मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१४७- ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक
| * अध्याय १४५ * | ५३९ |
|---|
| ऋषिजो बृहच्छुक्लश्च ऋषिर्दीर्घतमा अपि।<br>कक्षीवांश्च त्रयस्त्रिंशत् स्मृता ह्यङ्गिरसां पराः॥ १०५<br>एते मन्त्रकृतः सर्वे काश्यपांस्तु निबोधत।<br>कश्यपः सहवत्सारो नैध्रुवो नित्य एव च॥ १०६<br>असितो देवलश्चैव षडेते ब्रह्मवादिनः।<br>अत्रिरर्ध्वस्वनश्चैव शावास्योऽथ गविष्ठिरः॥ १०७<br>कर्णकश्च ऋषिः सिद्धस्तथा पूर्वातित्थिश्च यः॥ १०८<br>इत्येते त्वत्रयः प्रोक्ता मन्त्रकृत् षण्महर्षयः।<br>वसिष्ठश्चैव शक्तिश्च तृतीयश्च पराशरः॥ १०९<br>ततस्तु इन्द्रप्रमितः पञ्चमस्तु भरद्वसुः।<br>षष्ठस्तु मित्रवरुणः सप्तमः कुण्डिनस्तथा॥ ११०<br>इत्येते सप्त विज्ञेया वासिष्ठा ब्रह्मवादिनः।<br>विश्वामित्रश्च गाधेयो देवरातस्तथा बलः॥ १११<br>तथा विद्वान् मधुच्छन्दा ऋषिश्चान्योऽघमर्षणः।<br>अष्टको लोहितश्चैव भृतकीलस्तथाम्बुधिः॥ ११२<br>देवश्रवा देवरातः पुराणश्च धनञ्जयः।<br>शिशिरश्च महातेजाः शालङ्कायन एव च॥ ११३<br>त्रयोदशैते विज्ञेया ब्रह्मिष्ठाः कौशिका वराः।<br>अगस्त्योऽथ दृढद्युम्नो इन्द्रबाहुस्तथैव च॥ ११४<br>ब्रह्मिष्ठागस्तयो ह्येते त्रयः परमकीर्तयः।<br>मनुर्वैवस्वतश्चैव ऐलो राजा पुरूरवाः॥ ११५<br>क्षत्रियाणां वरौ ह्येतौ विज्ञेयौ मन्त्रवादिनौ।<br>भलन्दकश्च वासाश्वः संकीलश्चैव ते त्रयः॥ ११६<br>एते मन्त्रकृतो ज्ञेया वैश्यानां प्रवरां सदा।<br>इति द्विनवतिः प्रोक्ता मन्त्रा यैश्च बहिष्कृताः॥ ११७<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषिपुत्रान् निबोधत।<br>ऋषीकाणां सुता ह्येते ऋषिपुत्राः श्रुतर्षयः॥ ११८ | ऋषिषिज, बृहच्छुक्ल, दीर्घतमा और कक्षीवान्—ये तैंतीस श्रेष्ठ ऋषि अङ्गिरागोत्रीय कहे जाते हैं। ये सभी मन्त्रकर्ता हैं। अब कश्यपवंशमें उत्पन्न होनेवाले ऋषियोंके नाम सुनिये। कश्यप, सहवत्सार, नैध्रुव, नित्य, असित और देवल—ये छः ब्रह्मवादी ऋषि हैं। अत्रि, अर्धस्वन, शावास्य, गविष्ठिर, सिद्धर्षि कर्णक और पूर्वातिथि—ये छः मन्त्रकर्ता महर्षि अत्रिवंशोत्पन्न कहे गये हैं। वसिष्ठ, शक्ति, तीसरे पराशर, इन्द्रप्रमित, पाँचवें भरद्वसु, छठे मित्रावरुण तथा सातवें कुण्डिन—इन सात ब्रह्मवादी ऋषियोंको वसिष्ठवंशोत्पन्न जानना चाहिये॥९८—११० १/२॥<br><br>गाधि-नन्दन विश्वामित्र, देवरात, बल, विद्वान् मधुच्छन्दा, अघमर्षण, अष्टक, लोहित, भृतकील, अम्बुधि, देवपरायण देवरात, प्राचीन ऋषि धनञ्जय, शिशिर तथा महान् तेजस्वी शालंकायन—इन तेरहोंको कौशिकवंशोत्पन्न ब्रह्मवादी ऋषि समझना चाहिये। अगस्त्य, दृढद्युम्न तथा इन्द्रबाहु—ये तीनों परम यशस्वी ब्रह्मवादी ऋषि अगस्त्य-कुलमें उत्पन्न हुए हैं। विवस्वान्-पुत्र मनु तथा इला-नन्दन राजा पुरूरवा—क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न हुए इन दोनों राजर्षियोंको मन्त्रवादी जानना चाहिये। भलन्दक, वासाश्व और संकील—वैश्योंमें श्रेष्ठ इन तीनोंको मन्त्रकर्ता समझना चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-कुलमें उत्पन्न हुए बानबे ऋषियोंका वर्णन किया गया, जिन्होंने मन्त्रोंको प्रकट किया है। अब ऋषि-पुत्रोंके विषयमें सुनिये। ये ऋषिपुत्र जो श्रुतर्षि कहलाते हैं, ऋषियोंके पुत्र हैं॥ १११—११८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरकल्पवर्णनो नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरकल्पवर्णन नामक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४५॥
५४० * मत्स्यपुराण *
एक सौ छियालीसवाँ अध्याय
वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान
| ऋषय ऊचुः<br>कथं मत्स्येन कथितस्तारकस्य वधो महान्।<br>कस्मिन् काले विनिर्वृत्ता कथेयं सूतनन्दन॥ १<br><br>त्वन्मुखक्षीरसिन्धूत्था कथेयममृतात्मिका।<br>कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिरस्माकं न प्रजायते।<br>इदं मुने समाख्याहि महाबुद्धे मनोगतम्॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतनन्दन! मत्स्यभगवान्ने तारकासुरके वधरूप महान् कार्यका वर्णन किस प्रकार किया था? यह कथा किस समय कही गयी थी? मुने! आपके मुखरूपी क्षीरसागरसे उद्भूत हुई इस अमृतरूपिणी कथाका दोनों कानोंद्वारा पान करते हुए भी हमलोगोंको तृप्ति नहीं हो रही है। अतः महाबुद्धिमान् सूतजी! आप हमलोगोंके इस मनोऽभिलषित विषयका वर्णन कीजिये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>पृष्टस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>कथं शरवणे जातो देवः षड्वदनो विभो॥ ३<br><br>एतत्त वचनं श्रुत्वा पार्थिवस्यामितौजसः।<br>उवाच भगवान् प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम्॥ ४ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (प्राचीन कालकी बात है) राजर्षि मनुने मत्स्यरूपधारी भगवान् विष्णुसे प्रश्न किया—'विभो! षडानन स्वामिकार्तिकका जन्म सरपतके वनमें कैसे हुआ था?' उन अमिततेजस्वी राजर्षि मनुका प्रश्न सुनकर महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र भगवान् मत्स्य प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ३-४॥ |
| मत्स्य उवाच<br>वज्राङ्गो नाम दैत्योऽभूत् तस्य पुत्रस्तु तारकः।<br>सुरानुद्वासयामास पुरेभ्यः स महाबलः॥ ५<br><br>ततस्ते ब्रह्मणोऽभ्याशं जग्मुर्भयनिपीडिताः।<br>भीतांश्च त्रिदशान् दृष्ट्वा ब्रह्मा तेषामुवाच ह॥ ६<br><br>संत्यजध्वं भयं देवाः शंकरस्यात्मजः शिशुः।<br>तुहिनाचलदौहित्रस्तं हनिष्यति दानवम्॥ ७<br><br>ततः काले तु कस्मिंश्चिद् दृष्ट्वा वै शैलजां शिवः।<br>स्वरेतो वह्निवदने व्यसृजत् कारणान्तरे॥ ८<br><br>तत् प्राप्तं वह्निवदने रेतो देवानतर्पयत्।<br>विदार्य जठराण्येषामजीर्णं निर्गतं मुने॥ ९ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! (बहुत पहले) वज्राङ्ग नामका एक दैत्य उत्पन्न हुआ है, उसके पुत्रका नाम तारक था। उस महाबली तारकने देवताओंको उनके नगरोंसे निकालकर खदेड़ दिया। तब भयभीत हुए वे सभी देवगण ब्रह्माके निकट गये। उन देवताओंको डरा देखकर ब्रह्माने उनसे कहा—'देववृन्द! भय छोड़ दो। (शीघ्र ही) भगवान् शंकरके एक औरस पुत्र हिमाचलका दौहित्र (नाती) उत्पन्न होगा, जो उस दानवका वध करेगा।' तदनन्तर किसी समय पार्वतीको देखकर शिवजीका वीर्य स्खलित हो गया, तब उन्होंने उसे किसी भावी कारणवश अग्निके मुखमें गिरा दिया। अग्निके मुखमें पड़े हुए उस वीर्यने देवताओंको तृप्त कर दिया, किंतु पच न सकनेके कारण वह उनके उदरको फाड़कर बाहर निकल पड़ा |