल चरित्रके कारण बड़ा सुखदायक जान पड़ता है, इसीलिये तुम मेरे मनमें घर कर गयी हो। अतएव मैंने तुमसे न तो पहले कभी झूठ कहा है और न आगे ही कहूँगी॥ २९ ॥

‘इन दोनों वीरोंको रणभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। वैसा लक्षण देखकर ही मैंने तुमसे ये बातें कही हैं॥ ३० ॥

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‘मिथिलेशकुमारी! यह महान् आश्चर्यकी बात तो देखो। बाणोंके लगनेसे ये अचेत होकर पड़े हैं तो भी लक्ष्मी (शरीरकी सहज कान्ति) इनका त्याग नहीं कर रही है॥ ३१ ॥

‘जिनके प्राण निकल जाते हैं अथवा जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, उनके मुखोंपर यदि दृष्टिपात किया जाय तो प्रायः वहाँ बड़ी विकृति दिखायी देती है (इन दोनोंके मुखोंकी शोभा ज्यों-की-त्यों बनी हुई है; इसलिये ये जीवित हैं)॥ ३२ ॥

‘जनककिशोरी! तुम श्रीराम और लक्ष्मणके लिये शोक, दुःख और मोह त्याग दो। ये अब मर नहीं सकते’॥ ३३ ॥

त्रिजटाकी यह बात सुनकर देवकन्याके समान सुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीताने हाथ जोड़कर उससे कहा—‘बहिन! ऐसा ही हो’॥ ३४ ॥

फिर मनके समान वेगवाले पुष्पकविमानको लौटाकर त्रिजटा दुःखिनी सीताको लङ्कापुरीमें ही ले आयी॥ ३५ ॥

तत्पश्चात् त्रिजटाके साथ विमानसे उतरनेपर राक्षसियोंने उन्हें पुनः अशोकवाटिकामें ही पहुँचा दिया॥

बहुसंख्यक वृक्षसमूहोंसे सुशोभित राक्षसराजकी उस विहारभूमिमें पहुँचकर सीताने उसे देखा और उन दोनों राजकुमारोंका चिन्तन करके वे महान् शोकमें डूब गयीं॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८ ॥

उनचासवाँ सर्ग

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उनचासवाँ सर्ग

श्रीरामका सचेत होकर लक्ष्मणके लिये विलाप करना और स्वयं प्राणत्यागका विचार करके वानरोंको लौट जानेकी आज्ञा देना

दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भयंकर सर्पाकार बाणके बन्धनमें बँधे हुए-से पड़े थे। वे लहूलुहान हो रहे थे और फुफकारते हुए सर्पोंके समान साँस ले रहे थे॥ १ ॥

उन दोनों महात्माओंको चारों ओरसे घेरकर सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ महाबली वानर शोकमें डूबे खड़े थे॥ २ ॥

इसी बीचमें पराक्रमी श्रीराम नागपाशसे बँधे होनेपर भी अपने शरीरकी दृढ़ता और शक्तिमत्ताके कारण मूर्छासे जाग उठे॥ ३ ॥

उन्होंने देखा कि भाई लक्ष्मण बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं और उनका चेहरा बहुत उतर गया है; अतः वे आतुर होकर विलाप करने लगे— ॥ ४ ॥

‘हाय! यदि मुझे सीता मिल भी गयीं तो मैं उन्हें लेकर क्या करूँगा? अथवा इस जीवनको ही रखकर क्या करना है? जब कि आज मैं अपने पराजित हुए भाईको युद्धस्थलमें पड़ा हुआ देख रहा हूँ॥ ५ ॥

‘मर्त्यलोकमें ढूँढ़नेपर मुझे सीता-जैसी दूसरी स्त्री मिल सकती है; परंतु लक्ष्मणके समान सहायक और युद्धकुशल भाई नहीं मिल सकता॥ ६ ॥

‘सुमित्राके आनन्दको बढ़ानेवाले लक्ष्मण यदि जीवित न रहे तो मैं वानरोंके देखते-देखते अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा॥ ७ ॥

‘लक्ष्मणके बिना यदि मैं अयोध्याको लौटूँ तो माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा तथा अपने पुत्रको देखनेके लिये उत्सुक हो बछड़ेसे बिछुड़ी गायके समान काँपती और कुररीकी भाँति रोतीबिलखती माता सुमित्रासे क्या कहूँगा? उन्हें किस तरह धैर्य बँधाऊँगा?॥ ८-९ ॥

‘मैं यशस्वी भरत और शत्रुघ्नसे किस तरह यह कह सकूँगा कि लक्ष्मण मेरे साथ वनको गये थे; किंतु मैं उन्हें वहीं खोकर उनके बिना ही लौट आया हूँ॥

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‘दोनों माताओंसहित सुमित्राका उपालम्भ मैं नहीं सह सकूँगा; अतः यहीं इस देहको त्याग दूँगा। अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं है॥ ११॥

‘मुझ-जैसे दुष्कर्मी और अनार्यको धिक्कार है, जिसके कारण लक्ष्मण मरे हुएके समान बाण-शय्यापर सो रहे हैं॥ १२॥

‘लक्ष्मण! जब मैं अत्यन्त विषादमें डूब जाता था, उस समय तुम्हीं सदा मुझे आश्वासन देते थे; परंतु आज तुम्हारे प्राण नहीं रहे, इसलिये आज तुम मुझ दुःखियासे बात करनेमें भी असमर्थ हो॥ १३॥

‘भैया! जिस रणभूमिमें आज तुमने बहुत-से राक्षसोंको मार गिराया था, उसीमें शूरवीर होकर भी तुम बाणोंद्वारा मारे जाकर सो रहे हो॥ १४॥

‘इस बाण-शय्यापर तुम खूनसे लथपथ होकर पड़े हो और बाणोंसे व्याप्त होकर अस्ताचलको जाते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हो॥ १५॥

‘बाणोंसे तुम्हारा मर्मस्थल विदीर्ण हो गया, इसलिये तुम यहाँ बात भी नहीं कर सकते। यद्यपि तुम बोल नहीं रहे हो, तथापि तुम्हारे नेत्रोंकी लालीसे तुम्हारी मार्मिक पीड़ा सूचित हो रही है॥ १६॥

‘जिस तरह वनकी यात्रा करते समय महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी प्रकार मैं भी यमलोकमें इनका अनुसरण करूँगा॥ १७॥

‘जो मेरे प्रिय बन्धुजन थे और सदा मुझमें अनुराग एवं भक्तिभाव रखते थे, वे ही लक्ष्मण आज मुझ अनार्यकी दुर्नीतियोंके कारण इस अवस्थाको पहुँच गये॥

‘मुझे ऐसा कोऽइ प्रसंग याद नहीं आता, जब कि वीर लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित होनेपर भी मुझे कभी कोऽइ कठोर या अप्रिय बात सुनायी हो॥ १९॥

‘लक्ष्मण एक ही वेगसे पाँच सौ बाणोंकी वर्षा करते थे; इसलिये धनुर्विद्यामें कार्तवीर्य अर्जुनसे भी बढ़कर थे॥ २०॥

‘जो अपने अस्त्रोंद्वारा महात्मा इन्द्रके भी अस्त्रोंको काट सकते थे; वे ही बहुमूल्य शय्यापर सोनेयोग्य लक्ष्मण आज स्वयं मारे जाकर पृथ्वीपर सो रहे हैं॥

‘मैं विभीषणको राक्षसोंका राजा न बना सका; अतः मेरा वह झूठा प्रलाप मुझे सदा जलाता रहेगा, इसमें संशय नहीं है॥ २२॥

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‘वानरराज सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्तमें यहाँसे लौट जाओ; क्योंकि मेरे बिना तुम्हें असहाय समझकर रावण तुम्हारा तिरस्कार करेगा॥ २३ ॥

‘मित्र सुग्रीव! सेना और सामग्रियोंसहित अङ्गदको आगे करके नल और नीलके साथ तुम समुद्रके पार चले जाओ॥ २४ ॥

‘मैं लंगूरोंके स्वामी गवाक्ष तथा ऋक्षराज जाम्बवान्‌से भी बहुत संतुष्ट हूँ। तुम सब लोगोंने युद्धमें वह महान् पुरुषार्थ कर दिखाया है, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था॥ २५ ॥

‘अङ्गद, मैन्द और द्विविदने भी महान् पराक्रम प्रकट किया है। केसरी और सम्पातिने भी समराङ्गणमें घोर युद्ध किया है॥ २६ ॥

‘गवय, गवाक्ष, शरभ, गज तथा अन्य वानरोंने भी मेरे लिये प्राणोंका मोह छोड़कर संग्राम किया है॥ २७ ॥

‘किंतु सुग्रीव! मनुष्योंके लिये दैवके विधानको लाँघना असम्भव है। मेरे परम मित्र अथवा उत्तम सुहृद्‌के नाते तुम-जैसे धर्मभीरु पुरुषके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब तुमने किया है। वानरशिरोमणियो! तुम सबने मिलकर मित्रके इस कार्यको सम्पन्न किया है। अब मैं आज्ञा देता हूँ—तुम सब जहाँ इच्छा हो, वहाँ चले जाओ’॥ २८-२९ १/२ ॥

भगवान् श्रीरामका यह विलाप भूरी आँखोंवाले जिन-जिन वानरोंने सुना, वे सब अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ ३०-३१ ॥

तदनन्तर समस्त सेनाओंको स्थिरतापूर्वक स्थापित करके विभीषण हाथमें गदा लिये तुरंत उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी विद्यमान थे॥ ३२ ॥

काले कोयलोंकी राशिके समान कृष्ण कान्तिवाले विभीषणको शीघ्रतापूर्वक आते देख सब वानर उन्हें रावणपुत्र इन्द्रजित् समझकर इधर-उधर भागने लगे॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९ ॥

पचासवाँ सर्ग

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पचासवाँ सर्ग

विभीषणको इन्द्रजित् समझकर वानरोंका पलायन और सुग्रीवकी आज्ञासे जाम्बवान्‌का उन्हें सान्त्वना देना, विभीषणका विलाप और सुग्रीवका उन्हें समझाना, गरुड़का आना और श्रीराम-लक्ष्मणको नागपाशसे मुक्त करके चला जाना

उस समय महातेजस्वी महाबली वानरराज सुग्रीवने पूछा— 'वानरो! जैसे जलमें बवंडरकी मारी हुई नौका डगमगाने लगती है, उसी प्रकार जो यह हमारी सेना सहसा व्यथित हो उठी है, इसका क्या कारण है?'॥ १ ॥

सुग्रीवकी यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गदने कहा—'क्या आप श्रीराम और महारथी लक्ष्मणकी दशा नहीं देख रहे हैं?॥ २ ॥

‘ये दोनों वीर महात्मा दशरथकुमार रक्तसे भीगे हुए बाण-शय्यापर पड़े हैं और बाणोंके समूहसे व्याप्त हो रहे हैं'॥ ३ ॥

तब वानरराज सुग्रीवने पुत्र अङ्गदसे कहा— 'बेटा! मैं ऐसा नहीं मानता कि सेनामें अकारण ही भगदड़ मच गयी है। किसी-न-किसी भयके कारण ऐसा होना चाहिये॥ ४ ॥

‘ये वानर उदास मुँहसे अपने-अपने हथियार फेंककर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे हैं और भयके कारण आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं'॥ ५ ॥

‘पलायन करते समय उन्हें एक दूसरेसे लज्जा नहीं होती है। वे पीछेकी ओर नहीं देखते हैं। एक-दूसरेको घसीटते हैं और जो गिर जाता है, उसे लाँघकर चल देते हैं (भयके मारे उठातेतक नहीं हैं)'॥ ६ ॥

इसी बीचमें वीर विभीषण हाथमें गदा लिये वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने विजयसूचक आशीर्वाद देकर सुग्रीव तथा श्रीरघुनाथजीकी अभ्युदय-कामना की॥ ७ ॥

वानरोंको भयभीत करनेवाले विभीषणको देखकर सुग्रीवने अपने पास ही खड़े हुए महात्मा ऋक्षराज जाम्बवान्से कहा— ॥ ८ ॥

‘ये विभीषण आये हैं, जिन्हें देखकर वानरशिरोमणियोंको यह संदेह हुआ है कि रावणका बेटा इन्द्रजित् आ गया। इसीलिये इनका भय बहुत बढ़ गया है और वे भागे जा रहे हैं॥ ९ ॥

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‘तुम शीघ्र जाकर यह बताओ कि इन्द्रजित् नहीं, विभीषण आये हैं। ऐसा कहकर बहुधा भयभीत हो पलायन करते हुए इन सब वानरोंको सुस्थिर करो— भागनेसे रोको’॥ १० ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर ऋक्षराज जाम्बवान्ने भागते हुए वानरोंको लौटाकर उन्हें सान्त्वना दी॥ ११ ॥

ऋक्षराजकी बात सुनकर और विभीषणको अपनी आँखों देखकर वानरोंने भयको त्याग दिया तथा वे सब-के-सब फिर लौट आये॥ १२ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे व्याप्त हुआ देख धर्मात्मा विभीषणको उस समय बड़ी व्यथा हुई॥ १३ ॥

उन्होंने जलसे भीगे हुए उन दोनों भाइयोंके नेत्र पोंछे और मन-ही-मन शोकसे पीड़ित हो वे रोने और विलाप करने लगे—॥ १४ ॥

‘हाय! जिन्हें युद्ध अधिक प्रिय था और जो बल-विक्रमसे सम्पन्न थे, वे ही ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मायासे युद्ध करनेवाले राक्षसोंद्वारा इस अवस्थाको पहुँचा दिये गये॥ १५ ॥

‘ये दोनों वीर सरलतापूर्वक पराक्रम प्रकट कर रहे थे। परंतु भाईके इस दुरात्मा कुपुत्रने अपनी कुटिल राक्षसी बुद्धिके द्वारा इन दोनोंके साथ धोखा किया॥ १६ ॥

‘इन दोनोंके शरीर बाणोंद्वारा पूर्णतः छिद गये हैं। ये दोनों भाई खूनसे नहा उठे हैं और इस अवस्थामें पृथ्वीपर सोये हुए ये दोनों राजकुमार काँटोंसे भरे हुए साही नामक जन्तुके समान दिखायी देते हैं॥ १७ ॥

‘जिनके बल-पराक्रमका आश्रय लेकर मैंने लङ्काके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेकी अभिलाषा की थी; वे ही दोनों भाई पुरुषशिरोमणि श्रीराम और लक्ष्मण देहत्यागके लिये सोये हुए हैं॥ १८ ॥

‘आज मैं जीते-जी मर गया। मेरा राज्यविषयक मनोरथ नष्ट हो गया। शत्रु रावणने जो सीताको न लौटानेकी प्रतिज्ञा की थी, उसकी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई। उसके पुत्रने उसे सफलमनोरथ बना दिया’॥ १९ ॥

इस प्रकार विलाप करते हुए विभीषणको हृदयसे लगाकर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीवने उनसे यों कहा—॥ २० ॥

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‘धर्मज्ञ! तुम्हें लङ्काका राज्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। पुत्रसहित रावण यहाँ अपनी कामना पूरी नहीं कर सकेगा॥ २१ ॥

‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छा त्यागनेके पश्चात् गरुड़की पीठपर बैठकर रणभूमिमें राक्षसगणोंसहित रावणका वध करेंगे’॥ २२ ॥

राक्षस विभीषणको इस प्रकार सान्त्वना और आश्वासन देकर सुग्रीवने अपने बगलमें खड़े हुए श्वशुर सुषेणसे कहा— ॥ २३ ॥

‘आप होशमें आ जानेपर इन दोनों शत्रुदमन श्रीराम और लक्ष्मणको साथ ले शूरवीर वानरगणोंके साथ किष्किन्धाको चले जाइये॥ २४ ॥

‘मैं रावणको पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर उसके हाथसे मिथिलेशकुमारी सीताको उसी प्रकार छीन लाऊँगा, जैसे देवराज इन्द्र अपनी खोयी हुई राजलक्ष्मीको दैत्योंके यहाँसे हर लाये थे’॥ २५ ॥

वानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सुषेणने कहा— ‘पूर्वकालमें जो देवासुर-महायुद्ध हुआ था, उसे हमने देखा था॥ २६ ॥

‘उस समय अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा लक्ष्यवेधमें कुशल देवताओंको बारम्बार बाणोंसे आच्छादित करते हुए दानवोंने बहुत घायल कर दिया था॥ २७ ॥

‘उस युद्धमें जो देवता अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित, अचेत और प्राणशून्य हो जाते थे, उन सबकी रक्षाके लिये बृहस्पतिजी मन्त्रयुक्त विद्याओं तथा दिव्य ओषधियोंद्वारा उनकी चिकित्सा करते थे॥ २८ ॥

‘मेरी राय है कि उन ओषधियोंको ले आनेके लिये सम्पाति और पनस आदि वानर शीघ्र ही वेगपूर्वक क्षीरसागरके तटपर जायँ॥ २९ ॥

‘सम्पाति आदि वानर वहाँ पर्वतपर प्रतिष्ठित हुई दो प्रसिद्ध महौषधियोंको जानते हैं। उनमेंसे एकका नाम है संजीवकरणी और दूसरीका नाम है विशल्यकरणी। इन दोनों दिव्य ओषधियोंका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है॥ ३० ॥

‘सागरोंमें उत्तम क्षीरसमुद्रके तटपर चन्द्र और द्रोण नामक दो पर्वत हैं, जहाँ पूर्वकालमें अमृतका मन्थन किया गया था। उन्हीं दोनों पर्वतोंपर वे श्रेष्ठ ओषधियाँ वर्तमान हैं। महासागरमें

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देवताओोंने ही उन दोनों पर्वतोंको प्रतिष्ठित किया था। राजन्! ये वायुपुत्र हनुमान् उन दिव्य ओषधियोंको लानेके लिये वहाँ जायँ'॥ ३१-३२॥

ओषधियोंको लानेकी वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोरसे वायु प्रकट हुई, मेघोंकी घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं। वह वायु सागरके जलमें हलचल मचाकर पर्वतोंको कम्पित-सी करने लगी॥ ३३॥

गरुड़के पंखसे उठी हुई प्रचण्ड वायुने सम्पूर्ण द्वीपके बड़े-बड़े वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्रके जलमें गिरा दिया॥ ३४॥

लङ्कावासी महाकाय सर्प भयसे थर्रा उठे। सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रतापूर्वक समुद्रके जलमें घुस गये॥ ३५॥

तदनन्तर दो ही घड़ीमें समस्त वानरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुड़को वहाँ उपस्थित देखा॥ ३६॥

उन्हें आया देख जिन महाबली नागोंने बाणके रूपमें आकर उन दोनों महापुरुषोंको बाँध रखा था, वे सब-के-सब वहाँसे भाग खड़े हुए॥ ३७॥

तत्पश्चात् गरुड़ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथोंसे उनके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखोंको पोंछा॥ ३८॥

गरुड़जीका स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मणके सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्तिसे युक्त एवं स्निग्ध हो गये॥ ३९॥

उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टिशक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहलेसे भी दुगुने हो गये॥ ४०॥

फिर महातेजस्वी गरुड़ने उन दोनों भाइयोंको, जो साक्षात् इन्द्रके समान थे, उठाकर हृदयसे लगा लिया। तब श्रीरामजीने प्रसन्न होकर उनसे कहा—॥ ४१॥

‘इन्द्रजित्के कारण हमलोगोंपर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपासे लाँघ गये। आप विशिष्ट उपायके ज्ञाता हैं; अतः आपने हम दोनोंको शीघ्र ही पूर्ववत् बलसे सम्पन्न कर दिया है॥ ४२॥

जैसे पिता दशरथ और पितामह अजके पास जानेसे मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्षसे खिल उठा है॥ ४३॥

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‘आप बड़े रूपवान् हैं, दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य अङ्गरागसे विभूषित हैं। आपने दो स्वच्छ वस्त्र धारण कर रखे हैं तथा दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं?’ (सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान्ने मानवभावका आश्रय लेकर गरुड़से ऐसा प्रश्न किया)॥ ४४ ॥

तब महातेजस्वी महाबली पक्षिराज विनतानन्दन गरुड़ने मन-ही-मन प्रसन्न हो आनन्दके आँसुओंसे भरे हुए नेत्रवाले श्रीरामसे कहा— ॥ ४५ ॥

‘काकुत्स्थ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुड़ हूँ। बाहर विचरनेवाला आपका प्राण हूँ। आप दोनोंकी सहायताके लिये ही मैं इस समय यहाँ आया हूँ॥ ४६ ॥

‘महापराक्रमी असुर, महाबली दानव, देवता तथा गन्धर्व भी यदि इन्द्रको आगे करके यहाँ आते तो वे भी इस भयंकर सर्पाकार बाणके बन्धनसे आपको छुड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकते थे॥ ४७ १/२ ॥

‘क्रूरकर्मा इन्द्रजित्ने मायाके बलसे जिन नागरूपी बाणोंका बन्धन तैयार किया था, वे नाग ये कद्रूके पुत्र ही थे। इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं। इन नागोंका विष बड़ा भयंकर होता है। ये राक्षसकी मायाके प्रभावसे बाण बनकर आपके शरीरमें लिपट गये थे॥ ४८-४९ ॥

‘धर्मके ज्ञाता सत्यपराक्रमी श्रीराम! समराङ्गणमें शत्रुओंका संहार करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणके साथ ही आप बड़े सौभाग्यशाली हैं (जो अनायास ही इस नागपाशसे मुक्त हो गये)॥ ५० ॥

‘मैं देवताओंके मुखसे आपलोगोंके नागपाशमें बँधनेका समाचार सुनकर बड़ी उतावलीके साथ यहाँ आया हूँ। हम दोनोंमें जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्रधर्मका पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ॥

‘आकर मैंने इस महाभयंकर बाण-बन्धनसे आप दोनोंको छुड़ा दिया। अब आपको सदा ही सावधान रहना चाहिये॥ ५२ ॥

‘समस्त राक्षस स्वभावसे ही संग्राममें कपटपूर्वक युद्ध करनेवाले होते हैं, परंतु शुद्धभाववाले आप-जैसे शूरवीरोंका सरलता ही बल है॥ ५३ ॥

‘इसलिये इसी दृष्टान्तको सामने रखकर आपको रणक्षेत्रमें राक्षसोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं’॥ ५४ ॥