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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

११६- ऐरावती नदीका वर्णन

* अध्याय ११४ *३८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकैकमनुरक्ताश्च चक्रवाकमिव ध्रुवम्।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः॥ ७६<br>दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।<br>जीवन्ति च महासत्त्वा न चान्या स्त्री प्रवर्तते॥ ७७सा होता है और वे एक साथ ही प्राण-त्याग भी करते हैं। वे चक्रवाककी तरह निश्चितरूपसे परस्पर अनुरक्त, नीरोग, शोकरहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। वे महापराक्रमी मानव ग्यारह हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। वहाँ कोई पुरुष दूसरा विवाह नहीं करता॥ ६९—७७॥
सूत उवाच<br>एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते युगे।<br>दृष्टः परमधर्मज्ञाः किं भूयः कथयामि वः॥ ७८<br>आख्यातास्त्वेवमृषयः सूतपुत्रेण धीमता।<br>उत्तरश्रवणे भूयः पप्रच्छुः सूतनन्दनम्॥ ७९सूतजी कहते हैं— परम धर्मज्ञ ऋषियो! इस प्रकार मैंने भारतीय युगमें वर्षोंकी सृष्टि देखी है (जिसका वर्णन कर दिया), अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ। बुद्धिमान् सूतपुत्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऋषियोंने पुनः उत्तरवर्ती वर्षोंके विषयमें सुननेके लिये सूतनन्दनसे जिज्ञासा प्रकट की॥ ७८-७९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे द्वीपादिवर्णनं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें द्वीपादिवर्णन नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११३॥


एक सौ चौदहवाँ अध्याय

भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन् स्वायम्भुवादयः।<br>चतुर्दशैव मनवः प्रजासर्गं ससृजिरे॥ १<br>एतद् वेदितुमिच्छामः सकाशात् तव सुव्रत।<br>उत्तरश्रवणं भूयः प्रब्रूहि वदतां वर॥ २ऋषियोंने पूछा— सुव्रत! जो यह भारतवर्ष है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु हुए हैं, जिन्होंने प्रजाओंकी सृष्टि की है, उनके विषयमें हमलोग आपके मुखसे सुनना चाहते हैं। साथ ही वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! पुनः इसके बाद भारत आदि अन्य वर्षोंके विषयमें भी कुछ बतलाइये॥ १-२॥
एतच्छ्रुत्वा ऋषीणां तु प्राब्रवील्लोमहर्षणः।<br>पौराणिकस्तदा सूत ऋषीणां भावितात्मनाम्॥ ३<br>बुद्ध्या विचार्य बहुधा विमृश्य च पुनः पुनः।<br>तेभ्यस्तु कथयामास उत्तरश्रवणं तदा॥ ४प्रसिद्ध पौराणिक लोमहर्षणके पुत्र सूतजीने उन पवित्रात्मा ऋषियोंका प्रश्न सुनकर अपनी बुद्धिसे बारम्बार बहुधा विचार-विमर्श करके उन ऋषियोंसे 'उत्तरश्रवण' (उत्तरवर्ती वर्षों)-के विषयमें कहना आरम्भ किया॥ ३-४॥
सूत उवाच<br>अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः।<br>भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते॥ ५<br>निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्।<br>यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः॥ ६सूतजी कहते हैं— ऋषियो! अब मैं इस भारतवर्षमें उत्पन्न होनेवाली प्रजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। इन प्रजाओंकी सृष्टि करने तथा इनका भरण-पोषण करनेके कारण मनुको भरत कहा जाता है। निरुक्त-वचनोंके आधारपर यह वर्ष (उन्हींके नामपर) भारतवर्षके* नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ स्वर्ग, मोक्ष तथा इन दोनोंके अन्तर्वर्ती (भोग) पदकी प्राप्ति होती है।

* सभी पुराणोंमें प्रायः सर्वत्र ऋषभ-पुत्र भरतके नामपर ही देशका नाम भारत कहा गया है। नाभिसे अजनाभ तथा उनके पोते भरतसे देशका भारत नाम पड़ा। मनु इनके भी पूर्वज थे, अतः यह कथन भी ठीक है। पर पाश्चात्योंने शकुन्तला-पुत्रके नामपर देशका नाम पड़ना गलत बतलाया है और भ्रमसे आज उसीका प्रचार है (विशेष जानकारीके लिये देखिये कल्याण वर्ष ३०।८)। यह अध्याय वायुपुराण ४५। ७२-१३७ तथा ब्रह्माण्ड, मार्कण्डेय आदि पुराणोंमें भी प्राप्त है।

३८४ * मत्स्यपुराण *


| न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्मविधिः स्मृतः।<br>भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत ॥ ७<br>इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णी गभस्तिमान्।<br>नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः ॥ ८<br>अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः।<br>योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥ ९<br>आयतस्तु कुमारीतो गङ्गायाः प्रवाहवधिः।<br>तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु ॥ १०<br>द्वीपो ह्युपनिविष्टोऽयं म्लेच्छैरन्तेषु सर्वशः।<br>यवनाश्च किराताश्च तस्यान्ते पूर्वपश्चिमे ॥ ११<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।<br>इज्ज्यायुधवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः ॥ १२<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्तते तु परस्परम्।<br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु ॥ १३<br>सकल्पपञ्चमानां तु आश्रमाणां यथाविधि।<br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिरिह मानुषे ॥ १४ | इस भूतलपर भारतवर्षके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी प्राणियोंके लिये कर्मका विधान नहीं सुना जाता। इस भारतवर्षके नौ भेद हैं, उनके नाम सुनिये—इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गान्धर्वद्वीप और वारुणद्वीप—ये आठ तथा उनमें नवाँ यह समुद्रसे घिरा हुआ भारतद्वीप^१ (या खण्ड) है। यह द्वीप दक्षिणसे उत्तरतक एक हजार योजनमें फैला हुआ है। इसका विस्तार गङ्गाके उद्गमस्थानसे लेकर कन्याकुमारी अथवा कुमारी अन्तरीपतक है। यह तिरछेरूपमें ऊपर-ही-ऊपर दस हजार योजन विस्तृत है। इस द्वीपके चारों ओर सीमावर्ती प्रदेशोंमें म्लेच्छ जातियोंकी बस्तियाँ हैं। इसकी पूर्व एवं पश्चिम दिशामें क्रमशः किरात और यवन निवास करते हैं। इसके मध्यभागमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विभागपूर्वक यज्ञ, शस्त्र-ग्रहण और व्यवसाय आदिके द्वारा जीवन-यापन करते हुए निवास करते हैं। उन चारों वर्णोंका पारस्परिक व्यवहार धर्म, अर्थ और कामसे संयुक्त होता है और वे अपने-अपने कर्मोंमें ही लगे रहते हैं। यहाँ कल्पसहित पाँचों वर्णों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, योगी और संन्यासी) तथा आश्रमोंका विधिपूर्वक पालन होता है। इस द्वीपके मनुष्योंकी कर्म-प्रवृत्ति स्वर्ग और मोक्षके लिये होती है॥ ५—१४॥ |
| यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग्यामः प्रकीर्तितः।<br>य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः ॥ १५ | इस मानव द्वीपको जो त्रिकोणाकार फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण रूपमें जीत लेता है वह सम्राट् कहलाता है। |
| अयं लोकस्तु वै सम्राडन्तरिक्षजितां स्मृतः।<br>स्वराडसौ स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ॥ १६ | अन्तरिक्षपर विजय पानेवालोंके लिये यह लोक सम्राट् कहा गया है और यही लोक स्वराट्के नामसे भी प्रसिद्ध है। अब मैं इसका पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। |
| सप्त चास्मिन् महावर्षे विश्रुताः कुलपर्वताः।<br>महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि ॥ १७<br>विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपर्वताः।<br>तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपतः ॥ १८ | इस महान् भारतवर्षमें सात विश्वविख्यात कुलपर्वत हैं। महेन्द्र^२, मलय, सह्य, शुक्तिमान्^३, ऋक्षवान्^४, विन्ध्य और पारियात्र^५—ये कुलपर्वत हैं। इनके समीप अन्य हजारों पर्वत हैं। |


१. इस प्रकार आजका दीखनेवाला सारा भूमण्डल बृहत्तर भारतके ही अन्तर्गत सिद्ध होता है। इसीलिये हेमाद्रि संकल्पमें 'भारतवर्षे भरतखण्डे' पढ़ा जाता है।
२. उड़ीसाके दक्षिणपूर्वी भागका पर्वत।
३. यह शक्ति पर्वत है, जो रायगढ़से लेकर मानभूम जिलेकी डालमा पहाड़ीतक फैला है।
४. यह विन्ध्य-पर्वतमालाका पूर्वी भाग है।
५. यह विन्ध्यपर्वतमालाका पश्चिमी भाग है।

* अध्याय ११४ *३८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अभिजातास्ततश्चान्ये विपुलाश्चित्रसानवः।<br>अन्ये तेभ्यः परिज्ञाता ह्रस्वा ह्रस्वोपजीविनः ॥ १९<br>तैर्विमिश्रा जानपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः।<br>पीयन्ते यैरिमा नद्यो गङ्गा सिन्धुः सरस्वती*॥ २०<br>शतद्रुश्चन्द्रभागा च यमुना सरयूस्तथा।<br>इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥ २१<br>गोमती धूतपापा च बाहुदा च दृषद्वती।<br>कौशिकी च तृतीया च निश्चीरा गण्डकी तथा।<br>चक्षुर्लोहित इत्येता हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २२<br>वेदस्मृतिर्वेत्रवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च।<br>पर्णाशा चन्दना चैव सदानीरा मही तथा ॥ २३<br>पारा चर्मण्वती यूपा विदिशा वेणुमत्यपि।<br>शिप्रा ह्यवन्ती कुन्ती च पारियात्राश्रिताः स्मृताः ॥ २४<br>शोणो महानदी चैव नर्मदा सुरसा क्रिया।<br>मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।<br>तमसा पिप्पली श्येनी करतोया पिशाचिका ॥ २५<br>विमला चञ्चला चैव वञ्जुला वालुवाहिनी।<br>शुक्तिमन्ती शुनी लज्जा मुकुटा हृदिकापि च।<br>ऋक्षवन्तप्रसूतास्ता नद्योऽमलजलाः शुभाः ॥ २६<br>तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या क्षिप्रा च निषधा नदी।<br>वेण्वा वैतरणी चैव विश्वमाला कुमुद्वती ॥ २७<br>तोया चैव महागौरी दुर्गा चान्तःशिला तथा।<br>विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ २८<br>गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी च वञ्जुला।<br>तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा वाह्या कावेर्यथापि च।<br>दक्षिणापथनद्यस्ताः सह्यपादाद् विनिःसृताः ॥ २९<br>कृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजा चोत्पलावती।<br>मलयान्निःसृता नद्यः सर्वाः शीतजलाः शुभाः ॥ ३०<br>त्रिषामा ऋषिकुल्या च इक्षुला त्रिदिवाचला।<br>लाङ्गूलिनी वंशधरा महेन्द्रतनयाः स्मृताः ॥ ३१<br>ऋषीका सुकुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी।<br>कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥ ३२इनके अतिरिक्त अन्य भी विशाल एवं चित्र-विचित्र शिखरोंवाले पर्वत हैं तथा दूसरे कुछ उनसे भी छोटे हैं जो निम्न (पर्वतीय) जातियोंके आश्रयभूत हैं। इन्हीं पर्वतोंसे संयुक्त जो प्रदेश हैं उनमें चारों ओर आर्य एवं म्लेच्छ जातियाँ निवास करती हैं, जो इन आगे कही जानेवाली नदियोंका जल पान करती हैं। जैसे गङ्गा, सिन्धु, सरस्वती, शतद्रु (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाव), यमुना, सरयू, इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), देविका, कुहू, गोमती, धूतपापा (धोपाप), बाहुदा, दृषद्वती, कौशिकी (कोसी), तृतीया, निश्चीरा, गण्डकी, चक्षु, लौहित—ये सभी नदियाँ हिमालयकी उपत्यका (तलहटी)—से निकली हुई हैं। वेदस्मृति, वेत्रवती (बेतवा), वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णाशा, चन्दना, सदानीरा, मही, पारा, चर्मण्वती, यूपा, विदिशा, वेणुमती, शिप्रा, अवन्ती तथा कुन्ती—इन नदियोंका उद्गमस्थान पारियात्र पर्वत है॥ १५–२४॥<br><br>शोण, महानदी, नर्मदा, सुरसा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, तमसा, पिप्पली, श्येनी, करतोया, पिशाचिका, विमला, चञ्चला, वञ्जुला, वालुवाहिनी, शुक्तिमन्ती, शुनी, लज्जा, मुकुटा और हृदिका—ये स्वच्छसलिला कल्याणमयी नदियाँ ऋक्षवन्त (ऋक्षवान्) पर्वतसे उद्भूत हुई हैं। तापी, पयोष्णी (पूर्णानदी या पैनगङ्गा), निर्विन्ध्या, क्षिप्रा, निषधा, वेण्वा, वैतरणी, विश्वमाला, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तःशिला—ये सभी पुण्यतोया मङ्गलमयी नदियाँ विन्ध्याचलकी उपत्यकाओंसे निकली हुई हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, वञ्जुला (मंजीरा), कर्णाटककी तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, वाह्या (वर्धनदी) और कावेरी—ये सभी दक्षिणापथमें प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, जो सह्यपर्वतकी शाखाओंसे प्रकट हुई हैं। कृतमाला (वैगैन नदी), ताम्रपर्णी, पुष्पजा (कुसुमाङ्गा, पेम्बै या पेन्नार नदी) और उत्पलावती—ये कल्याणमयी नदियाँ मलयाचलसे निकली हुई हैं। इनका जल बहुत शीतल होता है। त्रिषामा, ऋषिकुल्या, इक्षुला, त्रिदिवा, अचला, लाङ्गूलिनी और वंशधरा—ये सभी नदियाँ महेन्द्रपर्वतसे निकली हुई मानी जाती हैं। ऋषीका, सुकुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी, कृपा और पलाशिनी—इन नदियोंका उद्गम शुक्तिमान् पर्वतसे हुआ है।

* यह नदी-वर्णन ठीक इसी प्रकार ब्रह्मपु० १९। १०–२४, ब्रह्माण्ड० १। १६। २४–३९ तथा वायु० ४५। ६३–७८ में भी है।