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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अठारहवाँ सर्ग

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अठारहवाँ सर्ग

भगवान् श्रीरामका शरणागतकी रक्षाका महत्त्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषणसे मिलना

वायुनन्दन हनुमान्‌जीके मुखसे अपने मनमें बैठी हुई बात सुनकर दुर्जय वीर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया। वे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘मित्रो! विभीषणके सम्बन्धमें मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ। आप सब लोग मेरे हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले हैं। अतः मेरी इच्छा है कि आप भी उसे सुन लें॥ २ ॥

‘जो मित्रभावसे मेरे पास आ गया हो, उसे मैं किसी तरह त्याग नहीं सकता। सम्भव है उसमें कुछ दोष भी हों, परंतु दोषीको आश्रय देना भी सत्पुरुषोंके लिये निन्दित नहीं है (अतः विभीषणको मैं अवश्य अपनाऊँगा)’ ॥ ३ ॥

वानरराज सुग्रीवने भगवान् श्रीरामके इस कथनको सुनकर स्वयं भी उसे दोहराया और उसपर विचार करके यह परम सुन्दर बात कही— ॥ ४ ॥

‘प्रभो! यह दुष्ट हो या अदुष्ट, इससे क्या? है तो यह निशाचर ही। फिर जो पुरुष ऐसे संकटमें पड़े हुए अपने भाईको छोड़ सकता है, उसका दूसरा ऐसा कौन सम्बन्धी होगा, जिसे वह त्याग न सके’॥ ५१/२ ॥

वानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरघुनाथजी सबकी ओर देखकर कुछ मुसकराये और पवित्र लक्षणवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले— ॥

‘सुमित्रानन्दन! इस समय वानरराजने जैसी बात कही है, वैसी कोई भी पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना नहीं कह सकता॥ ८ ॥

‘परंतु सुग्रीव! तुमने विभीषणमें जो भाईके परित्यागरूप दोषकी उद्भावना की है, उस विषयमें मुझे एक ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म अर्थकी प्रतीति हो रही है, जो समस्त राजाओंमें प्रत्यक्ष देखा गया है और सभी लोगोंमें प्रसिद्ध है (मैं उसीको तुम सब लोगोंसे कहना चाहता हूँ॥ ९ ॥

‘राजाओंके छिद्र दो प्रकारके बताये गये हैं—एक तो उसी कुलमें उत्पन्न हुए जाति-भाई और दूसरे पड़ोसी देशोंके निवासी। ये संकटमें पड़नेपर अपने विरोधी राजा या राजपुत्रपर प्रहार कर बैठते हैं। इसी भयसे यह विभीषण यहाँ आया है (इसे भी अपने जाति-भाइयोंसे भय है)॥ १० ॥

‘जिनके मनमें पाप नहीं है, ऐसे एक कुलमें उत्पन्न हुए भाई-बन्धु अपने कुटुम्बीजनोंको हितैषी मानते हैं, परंतु यही सजातीय बन्धु अच्छा होनेपर भी प्रायः राजाओंके लिये शङ्कनीय होता है (रावण भी विभीषणको शङ्काकी दृष्टिसे देखने लगा है; इसलिये इसका अपनी रक्षाके लिये यहाँ आना अनुचित नहीं है। अतः तुम्हें इसके ऊपर भाईके त्यागका दोष नहीं लगाना चाहिये)॥ ११ ॥

‘तुमने शत्रुपक्षीय सैनिकको अपनानेमें जो यह दोष बताया है कि वह अवसर देखकर प्रहार कर बैठता है, उसके विषयमें मैं तुम्हें यह नीतिशास्त्रके अनुकूल उत्तर दे रहा हूँ, सुनो॥ १२ ॥

‘हमलोग इसके कुटुम्बी तो हैं नहीं (अतः हमसे स्वार्थ-हानिकी आशंका इसे नहीं है) और यह राक्षस राज्य पानेका अभिलाषी है (इसलिये भी यह हमारा त्याग नहीं कर सकता)। इन राक्षसोंमें बहुत-से लोग बड़े विद्वान् भी होते हैं (अतः वे मित्र होनेपर बड़े कामके सिद्ध होंगे) इसलिये विभीषणको अपने पक्षमें मिला लेना चाहिये॥ १३ ॥

‘हमसे मिल जानेपर ये विभीषण आदि निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जायँगे। इनकी जो यह शरणागतिके लिये प्रबल पुकार है, इससे मालूम होता है, राक्षसोंमें एक-दूसरेसे भय बना हुआ है। इसी कारणसे इनमें परस्पर फूट होगी और ये नष्ट हो जायँगे। इसलिये भी विभीषणको ग्रहण कर लेना चाहिये॥ १४ ॥

‘तात सुग्रीव! संसारमें सब भाई भरतके ही समान नहीं होते। बापके सब बेटे मेरे ही जैसे नहीं होते और सभी मित्र तुम्हारे ही समान नहीं हुआ करते हैं’॥ १५ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित महाबुद्धिमान् सुग्रीवने उठकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥

‘उचित कार्य करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप उस राक्षसको रावणका भेजा हुआ ही समझें। मैं तो उसे कैद कर लेना ही ठीक समझता हूँ॥ १७ ॥

‘निष्पाप श्रीराम! यह निशाचर रावणके कहनेसे मनमें कुटिल विचार लेकर ही यहाँ आया है। जब हमलोग इसपर विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, उस समय यह आपपर, मुझपर अथवा लक्ष्मणपर भी प्रहार कर सकता है। इसलिये महाबाहो! क्रूर रावणके भाई इस विभीषणका मन्त्रियोंसहित वध कर देना ही उचित है’॥ १८-१९ ॥

प्रवचनकुशल रघुकुलतिलक श्रीरामसे ऐसा कहकर बातचीतकी कला जाननेवाले सेनापति सुग्रीव मौन हो गये॥ २० ॥

सुग्रीवका वह वचन सुनकर और उसपर भलीभाँति विचार करके श्रीरामने उन वानरशिरोमणिसे यह परम मङ्गलमयी बात कही— ॥ २१ ॥

‘वानरराज! विभीषण दुष्ट हो या साधु। क्या यह निशाचर किसी तरह भी मेरा सूक्ष्म-से-सूक्ष्मरूपमें भी अहित कर सकता है?॥ २२ ॥

‘वानरयूथपते! यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वीपर जितने भी पिशाच, दानव, यक्ष और राक्षस हैं, उन सबको एक अंगुलिके अग्रभागसे मार सकता हूँ॥ २३ ॥

‘सुना जाता है कि एक कबूतरने अपनी शरणमें आये हुए अपने ही शत्रु एक व्याधका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया था और उसे निमन्त्रण दे अपने शरीरके मांसका भोजन कराया था॥ २४ ॥

‘उस व्याधने उस कबूतरकी भार्या कबूतरीको पकड़ लिया था तो भी अपने घर आनेपर कबूतरने उसका आदर किया; फिर मेरे-जैसा मनुष्य शरणागतपर अनुग्रह करे, इसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ २५ ॥

‘पूर्वकालमें कण्व मुनिके पुत्र सत्यवादी महर्षि कण्डुने एक धर्मविषयक गाथाका गान किया था। उसे बताता हूँ, सुनो॥ २६ ॥

‘परंतप! यदि शत्रु भी शरणमें आये और दीनभावसे हाथ जोड़कर दयाकी याचना करे तो उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये॥ २७ ॥

‘शत्रु दुःखी हो या अभिमानी, यदि वह अपने विपक्षीकी शरणमें जाय तो शुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ पुरुषको अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिये॥

‘यदि वह भय, मोह अथवा किसी कामनासे न्यायानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा नहीं करता तो उसके उस पाप-कर्मकी लोकमें बड़ी निन्दा होती है॥ २९ ॥

‘यदि शरणमें आया हुआ पुरुष संरक्षण न पाकर उस रक्षकके देखते-देखते नष्ट हो जाय तो वह उसके सारे पुण्यको अपने साथ ले जाता है॥ ३० ॥

‘इस प्रकार शरणागतकी रक्षा न करनेमें महान् दोष बताया गया है। शरणागतका त्याग स्वर्ग और सुयशकी प्राप्तिको मिटा देता है और मनुष्यके बल और वीर्यका नाश करता है॥ ३१

॥

‘इसलिये मैं तो महर्षि कण्डुके उस यथार्थ और उत्तम वचनका ही पालन करूँगा; क्योंकि वह परिणाममें धर्म, यश और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है॥ ३२ ॥

‘जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षाकी प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ। यह मेरा सदाके लिये व्रत है॥ ३३ ॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ सुग्रीव! वह विभीषण हो या स्वयं रावण आ गया हो। तुम उसे ले आओ। मैंने उसे अभयदान दे दिया’॥ ३४ ॥

भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने सौहार्दसे भरकर उनसे कहा— ॥ ३५ ॥

धर्मज्ञ! लोकेश्वरशिरोमणे! आपने जो यह श्रेष्ठ धर्मकी बात कही है, इसमें क्या आश्चर्य है? क्योंकि आप महान् शक्तिशाली और सन्मार्गपर स्थित हैं॥ ३६ ॥

‘यह मेरी अन्तरात्मा भी विभीषणको शुद्ध समझती है। हनुमान्जीने भी अनुमान और भावसे उनकी भीतर-बाहर सब ओरसे भलीभाँति परीक्षा कर ली हैं॥ ३७ ॥

‘अतः रघुनन्दन! अब विभीषण शीघ्र ही यहाँ हमारे-जैसे होकर रहें और हमारी मित्रता प्राप्त करें’॥ ३८ ॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषणसे मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षिराज गरुड़से मिल रहे हों॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८ ॥