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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

About this granth

The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.

This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.

The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.

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९८० * मत्स्यपुराण *


| पञ्चत्रिंशत्करा वैश्ये ह्यङ्गुलानि त्रयोदश।<br>तावत्करैव शूद्रस्य युता पञ्चदशाङ्गुलैः ॥ ३६<br><br>शालायास्तु त्रिभागेन यस्याग्रे वीथिका भवेत्।<br>सोष्णीषं नाम तद्वास्तु पश्चाच्छ्रेयोच्छ्रयं भवेत् ॥ ३७<br><br>पार्श्वयोर्वीथिका यत्र सावष्टम्भं तदुच्यते।<br>समन्ताद्वीथिका यत्र सुस्थितं तदिहोच्यते ॥ ३८<br><br>शुभदं सर्वमेतत् स्याच्चातुर्वर्ण्ये चतुर्विधम्।<br>विस्तरात् षोडशो भागस्तथा हस्तचतुष्टयम् ॥ ३९<br><br>प्रथमो भूमिकोच्छ्राय उपरिष्टात् प्रहीयते।<br>द्वादशांशेन सर्वासु भूमिकासु तथोच्छ्रयः ॥ ४०<br><br>पक्केष्टका भवेद् भित्तिः षोडशांशेन विस्तरात्।<br>दारुवैरपि कल्प्या स्यात् तथा मृन्मयभित्तिका ॥ ४१<br><br>गर्भमानेन मानं तु सर्ववास्तुषु शस्यते।<br>गृहव्यासस्य पञ्चाशदष्टादशभिरङ्गुलैः ॥ ४२<br><br>संयुतो द्वारविष्कम्भो द्विगुणश्चोच्छ्रयो भवेत्।<br>द्वारशाखासु बाहुल्यमुच्छ्रायकरसम्मितैः ॥ ४३<br><br>अङ्गुलैः सर्ववास्तूनां शस्यते पृथुत्वं बुधैः।<br>उदुम्बरोत्तमाङ्गं च तदर्धार्धप्रविस्तरात् ॥ ४४ | वैश्यके लिये पैंतीस हाथ तेरह अङ्गुल लम्बी शाला होनी चाहिये। उतने ही हाथ तथा पंद्रह अङ्गुल शूद्रकी शालाका परिमाण है। शालाकी लम्बाईके तीन भागपर यदि सामनेकी ओर गली बनी हो तो वह 'सोष्णीष' नामक वास्तु है। पीछेकी ओर गली हो तो वह 'श्रेयोच्छ्रय' कहलाता है। यदि दोनों पार्श्वोंमें वीथिका हो तो वह 'सावष्टम्भ' तथा चारों ओर वीथिका हो तो 'सुस्थित' नामक वास्तु कहा जाता है। ये चारों प्रकारकी वीथियाँ चारों वर्णोंके लिये मङ्गलदायी हैं। शालाके विस्तारका सोलहवाँ भाग तथा चार हाथ—यह पहले खण्डकी ऊँचाईका मान है। अधिक ऊँचा करनेसे हानि होती है। उसके बाद अन्य सभी खण्डोंकी ऊँचाई बारहवें भागके बराबर रखनी चाहिये। यदि पक्की ईंटोंकी दीवाल बनायी जा रही हो तो गृहकी चौड़ाईके सोलहवें भागके परिमाणके बराबर मोटाई होनी चाहिये। वह दीवाल लकड़ी तथा मिट्टीसे भी बनायी जा सकती है। सभी वास्तुओंमें भीतरके मानके अनुसार लम्बाई-चौड़ाईका मान श्रेष्ठ माना गया है। गृहके व्याससे पचास अङ्गुल विस्तार तथा अठारह अङ्गुल वेधसे युक्त द्वारकी चौड़ाई रखनी चाहिये और उसकी ऊँचाई चौड़ाईसे दुगुनी होनी चाहिये। जितनी ऊँचाई द्वारकी हो उतनी ही दरवाजेमें लगी हुई शाखाओंकी भी होनी चाहिये। ऊँचाई जितने हाथोंकी हो उतने ही अङ्गुल उन शाखाओंकी मोटाई होनी चाहिये—यही सभी वास्तुविद्याके ज्ञाताओंने बताया है। द्वारके ऊपरका कलश (बुर्ज) तथा नीचेकी देहली (चौखट)—ये दोनों शाखाओंसे आधे अधिक मोटे हों, अर्थात् इन्हें शाखाओंसे ड्योढ़ा मोटा रखना चाहिये ॥ ३६—४४ ॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु गृहमाननिर्णयो नाम चतुःपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुप्रकरणमें गृह-मान-निर्णय नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५४ ॥

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  • अध्याय २५५ * १८१

दो सौ बचपनवाँ अध्याय

वास्तुविषयक वेधका विवरण

सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि स्तम्भमानविनिर्णयम्।<br>कृत्वा स्वभवनोच्छ्रायं सदा सप्तगुणं बुधैः॥ १<br><br>अशीत्यंशः पृथुत्वे स्यादग्रे नवगुणे सति।<br>रुचकश्चतुरः स्यात् तु अष्टास्रो वज्र उच्यते॥ २<br><br>द्विवज्रः षोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्रः प्रलीनकः।<br>मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः॥ ३<br><br>एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु।<br>पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूषिताः ॥ ४<br><br>स्तम्भस्य नवमांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु।<br>स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः॥ ५<br><br>त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुनः।<br>हीनं हीनं चतुर्थांशात् तथा सर्वासु भूमिषु॥ ६<br><br>वासगेहानि सर्वेषां प्रविशेद् दक्षिणेन तु।<br>द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु॥ ७<br><br>पूर्वेणेन्द्रं जयन्तं च द्वारं सर्वत्र शस्यते।<br>याम्यं च वितथं चैव दक्षिणेन विदुबुर्धाः॥ ८<br><br>पश्चिमे पुष्पदन्तं च वारुणं च प्रशस्यते।<br>उत्तरेण तु भल्लाटं सौम्यं तु शुभदं भवेत्॥ ९<br><br>तथा वास्तुषु सर्वत्र वेधं द्वारस्य वर्जयेत्।<br>द्वारे तु रथ्यया विद्धे भवेत् सर्वकुलक्षयः॥ १०<br><br>तरुणा द्वेषबाहुल्यं शोकः पङ्केन जायते।<br>अपस्मारो भवेन्नूनं कूपवेधेन सर्वदा॥ ११<br><br>व्यथा प्रस्रवणेन स्यात् कीलेनाग्निभयं भवेत्।<br>विनाशो देवताविद्धे स्तम्भेन स्त्रीकृतो भवेत्॥ १२सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं स्तम्भके परिमाणके विषयमें बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे अपने गृहकी ऊँचाईके मानको सातसे गुणाकर उसके अस्सीवें भागके बराबर खम्भेकी मोटाई रखें। उसकी मोटाईमें नौसे गुणा कर अस्सीवें भागके बराबर खम्भेका मूलभाग रखना चाहिये। चार कोणवाला स्तम्भ 'रुचक', आठ कोणवाला 'वज्र', सोलह कोणवाला 'द्विवज्र' तथा बत्तीस कोणवाला 'प्रलीनक' कहा जाता है। मध्य प्रदेशमें जो खम्भा वृत्ताकार रहता है, उसे 'वृत्त' कहा गया है। ये पाँच प्रकारके स्तम्भ सभी प्रकारके वास्तु-कार्यमें प्रशंसनीय कहे गये हैं। ये सभी स्तम्भ पद्म, वल्ली, लता, कुम्भ, पत्र एवं दर्पणसे चित्रित रहने चाहिये। इन कमलों तथा कुम्भोंमें स्तम्भके नवें अंशके बराबर अन्तर रहना चाहिये। स्तम्भके बराबर ऊँचाईको 'तुला' तथा उससे न्यूनको 'उपतुला' कहते हैं। मानके तृतीय या चतुर्थ भागसे हीन जो तुला है, वही 'उपतुला' है। यह उपतुला सभी भूमियोंमें रहती है। सभी वास-गृहोंमें दाहिनी ओर प्रवेशद्वार रखना चाहिये। अब मैं गृहके जो प्रशस्तद्वार हैं, उन्हें बतला रहा हूँ। पूर्व दिशामें इन्द्र और जयन्तद्वार सभी गृहोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। बुद्धिमान् लोग दक्षिण द्वारोंमें याम्य और वितथको श्रेष्ठ मानते हैं। पश्चिम द्वारोंमें पुष्पदन्त और वरुण प्रशंसित हैं। उत्तर द्वारोंमें भल्लाट तथा सौम्य शुभदायक होते हैं। सभी वास्तुओंमें द्वारवेधको बचाना चाहिये। गली, सड़क या मार्गद्वारा द्वार-वेध होनेपर पूरे कुलका क्षय हो जाता है। वृक्षके द्वारा वेध होनेपर द्वेषकी अधिकता होती है। कीचड़से वेध होनेपर शोक होता है और कूपद्वारा वेध होनेपर अवश्य ही सदाके लिये मिरगीका रोग होता है। नाबदान या जलप्रवाहसे वेध होनेपर व्यथा होती है, कीलसे वेध होनेपर अग्निभय होता है, देवतासे विद्ध होनेपर विनाश तथा स्तम्भसे विद्ध होनेपर स्त्रीद्वारा क्लेशकी प्राप्ति होती है॥१—१२॥
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९८२* मत्स्यपुराण *

| गृहभर्तुर्विनाशः स्याद् गृहेण च गृहे कृते।<br>अमेध्यावस्करैर्विद्धे गृहिणी बन्धकी भवेत्॥ १३<br>तथा शस्त्रभयं विद्यादन्त्यजस्य गृहेण तु।<br>उच्छ्रायाद् द्विगुणां भूमिं त्यक्त्वा वेधो न जायते॥ १४<br>स्वयमुद्घाटिते द्वारे उन्मादो गृहवासिनाम्।<br>स्वयं वा पिहिते विद्यात् कुलनाशं विचक्षणः॥ १५<br>मानाधिके राजभयं न्यूने तस्करतो भवेत्।<br>द्वारोपरि च यद् द्वारं तदन्तकमुखं स्मृतम्॥ १६<br>अध्वनो मध्यदेशे तु अधिको यस्य विस्तरः।<br>वज्रं तु संकटं मध्ये सद्यो भर्तुर्विनाशनम्॥ १७<br>तथान्यपीडितं द्वारं बहुदोषकरं भवेत्।<br>मूलद्वारात् तथान्यत् तु नाधिकं शोभनं भवेत्॥ १८<br>कुम्भश्रीपर्णीवल्लीभिर्मूलद्वारं तु शोभयेत्।<br>पूजयेच्चापि तन्नित्यं बलिना चाक्षतोदकैः॥ १९<br>भवनस्य वटः पूर्वे दिग्भागे सार्वकामिकः।<br>उदुम्बरस्तथा याम्ये वारुण्यां पिप्पलः शुभः॥ २०<br>प्लक्षश्चोत्तरतो धन्यो विपरीतास्त्वसिद्धये।<br>कण्टकी क्षीरवृक्षश्च आसनः सफलो द्रुमः॥ २१<br>भार्याहानौ प्रजाहानौ भवेतां क्रमशस्तदा।<br>न च्छिन्द्याद् यदि तानन्यानन्तरे स्थापयेच्छुभान्॥ २२<br>पुन्नागाशोकबकुलशमीतैलकचम्पकान् ।<br>दाडिमीपिप्पलीद्राक्षास्तथा कुसुममण्डपान्॥ २३<br>जम्बीरपूगपनसद्रुमकेतकीभि-<br>र्वातीसरोजशतपत्रिकमल्लिकाभिः।<br>बन्नारिकेलकदलीदलपाटलाभि-<br>र्युक्तं तदत्र भवनं श्रियमातनोति॥ २४ | एक घरसे दूसरे घरमें वेध पड़नेपर गृहपतिका विनाश होता है तथा अपवित्र द्रव्यादिद्वारा वेध होनेपर घरकी स्वामिनी वन्ध्या हो जाती है। अन्त्यजके घरके द्वारा वेध होनेपर हथियारसे भय प्राप्त होता है। गृहकी ऊँचाईसे दुगुनी भूमिकी दूरीपर वेधका दोष नहीं होता। जिस घरके द्वार बिना हाथ लगाये स्वयं खुल जाते हैं, उस घरके निवासियोंको उन्मादका रोग होता है। इसी प्रकार स्वयं बंद हो जानेपर कुलका नाश हो जाता है—ऐसा विद्वान् लोग बतलाते हैं। गृहके द्वार यदि अपने मानसे अधिक ऊँचे हैं तो राजभय तथा यदि नीचे हैं तो चोरोंका भय होता है। द्वारके ऊपर जो द्वार बनता है, वह यमराजका मुख कहा जाता है। मार्गके बीचमें बने हुए जिस गृहकी चौड़ाई बहुत अधिक होती है, वह वज्रके समान शीघ्र ही गृहपतिके विनाशका कारण होता है। यदि मुख्यद्वार अन्य द्वारोंसे निकृष्ट हो तो वह बहुत बड़ा दोषकारक होता है। अतः मुख्यद्वारकी अपेक्षा अन्य द्वारोंका बड़ा होना शुभकारक नहीं है। घट, श्रीपर्णी और लताओंसे मूलद्वारको सुशोभित रखना चाहिये और उसकी नित्य बलि, अक्षत और जलसे पूजा करनी चाहिये। घरकी पूर्व दिशामें बरगदका वृक्ष सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका पेड़ शुभकारक होता है। इसी तरह उत्तरमें पाकड़का पेड़ मङ्गलकारी है। इससे विपरीत दिशामें रहनेपर ये वृक्ष विपरीत फल देनेवाले होते हैं। घरके समीप यदि काँटे या दूधवाले वृक्ष, असनाका वृक्ष एवं फलदार वृक्ष हों तो उनसे क्रमशः स्त्री और संतानकी हानि होती है। यदि कोई उन्हें काट न सके तो उनके समीप अन्य शुभदायक वृक्षोंको लगा दे। पुंनाग, अशोक, मौलसिरी, शमी, तिलक, चम्पा, अनार, पीपली, दाख, अर्जुन, जंबीर, सुपारी, कटहल, केतकी, मालती, कमल, चमेली, मल्लिका, नारियल, केला एवं पाटल—इन वृक्षोंसे सुशोभित घर लक्ष्मीका विस्तार करता है॥ १३–२४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु वेधपरिवर्जनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वास्तु-विद्या-प्रसङ्गमें वेधविवरण नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५५ ॥

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* अध्याय २५६ *१८३

दो सौ छप्पनवाँ अध्याय

वास्तुप्रकरणमें गृह-निर्माणविधि

सूत उवाच
उदगादिप्लवं वास्तु समानशिखरं तथा।<br>परीक्ष्य पूर्ववत् कुर्यात् स्तम्भोच्छ्रायं विचक्षणः॥ १<br><br>न देवधूर्तसचिवचत्वराणां समीपतः।<br>कारयेद् भवनं प्राज्ञो दुःखशोकमयं ततः॥ २<br><br>तस्य प्रदेशाश्चत्वारस्तथोत्सर्गोऽग्रतः शुभः।<br>पृष्ठतः पृष्ठभागस्तु सव्यावर्तः प्रशस्यते॥ ३<br><br>अपसव्यो विनाशाय दक्षिणे शीर्षकस्तथा।<br>सर्वकामफलो नृणां सम्पूर्णो नाम वामतः॥ ४<br><br>एवं प्रदेशमालोक्य यत्नेन गृहमारभेत्।<br>अथ सांवत्सरोक्ते मुहूर्ते शुभलक्षणे॥ ५<br><br>रत्नोपरि शिलां कृत्वा सर्वबीजसमन्विताम्।<br>चतुर्भिर्ब्राह्मणैः स्तम्भं कारयित्वा सुपूजितम्॥ ६<br><br>शुक्लाम्बरधरः शिल्पिसहितो वेदपारगः।<br>स्नापितं विन्यसेत् तद्वत् सर्वौषधिसमन्वितम्॥ ७<br><br>नानाक्षतसमोपेतं वस्त्रालङ्कारसंयुतम्।<br>ब्रह्मघोषेण वाद्येन गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ८<br><br>पायसं भोजयेद् विप्रान् होमं तु मधुसर्पिषा।<br>वास्तोष्पते प्रतिजानीहि मन्त्रेणानेन सर्वदा॥ ९<br><br>सूत्रपाते तथा कार्यमेवं स्तम्भोदये पुनः।<br>द्वारवंशोच्छ्रये तद्वत् प्रवेशसमये तथा॥ १०<br><br>वास्तूपशमने तद्वद् वास्तुयज्ञस्तु पञ्चधा।<br>ईशाने सूत्रपातः स्यादाग्नेये स्तम्भारोपणम्॥ ११<br><br>प्रदक्षिणं च कुर्वीत वास्तोः पदविलेखनम्।<br>तर्जनी मध्यमा चैव तथाङ्गुष्ठस्तु दक्षिणे॥ १२<br><br>प्रवालरत्नकनकफलं पिष्ट्वा कृतोदकम्।<br>सर्ववास्तुविभागेषु शस्तं पदविलेखने॥ १३**सूतजी कहते हैं—*ऋषियो ! बुद्धिमान् पुरुष उत्तरकी ओर झुकी हुई या समान भागवाली भूमिकी परीक्षा कर पूर्व कही गयी रीतिसे स्तम्भकी ऊँचाई आदिका निर्माण कराये। बुद्धिमान् पुरुषको देवालय, धूर्त, सचिव या चौराहेके समीप अपना घर नहीं बनवाना चाहिये; क्योंकि इससे दुःख, शोक और भय बना रहता है। घरके चारों ओर तथा द्वारके सम्मुख और पीछे कुछ भूमिको छोड़ देना शुभकारक है। पिछला भाग दक्षिणावर्त रहना ठीक है; क्योंकि वामावर्त विनाशकारक होता है। दक्षिण भागमें ऊँचा रहनेवाला घर 'सम्पूर्ण' वास्तुके नामसे अभिहित किया जाता है। वह मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करता है। इस प्रकारके प्रदेशको देखकर प्रयत्नपूर्वक गृह आरम्भ करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदज्ञ पुरोहित श्वेत वस्त्र धारण कर कारीगरके साथ ज्योतिषीके कथनानुसार शुभ मुहूर्तमें सभी बीजोंसे युक्त आधार-शिलाको रत्नके ऊपर स्थापित करे। पुनः चार ब्राह्मणोंद्वारा उस स्तम्भकी भलीभाँति पूजा कराकर उसे धो-पोंछकर अक्षत, वस्त्र, अलंकार और सर्वौषधिसे पूजितकर पूर्ववत् मन्त्रोच्चारण, बाजा और माङ्गलिक गीत आदिके शब्दके साथ स्थापित कर दे। ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराये और 'वास्तोष्पते प्रतिजानीहि' (ऋक्संहिता ७।५४।१) इस मन्त्रके द्वारा मधु और घीसे हवन करे। वास्तुयज्ञ पाँच प्रकारके हैं—सूत्रपात, स्तम्भारोपण, द्वारवंशोच्छ्रय (चौखट-स्थापन), गृहप्रवेश और वास्तु-शान्ति। इन सभीमें पूर्ववत् कार्य करनेका विधान है। ईशानकोणमें सूत्रपात और अग्निकोणमें स्तम्भारोपण होता है। वास्तुके पदचिह्नोंको बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सभी वास्तु-विभागोंमें दाहिने हाथकी तर्जनी, मध्यमा और अङ्गूठेसे मूँगा, रत्न और सुवर्णके चूर्णसे मिश्रित जलद्वारा पद-चिह्न बनाना श्रेष्ठ माना गया है॥ १—१३ ॥

* यह पूरा मन्त्र इस प्रकार है—वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान्स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥ (ऋ० ७।५४।१, तैत्ति० सं० ३।४।१०।१)

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९८४ * मत्स्यपुराण *


श्लोकहिन्दी अर्थ
न भस्माङ्गारकाष्ठेन नखशस्त्रेण चर्मभिः।<br>न शृङ्गास्थिकपालैश्च क्वचिद् वास्तु विलेखयेत्॥ १४<br><br>एभिर्विलिखितं कुर्याद्दुःखशोकभयादिकम्।<br>यदा गृहप्रवेशः स्याच्छिल्पी तत्रापि लक्षयेत्॥ १५<br><br>स्तम्भसूत्रादिकं तद्वच्छुभाशुभफलप्रदम्।<br>आदित्याभिमुखं रौति शकुनिः परुषं यदि॥ १६<br><br>तुल्यकालं स्पृशेदङ्गं गृहभर्तुर्यदात्मनः।<br>वास्त्वङ्गे तद् विजानीयान्नरशल्यं भयप्रदम्॥ १७<br><br>अङ्कनानन्तरं यत्र हस्त्यश्वश्वापदं भवेत्।<br>तदङ्गसम्भवं विन्द्यात् तत्र शल्यं विचक्षणः॥ १८<br><br>प्रसार्यमाणे सूत्रे तु श्वा गोमायुर्विलङ्घते।<br>तत्तु शल्यं विजानीयात् खरशब्देऽतिभैरवे॥ १९<br><br>यदीशाने तु दिग्भागे मधुरं रौति वायसः।<br>धनं तत्र विजानीयाद् भागे वा स्वाम्यधिष्ठिते॥ २०<br><br>सूत्रच्छेदे भवेन्मृत्युर्व्याधिः कीले त्वधोमुखे।<br>अङ्गारेषु तथोन्मादं कपालेषु च सम्भ्रमम्॥ २१<br><br>कम्बुशल्येषु जानीयात्पौँश्चल्यं स्त्रीषु वास्तुवित्।<br>गृहभर्तुर्गृहस्यापि विनाशः शिल्पिसम्भ्रमे॥ २२<br><br>स्तम्भे स्कन्धच्युते कुम्भे शिरोरोगं विनिर्दिशेत्।<br>कुम्भापहारे सर्वस्य कुलस्यापि क्षयो भवेत्॥ २३<br><br>मृत्युः स्थानच्युते कुम्भे भग्ने बन्धं विदुर्बुधाः।<br>करसंख्याविनाशे तु नाशं गृहपतेर्विदुः॥ २४<br><br>बीजौषधिविहीने तु भूतेभ्यो भयमादिशेत्।<br>ततः प्रदक्षिणेनान्यान्यसेत् स्तम्भान् विचक्षणः॥ २५<br><br>यस्माद् भयंकरा नृणां योजिता ह्यप्रदक्षिणम्।राख, अंगार, काष्ठ, नख, शास्त्र, चर्म, सींग, हड्डी, कपाल—इन वस्तुओंद्वारा कहीं भी वास्तुके चिह्न नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि इनके द्वारा बनाया गया चिह्न दुःख, शोक और भय आदि उत्पन्न करता है। जिस समय गृहप्रवेश हो, उस समय कारीगरका भी रहना उचित है। स्तम्भारोपण और सूत्रपातके समय पूर्ववत् शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले शुक होते हैं। यदि ऐसे अवसरोंपर कोई पक्षी सूर्यकी ओर मुख कर कठोर वाणी बोलता है या उस समय गृहपति अपने शरीरके किसी अङ्गपर हाथ रखता है तो समझ लेना चाहिये कि वास्तुके उसीपर भय प्रदान करनेवाली मनुष्यकी हड्डी पड़ी हुई है। सूत्र अङ्कित कर देनेके बाद यदि गृहपति अपने किसी अङ्गका स्पर्श करता है तो वास्तुके उसी अङ्गमें हाथी, अश्व तथा कुत्तेकी हड्डियाँ हैं, ऐसा बुद्धिमान् पुरुषको समझ लेना चाहिये। सूत्रको फैलाते समय उसे शृगाल या कुत्ता लाँघ जाता है और गदहा अत्यन्त भयंकर चीत्कार करता है तो ठीक उस स्थानपर हड्डी जाननी चाहिये। यदि सूत्रपातके समय ईशान कोणमें कौआ मीठे स्वरसे बोलता हो तो वास्तुके उस भागमें या जहाँ गृहपति खड़ा है, वहाँ धन है—ऐसा जानना चाहिये। सूत्रपातके समय यदि सूत्र टूट जाता है तो गृहपतिकी मृत्यु होती है। वास्तुवेत्ताको ऐसा समझना चाहिये कि कीलके नीचेकी ओर झुक जानेपर व्याधि, अंगार दिखायी पड़नेपर उन्माद, कपाल दीख पड़नेपर भय और शङ्ख या घोंघेकी हड्डी मिलनेपर कुलाङ्गनाओंमें व्यभिचारकी सम्भावना रहती है। भवन-निर्माणके समय कारीगरके पागल हो जानेपर गृहपति और घरका विनाश हो जाता है। स्थापित किये हुए स्तम्भ या कुम्भके कंधेपर गिर जानेसे गृहपतिके सिरमें रोग होता है तथा कलशकी चोरी हो जानेपर समूचे कुलका विनाश हो जाता है। कुम्भके अपने स्थानसे च्युत हो जानेपर गृहस्वामीकी मृत्यु होती है तथा फूट जानेपर वह बन्धनमें पड़ता है—ऐसा पण्डितोंने कहा है। गृहारम्भके समय हाथोंकी परिमाण-संख्या नष्ट हो जानेपर गृहपतिका नाश समझना चाहिये। बीज और ओषधियोंसे विहीन होनेपर भूतोंसे भय होता है। अतः विचारवान् पुरुष प्रदक्षिण-क्रमसे अन्य स्तम्भोंकी स्थापना करे; क्योंकि प्रदक्षिणक्रमके बिना स्थापित किये गये स्तम्भ मनुष्योंके लिये भयदायक होते हैं॥ १४–२५१/२॥
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* अध्याय २५६ *९८५

| रक्षां कुर्वीत यत्नेन स्तम्भोपद्रवनाशिनीम्॥ २६<br>तथा फलवतीं शाखां स्तम्भोपरि निवेशयेत्।<br>प्रागुदकप्रवणं कुर्याद् दिङ्मूढं तु न कारयेत्॥ २७<br>स्तम्भं वा भवनं वापि द्वारं वासगृहं तथा।<br>दिङ्मूढे* कुलनाशः स्यान्न च संवर्धयेद् गृहम्॥ २८<br>यदि संवर्धयेद् गेहं सर्वदिक्षु विवर्धयेत्।<br>पूर्वेण वर्धितं वास्तु कुर्याद् वैराणि सर्वदा॥ २९<br>दक्षिणे वर्धितं वास्तु मृत्यवे स्यान्न संशयः।<br>पश्चाद् विवृद्धं यद् वास्तु तदर्थक्षयकारकम्॥ ३०<br>वर्धापितं तथा सौम्ये बहुसन्तापकारकम्।<br>आग्नेये यत्र वृद्धिः स्यात् तदग्निभयदं भवेत्॥ ३१<br>वर्धितं राक्षसे कोणे शिशुक्षयकरं भवेत्।<br>वर्धापितं तु वायव्ये वातव्याधिप्रकोपकृत्॥ ३२<br>ईशान्यामन्नहानिः स्याद् वास्तौ संवर्धिते सदा।<br>ईशाने देवतागारं तथा शान्तिगृहं भवेत्॥ ३३<br>महानसं तथाग्नेये तत्पार्श्वे चोत्तरे जलम्।<br>गृहस्योपस्करं सर्वं नैर्ऋत्ये स्थापयेद् बुधः॥ ३४<br>बन्धस्थानं बहिः कुर्यात् स्नानमण्डपमेव च।<br>धनधान्यं च वायव्ये कर्मशालां ततो बहिः।<br>एवं वास्तुविशेषः स्याद् गृहभर्तुः शुभावहः॥ ३५ | स्तम्भके उपद्रवोंका विनाश करनेवाली रक्षा-विधि भी यत्नपूर्वक सम्पन्न करनी चाहिये। इसके लिये स्तम्भके ऊपर फलोंसे युक्त वृक्षकी शाखा डाल देनी चाहिये। स्तम्भ उत्तर या पूर्वकी ओर ढालू होना चाहिये, अस्पष्ट दिशामें नहीं कराना चाहिये। इस बातका ध्यान भवन, स्तम्भ, निवासगृह तथा द्वार निर्माणके समय भी स्थापन रखना चाहिये; क्योंकि दिशाकी अस्पष्टतासे कुलका नाश हो जाता है। घरके किसी अंशको पिण्डसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि बढ़ाना ही हो तो सभी दिशामें बढ़ावे। पूर्व दिशामें बढ़ाया गया वास्तु सर्वदा वैर पैदा करता है, दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ाया हुआ वास्तु मृत्युकारी होता है, इसमें संदेह नहीं है। जो वास्तु पश्चिमकी ओर बढ़ाया जाता है, वह धनक्षयकारी होता है तथा उत्तरकी ओर बढ़ाया हुआ दुःख एवं सन्तापकी वृद्धि करता है। जहाँ अग्निकोणमें वृद्धि होती है, वहाँ वह अग्निका भय देनेवाला नैर्ऋत्यकोण बढ़ानेपर शिशुओंका विनाशक, वायव्य कोणमें बढ़ानेपर वात-व्याधि-उत्पादक, ईशान कोणमें बढ़ानेपर अन्नके लिये हानिकारक होता है। गृहके ईशान कोणमें देवताका स्थान और शान्तिगृह, अग्निकोणमें रसोई घर और उसके बगलमें उत्तर दिशामें जलस्थान होना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष सभी घरेलू सामग्रियोंको नैर्ऋत्य कोणमें करे। पशुओं आदिके बाँधनेका स्थान और स्नानागार गृहके बाहर बनाये। वायव्य कोणमें अन्नादिका स्थान बनाये। इसी प्रकार कार्यशाला भी निवास-स्थानसे बाहर बनानी चाहिये। इस ढंगसे बना हुआ भवन गृहपतिके लिये मङ्गलकारी होता है॥ २६–३५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यायां गृहनिर्णयो नाम षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्याके प्रसङ्गमें गृहनिर्णय कथन नामक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५६॥


* वाल्मी० ३।६०।६, बृहत्संहिता ५३।११५ के अनुसार जहाँ कोई निशान प्रतीत हो, वे भवनादि विमूढ कहे गये हैं।

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९८६ | * मत्स्यपुराण *


दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय

गृहनिर्माण ( वास्तुकार्य )-में ग्राह्य काष्ठ

सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दार्व्वाहणमुत्तमम्।<br>धनिष्ठापञ्चकं मुक्त्वा त्विष्ट्यादिकमतः परम्॥ १<br>ततः सांवत्सरादिष्टे दिने यायाद् वनं बुधः।<br>प्रथमं बलिपूजां च कुर्याद् वृक्षस्य सर्वदा॥ २<br>पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते।<br>अन्यथा न शुभं विन्द्याद् याम्योपरि निपातनम्॥ ३<br>क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत्।<br>कृताधिवासं विहगैरनिलानलपीडितम्॥ ४<br>गजावरुग्णं च तथा विद्युन्निर्घातपीडितम्।<br>अर्धशुष्कं तथा दारु भग्नशुष्कं तथैव च॥ ५<br>चैत्यदेवालयोत्पन्नं नदीसङ्गमजं तथा।<br>श्मशानकूपनिलं तडागादिसमुद्भवम्॥ ६<br>वर्जयेत् सर्वथा दारु यदिच्छेद विपुलां श्रियम्।<br>तथा कण्टकिनो वृक्षान् नीपनिम्बविभीतकान्॥ ७<br>श्लेष्मातकानाप्रतरून्वर्जयेद्गृहकर्मणि ।<br>आसनाशोकमधुकसर्जशालाः शुभावहाः॥ ८<br>चन्दनं पनस्रं धन्यं सुरदारु हरिद्रवः।<br>द्वाभ्यामेकेन वा कुर्यात् त्रिभिर्वा भवनं शुभम्॥ ९<br>बहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत्।<br>एकैकशिंशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुको तथा॥ १०<br>एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः।<br>स्यन्दनः पनसस्तद्वत् सरलार्जुनपद्मकाः॥ ११<br>एते नान्यसमायुक्ता वास्तुकार्यफलप्रदाः।**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं उत्तम काष्ठ लानेकी विधि बतलाता हूँ। धनिष्ठा आदि पाँच नक्षत्रों और इसके बाद भद्रा आदिको छोड़कर ज्योतिषीद्वारा बताये गये शुभ दिनमें बुद्धिमान् पुरुष काष्ठ लानेके लिये वनको प्रस्थान करे। सर्वप्रथम ग्रहण किये जानेवाले वृक्षकी बलिपूजा करनी चाहिये। पूर्व तथा उत्तर दिशाकी ओर गिरनेवाले वृक्षका काष्ठ गृहनिर्माणमें मङ्गलकारी होता है तथा दक्षिणकी ओर गिरा हुआ अशुभ होता है। दूधवाले वृक्षोंका काष्ठ घरमें नहीं लगाना चाहिये। जो वृक्ष पक्षियोंद्वारा अधिष्ठित तथा वायु और अग्निसे पीड़ित हो, हाथीसे तोड़ा हुआ हो, बिजली गिरनेसे जल गया हो, जिसका आधा भाग सूख गया हो या कुछ अंश टूट-फूट गया हो, अश्वत्थवृक्ष समाधि या देवमन्दिरसे निकले वृक्ष, नदीके संगमपर स्थित वृक्षोंको अथवा जो श्मशानभूमि तालाब आदि जलाशयोंपर उगा हुआ हो, ऐसे वृक्षोंको विपुल लक्ष्मीकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको छोड़ देना चाहिये। इसी प्रकार काँटेदार वृक्ष, कदम्ब, निम्ब, बहेड़ा, ढेरा और आमके वृक्षोंको भी गृहकर्ममें नहीं लेना चाहिये। असना, अशोक, महुआ, सर्ज और साखूके काष्ठ मङ्गलप्रद हैं। चन्दन, कटहल, देवदारु तथा दारुल्दीके काष्ठ धनप्रद कहे गये हैं। एक, दो या तीन प्रकारके काष्ठोंद्वारा बनाया गया भवन शुभ होता है; क्योंकि अनेक प्रकारके काष्ठोंसे बनाया हुआ भवन अनेकों भय देनेवाला होता है। धनदायक शीशम, श्रीपर्णी तथा तिन्दुकोके काष्ठको अकेले ही लगाना चाहिये; क्योंकि ये अन्य किसी काष्ठके साथ सम्मिलित कर देनेसे कभी मङ्गलकारी नहीं होते। इसी प्रकार धव, कटहल, चीड़, अर्जुन और पद्म वृक्ष भी अन्य काष्ठोंके साथ सम्मिलित होनेपर गृहकार्यके लिये शुभदायक नहीं होते॥ १—११ १/२॥
तरुच्छेदे महापीते गोधा विन्द्याद्विचक्षणः॥ १२<br><br>माञ्जिष्ठवर्णे भेकः स्यान्नीले सर्पादि निर्दिशेत्।<br>अरुणे सरटं विद्यान्मुक्ताभे शुकमादिशेत्॥ १३वृक्ष काटते समय विचक्षण पुरुषको यदि पीले वर्णका चिह्न मिले तो भावी गृहमें गोहका, मंजीठ रंगका मिलनेपर मेढकका, नीला रंग मिलनेपर सर्पका, अरुण
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* अध्याय २५७ *१८७

| कपिले मूषकन् विद्यात्खड्गाभे जलमादिशेत्।<br>एवंविधं सगर्भं तु वर्जयेद् वास्तुकर्मणि॥ १४<br><br>पूर्वच्छिन्नं तु गृह्णीयान्निमित्तशकुनैः शुभैः।<br>व्यासेन गुणिते दैर्घ्ये अष्टाभिर्वै हृते तथा॥ १५<br><br>यच्छेषमायतं विद्यादष्टभेदं वदामि वः।<br>ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च खरः श्वावृष एव च॥ १६<br><br>हस्ती ध्वाङ्क्षश्च पूर्वाद्याः करशेषा भवन्त्यमी।<br>ध्वजः सर्वमुखो धन्यः प्रत्यग्द्वारो विशेषतः॥ १७<br><br>उदङ्मुखो भवेत् सिंहः प्राङ्मुखो वृषभो भवेत्।<br>दक्षिणाभिमुखो हस्ती सप्तभिः समुदाहृतः॥ १८<br><br>एकेन ध्वज उद्दिष्टस्त्रिभिः सिंहः प्रकीर्त्तितः।<br>पञ्चभिर्वृषभः प्रोक्तो विकोणस्थांश्च वर्जयेत्॥ १९<br><br>तमेवाष्टगुणं कृत्वा करराशिं विचक्षणः।<br>सप्तविंशाहते भागे ऋक्षं विद्याद् विचक्षणः॥ २०<br><br>अष्टभिर्भाजिते ऋक्षे यः शेषः स व्ययो मतः।<br>व्यायाधिकं न कुर्वीत यतो दोषकरं भवेत्।<br>आयाधिके भवेच्छान्तिरित्याह भगवान् हरिः॥ २१<br><br>कृत्वाग्रतो द्विजवरानथ पूर्णकुम्भं<br>दध्यक्षताग्रदलपुष्पफलोपशोभम्।<br>दत्त्वा हिरण्यवसनानि तदा द्विजेभ्यो<br>माङ्गल्यशान्तिनिलयाय गृहं विशेत्तु॥ २२<br><br>गृह्योक्तहोमविधिना बलिकर्म कुर्यात्<br>प्रासादवास्तुशमने च विधिर्य उक्तः।<br>संतर्पयेद् विजवरानथ भक्ष्यभोज्यैः<br>शुक्लाम्बरःस्वभवनं प्रविशेत् सधूपम्॥ २३ | रंगसे गिरगिटका, मोतीके समान श्वेत चिह्नसे शुकका, कपिल वर्णसे चूहेका और तलवारकी भाँति चिह्न मिलनेपर जलका भय जानना चाहिये। इस प्रकारके गर्भवाले वृक्षको वास्तुकर्ममें त्याग देना चाहिये। पहलेसे कटे हुए वृक्षको शुभदायी निमित्त शकुनोंके साथ ग्रहण किया जा सकता है। घरके व्याससे लम्बाईके मानमें गुणाकर आठका भाग दे, जो शेष बचे उसे आयत जानना चाहिये। अब मैं आपलोगोंको आठका भेद बतला रहा हूँ। उन करशेषोंकी क्रमशः ध्वज, धूम, सिंह, खर, श्वान, वृषभ, हस्ती और काक संज्ञा होती है। चारों ओर मुखवाला तथा विशेषतया पश्चिम द्वारवाला ध्वज शुभकारी होता है। सिंहका उत्तर, वृषभका पूर्व, हाथीका दक्षिण मुख दुःखदायी होता है। सात विभागोंद्वारा इसे कहा जा चुका है। एक हाथसे ध्वजको, तीन हाथसे सिंहको और पाँच हाथसे वृषभको तो कहा गया। इनके अतिरिक्त जो त्रिकोणस्थ हों उन्हें व्यवहारमें नहीं लाना चाहिये। विचक्षण पुरुष उक्त करराशिके अंकको आठसे गुणाकर सत्ताईसका भाग देनेपर शेषको नक्षत्र माने। पुनः उस नक्षत्रमें आठका भाग देनेसे जो शेष बचता है, वह व्यय माना गया है। जिसमें व्यय अधिक निकले, उसे नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह दोषकारक होता है। आय अधिक होनेपर शान्ति होती है, ऐसा भगवान् हरिने कहा है। गृह पूर्ण हो जानेपर उसमें माङ्गलिक शान्तिकी स्थितिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे कर दही, अक्षत, आमके पल्लव, पुष्प तथा फलादिसे सुशोभित जलपूर्ण कलशको देकर तथा अन्य ब्राह्मणोंको सुवर्ण और वस्त्र देकर उस भवनमें गृहपतिको प्रवेश करना चाहिये। उस समय गृह्यसूत्रोंमें प्रासाद एवं वास्तुकी शान्तिके लिये जो विधि कही गयी है, उसके अनुसार हवन एवं बलि-कर्म करे। फिर भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् श्वेत वस्त्र धारणकर धूपादि द्रव्योंके साथ भवनमें प्रवेश करना चाहिये॥ १२-२३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यानुकीर्तनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्यानुकीर्तन नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५७॥

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९८८ * मत्स्यपुराण *


दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय

देव-प्रतिमाका प्रमाण-निरूपण

ऋषय ऊचुः<br>क्रियायोगः कथं सिध्येद् गृहस्थादिषु सर्वदा।<br>ज्ञानयोगसहस्त्राद्धि कर्मयोगो विशिष्यते॥ १ऋषियोंने पूछा—सूतजी! गृहस्थादि आश्रमोंमें सभी युगोंमें क्रियायोगकी* सिद्धि किस प्रकार सम्भव है, क्योंकि क्रिया (भक्ति)-योगको हजारों ज्ञान-योगकी अपेक्षा विशिष्ट माना गया है॥ १॥
सूत उवाच<br>क्रियायोगं प्रवक्ष्यामि देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं यस्मान्नान्यल्लोकेषु विद्यते॥ २<br>प्रतिष्ठायां सुराणां तु देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>देवयज्ञोत्सवं चापि बन्धनाद् येन मुच्यते॥ ३<br>विष्णोस्तावत् प्रवक्ष्यामि यादग्रूपं प्रशस्यते।<br>शङ्खचक्रधरं शान्तं पद्महस्तं गदाधरम्॥ ४<br>छत्राकारं शिरस्तस्य कम्बुग्रीवं शुभेक्षणम्।<br>तुङ्गनासं शुक्तिकर्णं प्रशान्तोर्भुजक्रमम्॥ ५<br>क्वचिदष्टभुजं विद्याच्चतुर्भुजमथापरम्।<br>द्विभुजश्चापि कर्तव्यो भवनेषु पुरोधसा॥ ६<br>देवस्याष्टभुजस्यास्य यथास्थानं निबोधत।<br>खड्गो गदा शरः पद्मं देयं दक्षिणतो हरेः॥ ७<br>धनुश्च खेटकं चैव शङ्खचक्रे च वामतः।<br>चतुर्भुजस्य वक्ष्यामि यथैवायुधसंस्थितिम्॥ ८<br>दक्षिणेन गदा पद्मं वासुदेवस्य कारयेत्।<br>वामतः शङ्खचक्रे च कर्तव्ये भूतिमिच्छता॥ ९<br>कृष्णावतारे तु गदा वामहस्ते प्रशस्यते।<br>यथेच्छया शङ्खचक्रे चोपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ १०सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं देवार्चनकथनस्वरूप क्रियायोगका वर्णन कर रहा हूँ। यह भोग और मोक्ष—दोनोंको देनेवाला है तथा भूलोकके अतिरिक्त इसकी अन्य लोकोंमें सत्ता नहीं है। इन देवताओंकी प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्ग-क्रममें प्रतिमा-निर्माण और उनके अङ्गभूत यज्ञकी विधि भी निर्दिष्ट है, जिसके अनुष्ठानसे प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् विष्णुकी जैसी प्रतिमा श्रेष्ठ मानी जाती है उसका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाका रूप शान्त हो, हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हो, उसका सिर छत्रके समान गोल, गला शङ्खके समान, आँखें सुन्दर, नासिका कुछ ऊँची, कान सीपी-सदृश, भुजाएँ विशाल और ऊरु प्रशान्त—चढ़ाव-उतारवाले होने चाहिये। विष्णुभगवान्‌की प्रतिमा कहीं तो आठ भुजाओंवाली होती है और कहीं चार भुजाओंवाली; किंतु गृहस्थको अपने भवनमें दो भुजाओंकी (विष्णु-) प्रतिमा पुरोहितद्वारा स्थापित करानी चाहिये। अष्टभुज मूर्तिमें आयुधोंके यथास्थान क्रमको सुनिये—भगवान् श्रीहरिके दाहिनी ओरके चार हाथोंमें क्रमशः (नीचेसे ऊपरकी ओर) खड्ग, गदा, बाण और कमल तथा बायें हाथमें क्रमशः (नीचेसे ऊपर) धनुष, ढाल, शङ्ख और चक्र स्थापित करना चाहिये। अब चतुर्भुजमूर्तिके हाथोंमें आयुधकी स्थिति बतला रहा हूँ। समृद्धिकी इच्छा रखनेवालेको भगवान् वासुदेवकी प्रतिमामें दाहिनी ओरके दोनों हाथोंमें क्रमशः नीचेसे ऊपर गदा और पद्म तथा बायीं ओर क्रमशः नीचेसे ऊपर शङ्ख और चक्र रखना चाहिये। कृष्णावतारकी प्रतिमामें बायें हाथमें गदा ठीक मानी गयी है। दाहिने हाथमें स्वेच्छानुसार शङ्ख और चक्रको ऊपर-नीचे रखना चाहिये॥ २—१०॥

* यह पाद्मीय क्रियायोग-खण्डका सारांश तथा भाग ११। २७ के क्रियायोगका कुछ विस्तृत रूप है। यहाँ क्रियायोगका तात्पर्य देवपरक भगवद्भक्ति एवं देवार्चनसे है। मन्दिर, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिष्ठादिका यह प्रकरण भारतीय धर्म-संस्कृति एवं कला-कौशलका प्राण है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये 'विष्णुधर्मोत्तर' 'शिल्परत्न' 'वास्तुरजवल्लभ'—'प्रतिमा-प्रसादमण्डन' 'काश्यपशिल्प' 'अपराजित-पृच्छा' 'समराङ्गणसूत्रधार' 'प्रतिष्ठामहोदधि' आदि सहायक ग्रन्थ भी अनुसंधेय है।

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* अध्याय २५८ *१८९

| अधस्तात् पृथिवी तस्य कर्तव्या पादमध्यतः।<br>दक्षिणे प्रणतं तद्वद् गरुत्मन्तं निवेशयेत्॥ ११<br><br>वामतस्तु भवेल्लक्ष्मीः पद्महस्ता शुभानना।<br>गरुत्मानग्रतो वापि संस्थाप्यो भूतिमिच्छता॥ १२<br><br>श्रीश्च पुष्टिश्च कर्तव्ये पार्श्वयोः पद्मसंयुते।<br>तोरणं चोपरिष्टात् तु विद्याधरसमन्वितम्॥ १३<br><br>देवदुन्दुभिसंयुक्तं गन्धर्वमिथुनान्वितम्।<br>पत्रवल्लीसमोपेतं सिंहव्याघ्रसमन्वितम्॥ १४<br><br>तथा कल्पलतोपेतं स्तुवद्भिरमरेश्वरैः।<br>एवंविधो भवेद्विष्णोस्त्रिभागेनास्य पीठिका॥ १५<br><br>नवतालप्रमाणास्तु देवदानवकिंनराः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि मानोन्मानं विशेषतः॥ १६<br><br>जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजः स्फुटम्।<br>त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ १७<br><br>तदष्टकेन लिक्ष्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता।<br>यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ १८<br><br>स्वकीयाङ्गुलिमानेन मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम्।<br>मुखमानेन कर्तव्या सर्वावयवकल्पना॥ १९ | विष्णुभगवान्‌के दोनों चरणोंके मध्यमें नीचेकी ओर पृथ्‍वीकी मूर्ति और दाहिनी ओर प्रणाम करते हुए गरुड़की मूर्ति रखनी चाहिये। बायीं ओर हाथमें कमल लिये हुए सुन्दर मुखवाली लक्ष्मीकी स्थापना करनी चाहिये। कल्याणकामी पुरुष गरुड़को आगे भी स्थापित कर सकता है। प्रतिमाके दोनों ओर हाथमें कमल लिये श्री और पुष्टिकी मूर्ति भी बनानी चाहिये। प्रतिमाके ऊपर विद्याधरोंसे चित्रित गोलाकार तोरणका निर्माण करना चाहिये। देवताओंके नगाड़े बजाते हुए गन्धर्व-दम्पत्तिको भी वहाँ चित्रित करना चाहिये। साथमें वहीं यह लता और पत्तोंसे युक्त कल्पलतासे समन्वित हो और व्याघ्र-सिंहोंकी भी प्रतिमासे सम्पन्न। स्तुति करते हुए बड़े-बड़े देवगण सामने खड़े हों। इस प्रकार विष्णुकी प्रतिमा हो तथा प्रतिमाकी पीठिकाका विस्तार प्रतिमामानके तृतीयांशसे निर्मित हो। देवता, दानव तथा किन्नरोंकी प्रतिमा नौ ताल¹ परिमाणकी होनी चाहिये। अब मैं कौन-सी प्रतिमा कितनी ऊँची, नीची, मोटी और लम्बी हो, यह बतलानेके लिये मापविवरण बतला रहा हूँ। जालीके भीतरसे सूर्यकी किरणोंके प्रविष्ट होनेपर जो उड़ता धूलिकण स्पष्ट दिखायी पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। इन आठ त्रसरेणुओंके बराबर एक बालाग्र होता है। उससे आठगुने बड़े आकारके पदार्थकी लिक्ष्या और आठ लिक्ष्याकी एक यूका होती है। आठ यूकाका एक यव और आठ यवोंके मापका एक अंगुल होता है। अपनी अँगुलीके परिमाणसे बारह अंगुलका मुख होता है और मुखके परिमाणानुसार ही देवताके सभी अवयवोंकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ११–१९॥ |
| सौवर्णी राजती वापि ताम्री रत्नमयी तथा।<br>शैली दारुमयी चापि लोहसीसमयी तथा॥ २०<br><br>रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयी तथा।<br>शुभदारुमयी वापि देवतार्चा प्रशस्यते॥ २१<br><br>अङ्गुष्ठपर्वादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु।<br>गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः॥ २२ | देव-प्रतिमा सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल, ताँबा और काँसमिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई प्रशस्त मानी गयी है।² गृहस्थोंके घरोंमें अँगूठेके एक पर्वसे लेकर एक बीते प्रमाणमात्र ही प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने इससे बड़ीको गृहस्थके लिये प्रशस्त नहीं माना है। |


१. अंगूठेसे मध्यमा अंगुलीतक फैले करतलको ताल कहते हैं।
२. भागवतीय क्रियायोगोंमें भी कहा है—
'शैली दारुमयी लौही लेप्यालेख्या च सैकती। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता॥ (११। २७। १२)

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९९०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आषोडशा तु प्रासादे कर्तव्या नाधिका ततः।<br>मध्योत्तमकनिष्ठा तु कार्या वित्तानुसारतः॥ २३<br>द्वारोच्छ्रायस्य यन्मानमष्टधा तत् तु कारयेत्।<br>भागमेकं ततस्त्यक्त्वा परिशिष्टं तु यद् भवेत्॥ २४<br>भागद्वयेन प्रतिमा त्रिभागीकृत्य तत्पुनः।<br>पीठिका भागतः कार्या नातिनीचा न चोच्छ्रिता॥ २५<br>प्रतिमामुखमानेन नव भागान् प्रकल्पयेत्।<br>चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा भागेन हृदयं पुनः॥ २६<br>नाभिस्तस्मादधः कार्या भागेनैकेन शोभना।<br>निम्नत्वे विस्तरत्वे च अङ्गुलं परिकीर्तितम्॥ २७<br>नाभेरधस्तथा मेढ्रं भागेनैकेन कल्पयेत्।<br>द्विभागेनायतावरू जानुनी चतुरङ्गुले॥ २८<br>जङ्घे द्विभागे विख्याते पादौ च चतुरङ्गुलौ।<br>चतुर्दशाङ्गुलस्तद्वन्मौलिरस्य प्रकीर्त्तितः॥ २९<br>ऊर्ध्वमानमिदं प्रोक्तं पृथुत्वं च निबोधत।<br>सर्वावयवमानेषु विस्तारं शृणुत द्विजाः॥ ३०किंतु देवमन्दिरोंमें सोलह बीतातककी प्रतिमा प्रतिष्ठित की जा सकती है, पर उससे बड़ी वहाँ भी नहीं। इन प्रतिमाओंको अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ कोटिकी बनानी चाहिये। मन्दिरके प्रवेशद्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर दे। उसमें एक भाग छोड़कर शेष दो भागोंसे प्रतिमा बनवाये। फिर उन दो भागोंकी संख्याको तीन भागोंमें विभक्त कर दे। उसके एक भागके बराबर पीठिका बनाये। वह न बहुत ऊँची हो, न बहुत नीची। फिर प्रतिमाके मुखमानको नौ भागोंमें विभक्त करे। उसमें चार अङ्गुलमें ग्रीवा तथा एक भागके द्वारा हृदय होना चाहिये। उसके नीचेके एक भागमें सुन्दर नाभि बनानी चाहिये। वह गहराई और विस्तारमें एक अंगुलकी कही गयी है। नाभिके नीचे एक भागमें लिंग, दो भागोंमें विस्तृत ऊरु, चार अंगुलमें घुटने, दो भागसे जंघे और चार अंगुलके पैर हों। उसी प्रकार मूर्तिका सिर चौदह अंगुलका बनाना चाहिये। यह तो मूर्तिकी ऊँचाई बतायी गयी, अब उसकी मोटाई सुनिये। ब्राह्मणगण! अब क्रमशः सभी अवयवोंका विस्तार सुनिये॥ २०—३०॥
चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादूर्ध्वं नासा तथैव च।<br>द्व्यङ्गुलस्तु हनुर्ज्ञेय ओष्ठौ द्व्यङ्गुलसम्मितौ॥ ३१<br>अष्टाङ्गुलं ललाटं च तावन्मात्रे भ्रुवौ मते।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवानता॥ ३२<br>उन्नताग्रा भवेत् पार्श्वे श्लक्ष्णतीक्ष्णा प्रशस्यते।<br>अक्षिणी द्व्यङ्गुलायामे तदर्धं चैव विस्तरे॥ ३३<br>उन्नतोदरमध्ये तु रक्तान्ते शुभलक्षणे।<br>तारकार्धविभागेन दृष्टिः स्यात् पञ्चभागिकी॥ ३४<br>द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्ये नासामूलमथाङ्गुलम्।<br>नानाग्रविस्तरं तद्वत् पुटद्वयमथानतम्॥ ३५<br>नासापुटविलं तद्वदर्धाङ्गुलमुदाहृतम्।<br>कपोले द्व्यङ्गुले तद्वत् कर्णमूलाद् विनिर्गते॥ ३६प्रतिमाके ललाटकी मोटाई चार अंगुल, नासिकाकी चार अंगुल, दाढ़ीकी दो अंगुल और ओठकी भी दो अंगुल जाननी चाहिये। यदि ललाटका विस्तार आठ अंगुल हो तो उतनेमें ही दोनों भौंहोंको भी बनानी चाहिये। भौंहोंकी रेखा आधे अंगुलकी हो। वह बीचमें धनुषाकार हो। दोनों छोरोंपर उसके अग्रभाग उठे हुए हों, बनावट चिकनी तथा सुन्दर होनी चाहिये। आँखोंकी लम्बाई दो अंगुल, चौड़ाई एक अंगुल, उनके मध्य भागमें ऊँची रक्ताभ एवं शुभ लक्षणोंसे युक्त पुतलियाँ होनी चाहिये। तारकाके आधे भागसे पाँचगुनी दृष्टि बनानी चाहिये। दोनों भौंहोंके मध्यमें दो अंगुलका अन्तर रखना चाहिये, नासिकाका मूलभाग एक अंगुलमें रहे। इसी प्रकार नीचेकी ओर झुकी हुई नासिकाके अग्रभाग एवं दोनों पुटोंको बनाना चाहिये। नासिकाके पुटोंके छिद्र आधे अंगुलके बताये गये हैं। कपोल दो अंगुलके हों जो कानोंके मूल भागतक विस्तृत हों।
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* अध्याय २५८ *९९१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हन्वग्रमङ्गुलं तद्वद् विस्तारो द्व्यङ्गुलो भवेत्।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवो राजी प्रणालसदृशी समा॥ ३७<br>अर्धाङ्गुलसमस्तद्वदुत्तरोष्ठस्तु विस्तरे।<br>निष्पावसदृशं तद्वन्नासापुटदलं भवेत्॥ ३८<br>सृक्किणी ज्योतिस्तुल्ये तु कर्णमूलात् षडङ्गुले।<br>कर्णौ तु भूसमौ ज्ञेयौ ऊर्ध्वं तु चतुरङ्गुलौ॥ ३९<br>द्व्यङ्गुलौ कर्णपाश्र्वौ तु मात्रामेकां तु विस्तृतौ।<br>कर्णयोरुपरिष्टाच्च मस्तकं द्वादशाङ्गुलम्॥ ४०ठुड्डीका अग्रभाग एक अंगुलमें तथा विस्तार दो अंगुलमें होना चाहिये। आधे अंगुलमें भौंहोंकी रेखा होनी चाहिये, जो प्रणालीके समान हो। नीचे तथा ऊपरके ओठ आधे-आधे अंगुलके हों। उसी प्रकार नासिकाके दोनों पुट निष्पाव (सेमके बीज)-के तुल्य मापके बनाये जायँ। ओठके बगलमें मुखका कोना और नेत्र ज्योति दोनों समान आकारका हों और कानके मूलसे छः अंगुल दूरपर बनावे। दोनों कानोंकी बनावट भौंहोंके समान हो और उनकी ऊँचाई चार अंगुलकी हो। कानोंके पार्श्वभाग दो अंगुलके हों और उनका विस्तार एक अंगुल मात्रका हो। दोनों कानोंके ऊपर मस्तकका विस्तार बारह अंगुलका होना चाहिये॥ ३१—४०॥
ललाटात् पृष्ठतोऽर्धेन प्रोक्तमष्टादशाङ्गुलम्।<br>षट्त्रिंशदङ्गुलश्चास्य परिणाहः शिरोगतः॥ ४१<br>सकेशनिचयो यस्य द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>केशान्ताद्धनुका तद्वदङ्गुलानि तु षोडश॥ ४२<br>ग्रीवामध्यपरीणाहश्चतुर्विंशतिकाङ्गुलः।<br>अष्टाङ्गुला भवेद् ग्रीवा पृथुत्वेन प्रशस्यते॥ ४३ललाटके पीछेका आधा भाग अठारह अंगुलका कहा गया है और इसके मस्तकतकका विस्तार छत्तीस अंगुल होता है। केश-समूहका विस्तार बयालीस अंगुलका होता है। केशोंके अन्तर्भागसे दाढ़ीहतकका विस्तार सोलह अंगुलका होता है। दोनों कंधोंका विस्तार चौबीस अंगुलका हो। ग्रीवाकी मोटाई आठ अंगुलकी उत्तम मानी गयी है।
स्तनग्रीवान्तरं प्रोक्तमेकताल स्वयम्भुवा।<br>स्तनयोरन्तरं तद्वद् द्वादशाङ्गुलमिष्यते॥ ४४ब्रह्माने स्तन और ग्रीवाका मध्यभाग एक तालके बराबर बताया है। दोनों स्तनोंमें बारह अंगुलका अन्तर माना जाता है।
स्तनयोर्मण्डलं तद्वद् द्व्यङ्गुलं परिकीर्तितम्।<br>चूचुकौ मण्डलस्यान्तर्यवमात्रावुभौ स्मृतौ॥ ४५<br>द्वितालं चापि विस्ताराद् वक्षःस्थलमुदाहृतम्।<br>कक्षे षडङ्गुले प्रोक्ते बाहुमूलस्तनान्तरे॥ ४६स्तनोंके मण्डल दो अंगुल कहे गये हैं। दोनों चूचुक उस मण्डलके भीतर यवके बराबर बताये जाते हैं। वक्षःस्थलकी चौड़ाई दो ताल कही गयी है। दोनों कक्ष बाहु (भुजा) और स्तनके मध्यमें छः अंगुलके होने चाहिये।
चतुर्दशाङ्गुलौ पादावङ्गुष्ठौ तु त्रिरङ्गुलौ।<br>पञ्चाङ्गुलपरीणाहमङ्गुष्ठाग्रं तथोन्नतम्॥ ४७<br>अङ्गुष्ठकसमा तद्वदायामा स्यात् प्रदेशिनी।<br>तस्याः षोडशभागेन हीयते मध्यमाङ्गुली॥ ४८दोनों पैर चौदह अंगुल तथा उनके अँगूठे तीन अँगल हों। अँगूठेका अग्रभाग उन्नत होना चाहिये और उसका विस्तार पाँच अंगुलका हो। उसी प्रकार अँगूठेके समान ही प्रदेशिनी अंगुलीको भी लम्बी बनाना चाहिये। उससे सोलहवें अंशसे अधिक मध्यमा अंगुली हो,
अनामिकाष्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते।<br>पर्वत्रयेण चाङ्गुल्यौ गुल्फौ द्व्यङ्गुलकौ मतौ॥ ४९अनामिका मध्यमा अंगुलीकी अपेक्षा आठवाँ भाग न्यून हो और अनामिकासे आठवें भागमें न्यून कनिष्ठिका हो। इन दोनों अंगुलियोंमें तीन पर्व बनाने चाहिये। पैरोंकी गाँठ दो अंगुलकी मानी गयी है।
पाष्णिद्व्यङ्गुलमात्रस्तु कलयोच्चैः प्रकीर्तितः।<br>द्विपर्वाङ्गुष्ठकः प्रोक्तः परीणाहश्च द्व्यङ्गुलः॥ ५०दोनों एड़ियाँ दो-दो अंगुलमें रहनी चाहिये, किंतु गाँठकी अपेक्षा इसमें एक कला अधिक रहे। अँगूठेमें दो पोर बनने चाहिये, उसका विस्तार दो अंगुलका हो।
प्रदेशिनीपरीणाहस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः।<br>कनिष्ठिकाष्टभागेन हीयते क्रमशो द्विजाः॥ ५१प्रदेशिनीका विस्तार तीन अंगुलका बताया गया है। द्विजगण! कनिष्ठिका क्रमशः आठवें भागसे कम रहे।
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९९२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अङ्गुलेनोच्छ्रयः कार्यों ह्यङ्गुष्ठस्य विशेषतः।<br>तदर्धेन तु शेषाणामङ्गुलीनां तथोच्छ्रयः॥ ५२विशेषतया अँगूठेकी मोटाई एक अंगुलकी हो। शेष अंगुलियोंकी मोटाई उसके आधे भागके तुल्य रखनी चाहिये॥ ४१—५२॥
जङ्घाग्रे परिणाहस्तु अङ्गुलानि चतुर्दश।<br>जङ्घामध्ये परीणाहस्तथैवाष्टादशाङ्गुलः॥ ५३<br>जानुमध्ये परीणाह एकविंशतिरङ्गुलः।<br>जानूच्छ्रयोऽङ्गुलः प्रोक्तो मण्डलं तु त्रिरङ्गुलम्॥ ५४<br>ऊरुमध्ये परीणाहो ह्यष्टाविंशतिकाङ्गुलः।<br>एकत्रिंशोपरिष्टाच्च वृषणौ तु त्रिरङ्गुलौ॥ ५५<br>द्व्यङ्गुलं च तथा मेढ्रं परीणाहः षडङ्गुलः।<br>मणिबन्धादधो विद्यात् केशरेखास्तथैव च॥ ५६<br>मणिकोषपरीणाहश्चतुरङ्गुल इष्यते।<br>विस्तरेण भवेत् तद्वत् कटिरष्टादशाङ्गुला॥ ५७<br>द्वाविंशति तथा स्त्रीणां स्तनौ च द्वादशाङ्गुलौ।<br>नाभिमध्यपरीणाहो द्विचत्वारिंशदङ्गुलः॥ ५८<br>पुरुषे पञ्चपञ्चाशत् कट्यां चैव तु वेष्टनम्।<br>कक्षयोरुपरिष्टात् तु स्कन्धौ प्रोक्तौ षडङ्गुलौ॥ ५९<br>अष्टाङ्गुलां तु विस्तारे ग्रीवां चैव विनिर्दिशेत्।<br>परीणाहे तथा ग्रीवां कला द्वादश निर्दिशेत्॥ ६०जाँघके आगेके भाग चौदह अंगुल और मध्यभाग अठारह अंगुल रहे। घुटनेका मध्यभाग इक्कीस अंगुलका हो। घुटनेकी ऊँचाई एक अंगुल तथा मण्डल तीन अंगुल विस्तृत हो। ऊरुओंका मध्यभाग अट्ठाईस अंगुल हो। इसके एकतीस अंगुल ऊपर अण्डकोश तीन अंगुल और लिंग दो अंगुल हो तथा उसका विस्तार छः अंगुल हो। मणिबन्धसे नीचे केशोंकी रेखा रखनी चाहिये। मणिकोषका विस्तार चार अंगुलका हो। कटिप्रदेशका विस्तार अठारह अंगुल हो। स्त्रियोंकी मूर्तिमें कटिका विस्तार बाईस अंगुलका तथा स्तनोंका बारह अंगुल होना चाहिये। नाभिका मध्यभाग बयालीस अंगुलका होना चाहिये। पुरुषके कटिप्रदेश पचपन अंगुल तथा दोनों कक्षोंके ऊपर छः अंगुलके स्कन्धोंके बनानेकी विधि है। आठ अंगुलके विस्तारमें ग्रीवाका निर्माण कहा गया है और इसकी लम्बाई बारह कलाकी होनी चाहिये॥ ५३—६०॥
आयामो भुजयोस्तद्वद् द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>कार्यं तु बाहुशिखरं प्रमाणे षोडशाङ्गुलम्॥ ६१<br>ऊर्ध्वं यद्बाहुपर्यन्तं विद्यादष्टादशाङ्गुलम्।<br>तथैकाङ्गुलहीनं तु द्वितीयं पर्व उच्यते॥ ६२<br>बाहुमध्ये परीणाहो भवेदष्टादशाङ्गुलः।<br>षोडशोक्तः प्रबाहुस्तु षट्कलोऽग्रकरो मतः॥ ६३<br>सप्ताङ्गुलं करतलं पञ्च मध्याङ्गुली मता।<br>अनामिका मध्यमायाः सप्तभागेन हीयते॥ ६४<br>तस्यास्तु पञ्चभागेन कनिष्ठा परिहीयते।<br>मध्यमायास्तु हीना वै पञ्चभागेन तर्जनी॥ ६५<br>अङ्गुष्ठस्तर्जनीमूलादधः प्रोक्तस्तु तत्समः।<br>अङ्गुष्ठपरिणाहस्तु विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः॥ ६६<br>शेषाणामङ्गुलीनां तु भागो भागेन हीयते।<br>मध्यमापर्वमध्यं तु अङ्गुलद्वयमायतम्॥ ६७दोनों भुजाओंकी लम्बाई बयालीस अंगुल हो। बाहुके मूलभाग सोलह अंगुलके होने चाहिये। बाहुके ऊपरी अंशतक अठारह अंगुल होना चाहिये। दूसरा पर्व (पोर) इसकी अपेक्षा एक अंगुल कम कहा गया है। बाहुके मध्यभागका विस्तार अठारह अंगुल तथा नीचेका हाथ (करतलके पूर्वतक) सोलह अंगुलका कहा गया है। हाथके अग्रभागका मान छः कलाका माना गया है। हथेलीका विस्तार सात अंगुल हो और उसमें पाँच अंगुलियाँ बनी हों। अनामिका अंगुली मध्यमाकी अपेक्षा सप्तमांश कम रहती है। कनिष्ठा उससे भी पञ्चमांश न्यून तथा मध्यमाके पाँचवें भागसे न्यून तर्जनी होनी चाहिये। अँगूठा तर्जनीके उद्गमसे नीचा होना चाहिये, किंतु लम्बाईमें उतना ही होना चाहिये। अँगूठेका विस्तार चार अंगुलका जानना चाहिये। शेष अंगुलियोंके विस्तार क्रमशः एक-एक भागसे न्यून होते हैं। मध्यमा अंगुलीके पोरोंके
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* अध्याय २५९ *९९३

| यवो यवेन सर्वासाम् तस्यास्तस्याः प्रहीयते।<br>अङ्गुष्ठपर्वमध्यं तु तर्जन्याः सदृशं भवेत् ॥ ६८<br>यवद्वयाधिकं तद्वदग्रपर्व उदाहृतम्।<br>पर्वार्धे तु नखान् विद्यादङ्गुलीषु समन्ततः ॥ ६९<br>स्निग्धं श्लक्ष्णं प्रकुर्वीत ईषद्रक्तं तथाग्रतः।<br>निम्नपृष्ठं भवेन्मध्ये पार्श्वतः कलयोच्छ्रितम् ॥ ७०<br>तथैव केशवल्लीयं स्कन्धोपरि दशाङ्गुला।<br>स्त्रियः कार्यास्तु तन्वङ्ग्यः स्तनोरूजघनाधिकाः ॥ ७१<br>चतुर्दशाङ्गुलायाममुदरं तासु निर्दिशेत्।<br>नानाभरणसम्पन्नाः किञ्चिच्छ्लक्ष्णभुजास्ततः ॥ ७२<br>किञ्चिद् दीर्घं भवेद् वक्त्रमलकावलिरुत्तमा।<br>नासा ग्रीवा ललाटं च सार्धमात्रं त्रिरङ्गलम् ॥ ७३<br>अध्यर्धाङ्गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लवः।<br>अधिकं नेत्रयुग्मं तु चतुर्भागेन निर्दिशेत्।<br>ग्रीवाबलिश्च कर्तव्या किञ्चिदर्थाङ्गुलोच्छ्रयः ॥ ७४<br>एवं नारीषु सर्वासु देवानां प्रतिमासु च।<br>नवतालमिदं प्रोक्तं लक्षणं पापनाशनम् ॥ ७५ | मध्यभागमें दो अंगुलका अन्तर रहना चाहिये। इसी प्रकार अन्य अंगुलियोंके पोरोंमें एक-एक यवकी कमी होती जाती है। अंगूठेके पोरोंका मध्यभाग तर्जनीके समान ही रहना चाहिये। अगला पोर दो यवसे अधिक कहा गया है। अंगुलियोंके पर्वार्धमें नखोंको चिकना, सुन्दर तथा आगेकी ओर कुछ लालिमायुक्त बनाना चाहिये। मध्यभागमें पीछेकी ओर कुछ नीचा तथा बगलमें अंशमात्र ऊँचा बनावे। उसी प्रकार कंधोंके ऊपर दस अंगुलमें केशोंकी वल्लीका निर्माण करना चाहिये। स्त्री-प्रतिमाओंको कुछ पतली तथा उनके स्तन, ऊरु एवं जाँघोंको स्थूल बनाना चाहिये। उनके उदरप्रदेशकी लम्बाई चौदह अंगुल तथा वे अनेक आभूषणोंसे विभूषित हों और उनकी भुजाओंको कुछ मृदु एवं मनोहर आकृतियुक्त बनाना चाहिये। मुखाकृति अपेक्षाकृत लम्बी हो। अलकावलि उत्तम ढंगसे रचित हो। नासिका, ग्रीवा और ललाट साढ़े तीन अंगुल होने चाहिये। अधर-पल्लवोंका विस्तार आधे अंगुलका प्रशस्त माना गया है। दोनों नेत्र अधर-पल्लवोंसे चार गुने अधिक होने चाहिये। ग्रीवाकी वलि आधे अंगुलकी ऊँची बनानी चाहिये। इस प्रकार सभी देवताओंकी प्रतिमाओं एवं स्त्री-प्रतिमाओंके निर्माणमें नौ तालका परिमाण बतलाया गया है, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला कहा गया है॥ ६१—७५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवार्चानुकीर्तने प्रमाणानुकीर्तनं नामाष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवपूजा-प्रसंगमें प्रतिमा-प्रमाण-कीर्तन नामक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५८॥


दो सौ उनसठवाँ अध्याय

प्रतिमाओंके लक्षण, मान, आकार आदिका कथन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद मैं
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषतः।<br>दशतालः स्मृतो रामो बलिवैरोचनिस्तथा ॥ १<br>वाराहो नारसिंहश्च सप्ततालस्तु वामनः।<br>मत्स्यकूर्मों च निर्दिष्टौ यथाशोभं स्वयम्भुवा ॥ २<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रुद्राद्याकारमुत्तमम्।<br>स पीनोरुभुजस्कन्धस्तप्तकाञ्चनसप्रभः ॥ ३देवताओंकी मूर्तियोंके आकारके विषयमें विशेषरूपसे बतला रहा हूँ। इस विषयमें ब्रह्माने बताया है कि राम¹, विरोचनके पुत्र बलि, वाराह और नृसिंहकी मूर्तियोंकी ऊँचाई दस ताल² होनी चाहिये। वामनकी प्रतिमा सात तालकी हो तथा मत्स्य और कूर्मकी प्रतिमाएँ जितनेमें सुन्दर दीख सकें, उसी परिमाणकी बनानी चाहिये। अब मैं शिव आदिकी मूर्तियोंके आकारका वर्णन कर रहा हूँ।

१. राम शब्दसे यहाँ दशरथनन्दन राम, परशुराम तथा बलराम तीनों ही ग्राह्य हैं।
२. दस तालका तात्पर्य प्रायः पाँच हाथ या साढ़े सात फीटकी ऊँचाईसे है।

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९९४* मत्स्यपुराण *

| शुक्लोऽर्करश्मिसंघातश्चन्द्राङ्कितजटो विभुः।<br>जटामुकुटधारी च द्व्यष्टवर्षाकृतिश्च सः॥ ४<br>बाहू वारणहस्ताभौ वृत्तजङ्घोरुमण्डलः।<br>ऊर्ध्वकेशश्च कर्तव्यो दीर्घायतविलोचनः॥ ५<br>व्याघ्रचर्मपरीधानः कटिसूत्रत्रयान्वितः।<br>हारकेयूरसम्पन्नो भुजङ्गाभरणस्तथा॥ ६<br>बाहवश्चापि कर्तव्या नानाभरणभूषिताः।<br>पीनोरुगण्डफलकः कुण्डलाभ्याममलङ्कृतः॥ ७<br>आजानुलम्बबाहुश्च सौम्यमूर्तिः सुशोभनः।<br>खेटकं वामहस्ते तु खड्गं चैव तु दक्षिणे॥ ८<br>शक्तिं दण्डं त्रिशूलं च दक्षिणेपु निवेशयेत्।<br>कपालं वामपार्श्वे तु नागं खट्वाङ्गमेव च॥ ९<br>एकश्च वरदो हस्तस्तथाक्षवलयोऽपरः।<br>वैशाखस्थानकं कृत्वा नृत्याभिनयसंस्थितः॥ १०<br><br>नृत्यन् दशभुजः कार्यों गजचर्मधरस्तथा।<br>तथा त्रिपुरदाहे च बाहवः षोडशैव तु॥ ११<br>शङ्खं चक्रं गदा शार्ङ्गं घण्टा तत्राधिका भवेत्।<br>तथा धनुः पिनाकश्च शरो विष्णुमयस्तथा॥ १२<br>चतुर्भुजोऽष्टबाहुर्वा ज्ञानयोगेश्वरो मतः।<br>तीक्ष्णनासाग्रदशनः करालवदनो महान्॥ १३<br>भैरवः शस्यते लोके प्रत्यायतनसंस्थितः।<br>न मूलायतने कार्यों भैरवस्तु भयंकरः॥ १४<br>नारसिंहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः।<br>नाधिकाङ्गा न हीनाङ्गाः कर्तव्या देवताः क्वचित्॥ १५<br>स्वामिनं घातयेन्न्यूना करालवदना तथा।<br>अधिका शिल्पिनं हन्यात् कृशा चैवार्थनाशिनी॥ १६ | रुद्रकी मूर्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति कान्तिमती तथा स्थूल ऊरुओं, भुजाओं और स्कन्धोंसे युक्त होनी चाहिये। उनका वर्ण सूर्यकी किरणोंके समान श्वेत और जटा चन्द्रमासे विभूषित हो। वे जटा-मुकुटधारी हों तथा उनकी अवस्था सोलह वर्षकी होनी चाहिये। उनकी दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी तरह तथा जंघा और ऊरुमण्डल गोलाकार हों। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए तथा नेत्र दीर्घ एवं चौड़े बनाये जाने चाहिये। उनके वस्त्रके स्थानपर व्याघ्रचर्म तथा कमरमें तीन सूत्रोंकी मेखला बनायी जाय। उन्हें हार और केयूरसे सुशोभित तथा सर्पोंके आभूषणोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाओंको विविध प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा उभरे हुए कपोलोंको दो कुण्डलोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाएँ घुटनेतक लम्बी, मूर्ति सौम्य, परम सुन्दर, बायें हाथमें ढाल, दाहिने हाथमें तलवार, दाहिनी ओर शक्ति, दण्ड और त्रिशूल तथा बायीं ओरके हाथोंमें कपाल, नाग और खट्वाङ्गको रखना चाहिये। एक हाथ वरदमुद्रासे सुशोभित और दूसरा हाथ रुद्राक्षकी माला धारण किये हुए हो॥ १—९½॥<br><br>दस भुजाओंवाली शिवकी नटराज-मूर्तिको विशाख* स्थानयुक्त बनायी जानी चाहिये। वह नाचती हुई तथा गजचर्म धारण किये हुए हो। त्रिपुरान्तक प्रतिमामें सोलह भुजाएँ बनायी जानी चाहिये। उस समय उनके हाथमें शङ्ख, चक्र, गदा, सींग, घण्टा, पिनाक, धनुष, त्रिशूल और विष्णुमय शर—ये आठ वस्तुएँ अधिक रहेंगी। शिवकी ज्ञानयोगेश्वर प्रतिमामें चार या आठ भुजाएँ बनायी जाती हैं। भैरव-मूर्ति तीक्ष्ण दाँत तथा नुकीली नासिकासे युक्त होती है। उनका मुख महान् भयंकर होता है। ऐसी मूर्तिको प्रत्यायतन अर्थात् मुख्य मन्दिरके सामनेके मन्दिर या बरामदेमें स्थापित करना शुभदायक होता है। मुख्य मन्दिरमें भैरवकी स्थापना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये भयकारी देवता हैं। इसी प्रकार नृसिंह, वराह तथा अन्य भयंकर देवताओंके लिये भी करना चाहिये। देव-प्रतिमाओंको कहीं भी हीन अङ्गोंवाली अथवा अधिक अङ्गोंवाली नहीं बनानी चाहिये। न्यून अङ्ग तथा भयानक मुखवाली प्रतिमा स्वामीका विनाश करती है, अधिक अङ्गोंवाली प्रतिमा शिल्पकारका हनन करती है और दुर्बल प्रतिमा धनका नाश करती है। |


* विशाखस्थान नृत्य या युद्धमें खड़े होनेकी वह मुद्रा है, जिसमें दोनों पैरोंके बीचमें एक हाथ जगह खाली रहती है।

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  • अध्याय २५९ * । १९५

श्लोकअर्थ
कृशोदरी तु दुर्भिक्षं निर्मांसा धननाशिनी।<br>वक्रनासा तु दुःखाय संक्षिप्ताङ्गी भयङ्करी ॥ १७<br>चिपिटा दुःखशोकाय अनेत्रा नेत्रनाशिनी।<br>दुःखदा हीनवक्त्रा तु पाणिपादकृशा तथा ॥ १८<br>हीनाङ्गा हीनजङ्घा च भ्रमोन्मादकरी नृणाम्।<br>शुष्कवक्त्रा तु राजानं कटिहीना च या भवेत् ॥ १९<br>पाणिपादविहीना या जायते मारको महान्।<br>जङ्घाजानुविहीना च शत्रुकल्याणकारिणी ॥ २०दुबले उदरवाली प्रतिमा दुर्भिक्षप्रदा, कंकाल-सरीखी धननाशिनी, टेढ़ी नासिकावाली दुःखदायिनी, सूक्ष्माङ्गी भय पहुँचानेवाली, चिपटी दुःख और शोक प्रदान करनेवाली, नेत्रहीना नेत्रकी विनाशिका, मुखविहीना दुःखदायिनी तथा दुर्बल हाथ-पैरवाली या अन्य किन्हीं अङ्गोंसे हीन अथवा विशेषकर जंघेसे हीन प्रतिमा मनुष्योंके लिये भ्रम और उन्माद उत्पन्न करनेवाली कही गयी है। सूखे मुखवाली तथा कटिभागसे हीन प्रतिमा राजाको कष्ट देनेवाली कही गयी है। हाथ-पाँवसे विहीन प्रतिमा महामारीका भय उत्पन्न करनेवाली तथा जंघा और घुटनेसे विहीन शत्रु का कल्याण करनेवाली कही गयी है॥ १०—२०॥
पुत्रमित्रविनाशाय हीनवक्षःस्थला तु या।<br>सम्पूर्णावयवा या तु आयुर्लक्ष्मीप्रदा सदा ॥ २१<br>एवं लक्षणमासाद्य कर्तव्यः परमेश्वरः।<br>स्तूयमानः सुरैः सर्वैः समन्ताद् दर्शयेद् भवम् ॥ २२<br>शक्रेण नन्दिना चैव महाकालेन शंकरम्।<br>प्रणता लोकपालास्तु पार्श्वे तु गणनायकाः ॥ २३<br>नृत्यद्भृङ्गिरिटिश्चैव भूतवेतालसंवृताः।<br>सर्वे हृष्टास्तु कर्तव्याः स्तुवन्तः परमेश्वरम् ॥ २४<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मथाप्सरोगुह्यकनायकानाम् ।<br>गणैरनेकैः शतशो महेन्द्रै-<br>र्मुनिप्रवीरैरपि नम्यमानम् ॥ २५<br>धृताक्षसूत्रैः शतशः प्रवाल-<br>पुष्पोपहारप्रचयं ददद्भिः।<br>संस्तूयमानं भगवन्तमीड्यं<br>नेत्रत्रयेणामरमर्त्यपूज्यम् ॥ २६जो वक्षःस्थलसे विहीन होती है, वह पुत्रों और मित्रोंकी विनाशिका तथा सम्पूर्ण अङ्गोंसे परिपूर्ण प्रतिमा सर्वदा आयु और लक्ष्मी प्रदान करनेवाली कही गयी है। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त भगवान् शंकरकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। उनकी प्रतिमाके चारों ओर सभी देवगणोंको स्तुति करते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। शंकरकी मूर्तिको इन्द्र, नन्दीश्वर एवं महाकालसे युक्त बनाना चाहिये। उनके पार्श्वभागमें विनम्रभावसे स्थित लोकपालों और गणेश्वरोंको दिखलाना चाहिये। भृंगी और भूत-वेतालोंकी मूर्तियाँ उनके बगलमें नाचती-गाती हुई बनायी जानी चाहिये, जो सभी हर्षपूर्वक परमेश्वर शिवकी स्तुतिमें लीन रहें। रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, प्रवाल (मूँगे) आदिकी माला तथा पुष्पादिरूप उपहारोंको समर्पित करनेवाले गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, अप्सरा और गुह्यकोंके अधीश्वरोंके अनेकों गणों तथा इन्द्र आदि सैकड़ों देवताओं और मुनिवरोंद्वारा नमस्कार एवं स्तुति किये जाते हुए तथा देवताओं और मनुष्योंके लिये पूजनीय त्रिनेत्रधारी स्तवनीय भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनायी जानी चाहिये ॥ २१—२६ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमालक्षण नामक दो सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५९॥

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९९६ * मत्स्यपुराण *


दो सौ साठवाँ अध्याय

विविध देवताओंकी प्रतिमाओंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि अर्धनारीश्वरं परम्।<br>अर्धेन देवदेवस्य नारीरूपं सुशोभनम्॥ १<br>ईशार्धे तु जटाभागो बालेन्दुकलया युतः।<br>उमार्धे चापि दातव्यौ सीमन्ततिलकावुभौ॥ २<br>वासुकिं दक्षिणे कर्णे वामे कुण्डलमादिशेत्।<br>बालिका चोपरिष्टात् तु कपालं दक्षिणे करे।<br>त्रिशूलं वापि कर्तव्यं देवदेवस्य शूलिनः॥ ३<br>वामतो दर्पणं दद्यादुत्पलं तु विशेषतः।<br>वामबाहुश्च कर्तव्यः केयूरवलयान्वितः॥ ४<br>उपवीतं च कर्तव्यं मणिमुक्तामयं तथा॥ ५<br>स्तनभारं तथार्धे तु वामे पीतं प्रकल्पयेत्।<br>परार्धमुज्ज्वलं कुर्याच्छ्रोण्यर्धं तु तथैव च॥ ६<br>लिङ्गार्धमूर्ध्वगं कुर्याद् व्यालाजिनकृताम्बरम्।<br>वामे लम्बपरीधानं कटिसूत्रत्रयान्वितम्॥ ७<br>नानारत्नसमोपेतं दक्षिणे भुजगान्वितम्।<br>देवस्य दक्षिणं पादं पद्मोपरि सुसंस्थितम्॥ ८<br>किञ्चिदूर्ध्वं तथा वामं भूषितं नूपुरेण तु।<br>रत्नैर्विभूषितान् कुर्यादङ्गुलीष्वङ्गुलीयकन्॥ ९<br>सालक्तकं तथा पादं पार्वत्या दर्शयेत् सदा।<br>अर्धनारीश्वरस्येदं रूपमस्मिन्नुदाहृतम्॥ १०ऋषियो! अब मैं भगवान् शिवके अर्धनारीश्वर रूपका वर्णन कर रहा हूँ। इसमें देवाधिदेव शंकरकी बायीं ओर आधे भागमें अत्यन्त सुन्दर स्त्रीका रूप होता है तथा अर्धभागमें दाहिनी ओर पुरुषरूप। पुरुषभागमें प्रतिमाको जटाजूट तथा बालचन्द्रकी कलासे युक्तकर उमाके अर्धभागमें मस्तकपर सीमन्त (माँग)-में सिन्दूर और ललाटपर तिलक निर्मित करे। दाहिने कानमें वासुकि नाग और बायें कानमें कुण्डलकी रचना की जानी चाहिये। वहीं ऊपरकी ओर केशोंके आभूषण तथा कानमें बाली बनानी चाहिये। देवदेवेश्वर शिवके दाहिने हाथमें कपाल या त्रिशूल तथा बायें हाथमें दर्पण और कमल बनाये। विशेषतया बायें बाहुको बाजूबंद और कङ्कणसे युक्त बनाना चाहिये और दाहिनी ओरके भागमें मणियों और मोतियोंका यज्ञोपवीत बनाना चाहिये। प्रतिमाके बायें भागकी ओर स्तन तथा दाहिना भाग पीले वर्णका बनाये। ऊपरका आधा भाग उज्ज्वल हो, नितम्बका आधा भाग श्वेतवर्णका होना चाहिये। लिंगसे ऊपरका भाग सिंहके चर्मसे आवृत हो। बायें भागमें नाना प्रकारके रत्नोंसे बनी हुई तीन लड़ियोंवाली करधनी और साड़ी पहनानी चाहिये। दाहिना भाग सर्पोंसे युक्त हो। शिवजीका दाहिना पैर कमलके ऊपर स्थापित हो तथा नूपुरसे विभूषित बायाँ पैर उससे कुछ ऊपरकी ओर हो। उसकी अंगुलियोंको रत्ननिर्मित अँगूठियोंसे विभूषित करे। पार्वतीके चरण सर्वदा महावरसे युक्त प्रदर्शित किये जायें। इस प्रकार इस प्रसङ्गमें मैंने अर्धनारीश्वरके रूपका वर्णन किया॥ १—१०॥
उमामहेश्वरस्यापि लक्षणं शृणुत द्विजाः।<br>संस्थानं तु तयोर्वक्ष्ये लीलाललितविभ्रमम्॥ ११<br>चतुर्भुजं द्विबाहुं वा जटाभारेन्दुभूषितम्।<br>लोचनत्रयसंयुक्तमुमैकस्कन्धपाणिनम् ॥ १२<br>दक्षिणेनोत्पलं शूलं वामे कुचभरे करम्।<br>द्वीपिचर्मपरीधानं नानारत्नोपशोभितम्॥ १३ब्राह्मणो! अब आपलोग उमामहेश्वर-मूर्तिके लक्षण सुनिये। मैं उन दोनोंकी स्थितिका वर्णन कर रहा हूँ। उमामहेश्वरकी प्रतिमा मनोहर लीलाओंसे युक्त हो। उसे जटाओंके भार और चन्द्रमासे विभूषित दो या चार बाहुओं तथा तीन नेत्रोंसे युक्त बनाना चाहिये। उसमें भगवान् शिवका एक हाथ उमाके कंधेपर विराजमान होना चाहिये। मूर्तिके दाहिने हाथमें कमल या शूल हो, बायाँ हाथ स्तनपर न्यस्त होना चाहिये। उसे विविध प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, व्याघ्रचर्मसे युक्त,
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* अध्याय २६० * । १९७

| सुप्रतिष्ठं सुवेषं च तथार्धेन्दुकृताननम्।<br>वामे तु संस्थिता देवी तस्योरौ बाहुगूहिता॥ १४<br><br>शिरोभूषणसंयुक्तैरलकैर्ललितानना ।<br>सबालिका कर्णवती ललाटतिलकोज्ज्वला॥ १५<br><br>मणिकुण्डलसंयुक्ता कर्णिकाभरणा क्वचित्।<br>हारकेयूरबहुला हरवक्त्रावलोकिनी॥ १६<br><br>वामांसं देवदेवस्य स्पृशन्ती लीलया ततः।<br>दक्षिणं तु बहिः कृत्वा बाहुं दक्षिणतस्तथा॥ १७<br><br>स्कन्धे वा दक्षिणे कुक्षौ स्पृशन्त्यङ्गुलिजैः क्वचित्।<br>वामे तु दर्पणं दद्यादुत्पलं वा सुशोभनम्॥ १८<br><br>कटिसूत्रत्रयं चैव नितम्बे स्यात् प्रलम्बकम्।<br>जया च विजया चैव कार्तिकेयविनायकौ॥ १९<br><br>पार्श्वयोर्दर्शयेत् तत्र तोरणे गणगुह्यकान्।<br>माला विद्याधरांस्तद्वद्वीणावानप्सरोगणः॥ २०<br><br>एतद् रूपमुमेशस्य कर्तव्यं भूतिमिच्छता। | सुन्दर वेषोंसे सुसज्जित, मुखमण्डलको अर्धचन्द्रमासे विभूषित तथा उचित रूपसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। उसके बायें भागमें देवीकी मूर्ति होगी, जिसके दोनों ऊरुभाग बाहुओंसे छिपे रहेंगे। सिरके आभूषणों तथा अलकावलियोंद्वारा मुखभाग ललित हो और बालियोंसे कान तथा तिलकसे ललाट शोभायमान हो रहा हो। कहीं-कहीं कानोंको अलंकृत करनेके लिये मणिर्निमित कुण्डल पहनाये जाते हैं। उसे हार और केयूरसे सुसज्जित कर शिवजीके मुखका अवलोकन करनेवाली बनावे। वे लीलापूर्वक देवदेव शंकरके बायें कंधेका स्पर्श कर रही हों तथा उनका दाहिना हाथ दाहिने भागसे बाहरकी ओर बना हो। या किसी-किसी प्रतिमामें दाहिने कंधे अथवा कुक्षिभागमें नखोंसे स्पर्श कर रही हों, बायें हाथमें दर्पण अथवा सुन्दर कमल रहना चाहिये। नितम्बभागपर तीन लड़ियोंवाला कटिसूत्र लटकता रहना चाहिये। पार्वतीके दोनों ओर जया, विजया, स्वामिकार्तिकेय और गणेशको तथा तोरणद्वारपर गुह्यक गणोंको प्रदर्शित करना चाहिये। उसी प्रकार वहाँ माला, विद्याधर और वीणासे सुशोभित अप्सराओंको बनाना चाहिये। समृद्धिकामीको उमापति शिवकी प्रतिमा इस प्रकारकी बनवानी चाहिये॥ ११–२०½॥ |
| शिवनारायणं वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशनम्॥ २१<br><br>वामार्धे माधवं विद्याद् दक्षिणे शूलपाणिनम्।<br>बाहुद्वयं च कृष्णस्य मणिकेयूरभूषितम्॥ २२<br><br>शङ्खचक्रधरं शान्तमारक्ताङ्गुलिविभ्रमम्।<br>चक्रस्थाने गदां वापि पाणौ दद्यादधस्तले॥ २३<br><br>शङ्खं चैवोत्तरे दद्यात् कट्यर्थं भूषणोज्ज्वलम्।<br>पीतवस्त्रपरीधानं चरणं मणिभूषणम्॥ २४<br><br>दक्षिणार्धं जटाभारमर्धेन्दुकृतभूषणम्।<br>भुजङ्गहारवलयं वरदं दक्षिणं करम्॥ २५<br><br>द्वितीयं चापि कुर्वीत त्रिशूलवरधारिणम्।<br>व्यालोपवीतसंयुक्तं कट्यर्थं कृत्तिवाससम्॥ २६<br><br>मणिरत्नैश्च संयुक्तं पादं नागविभूषितम्।<br>शिवनारायणस्यैवं कल्पयेद् रूपमुत्तमम्॥ २७ | अब मैं सभी पापोंके विनाशक शिवनारायणकी प्रतिमाकी विधि बता रहा हूँ। इस प्रतिमाकी बायीं ओर आधे भागमें भगवान् विष्णु तथा दाहिनी ओर आधे भागमें शूलपाणि शिवको बनाना चाहिये। कृष्णकी दोनों भुजाएँ मणिनिर्मित केयूरसे विभूषित होनी चाहिये। दोनों भुजाओंमें शङ्ख और चक्र धारण किये हों, शान्तरूप हों तथा मनोहर अंगुलियाँ लाल वर्णकी हों। हाथके निचले भागमें चक्रके स्थानमें गदा भी देनी चाहिये। ऊपरी भागमें शङ्ख, कटिभागमें उज्ज्वल आभूषण और पीताम्बर धारण किये हुए हों तथा चरण मणिनिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हों। इसका दाहिना आधा भाग जटाभार तथा अर्धचन्द्रसे विभूषित होना चाहिये। दाहिने हाथको वरद-मुद्रासे युक्त तथा सर्पोंके हार और कङ्कणसे सुशोभित तथा दूसरे हाथको त्रिशूलसे विभूषित बनाना चाहिये। उसे सर्पके यज्ञोपवीतसे युक्त और उसके कटिप्रदेशको गजचर्मसे आच्छादित कर दे। चरण मणि और रत्नोंसे अलंकृत तथा नागसे विभूषित हों। इस प्रकार शिवनारायणके |

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९९८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम्।<br>तीक्ष्णदंष्ट्राग्रघोणास्यं मेदिनी वामकूर्परम्॥ २८<br><br>दंष्ट्राग्रेणोद्धृतां दान्तां धरणीमुत्पलान्विताम्।<br>विस्मयोत्फुल्लवदनामुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ २९<br><br>दक्षिणं कटिसंस्थं तु करं तस्याः प्रकल्पयेत्।<br>कूर्मोपरि तथा पादमेकं नागेन्द्रमूर्धनि॥ ३०<br><br>संस्तूयमानं लोकेशैः समन्तात्परिकल्पयेत्।उत्तम स्वरूपकी कल्पना करनी चाहिये। अब मैं महावराहका वर्णन कर रहा हूँ। उनके हाथोंमें पद्म और गदा हों, उनके दाढ़ोंके अर्धभाग तीक्ष्ण हों, थूथुनवाला मुख हो, बायीं केहुनीपर पृथ्वी हो, वह पृथ्वी दाढ़के अग्रभागपर रखी हुई कमलयुक्त और शान्त हो तथा उसका मुख विस्मयसे उत्फुल्ल हो, ऐसी मूर्तिको ऊपरकी ओर बनाना चाहिये। उस मूर्तिका दाहिना हाथ कटिप्रदेशपर हो। उनका एक पैर शेषनागके मस्तकपर और दूसरा कूर्मपर स्थित हो तथा लोकपालगण चारों ओरसे उनकी स्तुति कर रहे हों, ऐसी मूर्ति बनानी चाहिये॥ २१—३० १/२॥
नारसिंहं तु कर्तव्यं भुजाष्टकसमन्वितम्॥ ३१<br><br>रौद्रं सिंहासनं तद्वद् विदारितमुखेक्षणम्।<br>स्तब्धपीनसटाकर्णं दारयन्तं दितेः सुतम्॥ ३२<br><br>विनिर्गतान्त्रजालं च दानवं परिकल्पयेत्।<br>वमन्तं रुधिरं घोरं भृकुटीवदनेक्षणम्॥ ३३<br><br>युध्यमानश्च कर्तव्यः क्वचित् करणबन्धनैः।<br>परिश्रान्तेन दैत्येन तर्ज्यमानो मुहुर्मुहुः॥ ३४<br><br>दैत्यं प्रदर्शयेत् तत्र खड्गखेटकधारिणम्।<br>स्तूयमानं तथा विष्णुं दर्शयेदमराधिपैः॥ ३५<br><br>तथा त्रिविक्रमं वक्ष्ये ब्रह्माण्डक्रमणोल्वणम्।<br>पादपार्श्वे तथा बाहुमुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ ३६<br><br>अधस्ताद् वामनं तद्वत् कल्पयेत् सकमण्डलुम्।<br>दक्षिणे छत्रिकां दद्यान्मुखं दीनं प्रकल्पयेत्॥ ३७<br><br>भृङ्गारधारिणं तद्वद् बलिं तस्य च पार्श्वतः।<br>बन्धनं चास्य कुर्वन्तं गरुडं तस्य दर्शयेत्॥ ३८<br><br>मत्स्यरूपं तथा मत्स्यं कूर्मं कूर्माकृतिं न्यसेत्।<br>एवंरूपस्तु भगवान् कार्यो नारायणो हरिः॥ ३९भगवान् नृसिंहकी प्रतिमा आठ भुजाओंसे युक्त बनायी जानी चाहिये। उसी प्रकार उनका सिंहासन भी भयंकर हो, मुख और नेत्र फैले हुए हों, गर्दनके लम्बे बाल कानोंतक बिखरे हों तथा वे नखसे दितिपुत्र हिरण्यकशिपुको फाड़ रहे हों। जिसकी आँतें बाहर निकल गयी हों, मुखसे रुधिर गिर रहा हो, भृकुटी, मुख और नेत्र विकराल हों, ऐसे दानवराज हिरण्यकशिपुकी मूर्ति बनानी चाहिये। कहीं नृसिंह-प्रतिमा युद्धके उपकरणोंसे युक्त दैत्योंसे युद्ध करती हुई बनायी जाती है और कहीं थके हुए दैत्यसे बारंबार धमकायी जाती हुई बनानी चाहिये। वहाँ दैत्यको तलवार और ढाल धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये तथा देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए विष्णुको दिखाना चाहिये। अब मैं वामनका वर्णन कर रहा हूँ। वे ब्रह्माण्डको नापनेके लिये तत्पर दीखते हों। उनके चरणोंके समीपमें ऊपरकी ओर बाहुका निर्माण करे। उसके नीचेकी ओर बायें हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए वामनकी रचना करे। दाहिने हाथमें एक छोटी-सी छतरी होनी चाहिये। उनका मुख दीनतासे युक्त हो। उन्हींकी बगलमें जलका गेडुआ लिये हुए बलिको निर्माण होना चाहिये। उसी स्थलपर बलिको बाँधते हुए गरुड़को भी दिखाना चाहिये। इसी प्रकार मत्स्यभगवान्की प्रतिमा मछलीके आकारकी तथा कूर्मभगवान्की प्रतिमा कछुएके समान बनानी चाहिये। इस प्रकार भगवान् विष्णु तथा उनके अवतारोंकी प्रतिमाओंका निर्माण होना चाहिये॥ ३१—३९॥
ब्रह्मा कमण्डलुधरः कर्तव्यः स चतुर्मुखः।<br>हंसारूढः क्वचित् कार्यः क्वचिच्च कमलासनः॥ ४०ब्रह्माको कमण्डलु लिये हुए चार मुखोंसे युक्त बनावे। उनकी प्रतिमा कहीं हंसपर बैठी हुई तथा कहीं कमलपर विराजमान रहती है।
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* अध्याय २६० *९९९
श्लोकअर्थ
वर्णतः पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहुः शुभेक्षणः।<br>कमण्डलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे॥ ४१<br>वामे दण्डधरं तद्वत् स्रुवञ्चापि प्रदर्शयेत्।<br>मुनिभिर्देवगन्धर्वैः स्तूयमानं समन्ततः॥ ४२<br>कुर्वाणमिव लोकांस्त्रीञ्छुक्लाम्बरधरं विभुम्।<br>मृगचर्मधरं चापि दिव्ययज्ञोपवीतिनम्॥ ४३<br>आज्यस्थालीं न्यसेत् पार्श्वे वेदांश्च चतुरः पुनः।<br>वामपार्श्वेऽस्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम्॥ ४४<br>अग्रे च ऋषयस्तद्वत् कार्याः पितामहे पदे।उनकी प्रतिमा कमलके भीतरी भागके समान अरुण, चार भुजाओंसे युक्त और सुन्दर नेत्रवाली हो। उनके नीचेके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें स्रुवा हो। उनके ऊपरके बायें हाथमें दण्ड तथा दाहिने हाथमें भी स्रुवा* धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये। उनके चारों ओर देवता, गन्धर्व और मुनिगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। ऐसी भूमिका भी दिखाये, मानो वे तीनों लोकोंकी रचनामें प्रवृत्त हैं। वे श्वेत वस्त्रधारी, ऐश्वर्यसम्पन्न, मृगचर्म तथा दिव्य यज्ञोपवीतसे युक्त हों। उनके बगलमें आज्यस्थाली रहे और सामने चारों वेदोंकी मूर्तियाँ हों। उनकी बायीं ओर सावित्री, दाहिनी ओर सरस्वती तथा उनके अग्रभागमें मुनियोंके समूह हों॥ ४०—४४ १/२ ॥
कार्तिकेयं प्रवक्ष्यामि तरुणादित्यसप्रभम्॥ ४५<br>कमलोदरवर्णाभं कुमारं सुकुमारकम्।<br>दण्डकैश्चीरकैर्युक्तं मयूरवरवाहनम्॥ ४६<br>स्थापयेत् स्वेष्टनगरे भुजान् द्वादश कारयेत्।<br>चतुर्भुजः खर्वटे स्याद् वने ग्रामे द्विबाहुकः॥ ४७<br>शक्तिः पाशस्तथा खड्गः शरः शूलं तथैव च।<br>वरदश्चैकहस्तः स्यादथ चाभयदो भवेत्॥ ४८<br>एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूरकटकोज्ज्वलाः।<br>धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता॥ ४९<br>खेटकं ताम्रचूडं च वामहस्ते तु शस्यते।<br>द्विभुजस्य करे शक्तिर्वामे स्यात् कुक्कुटोपरि॥ ५०<br>चतुर्भुजे शक्तिपाशौ वामतो दक्षिणे त्वसिः।<br>वरदोऽभयदो वापि दक्षिणः स्यात् तुरीयकः॥ ५१अब मैं कार्तिकेयकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाको मध्यकालीन सूर्यकी भाँति परम तेजोमय, कमलके मध्यभागके समान अरुण, मयूरपर आरूढ़, दण्डों और चीरोंसे सुशोभित, सुकुमार शरीरसे युक्त और बारह भुजाओंवाली बनाना चाहिये। उसे अपने इष्ट नगरमें स्थापित करना चाहिये। खर्वट (पर्वतके समीपके ग्राम)-में इनकी चार भुजाओंवाली और वन अथवा ग्राममें दो बाहुवाली प्रतिमा स्थापित करानी चाहिये। (बारह भुजाओंवाली प्रतिमामें) उनकी दाहिनी ओरके छः हाथोंमें शक्ति, पाश, तलवार, बाण और शूल शोभायमान हों। एक हाथमें अभयमुद्रा अथवा वरदमुद्रा बनानी चाहिये। ये सभी केयूर तथा कटकसे विभूषित उज्ज्वल वर्णके होने चाहिये। बायीं ओरके छः हाथ क्रमशः धनुष, पताका, मुष्टि, फैली हुई तर्जनी, ढाल, मुर्गा—इन वस्तुओंसे युक्त और उसी वर्णके होने चाहिये। दो भुजाओंवाली प्रतिमाके बायें हाथमें शक्ति और दाहिना हाथ कुक्कुटपर न्यस्त रहना चाहिये। चतुर्भुज प्रतिमाकी बायीं ओरके दो हाथोंमें शक्ति और पाश तथा दाहिनी ओरके तीसरे हाथमें तलवार हो और चौथा हाथ अभय अथवा वरदमुद्रासे युक्त हो॥ ४५—५१॥
विनायकं प्रवक्ष्यामि गजवक्त्रं त्रिलोचनम्।<br>लम्बोदरं चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम्॥ ५२<br>ध्वस्तकर्णं बृहत्तुण्डमेकदंष्ट्रं पृथूदरम्।<br>स्वदन्तं दक्षिणकरे उत्पलं चापरे तथा॥ ५३अब मैं गणेशजीकी प्रतिमाका विधान बता रहा हूँ। उनकी प्रतिमामें हाथी-सा मुख, तीन नेत्र, लम्बा उदर, चार भुजाएँ, सर्पका यज्ञोपवीत, सिमटा हुआ कान, विशाल शुण्ड, एक दाँत और तोंद स्थूल हो। उनके ऊपरके दाहिने हाथमें अपना दाँत और निचले हाथमें कमल होना चाहिये।

* कहीं-कहीं उनके ऊपरके दाहिने हाथमें वेदग्रन्थ या स्रुक् भी निर्दिष्ट है।