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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ आठवाँ सर्ग

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एक सौ आठवाँ सर्ग

श्रीरामचन्द्रजीका भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछोंके साथ परमधाम जानेका निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविदको इस भूतलपर ही रहनेका आदेश देना

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर शीघ्रगामी दूत शीघ्र ही मधुरापुरीको चल दिये। उन्होंने मार्गमें कहीं भी पड़ाव नहीं डाला॥ १ ॥

लगातार तीन दिन और तीन रात चलकर वे मधुरा पहुँचे और अयोध्याकी सारी बातें उन्होंने शत्रुघ्नसे यथार्थतः कह सुनायीं॥ २ ॥

श्रीरामकी प्रतिज्ञा, लक्ष्मणका परित्याग, श्रीरामके दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक और पुरवासियोंका श्रीरामके साथ जानेका निश्चय आदि सब बातें बताकर दूतोंने यह भी कहा कि ‘परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने कुशके लिये विन्ध्यपर्वतके किनारे कुशावती नामक रमणीय नगरीका निर्माण कराया है॥ ३-४ ॥

‘इसी तरह लवके लिये श्रावस्ती नामसे प्रसिद्ध सुन्दरपुरी बसायी है। श्रीरघुनाथजी और भरतजी दोनों महारथी वीर अयोध्याको सूनी करके साकेतधामको जानेके लिये उद्योग कर रहे हैं।’ इस प्रकार महात्मा शत्रुघ्नको शीघ्रतापूर्वक सब बातें बताकर दूतोंने कहा—‘राजन्! शीघ्रता कीजिये’ इतना कहकर वे चुप हो गये॥ ५-६ १/२ ॥

अपने कुलका भयंकर संहार उपस्थित हुआ सुनकर रघुनन्दन शत्रुघ्नने समस्त प्रजा तथा काञ्चन नामक पुरोहितको बुलाया और उनसे सब बातें यथावत् कह सुनायीं॥ ७-८ ॥

उन्होंने यह भी बताया कि भाइयोंके साथ मेरे शरीरका भी वियोग होनेवाला है। इसके बाद वीर राजा शत्रुघ्नने अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक किया॥ ९ ॥

सुबाहुने मधुराका राज्य पाया और शत्रुघातीने विदिशाका। मधुराकी सेनाके दो भाग करके राजा शत्रुघ्नने दोनों पुत्रोंको बाँट दिये तथा बाँटनेके योग्य धनका भी विभाजन करके उन दोनोंको दे दिया और उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें स्थापित कर दिया॥ १० ॥

इस प्रकार सुबाहुको मधुरामें तथा शत्रुघातीको विदिशामें स्थापित करके रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न एकमात्र रथके द्वारा अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए॥ ११ ॥

वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा महात्मा श्रीराम अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे हैं। उनके शरीरपर महीन रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा है तथा वे अविनाशी महर्षियोंके साथ विराजमान हैं॥ १२ ॥

निकट जा हाथ जोड़कर उन्होंने श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और धर्मका चिन्तन करते हुए इन्द्रियोंको काबूमें करके वे धर्मके ज्ञाता श्रीरामसे बोले— ॥ १३ ॥

'रघुकुलनन्दन! मैं अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक करके आया हूँ। राजन्! आप मुझे भी अपने साथ चलनेके दृढ़ निश्चयसे युक्त समझें॥ १४ ॥

'वीर! आज इसके विपरीत आप मुझसे और कुछ न कहियेगा; क्योंकि उससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई दण्ड न होगा। मैं नहीं चाहता कि किसीके विशेषतः मुझ-जैसे सेवकके द्वारा आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन हो'॥

शत्रुघ्नका यह दृढ़ विचार जानकर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा— 'बहुत अच्छा'॥ १६ ॥

उनकी यह बात समाप्त होते ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ और राक्षसोंके समुदाय बहुत बड़ी संख्यामें वहाँ आ पहुँचे॥ १७ ॥

साकेत-धामको जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरामके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वे सभी वानर सुग्रीवको आगे करके वहाँ पधारे थे॥ १८ ॥

उनमेंसे कितने ही देवताओंके पुत्र थे, कितने ही ऋषियोंके बालक थे और कितने ही गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुए थे। श्रीरघुनाथजीके लीलासंवरणका समय जानकर वे सब-के-सब वहाँ आये थे। उक्त सभी वानर और राक्षस श्रीरामको प्रणाम करके बोले— ॥ १९ १/२ ॥

'राजन्! हम भी आपके साथ चलनेका निश्चय लेकर यहाँ आये हैं। पुरुषोत्तम श्रीराम! यदि आप हमें साथ लिये बिना ही चले जायँगे तो हम यह समझेंगे कि आपने यमदण्ड उठाकर हमें मार गिराया है'॥ २०-२१ ॥

इसी बीचमें महाबली सुग्रीव भी वीर श्रीरामको विधिपूर्वक प्रणाम करके अपना अभिप्राय निवेदन करनेके लिये उद्यत हो बोले— ॥ २२ ॥

'नरेश्वर! मैं वीर अङ्गदका राज्याभिषेक करके आया हूँ। आप समझ लें कि मेरा भी आपके साथ चलनेका दृढ़ निश्चय है'॥ २३ ॥

उनकी यह बात सुनकर मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने वानरराज सुग्रीवकी मित्रताका विचार करके उनसे कहा—॥ २४ ॥

‘सखे सुग्रीव! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे बिना देवलोकमें और महान् परमपद या परमधाममें भी नहीं जा सकता’॥ २५ ॥

पूर्वोक्त वानरों और राक्षसोंकी भी बात सुनकर महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुसकराये और राक्षसराज विभीषणसे बोले—॥ २६ ॥

‘महापराक्रमी राक्षसराज विभीषण! जबतक संसारकी प्रजा जीवन धारण करेगी, तबतक तुम भी लङ्कामें रहकर अपने शरीरको धारण करोगे॥ २७ ॥

‘जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसारमें मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तबतक इस भूतलपर तुम्हारा राज्य बना रहेगा’॥ २८ ॥

‘मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं। तुम्हें मेरी आज्ञाका पालन करना चाहिये। तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो। इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रतिवाद नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥

‘महाबली राक्षसराज! इसके सिवा मैं तुमसे एक बात और कहना चाहता हूँ। हमारे इक्ष्वाकुकुलके देवता हैं भगवान् जगन्नाथ (श्रीशेषशायी भगवान् विष्णु)। इन्द्र आदि देवता भी उनकी निरन्तर आराधना करते रहते हैं। तुम भी सदा उनकी पूजा करते रहना’॥ ३० १/२ ॥

राक्षसराज विभीषणने श्रीरघुनाथजीकी इस आज्ञाको अपने हृदयमें धारण किया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसका पालन स्वीकार किया॥ ३१ १/२ ॥

विभीषणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्‌जीसे बोले—‘तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है। अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो॥ ३२ १/२ ॥

‘हरीश्वर! जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो’॥ ३३ १/२ ॥

महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले—॥ ३४ १/२ ॥

‘भगवन्! संसारमें जबतक आपकी पावन कथाका प्रचार रहेगा, तबतक आपके आदेशका पालन करता हुआ मैं इस पृथ्वीपर ही रहूँगा’॥ ३५ १/२ ॥

इसके बाद भगवान्ने ब्रह्माजीके पुत्र बूढ़े जाम्बवान् तथा मैन्द और द्विविदसे भी कहा—‘जाम्बवान्सहित तुम पाँचों व्यक्ति (जाम्बवान्, विभीषण, हनुमान्, मैन्द और द्विविद) तबतक जीवित रहो, जबतक कि प्रलय एवं कलियुग न आ जाय’ (इनमेंसे हनुमान् और विभीषण तो प्रलयकालतक रहनेवाले हैं और शेष तीन व्यक्ति कलि और द्वापरकी संधिमें श्रीकृष्णावतारके समय मारे गये या मर गये)॥ ३६-३७ ॥

उन सबसे ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने शेष सभी रीछों और वानरोंसे कहा—‘बहुत अच्छा’ तुमलोगोंकी बातें मुझे स्वीकार हैं। तुम सब अपने कथनानुसार मेरे साथ चलो’॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८ ॥