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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२५- कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना

* अध्याय २३ *९१
पितृभिर्देवगन्धर्वैरोषधीभिस्तथैव च।<br>तुष्टुवुः सोमदेवत्यैर्ब्रह्माद्यैर्मन्त्रसंग्रहैः॥ ११<br>स्तूयमानस्य तस्याभूदधिको धामसम्भवः।<br>तेजोवितानादभवद् भुवि दिव्यौषधीगणः॥ १२<br>तद्धीमिरधिका तस्माद् रात्रौ भवति सर्वदा।<br>तेनौषधीशः सोमोऽभूद् द्विजेशश्चापि गद्यते॥ १३<br>वेदधामरसं चापि यदिदं चन्द्रमण्डलम्।<br>क्षीयते वर्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा॥ १४<br>विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।<br>रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः॥ १५<br>ततः समाससहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।<br>तपश्चचार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः॥ १६<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान्स्तस्मै नारायणो हरिः।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच परमात्मा जनार्दनः॥ १७<br>ततो वव्रे वरान् सोमः शक्रलोकं जयाम्यहम्।<br>प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवन्तु मम मन्दिरे॥ १८<br>राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्याः सन्तु मे द्विजाः।<br>रक्षःपालः शिवोऽस्माकमास्तां शूलधरो हरः॥ १९<br>तथेत्युक्तः स आजहे राजसूयं तु विष्णुना।<br>होतात्रिर्भृगुरध्वर्युुरुद्गाताभूच्चतुर्मुखः ॥ २०<br>ब्रह्मत्वमगमत् तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।<br>सदस्याः सनकाद्यास्तु राजसूयविधौ स्मृताः॥ २१<br>चमसाध्वर्यवस्तत्र विश्वेदेवा दशैव तु।<br>त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादितम्॥ २२<br>ततः समाप्तेऽवभृथे तद्रूपालोकनेच्छवः।<br>कामबाणाभितप्ताङ्ग्यो नव देव्यः सिषेविरे॥ २३<br>लक्ष्मीनारायणं त्यक्त्वा सिनीवाली च कर्दमम्।<br>द्युतिर्विभावसुं तद्वत् तुष्टिर्धातारमव्ययम्॥ २४<br>प्रभा प्रभाकरं त्यक्त्वा हविष्मन्तं कुहूः स्वयम्।<br>कीर्तिर्जयन्तं भर्तारं वसुर्मरीचकश्यपम्॥ २५उसी समय पितर, ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व और ओषधियोंने ‘सोमदैवत्य’* नामक वैदिक मन्त्रसमूहोंसे उनकी स्तुति की। इस प्रकार स्तुति किये जानेपर चन्द्रमाका तेज और अधिक बढ़ गया। तब उस तेजसमूहसे भूतलपर दिव्य ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी कारण रात्रिमें उन ओषधियोंकी कान्ति सर्वदा अधिक हो जाती है। इसी हेतु चन्द्रमा ओषधीश कहलाये तथा उन्हें द्विजेश भी कहा जाता है। वेदोंके तेजरूप रससे उत्पन्न हुआ जो यह चन्द्रमण्डल है, वह सर्वदा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें क्षीण होता रहता है॥ २-१४॥<br><br>तदनन्तर प्रचेता-नन्दन दक्षने चन्द्रमाको अपनी सत्ताईस कन्याएँ—जो रूप-लावण्यसे सम्पन्न तथा परम तेजस्विनी थीं, पत्नीरूपमें प्रदान कीं। तब शीत किरणोंवाले चन्द्रमाने एकमात्र भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर होकर १० लाख वर्षोतक तपस्या की। उससे प्रभावित होकर भगवान् (ऐश्वर्यशाली) जनार्दन (दुष्टविनाशक), परमात्मा (परम आत्मबलसे सम्पन्न), नारायण (जलशायी) हैं, वे श्रीहरि चन्द्रमापर प्रसन्न हो गये और (उनके समक्ष प्रकट होकर) बोले—‘वर माँगो!’ इस प्रकार कहे जानेपर चन्द्रमाने वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं इन्द्रलोकको जीत लेना चाहता हूँ, जिससे देवतालोग प्रत्यक्षरूपसे मेरे भवनमें आकर अपना-अपना भाग ग्रहण करें। मेरे राजसूय-यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवगण ब्राह्मण हों तथा त्रिशूलधारी मङ्गलमय भगवान् शंकर हम सभीके दिव्य रक्षःपाल (राक्षसोंसे रक्षा करनेवाले या सभी प्रकारके रक्षक) रूपमें उपस्थित रहें।’ भगवान् विष्णुके ‘तथेति’—‘ऐसा ही हो’—यों कहकर स्वीकार कर लेनेपर चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें महर्षि अत्रि होता (ऋग्वेदके पाठक), भृगु अध्वर्यु (यजुर्वेदके पाठक) और चतुर्मुख ब्रह्मा उद्गाता (सामवेदके गायक) थे। स्वयं श्रीहरिने उस यज्ञका उपद्रष्टा होकर ब्रह्मा (अथर्ववेदका पाठक)-का पद ग्रहण किया। उस राजसूय-यज्ञमें सनक आदि सदस्य और दसों विश्वेदेव चमसाध्वर्यु (यज्ञमें सोमरस पीनेवाले) बने—ऐसा सुना जाता है। उस समय चन्द्रमाने ऋत्विजोंको तीनों लोक दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिये थे। तत्पश्चात् अवभृथस्नान (यज्ञान्तमें होनेवाला स्नान)-की समाप्तिपर (चन्द्रमाके रूपपर मुग्ध होकर) उसके सौन्दर्यका अवलोकन करनेकी इच्छासे युक्त सिनीवाली आदि नौ देवियाँ उनकी सेवामें उपस्थित हुई। लक्ष्मी नारायणको, सिनीवाली कर्दमको, द्युति विभावसुको, तुष्टि अविनाशी ब्रह्माको, प्रभा प्रभाकरको, कुहू स्वयं हविष्मान्‌को, कीर्ति जयन्तको, वसु मरीचिनन्दन कश्यपको

* ऋग्वेदके १। ९१ (मुख्यतम), ९। १-११४, १०। ८५ (जिसे विवाहसूक्त भी कहते हैं) आदि सूक्त सोमदैवत्य हैं।

९२ | मत्स्यपुराण |


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
धृतिस्त्यक्त्वा पतिं नन्दिं सोममेवाभजंस्तदा।<br>स्वकीया इव सोमोऽपि कामयामास तास्तदा॥ २६<br>एवं कृतापचारस्य तासां भर्तृगणस्तदा।<br>न शशाकापचाराय शापैः शस्त्रादिभिः पुनः॥ २७<br>तथाप्यराजत विधुर्दशधा भावयन् दिशः।<br>सोमः प्राप्याथ दुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसंस्कृतम्।<br>सप्तलोकैकनाथत्वमवाप तपसा तदा॥ २८और धृति अपने पति नन्दिको छोड़कर उस समय चन्द्रमाकी सेवामें नियुक्त हुई। चन्द्रमा उस समय दसों दिशाओंको उद्भासित करते हुए सुशोभित हो रहे थे तथा उन्होंने समस्त सृष्टिमें संस्कृत एवं दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्तकर सातों लोकोंका एकच्छत्र आधिपत्य प्राप्त किया'॥ १५–२८॥
कदाचिदुद्यानगतामपश्य-<br>दनेकपुष्पाभरणैश्च शोभिताम्।<br>बृहन्नितम्बस्तनभारखेदात्-<br>पुष्पस्य भङ्गेऽप्यतिदुर्बलाङ्गीम्॥ २९<br>भार्यां च तां देवगुरोरनङ्ग-<br>बाणाभिरामायतचारुनेत्राम् ।<br>तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः<br>केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ॥ ३०<br>सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे<br>तद्रूपकान्त्या हृतमानसेन।<br>चिरं विहृत्याथ जगाम तारां<br>विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोऽपि॥ ३१इसके कुछ दिन बाद चन्द्रमा एक बार कभी ताराको साथ लेकर अपने घर चले गये। बृहस्पतिके कहनेपर भी उन्होंने ताराको उन्हें समर्पित नहीं किया।
न तृप्तिरासीच्च गृहेऽपि तस्य<br>तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।<br>बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्ध-<br>स्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव॥ ३२<br>शशाक शापं न च दातुमस्मै<br>न मन्त्रशस्त्राग्निविशेषरौषैः।<br>तस्यापकर्तुं विविधैरुपायै-<br>र्नैवाभिचारैरपि वागधीशः॥ ३३तत्पश्चात् महेश्वर, ब्रह्मा, साध्यगण तथा लोकपालोंसहित मरुद्गणके समझानेपर भी जब चन्द्रमाने ताराको किसी प्रकार नहीं लौटाया, तब भगवान् शिव, जो भूतलपर
स याचयामास ततस्तु दैन्यात्<br>सोमं स्वभार्यार्थमनङ्गतप्तः।<br>स याच्यमानोऽपि ददौ न तारां<br>बृहस्पतेस्तत्सुखपाशबद्धः॥ ३४<br>महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेण<br>साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।<br>ददौ यदा तां न कथंचिदिन्दु-<br>स्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव॥ ३५वामदेव नामसे विख्यात हैं तथा अनेकों रुद्र जिनके चरणकमलोंकी अर्चना किया करते हैं, क्रुद्ध हो उठे।
यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्या-<br>मनेकरुद्रार्चितपादपद्मः ।<br>ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी<br>बृहस्पतिस्नेहवशानुबद्धः॥ ३६तदनन्तर त्रिपुरासुरके शत्रु एवं पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर बृहस्पतिके प्रति स्नेहके वशीभूत हो शिष्योंके
* अध्याय २३ *९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारि-<br>र्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।<br>युद्धाय सोमेन विशेषदीप्त-<br>स्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः॥ ३७॥साथ 'आजगव' नामक धनुष लेकर चन्द्रमाके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुए। उस समय उनका मुख विशेषरूपसे उद्दीप्त हुए तृतीय नेत्रकी अग्निसे बड़ा भयानक दीख रहा था॥ २९-३७॥
सहैव जगमुश्च गणेशकाद्या<br>विंशच्चतुःषष्टिगणास्त्रयुक्ताः।<br>यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकै-<br>र्युतोऽन्वगात् स्पन्दनसंस्थितानाम्॥ ३८॥उनके साथ भूतेश्वरों और सिद्धोंका समुदाय भी था तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित गणेश आदि चौरासी गण भी साथ ही रवाना हुए। उसी प्रकार यक्षराज कुबेरने भी अनेकों शतकोटि सेनाओंके साथ-साथ रथारूढ़ एक
वेतालरक्षोरगकिंनराणां<br>पद्मेन चैकेन तथार्बुदेन।<br>लक्षैस्त्रिभिर्द्वादशभी रथानां<br>सोमोऽप्यगात् तत्र विवृद्धमन्युः॥ ३९॥पद्म वेताल, एक अरब यक्ष, तीन लाख नाग और बारह लाख किन्नरोंको साथ लेकर शिवजीका अनुसरण किया। उधर चन्द्रमा भी क्रोधाविष्ट हो नक्षत्रों, दैत्यों
नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः<br>शनैश्चराङ्गारकवृद्धतेजाः।<br>जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका-<br>श्चचाल भूद्वीपसमुद्रगर्भा॥ ४०॥और असुरोंकी सेनाओंके साथ शनैश्चर और मंगलके सहयोगके कारण उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न हो रणभूमिमें आ डटे। उस समाहारको देखकर सातों लोक भयभीत हो उठे तथा द्वीपों एवं समुद्रोंसहित पृथ्वी काँपने लगी।
स सोममेवाभ्यगमत् पिनाकी<br>गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।<br>अथाभवद् भीषणभीमसेन-<br>सैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ॥ ४१॥शिवजीने प्रकाशमान एवं विशाल आग्नेयास्त्रको लेकर चन्द्रमापर आक्रमण किया। फिर तो दोनों सेनाओंमें अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे उस युद्धने
अशेषसत्त्वक्षयकृत्प्रवृद्ध-<br>स्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनेकरूपः।<br>शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं<br>द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः॥ ४२॥उग्ररूप धारण कर लिया। उसमें सम्पूर्ण जीवोंका संहार हो रहा था तथा अग्निके समान प्रज्वलित हथियार चमक रहे थे। इस प्रकार एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त तीखे शस्त्रोंके प्रहारसे दोनों सेनाएँ समग्ररूपसे नष्ट होने लगीं।
पतन्ति शस्त्राणि तथोज्ज्वलानि<br>स्वर्भूमिपातालमथो दहन्ति।<br>रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीर्षं मुमोच<br>सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम्॥ ४३॥उस समय ऐसे जाज्वल्यमान शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी, जो स्वर्गलोक, भूतल और पातालको भस्म कर डालते थे। यह देख रुद्रने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशीर्ष नामक अस्त्र चलाया, तब चन्द्रमाने भी अपने अचूक लक्ष्यवाले सोमास्त्रका प्रयोग किया।
तयोर्निपातेन समुद्रभूम्यो-<br>रथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत्।<br>तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय<br>प्रवृद्धमालोक्य पितामहोऽपि॥ ४४॥उन दोनों अस्त्रोंके टकरानेसे समुद्र, भूमि और अन्तरिक्ष आदि सभी भयसे काँप उठे। इस प्रकार उन दोनों अस्त्रोंको जगत्का विनाश करनेके लिये बढ़ता हुआ देखकर
अन्तःप्रविश्याथ कथं कथंचि-<br>न्निवारयामास सुरैः सहैव।<br>अकारणं किं क्षयकृज्जनानां<br>सोम त्वयापीत्थमकारि कार्यम्॥ ४५॥देवताओंके साथ ब्रह्माने उनके भीतर प्रवेश करके किसी-किसी प्रकारसे उनका निवारण किया (और कहा-) 'सोम! तुमने अकारण ही ऐसा कार्य क्यों किया, यह तो लोगोंका विनाशक है। सोम! चूँकि तुमने

९४ * मत्स्यपुराण *


| यस्मात् परस्त्रीहरणाय सोम<br>त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।<br>पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु<br>शान्तोऽप्यलं नूनमथो सितान्ते॥<br>भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं<br>न चावमानोऽस्ति परस्वहारे॥ ४६ | दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेके लिये इतना भयंकर युद्ध किया है, इसलिये शान्तस्वरूप होनेपर भी तुम शुक्लपक्षके अन्तमें अर्थात् कृष्णपक्षमें निश्चय ही जनतामें पापग्रहके रूपसे प्रसिद्ध होओगे। तुम बृहस्पतिकी इस भार्याको उन्हें समर्पित कर दो। दूसरेका धन लेकर उसे लौटा देनेमें अपमान नहीं होता'॥ ३८—४६॥ |
| सूत उवाच<br>तथेति चोवाच हिमांशुमाली<br>युद्धादपाक्रामदतः प्रशान्तः।<br>बृहस्पतिः स्वामपगृह्य तारां<br>हृष्टो जगाम स्वगृहं सरुद्रः॥ ४७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तब चन्द्रमाने 'तथेति—ऐसा ही हो' यों कहकर ब्रह्माकी आज्ञा स्वीकार कर ली और वे शान्त होकर युद्धसे हट गये। इधर बृहस्पति भी अपनी पत्नी ताराको ग्रहण करके शिवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चले गये॥ ४७॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशाख्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशाख्यानमें सोमापचार नामक तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३॥


चौबीसवाँ अध्याय

ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त

| सूत उवाच<br>ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।<br>दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥ १<br>तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।<br>सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥ २<br>नाम यद्राजपुत्रीयं विश्रुतं गजवैद्यकम्।<br>राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥ ३<br>जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।<br>ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥ ४<br>बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।<br>अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ। वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिमान् था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आदि विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्रीय' (या 'पालकाप्य'<sup>१</sup>)-नामसे विख्यात है, इसमें गज-चिकित्साका विशद वर्णन है।<sup>२</sup> सोम राजाका पुत्र होनेके कारण वह राजकुमार राजपुत्र तथा बुधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकर्म-संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियोंके साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण |


१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्लास १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६।२४-३० की तथा रघुवंश ५।५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।
२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।

* अध्याय २४ *९५
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।<br>पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६<br>सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्लाद् विधुः सुतम्।<br>बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७<br>अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः।<br>ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९<br>अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।<br>पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥ १०<br>हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।<br>लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥ ११<br>केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।<br>उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता॥ १२<br>सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।<br>धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥ १३<br>चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।<br>विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददार्धासनं तदा॥ १४कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥ १-१४॥
धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।<br>धर्मार्थकामाः संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५<br>जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।<br>भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥ १६<br>आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।<br>निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद् धर्मेऽधिकां पुनः॥ १७<br>जग्मतुस्तेन कामार्थावतिक्षोपं नृपं प्रति।<br>अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥ १८<br>कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।<br>कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥ १९<br>धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।<br>सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०<br>शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥ २१पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा—'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा—'राजेन्द्र! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा—'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे ॥ १५-२१ ॥
९६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।<br>कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२<br>सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।<br>केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३<br>तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।<br>बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना॥ २४<br>तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।<br>मित्रत्वमगमद् देवैर्दाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५<br>ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।<br>सर्वलोकातिशायित्वं बलमूर्जो यशः श्रियम्॥ २६<br>प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।<br>सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥ २७<br>लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।<br>मेनकामुर्वशीं रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८<br>ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।<br>सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥ २९<br>विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।<br>शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥ ३०<br>पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।<br>पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति॥ ३१राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशीको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा—तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा—'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा॥ २२—३१॥
ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।<br>शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२<br>अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।<br>आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुर्धृतिमान् वसुः॥ ३३<br>शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।<br>आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥ ३४<br>रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।<br>रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५<br>रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।<br>तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥ ३६तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे—आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर

* कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।