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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पचासवाँ सर्ग

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पचासवाँ सर्ग

लक्ष्मण और सुमन्त्रकी बातचीत

मिथिलशकुमारी सीताका मुनिके आश्रममें प्रवेश हो गया, यह देखकर लक्ष्मण मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए। उन्हें घोर संताप हुआ॥ १ ॥

उस समय महातेजस्वी लक्ष्मण मन्त्रणामें सहायता देनेवाले सारथि सुमन्त्रसे बोले— ‘सूत! देखो तो सही, श्रीरामको अभीसे सीताजीके विरहजनित संतापका कष्ट भोगना पड़ रहा है॥ २ ॥

‘भला, श्रीरघुनाथजीको इससे बढ़कर दुःख क्या होगा कि उन्हें अपनी पवित्र आचरणवाली धर्मपत्नी जनककिशोरी सीताका परित्याग करना पड़ा॥ ३ ॥

‘सारथे! रघुनाथजीको सीताका जो यह नित्य वियोग प्राप्त हुआ है, इसमें मैं दैवको ही कारण मानता हूँ; क्योंकि दैवका विधान दुर्लङ्घ्य होता है॥ ४ ॥

‘जो श्रीरघुनाथजी कुपित होनेपर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंसहित असुरोंका भी संहार कर सकते हैं, वे ही दैवकी उपासना कर रहे हैं (उसका निवारण नहीं कर पा रहे हैं)॥ ५ ॥

‘पहले श्रीरामचन्द्रजीको पिताके कहनेसे चौदह वर्षोंतक विशाल एवं निर्जन दण्डकवनमें रहना पड़ा है॥

‘अब उससे भी बढ़कर दुःखकी बात यह हुई कि उन्हें सीताजीको निर्वासित करना पड़ा। परंतु पुरवासियोंकी बात सुनकर ऐसा कर बैठना मुझे अत्यन्त निर्दयतापूर्ण कर्म जान पड़ता है॥ ७ ॥

‘सूत! सीताजीके विषयमें अन्यायपूर्ण बात कहनेवाले इन पुरवासियोंके कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्ममें प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्रजीने किस धर्मराशिका उपार्जन कर लिया है?’॥ ८ ॥

लक्ष्मणकी कही हुई इन अनेक प्रकारकी बातोंको सुनकर बुद्धिमान् सुमन्त्रने श्रद्धापूर्वक ये वचन कहे—॥

‘सुमित्रानन्दन! मिथिलेशकुमारी सीताके विषयमें आपको संतप्त नहीं होना चाहिये। लक्ष्मण! यह बात ब्राह्मणोंने आपके पिताजीके सामने ही जान ली थी॥ १० ॥

‘उन दिनों दुर्वासाजीने कहा था कि ‘श्रीराम निश्चय ही अधिक दुःख उठायेंगे। प्रायः उनका सौख्य छिन जायगा। महाबाहु श्रीरामको शीघ्र ही अपने प्रियजनोंसे वियोग प्राप्त होगा॥ ११ ॥

‘सुमित्राकुमार! धर्मात्मा महापुरुष श्रीराम दीर्घकाल बीतते-बीतते तुमको, मिथिलेशकुमारीको तथा भरत और शत्रुघ्नको भी त्याग देंगे॥ १२ ॥

‘दुर्वासाने जो बात कही थी, उसे महाराज दशरथने तुमसे, शत्रुघ्नसे और भरतसे भी कहनेकी मनाही कर दी थी॥ १३ ॥

‘नरश्रेष्ठ! दुर्वासा मुनिने बहुत बड़े जनसमुदायके समीप मेरे समक्ष तथा महर्षि वसिष्ठके निकट वह बात कही थी॥ १४ ॥

‘दुर्वासा मुनिकी वह बात सुनकर पुरुषप्रवर दशरथने मुझसे कहा था कि ‘सूत! तुम्हें दूसरे लोगोंके सामने इस तरहकी बात नहीं कहनी चाहिये’॥ १५ ॥

‘सौम्य! उन लोकपालक दशरथके उस वाक्यको मैं झूठा न करूँ’ यह मेरा संकल्प है। इसके लिये मैं सदा सावधान रहता हूँ॥ १६ ॥

‘सौम्य रघुनन्दन! यद्यपि यह बात मुझे आपके सामने सर्वथा ही नहीं कहनी चाहिये, तथापि यदि आपके मनमें यह सुननेके लिये श्रद्धा (उत्सुकता) हो तो सुनिये॥ १७ ॥

‘यद्यपि पूर्वकालमें महाराजने इस रहस्यको दूसरोंपर प्रकट न करनेके लिये आदेश दिया था, तथापि आज मैं वह बात कहूँगा। दैवके विधानको लाँघना बहुत कठिन है; जिससे यह दुःख और शोक प्राप्त हुआ है। भैया! तुम्हें भी भरत और शत्रुघ्नके सामने यह बात नहीं कहनी चाहिये’॥ १८-१९ ॥

सुमन्त्रका यह गम्भीर भाषण सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने कहा— ‘सुमन्त्रजी! जो सच्ची बात हो, उसे आप अवश्य कहिये’॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥