मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
१०४- प्रयाग-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन
| * अध्याय १०१ * | ३४९ |
|---|---|
| वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः ।<br>शिवलोके वसेत् कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५५ | जो एक वर्षतक दिनमें एक ही बार भोजन करके व्रतान्तमें खाद्य पदार्थोंसहित जलपूर्ण घटका दान करता है, वह एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। इसे 'प्राप्तिव्रत' कहा जाता है। |
| नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद् वत्सरान्ते च धेनुदः ।<br>पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते॥ ५६ | जो प्रत्येक मासकी अष्टमी तिथियोंमें रातमें एक बार भोजन करता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे 'सुगतिव्रत' कहा जाता है। |
| विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरो ऋतून्।<br>घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति।<br>वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्॥ ५७ | जो वर्षा-ऋतुसे लेकर चार ऋतुओंतक ब्राह्मणको ईंधनका दान देता है और व्रतान्तमें घृत-धेनु प्रदान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला यह 'वैश्वानरव्रत' है। |
| एकादश्यां च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् ।<br>समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात्।<br>एतत् कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग् भवेत्॥ ५८ | जो एकादशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें सोनेका विष्णु-चक्र बनवाकर दान करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है और एक कल्पके बीतनेपर भूतलपर राज्यका भागी होता है। यह 'कृष्णव्रत' है। |
| पायसाशी समान्ते तु दद्याद् विप्राय गोयुगम्।<br>लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्येतद् देवीव्रतं स्मृतम्॥ ५९ | जो खीरका भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें ब्राह्मणको दो गौ दान करता है, वह लक्ष्मीलोकको प्राप्त होता है। इसे 'देवीव्रत' कहा जाता है। |
| सप्तम्यां नक्तभुग् दद्यात् समान्ते गां पयस्विनीम्।<br>सूर्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६० | जो सप्तमी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिमें दुधारू गौका दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'भानुव्रत' कहलाता है। |
| चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम्।<br>व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्॥ ६१ | जो चतुर्थी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिके अवसरपर सोनेका हाथी दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। शिवलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'विनायकव्रत' है। |
| महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये।<br>हैमानि कार्तिके दद्याद् गोयुगेन समन्वितम्।<br>एतत् फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्॥ ६२ | जो चौमासेमें (बेल, जामुन, बेर, कैथ और बीजपुर नीबू) इन पाँच महाफलोंका परित्याग कर कार्तिकमासमें सोनेसे इन फलोंका निर्माण कराकर दो गौओंके साथ दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। विष्णुलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'फलव्रत' है। |
| यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>गाश्च वै शक्तितो दद्याद्धेमान्नघटसंयुताः।<br>एतत् सौरव्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम्॥ ६३ | जो सप्तमी तिथिको निराहार रहते हुए वर्षके अन्तमें अपनी शक्तिके अनुसार स्वर्णनिर्मित कमल तथा सुवर्ण, अन्न और घटसहित गौओंका दान करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। सूर्यलोकरूप फलका प्रदाता यह 'सौरव्रत' है॥ ५२—६३॥ |
| द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च।<br>गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः।<br>परमं पदमाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६४ | जो मनुष्य बारह द्वादशियोंको उपवास करके यथाशक्ति गौ, वस्त्र और सुवर्णसे ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'विष्णुव्रत' कहा जाता है। |
| कार्तिक्यां च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् ।<br>शैवं पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६५ | जो कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको वृषोत्सर्ग करके नक्तव्रतका पालन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'वार्षव्रत' कहलाता है। |
३५० | * मत्स्यपुराण *
| कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद् भोजनं शक्तितः पदम्।<br>विप्राणां शाङ्करं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्॥ ६६<br>चतुर्दश्यां तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः।<br>शैव पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्॥ ६७<br>समरात्रोषितो दद्याद् घृतकुम्भं द्विजातये।<br>घृतव्रतमिदं प्राहुर्ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ६८<br>आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम्।<br>शक्रलोके वसेन्नित्यमिन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६९<br>अनग्निपक्वमश्नाति तृतीयायां तु यो नरः।<br>गां दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इह चानन्दकृत् पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७०<br>हैमं पलद्वयादूर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्।<br>ददन् कृतोपवासः स्याद् दिवि कल्पशतं वसेत्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यादश्वव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७१<br>तद्वद्धेमरथं दद्यात् करिभ्यां संयुतं नरः।<br>सत्यलोके वसेत् कल्पं सहस्रमथ भूपतिः।<br>भवेदुपोषितो भूत्वा करिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७२<br>उपवासं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>यक्षाधिपत्यमाप्नोति सुखव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७३<br>निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत्।<br>वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते॥ ७४<br>चान्द्रायणं च यः कुर्याद्धेमचन्द्रं निवेदयेत्।<br>चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्॥ ७५<br>ज्येष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम्।<br>यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७६ | जो कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रतकी समाप्तिपर गोदान करके यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'प्राजापत्यव्रत' है। जो चतुर्दशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करता है और वर्ष समाप्त होनेपर गोधनका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'त्रैयम्बकव्रत' है। जो सात राततक उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। यह ब्रह्मलोकरूप फल प्रदान करनेवाला 'घृतव्रत' है। जो वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे (खुले मैदानमें) शयन करता हैं और व्रतान्तमें दुधारू गौका दान करता है, वह सदाके लिये इन्द्रलोकमें निवास करता है। इसे 'इन्द्रव्रत' कहा जाता हैं। जो मनुष्य तृतीया तिथिको बिना अग्निमें पकाया हुआ पदार्थ भोजन करता है और व्रतान्तमें गौ-दान देता है, वह पुनरागमनरहित शिवलोकको प्राप्त होता है। मनुष्योंको इस लोकमें आनन्द प्रदान करनेवाला यह 'श्रेयोव्रत' कहलाता है। जो निराहार रहकर दो पलसे अधिक सोनेसे दो घोड़ोंसे जुता हुआ रथ बनवाकर दान करता है, वह सौ कल्पोंतक स्वर्गलोकमें वास करता है और कल्पान्तमें भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'अश्वव्रत' कहते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य निराहार रहकर दो हाथियोंसे जुता हुआ सोनेका रथ दान करता है, वह एक हजार कल्पोंतक सत्यलोकमें निवास करता है और (पुण्य-क्षीण होनेपर भूतलपर) राजा होता है। यह 'करिव्रत' कहलाता है। इसी प्रकार जो मनुष्य वर्षके अन्तमें उपवासका परित्याग कर गोदान करता है, वह यक्षोंका अधीश्वर होता है। इसे 'सुखव्रत' कहा जाता है। जो रातभर जलमें निवास कर प्रातःकाल गोदान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त करता है। इसे 'वरुणव्रत' कहते हैं। जो मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान कर स्वर्णनिर्मित चन्द्रमाका दान करता है, वह चन्द्रलोकको जाता है। चन्द्रलोकरूप फलका प्रदाता यह 'चन्द्रव्रत' कहलाता है। जो ज्येष्ठमासकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथियोंमें पञ्चाग्नि तपकर सायंकाल स्वर्णनिर्मित गौका दान करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। यह 'रुद्रव्रत' नामसे विख्यात है॥ ६४—७६॥ |
| सकृद् वितानकं कुर्यात् तृतीयायां शिवालये।<br>समान्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते॥ ७७<br>माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत्।<br>दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात् पवनं व्रतम्॥ ७८ | जो तृतीया तिथिको शिवालयमें एक बार चंदोवा या चाँदनी लगा देता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह भवानीलोकको जाता है। इसे 'भवानीव्रत' कहते हैं। जो माघमासमें सप्तमी तिथिको रातभर गीला वस्त्र धारण किये रहता है और प्रातःकाल गौका दान करता है, वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास करके भूतलपर |