श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
तैंतीसवाँ सर्ग
तैंतीसवाँ सर्ग
लक्ष्मणका किष्किन्धापुरीकी शोभा देखते हुए सुग्रीवके महलमें प्रवेश करके क्रोधपूर्वक धनुषको टंकारना, भयभीत सुग्रीवका ताराको उन्हें शान्त करनेके लिये भेजना तथा ताराका समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुरमें ले आना
इधर गुफामें प्रवेश करनेके लिये अङ्गदके प्रार्थना करनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नामक रमणीय गुफामें प्रवेश किया॥ १ ॥
किष्किन्धाके द्वारपर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मणको देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २ ॥
दशरथनन्दन लक्ष्मणको क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। इसलिये वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके साथ-साथ नहीं चल सके॥ ३ ॥
श्रीमान् लक्ष्मणने द्वारके भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धापुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफाके रूपमें बसी हुई है। वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी होनेके कारण दिव्य शोभासे सम्पन्न है। वहाँके वन-उपवन फूलोंसे सुशोभित दिखायी दिये॥ ४ ॥
हर्म्यों (धनियोंकी अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्त घनी दिखायी देती थी। नाना प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त खिले हुए वृक्षोंसे वह पुरी सुशोभित थी॥ ५ ॥
वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निवास करते हुए उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे॥ ६ ॥
वहाँ चन्दन, अगर और कमलोंकी मनोहर सुगन्ध छा रही थी। उस पुरीकी लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधुके आमोदसे महक रही थीं॥ ७ ॥
उस पुरीमें विन्ध्याचल तथा मेरुके समान ऊँचे-ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे। लक्ष्मणने उस गुफाके निकट ही निर्मल जलसे भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं॥ ८ ॥
उन्होंने राजमार्गपर अङ्गदका रमणीय भवन देखा। साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद,
सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख, नील, सुपाटल और सुनेत्र—इन महामनस्वी वानरशिरोमणियोंके भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मणको दृष्टिगोचर हुए। वे सब-के-सब राजमार्गपर ही बने हुए थे॥ ९—१२ ॥
वे सभी भवन श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओंसे सजाया गया था। वे प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियोंसे सुशोभित थे॥ १३ ॥
वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था॥ १४ ॥
कैलास-शिखरके समान श्वेत प्रासाद-शिखर तथा समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे॥ १५ ॥
वहाँ इन्द्रके दिये हुए दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघके समान श्याम तथा शीतल छायासे युक्त थे॥ १६ ॥
अनेक बलवान् वानर हाथोंमें हथियार लिये उसकी ड्योढ़ीपर पहरा दे रहे थे। वह सुन्दर महल दिव्य मालाओंसे अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोनेका बना हुआ था॥ १७ ॥
महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सुग्रीवके उस रमणीय भवनमें प्रवेश किया। मानो सूर्यदेव महान् मेघके भीतर प्रविष्ट हुए हों। उस समय किसीने रोक-टोक नहीं की॥ १८ ॥
धर्मात्मा लक्ष्मणने सवारियों तथा विविध आसनोंसे सुशोभित उस भवनकी सात ड्योढ़ियोंको पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्तःपुरको देखा॥ १९ ॥
उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोनेके बहुत-से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सबपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे। उन सबसे वह अन्तःपुर सुसज्जित दिखायी देता था॥ २० ॥
उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मणके कानोंमें संगीतकी मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूँज रही थी। वीणाके लयपर कोई कोमल कण्ठसे गा रहा था। प्रत्येक पद और अक्षरका उच्चारण सम* तालका प्रदर्शन करते हुए हो रहा था॥ २१ ॥
महाबली लक्ष्मणने सुग्रीवके उस अन्तःपुरमें अनेक रूपरंगकी बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रूप और यौवनके गर्वसे भरी हुईं थीं॥ २२ ॥
वे सब-की-सब उत्तम कुलमें उत्पन्न हुईं थीं, फूलोंके गजरोंसे अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारोंके निर्माणमें लगी हुईं थीं और सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामीके कार्य सिद्ध करनेके लिये अत्यन्त फुर्तीकी भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणीके नहीं थे॥ २३-२४ ॥
नूपुरोंकी झनकार और करधनीकी खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये (परायी स्त्रियोंपर दृष्टि पड़नेके कारण उन्हें स्वभावतः संकोच हुआ)॥ २५ ॥
तत्पश्चात् पुनः आभूषणोंकी झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोषके आवेगसे और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुषपर टंकार दी, जिसकी ध्वनिसे समस्त दिशाएँ गूँज उठीं॥ २६ ॥
रघुकुलोचित सदाचारका खयाल करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्तमें जाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे॥ २७ ॥
धनुषकी टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँतक आ पहुँचे हैं। फिर तो वे भयसे संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये॥ २८ ॥
वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गदने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये॥ २९ ॥
अङ्गदके द्वारा उनके आगमनका समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था। अब धनुषकी टंकारसे वानर सुग्रीवको इस बातका प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मणने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है। फिर तो उनका मुख सूख गया॥ ३० ॥
भयके कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे। (लक्ष्मणके सामने जानेका उन्हें साहस न हुआ।) तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारासे हितकी बात बोले—॥ ३१ ॥
‘सुन्दरि! इनके रोषका क्या कारण हो सकता है? जिससे स्वभावतः कोमल चित्त होनेपर भी ये श्रीरघुनाथजीके छोटे भाई रुष्ट-से होकर यहाँ पधारे हैं॥ ३२ ॥
‘अनिन्दिते! तुम्हारे देखनेमें कुमार लक्ष्मणके रोषका आधार क्या है? ये मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं। अतः बिना किसी कारणके निश्चय ही क्रोध नहीं कर सकते॥ ३३ ॥
‘यदि हमलोगोंने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धिसे विचारकर शीघ्र ही बताओ॥ ३४ ॥
‘अथवा भामिनि! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मणको देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करो॥ ३५ ॥
‘उनका हृदय शुद्ध है। तुम्हारे सामने वे क्रोध नहीं करेंगे; क्योंकि महात्मा पुरुष स्त्रियोंके प्रति कभी कठोर बर्ताव नहीं करते हैं॥ ३६ ॥
‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनोंसे उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मणका दर्शन करूँगा’॥ ३७॥
सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मणके पास गयी। उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनयसे झुका हुआ था। उसके नेत्र मदसे चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनीके सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे॥ ३८ ॥
वानरराजकी पत्नी तारापर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भावसे खड़े हो गये। स्त्रीके समीप होनेसे उनका क्रोध दूर हो गया॥ ३९ ॥
मधुपानके कारण ताराकी नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी। उसे राजकुमार लक्ष्मणकी दृष्टिमें कुछ प्रसन्नताका आभास मिला। इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकताके साथ महान् अर्थसे युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही—॥ ४० ॥
‘राजकुमार! आपके क्रोधका क्या कारण है? कौन आपकी आज्ञाके अधीन नहीं है? कौन निडर होकर सूखे वृक्षोंसे भरे हुए वनके भीतर चारों ओर फैलते हुए दावानलमें प्रवेश कर रहा है?’॥ ४१ ॥
ताराके इस वचनमें सान्त्वना भरी थी। उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदयका भाव प्रकट किया गया था। उसे सुनकर लक्ष्मणके हृदयकी आशङ्का जाती रही। वे कहने लगे—॥ ४२ ॥
‘अपने स्वामीके हितमें संलग्न रहनेवाली तारा! तुम्हारा यह पति विषय-भोगमें आसक्त होकर धर्म और अर्थके संग्रहका लोप कर रहा है। क्या तुम्हें इसकी इस अवस्थाका पता नहीं है?
तुम इसे समझाती क्यों नहीं?॥ ४३ ॥
‘तारे! सुग्रीव अपने राज्यकी स्थिरताके लिये ही प्रयास करता है। हमलोग शोकमें डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभाके सदस्योंसहित केवल विषय-भोगोंका ही सेवन कर रहा है॥ ४४ ॥
‘वानरराज सुग्रीवने चार महीनोंकी अवधि निश्चित की थी। वे कभी बीत गये, परंतु वह मधुपानके मदसे अत्यन्त उन्मत्त होकर स्त्रियोंके साथ क्रीडा-विहार कर रहा है। उसे बीते हुए समयका पता ही नहीं है॥ ४५ ॥
‘धर्म और अर्थकी सिद्धिके निमित्त प्रयत्न करनेवाले पुरुषके लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपानसे अर्थ, धर्म और काम तीनोंका नाश होता है॥ ४६ ॥
‘मित्रके किये हुए उपकारका यदि अवसर आनेपर भी बदला न चुकाया जाय तो धर्मकी हानि तो होती ही है। गुणवान् मित्रके साथ मित्रताका नाता टूट जानेपर अपने अर्थकी भी बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है॥
‘मित्र दो प्रकारके होते हैं—एक तो अपने मित्रके अर्थसाधनमें तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्मके ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामीने मित्रके दोनों ही गुणोंका परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्रका कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्ममें स्थित है॥ ४८ ॥
‘ऐसी स्थितिमें प्रस्तुत कार्यकी सिद्धिके लिये हमलोगोंको भविष्यमें क्या करना चाहिये? हमारे लिये जो समुचित कर्तव्य हो, उसे तुम्हीं बताओ; क्योंकि तुम कार्यके तत्त्वको जानती हो'॥ ४९ ॥
लक्ष्मणका वचन धर्म और अर्थके निश्चयसे संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभावका परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके विषयमें, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुनः लक्ष्मणसे विश्वासके योग्य बात बोली—॥ ५० ॥
‘वीर राजकुमार! यह क्रोध करनेका समय नहीं है। आत्मीय जनोंपर क्रोध करना भी नहीं चाहिये। सुग्रीवके मनमें सदा आपका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छा बनी रहती है। अतः यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये॥ ५१ ॥
‘कुमार! गुणोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन गुणवाले प्राणीपर क्रोध कैसे कर सकता है? जो सत्त्वगुणसे अवरुद्ध होनेके कारण शास्त्र-विपरीत व्यापारमें लग नहीं सकता, अतएव जो
सद्विचारको जन्म देनेवाला है, वह आप-जैसा कौन पुरुष क्रोधके वशीभूत हो सकता है?॥ ५२ ॥
'वानरवीर सुग्रीवके मित्र भगवान् श्रीरामके क्रोधका कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्यमें जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीवका जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगोंने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषयमें हमलोगोंका क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है॥ ५३ ॥
'नरश्रेष्ठ! इस शरीरमें उत्पन्न हुए कामका जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस कामद्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है। साथ ही इस बातसे भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्तिके कारण ही इन दिनों सुग्रीवका मन दूसरे किसी काममें नहीं लगता॥ ५४ ॥
'आप जो क्रोधके वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि कामके अधीन हुए पुरुषकी स्थितिका आपको बिलकुल ज्ञान नहीं है, वानरकी तो बात ही क्या है? कामासक्त मनुष्यको भी देश, काल, अर्थ और धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता—उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है॥ ५५ ॥
'विपक्षी वीरोंका विनाश करनेवाले राजकुमार ! वानरराज सुग्रीव विषय-भोगमें आसक्त होकर इस समय मेरे ही पास थे। कामके आवेशमें उन्होंने अपनी लज्जाका परित्याग कर दिया है, तो भी उन्हें अपना भाऽइ समझकर क्षमा कीजिये॥ ५६ ॥
'जो निरन्तर धर्म और तपस्यामें ही संलग्न रहते हैं, जिन्होंने मोहको अवरुद्ध कर दिया है—अविवेकको दूर भगा दिया है, वे महर्षि भी कभी-कभी विषयाभिलाषी हो जाते हैं; फिर जो स्वभावसे ही चञ्चल वानर हैं, वह राजा सुग्रीव सुख-भोगमें क्यों न आसक्त हों?' ॥ ५७ ॥
अप्रमेय शक्तिशाली लक्ष्मणसे इस प्रकार महान् अर्थसे युक्त बात कहकर मदसे चञ्चल नेत्रवाली वानरपत्नी ताराने पुनः खेदपूर्वक स्वामीके लिये यह हितकर वचन कहा— ॥ ५८ ॥
'नरश्रेष्ठ! यद्यपि सुग्रीव इस समय कामके गुलाम हो रहे हैं, तथापि इन्होंने आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये बहुत पहलेसे ही उद्योग आरम्भ करनेकी आज्ञा दे रखी है॥ ५९ ॥
'इसके फलस्वरूप इस समय विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले लाखों और करोड़ों वानर, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ एवं महान् पराक्रमी हैं, यहाँ उपस्थित हुए हैं॥ ६० ॥
‘महाबाहो! (दूसरेकी स्त्रियोंको देखना अनुचित समझकर जो आप भीतर नहीं आये, बाहर ही खड़े रह गये—इसके द्वारा) आपने सदाचारकी रक्षा की है; अतः अब भीतर आइये। मित्रभावसे स्त्रियोंकी ओर देखना (उनके प्रति माता-बहन आदिका भाव रखकर दृष्टि डालना) सत्पुरुषोंके लिये अधर्म नहीं है’॥ ६१ ॥
ताराके आग्रह और कार्यकी जल्दीसे प्रेरित होकर शत्रुदमन महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीवके महलके भीतर गये॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा, एक सोनेके सिंहासनपर बहुमूल्य बिछौना बिछा है और वानरराज सुग्रीव सूर्यतुल्य तेजस्वी रूप धारण किये उसके ऊपर विराजमान हैं॥ ६३ ॥
उस समय दिव्य आभूषणोंके कारण उनके शरीरकी विचित्र शोभा हो रही थी। दिव्यरूपधारी यशस्वी सुग्रीव दिव्य मालाएँ और दिव्य वस्त्र धारण करके दुर्जय वीर देवराज इन्द्रके समान दिखायी दे रहे थे॥ ६४ ॥
दिव्य आभूषणों और मालाओंसे अलंकृत युवती स्त्रियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं। उन्हें इस अवस्थामें देख लक्ष्मणके नेत्र रोषावेशके कारण लाल हो गये। वे उस समय यमराजके समान भयंकर प्रतीत होने लगे॥ ६५ ॥
सुन्दर सुवर्णके समान कान्ति और विशाल नेत्रवाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रूमाको गाढ आलिङ्गनपाशमें बाँधे हुए एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। उसी अवस्थामें उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्रवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको देखा॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥
* संगीतमें वह स्थान जहाँ गाने-बजानेवालोंका सिर या हाथ आप-से-आप हिल जाता है। यह स्थान तालके अनुसार निश्चित होता है। जैसे तितालेमें दूसरे तालपर और चौतालमें पहले तालपर सम होता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न तालोंमें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर सम होता है। वाद्योंका आरम्भ और गीतों तथा वाद्योंका अन्त इसी समपर होता है। परंतु गाने-बजानेके बीच-बीचमें भी सम बराबर आता रहता है।