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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छियालीसवाँ सर्ग

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छियालीसवाँ सर्ग

लक्ष्मणका सीताको रथपर बिठाकर उन्हें वनमें छोड़नेके लिये ले जाना और गङ्गाजीके तटपर पहुँचना

तब सुमन्त्र ‘बहुत अच्छा’ कहकर तुरंत ही उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ एक सुन्दर रथ ले आये, जिसपर तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब लक्ष्मणने मन-ही-मन दुःखी हो सूखे मुखसे सुमन्त्रसे कहा— ॥ १ ॥

बिछा दो। मैं महाराजकी आज्ञासे सीतादेवीको पुण्यकर्मा महर्षियोंके आश्रमपर पहुँचा दूँगा। तुम शीघ्र रथ ले आओ’॥ २-३ ॥

‘सारथे! एक उत्तम रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतो और उस रथमें सीताजीके लिये सुन्दर आसन

सुखद शय्यासे युक्त सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था॥ ४ ॥

उसे लाकर वे मित्रोंका मान बढ़ानेवाले सुमित्रा-कुमारसे बोले— ‘प्रभो! यह रथ आ गया। अब जो कुछ करना हो कीजिये’॥ ५ ॥

सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण राजमहलमें गये और सीताजीके पास जाकर बोले— ॥ ६ ॥

‘देवि! आपने महाराजसे मुनियोंके आश्रमोंपर जानेके लिये वर माँगा था और महाराजने आपको आश्रमपर पहुँचानेके लिये प्रतिज्ञा की थी॥ ७ ॥

‘देवि! विदेहनन्दिनि! उस बातचीतके अनुसार मैं राजाकी आज्ञासे शीघ्र ही गङ्गातटपर ऋषियोंके सुन्दर आश्रमोंतक चलूँगा और आपको मुनिजनसेवित वनमें पहुँचाऊँगा’॥ ८½ ॥

महात्मा लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ ९½ ॥

बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न लेकर वैदेही सीता वनकी यात्राके लिये उद्यत हो गयीं और लक्ष्मणसे बोलीं— ‘ये सब बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न-धन मैं मुनि-पत्नियोंको दूँगी’॥ १०-११½ ॥

लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मिथिलेशकुमारी सीताको रथपर चढ़ाया और श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाको ध्यानमें रखते हुए उस तेज घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर वे वनकी ओर चल दिये॥ १२½ ॥

उस समय सीताने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मणसे कहा ‘रघुनन्दन! मुझे बहुत-से अपशकुन दिखायी देते हैं। आज मेरी दायीं आँख फड़कती है और मेरे शरीरमें कम्प हो रहा है॥ १३-१४ ॥

‘सुमित्राकुमार! मैं अपने हृदयको अस्वस्थ-सा देख रही हूँ। मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है और मेरी अधीरता पराकाष्ठाको पहुँची हुई है॥ १५ ॥

‘विशाललोचन लक्ष्मण! मुझे पृथ्वी सूनी-सी ही दिखायी देती है। भ्रातृवत्सल! तुम्हारे भाई कुशलसे रहें॥ १६ ॥

‘वीर! मेरी सब सासुएँ समान रूपसे सानन्द रहें। नगर और जनपदमें भी समस्त प्राणी सकुशल रहें’॥ १७ ॥

ऐसा कहती हुई सीताने हाथ जोड़कर देवताओंसे प्रार्थना की। सीताकी बात सुनकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऊपरसे प्रसन्न हो मुरझाये हुए हृदयसे कहा—‘सबका कल्याण हो’॥ १८½ ॥

तदनन्तर गोमतीके तटपर पहुँचकर एक आश्रममें उन सबने रात बितायी। फिर प्रातःकाल उठकर सुमित्राकुमारने सारथिसे कहा—॥ १९½ ॥

‘सारथे! जल्दी रथ जोतो। आज मैं भागीरथीके जलको उसी प्रकार सिरपर धारण करूँगा; जैसे भगवान् शङ्करने अपने तेजसे उसे मस्तकपर धारण किया था’॥ २०½ ॥

सारथिने मनके समान वेगशाली चारों घोड़ोंको टहलाकर रथमें जोता और विदेहनन्दिनी सीतासे हाथ जोड़कर कहा—‘देवि! रथपर आरूढ़ होइये’॥ २१½ ॥

सूतके कहनेसे देवी सीता उस उत्तम रथपर सवार हुईं। इस प्रकार सुमित्राकुमार लक्ष्मण और बुद्धिमान् सुमन्त्रके साथ विशाललोचना सीतादेवी पापनाशिनी गङ्गाके तटपर जा पहुँचीं॥ २२-२३ ॥

दोपहरके समय भागीरथीकी जलधारातक पहुँचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुःखी हो उच्च स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे॥ २४ ॥

लक्ष्मणको शोकसे आतुर देख धर्मज्ञा सीता अत्यन्त चिन्तित हो उनसे बोलीं— ‘लक्ष्मण! यह क्या? तुम रोते क्यों हो! गङ्गाके तटपर आकर तो मेरी चिरकालकी अभिलाषा पूर्ण हुई है। इस हर्षके समय तुम रोकर मुझे दुःखी क्यों करते हो?॥ २५-२६ ॥

‘पुरुषप्रवर! श्रीरामके पास तो तुम सदा ही रहते हो। क्या दो दिनतक उनसे बिछुड़ जानेके कारण तुम इतने शोकाकुल हो गये हो?॥ २७ ॥

‘लक्ष्मण! श्रीराम तो मुझे भी अपने प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हैं; परंतु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही हूँ। तुम ऐसे नादान न बनो॥ २८ ॥

‘मुझे गङ्गाके उस पार ले चलो और तपस्वी मुनियोंके दर्शन कराओ। मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूँगी॥ २९ ॥

‘तत्पश्चात् उन महर्षियोंका यथायोग्य अभिवादन करके वहाँ एक रात ठहरकर हम पुनः अयोध्यापुरीको लौट चलेंगे॥ ३० ॥

‘मेरा मन भी सिंहके समान वक्षःस्थल, कृश उदर और कमलके समान नेत्रवाले श्रीरामको, जो मनको रमानेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, देखनेके लिये उतावला हो रहा है’॥ ३१ ॥

सीताजीका यह वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपनी दोनों सुन्दर आँखें पोंछ लीं और नाविकोंको बुलाया। उन मल्लाहोंने हाथ जोड़कर कहा— ‘प्रभो! यह नाव तैयार है’॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥