सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1861, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1861

देवताओोंने ही उन दोनों पर्वतोंको प्रतिष्ठित किया था। राजन्! ये वायुपुत्र हनुमान् उन दिव्य ओषधियोंको लानेके लिये वहाँ जायँ'॥ ३१-३२॥

ओषधियोंको लानेकी वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोरसे वायु प्रकट हुई, मेघोंकी घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं। वह वायु सागरके जलमें हलचल मचाकर पर्वतोंको कम्पित-सी करने लगी॥ ३३॥

गरुड़के पंखसे उठी हुई प्रचण्ड वायुने सम्पूर्ण द्वीपके बड़े-बड़े वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्रके जलमें गिरा दिया॥ ३४॥

लङ्कावासी महाकाय सर्प भयसे थर्रा उठे। सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रतापूर्वक समुद्रके जलमें घुस गये॥ ३५॥

तदनन्तर दो ही घड़ीमें समस्त वानरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुड़को वहाँ उपस्थित देखा॥ ३६॥

उन्हें आया देख जिन महाबली नागोंने बाणके रूपमें आकर उन दोनों महापुरुषोंको बाँध रखा था, वे सब-के-सब वहाँसे भाग खड़े हुए॥ ३७॥

तत्पश्चात् गरुड़ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथोंसे उनके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखोंको पोंछा॥ ३८॥

गरुड़जीका स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मणके सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्तिसे युक्त एवं स्निग्ध हो गये॥ ३९॥

उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टिशक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहलेसे भी दुगुने हो गये॥ ४०॥

फिर महातेजस्वी गरुड़ने उन दोनों भाइयोंको, जो साक्षात् इन्द्रके समान थे, उठाकर हृदयसे लगा लिया। तब श्रीरामजीने प्रसन्न होकर उनसे कहा—॥ ४१॥

‘इन्द्रजित्के कारण हमलोगोंपर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपासे लाँघ गये। आप विशिष्ट उपायके ज्ञाता हैं; अतः आपने हम दोनोंको शीघ्र ही पूर्ववत् बलसे सम्पन्न कर दिया है॥ ४२॥

जैसे पिता दशरथ और पितामह अजके पास जानेसे मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्षसे खिल उठा है॥ ४३॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 1861, कुल 2621 में से · SarvaKosh