मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६६- महाप्रलयका वर्णन
६८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दीप्तान्यन्तर्जंलस्थानि पृथिवीधरणानि च।<br>तदा क्रुद्धेन महता कम्पितानि समन्ततः॥५८<br>नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः।<br>हिरण्यकशिपुर्द्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान् महीम्॥५९<br>संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वारह इव पूर्वजः। | उसने चारों ओर जलके भीतर स्थित रहनेवाले उदीप्त पर्वतोंको भी अत्यन्त क्रोधवश कँपा दिया। उस समय पाताललोकमें विचरण करनेवाले तेजस्वी नाग भी प्रकम्पित हो उठे। इस प्रकार दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधवश दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए जब पृथ्वीपर खड़ा हुआ तो वह पूर्वकालमें प्रकट हुए वाराहकी तरह दीख रहा था॥५०—५९१/२॥ |
| नदी भागीरथी चैव शरयूः कौशिकी तथा॥६०<br>यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा।<br>सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा॥६१<br>चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः।<br>कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥६२<br>नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी।<br>गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती॥६३<br>मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी।<br>जम्बूद्वीपं रत्नवटं सर्वरत्नोपशोभितम्॥६४<br>सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णकरमण्डितम्।<br>महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम्॥६५<br>पत्तनं कोशकरणमृषिवीरजनाकरम्।<br>मागधाश्च महाग्रामा मुण्डाः शृङ्गास्तथैव च॥६६<br>सुह्मा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः।<br>भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम्॥६७<br>कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा।<br>रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः॥६८<br>उदयश्च महाशैल उत्थितः शतयोजनम्।<br>सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः॥६९<br>भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः।<br>शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः॥७०<br>अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः।<br>तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः॥७१<br>सुराष्ट्राश्च सबाहीकाः शूराभीरास्तथैव च।<br>भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥७२<br>तथैवोण्ड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः।<br>क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः॥७३ | इसी प्रकार भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी, यमुना, कावेरी, कृष्णवेणा नदी, महाभागा, सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नद और नदियोंका स्वामी, कमल उत्पन्न करनेवाला तथा मणिसदृश जलसे परिपूर्ण शोण, पुण्यसलिला नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुलसे सेवित होनेवाली गोमती, प्राचीसरस्वती, मही, कालमही, तमसा, पुष्पवाहिनी, जम्बूद्वीप, सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवट, सुवर्णकी खानोंसे युक्त सुवर्णप्रकट, पर्वतों और काननोंसे सुशोभित महानद लौहित्य, ऋषियों और वीरजनोंका उत्पत्तिस्थानस्वरूप कोशकरण नामक नगर, बड़े-बड़े ग्रामोंसे युक्त मागध, मुण्ड, शृङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी, कोसल—इन सबको तथा गरुडके भवनको, जो कैलासके शिखरकी-सी आकृतिवाला था तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था, उस दैत्येन्द्रने प्रकम्पित कर दिया। रक्तरूपी जलसे भरा हुआ महान् भयंकर लौहित्य सागर तथा जो स्वर्णमयी वेदिकासे युक्त, शोभाशाली, मेघकी पङ्क्तियोंद्वारा सुसेवित और सूर्य-सदृश एवं स्वर्णमय खिले हुए साल, ताल, तमाल और कनेरके वृक्षोंसे सुशोभित है, वह सौ योजन ऊँचा महान् पर्वत उदयाचल, धातुओंसे विभूषित अयोमुख नामक विख्यात पर्वत, तमाल-वनके गन्धसे सुवासित सुन्दर मलय पर्वत, सुराष्ट्र, बाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्तक, उण्ड्र, पौण्ड्र, केरल—इन सबको तथा देवों और अप्सराओंके समूहोंको उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया॥६०–७३॥ |
| अगस्त्यभवनं चैव यदगम्यं कृतं पुरा।<br>सिद्धचारणसङ्घैश्च विप्रकीर्णं मनोहरम्॥७४ | इसी प्रकार जो पहले अगम्य कर दिया गया था तथा सिद्धों और चारणोंके समूहोंसे व्याप्त, |
- अध्याय १६३ * | ६८३
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| विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम्।<br>जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणनादितम्॥ ७५<br>गिरिपुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः।<br>रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव॥ ७६<br>चन्द्रसूर्यांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः।<br>विद्युत्वान् सर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्॥ ७७<br>विद्युतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे।<br>ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः॥ ७८<br>कुञ्जरः पर्वतः श्रीमान् यत्रागस्त्यगृहं शुभम्।<br>विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥ ७९<br>तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता।<br>महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः॥ ८०<br>चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः।<br>प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्॥ ८१<br>यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः।<br>मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ८२<br>षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>तरुणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः॥ ८३<br>यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः।<br>हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसंखो गिरिः॥ ८४<br>कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः। | मनोहर, नाना प्रकारके रंग-विरंगे पक्षियोंसे युक्त और पुष्पोंसे लदे हुए महान् वृक्षोंसे सुशोभित था, उस अगस्त्य-भवनको भी कँपा दिया। इसके बाद जो लक्ष्मीवान्, प्रियदर्शन और अपने अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे आकाशमें रेखा-सी खींच रहा था तथा चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देनेके लिये सागरका भेदन कर बाहर निकला था, वह पुष्पितक गिरि अपने स्वर्णमय शिखरोंसे शोभा पा रहा था। फिर चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले एवं सागरके जलसे घिरे हुए शिखरोंसे युक्त शोभाशाली विद्युत्वान् पर्वत था, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत था। उस पर्वतश्रेष्ठपर बिजलियोंके समूह गिराये जाते थे। वृषभ नामसे पुकारा जानेवाला शोभासम्पन्न ऋषभ पर्वत तथा शोभाशाली कुंजर पर्वत, जिसपर महर्षि अगस्त्यका सुन्दर आश्रम था। सर्पोंका दुर्धर्ष निवासस्थान विशालाक्ष तथा भोगवती पुरी—ये सभी दैत्येन्द्रद्वारा प्रकम्पित कर दिये गये। द्विजवरो! वहाँ महासेन गिरि, पारियात्र पर्वत, गिरिश्रेष्ठ चक्रवान्, वाराह पर्वत, स्वर्णनिर्मित रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर, जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता है, बादलोंके समान गम्भीर शब्द करनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मेघ आदि साठ हजार पर्वत थे, वहीं मध्याह्नकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान विशाल पर्वत मेरु था, जिसकी कन्दराओंमें यक्ष, राक्षस और गन्धर्व नित्य निवास करते थे। महान् पर्वत हेमगर्भ, हेमसंख गिरि तथा पर्वतराज कैलास—इन सबको भी दानवेन्द्र हिरण्यकशिपुने कँपा दिया॥ ७४-८४ ½ ॥ |
| हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सरः॥ ८५<br>कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम्।<br>त्रिशृङ्गपर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा॥ ८६<br>तुषारचयसंच्छन्नो मन्दरश्चापि पर्वतः।<br>उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट्॥ ८७<br>प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः।<br>देवाभ्रपर्वतश्चैव तथा वै रेणुको गिरिः॥ ८८<br>क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूप्रवर्णश्च पर्वतः।<br>एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा॥ ८९<br>नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः।<br>कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्चैव कम्पितः॥ ९० | हिरण्यकशिपुने स्वर्ण-सदृश कमल-पुष्पोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा हंसों और बतखोंसे भरे हुए मानसरोवरको भी कम्पित कर दिया। इसके बाद त्रिशृङ्ग पर्वत, नदियोंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, तुषारसमूहसे आच्छादित मन्दर पर्वत, उशीरविन्दु गिरि, पर्वतराज चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्र पर्वत, रेणुक गिरि, क्रौंच पर्वत, सप्तर्षिशैल तथा धूप्रवर्ण पर्वत—इनको तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य पर्वतों, देशों, जनपदों तथा सागरोंसहित सभी नदियोंको उस दानवने कम्पित कर दिया। साथ ही महीपुत्र कपिल और व्याघ्रवान् भी काँप उठे। |