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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२१५- राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण

* अध्याय २१० *८४९

| यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्तयाशु<br>धर्मो न तेभ्योऽपि हि उच्यते च।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ १५<br><br>गुरुपूजारतिर्भर्ता त्वं च साध्वी पतिव्रता।<br>विनिवर्तस्व धर्मज्ञे ग्लानिर्भवति तेऽधुना॥ १६ | यमराजने कहा— तुम हमसे जिस कामनाको पूर्ण करानेके लिये आ रही हो उस कामनाको छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ। सचमुच संसारमें माता-पिता तथा गुरुकी सेवासे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। तुम्हारे इस प्रकार पीछे-पीछे आनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ रहा है और तुम भी थकावटसे चूर हो रही हो। इसलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ। धर्मज्ञे! तुम्हारा पति सचमुच गुरुजनोंकी पूजामें प्रेम करनेवाला है और तुम भी पतिव्रता साध्वी हो। इस समय तुम्हें कष्ट हो रहा है, अतः तुम लौट जाओ॥ १५-१६॥ |
| सावित्र्युवाच<br>पतिर्हि दैवतं स्त्रीणां पतिरेव परायणम्।<br>अनुगम्यः स्त्रिया साध्व्या पतिः प्राणधनेश्वरः॥ १७<br>मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।<br>अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥ १८<br>नीयते यत्र भर्ता मे स्वयं वा यत्र गच्छति।<br>मयापि तत्र गन्तव्यं यथाशक्ति सुरोत्तम॥ १९<br>पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा।<br>त्वां देव न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्॥ २०<br>मनस्विनी तु या काचिद्वैधव्याक्षरदूषिता।<br>मुहूर्तंमपि जीवेत मण्डनार्हा ह्यमण्डिता॥ २१ | सावित्री बोली— स्त्रियोंका पति ही देवता है, पति ही उसको शरण देनेवाला है, इसलिये साध्वी स्त्रियोंको प्राणपति प्रियतमका अनुगमन करना चाहिये। पिता, भाई तथा पुत्र परिमित सम्पत्ति देनेवाले हैं, किंतु पति अपरिमित सम्पत्तिका दाता है। भला, ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी। सुरोत्तम! आप मेरे पतिको जहाँ ले जा रहे हैं अथवा स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी यथाशक्ति जाना चाहिये। देव! मेरे प्राणपतिको ले जाते हुए आपके पीछे चलनेमें यदि मैं समर्थ न हो सकूँगी तो प्राणोंको त्याग दूँगी। जो कोई मनस्विनी स्त्री वैधव्य-धर्मसे दूषित होकर मुहूर्तभर जीवित रहती है तो वह सभी आभूषणोंसे अलंकृत होते हुए भी भाग्यहीन है॥ १७–२१॥ |
| यम उवाच<br>पतिव्रते महाभागे परितुष्टोऽस्मि ते शुभे।<br>विना सत्यवतः प्राणैर्वरं वरय मा चिरम्॥ २२ | यमने कहा— महाभाग्यशालिनी पतिव्रते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः शुभे! सत्यवान्‌के प्राणोंको छोड़कर कोई भी वरदान माँग लो, देर मत करो॥ २२॥ |
| सावित्र्युवाच<br>विनष्टचक्षुषो राज्यं चक्षुषा सह कारय।<br>च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ श्वशुरस्य महात्मनः॥ २३ | सावित्री बोली— धर्मज्ञ! जो राज्यसे च्युत हो गये हैं तथा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे मेरे महात्मा श्वशुरको राज्य और नेत्रसे संयुक्त कर दीजिये॥ २३॥ |
| यम उवाच<br>दूरे पथे गच्छ निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २४ | यमराजने कहा— भद्रे! तुम बहुत दूरतक चली आयी हो, अतः अब लौट जाओ। तुम्हारी यह सब अभिलाषा पूर्ण होगी। तुम्हारे मेरे पीछे चलनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ेगा और तुम्हें भी थकावट होगी, इसीलिये इस समय मैं तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने प्रथमवरलाभो नाम दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें प्रथम वरलाभ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१०॥

८५० * मत्स्यपुराण *


दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय

सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

सावित्र्युवाचसावित्रीने कहा—
कुतः क्लमः कुतो दुःखं सद्भिः सह समागमे।<br>सतां तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम॥ १देवश्रेष्ठ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है।
साधूनां वाप्यसाधूनां संत एव सदा गतिः।<br>नैवासतां नैव सतामसन्तो नैवमात्मनः॥ २चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सज्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हैं।
विषाग्निसर्पशस्त्रेभ्यो न तथा जायते भयम्।<br>अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा॥ ३विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगत्‌से वैर करनेवाले दुष्टोंसे होता है।
संतः प्राणानपि त्यक्त्वा परार्थं कुर्वते यथा।<br>तथासंतोऽपि संत्यज्य परपीडासु तत्पराः॥ ४जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं।
त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्।<br>परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः॥ ५जिस परलोककी प्राप्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते।
निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः।<br>असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्॥ ६स्वयं जगद्गुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है।
नरान् परीक्ष्येद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा।<br>निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः॥ ७राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है।
निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्।<br>एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना॥ ८सत्पुरुषोंको सम्मान देने तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है। स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिये।
राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते।<br>असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात्॥ ९जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है।
राजभिश्चाप्यशास्तानामसतां शासिता भवान्।<br>तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे॥ १०उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सके, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं।
जगत्तु धार्यते सद्भिः सतामग्र्यस्तथा भवान्।<br>तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ ११यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है॥ १—११॥

* अध्याय २९१ * ८५१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्॥ १२यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवान्‌के प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो॥ १२॥
सावित्र्युवाच<br>सहोदराणां भ्रातॄणां कामयामि शतं विभो।<br>अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे॥ १३सावित्रीने कहा— विभो! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ। मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों।
तामुवाच यमो गच्छ यथागतमनिन्दिते।<br>और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर॥ १४तब यमराजने सावित्रीसे कहा—‘अनिन्दिते! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वदैहिक क्रियाओंके लिये यत्न करो।
नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः।<br>पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्तं मम यास्यसि॥ १५अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अतः तुम इसके पीछे नहीं चल सकती। चूँकि तुम पतिव्रता हो, अतः दो घड़ीतक और मेरे साथ चल सकती हो।
गुरुशुश्रूषणाद् भद्रे तथा सत्यवता महत्।<br>पुण्यं समार्जितं येन नयाम्येनमहं स्वयम्॥ १६भद्रे! सत्यवान्‌ने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ।
एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता।<br>मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि॥ १७सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये।
तोषितं त्रयमेतच्च सदा सत्यवता वने।<br>पूजितं विजितः स्वर्गस्त्वयानेन चिरं शुभे॥ १८सत्यवान्‌ने वनमें इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है।
तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे।<br>पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा॥ १९शुभे! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं,
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः।<br>नाचैतेऽप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन तु विशेषतः॥ २०अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिये;
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।<br>माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः॥ २१क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्‍वीका और भाई अपना ही स्वरूप है।
जन्मना पितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।<br>न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ २२मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता।
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य तु सर्वदा।<br>तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥ २३अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिये; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं।
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।<br>न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ २४इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अतः उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये।
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः।<br>त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः॥ २५वे ही तीनों लोक हैं, वे ही तीनों आश्रम हैं, वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं।
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणातः स्मृतः।<br>गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं।
८५२* मत्स्यपुराण *

| त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते॥ २७<br><br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ | जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है। भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो गया, अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे द्वारा कही हुई वे सारी बातें पूर्ण होंगी। इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २३–२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें द्वितीय वरका लाभ नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २११॥


दो सौ बारहवाँ अध्याय

यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति

सावित्र्युवाचसावित्रीने कहा—
धर्मार्जने सुरश्रेष्ठ कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा।<br>त्वत्पादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम्॥ १<br><br>धर्मार्जनं तथा कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>तल्लाभः सर्वलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते॥ २<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम्।<br>धर्महीनस्य कामार्थौ वन्ध्यासुतसमौ प्रभौ॥ ३<br><br>धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा।<br>धर्म एकोऽनुयात्येनं यत्र क्वचनगामिनम्॥ ४<br><br>शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति।<br>एको हि जायते जन्तुरेक एव विपद्यते॥ ५<br><br>धर्मस्तमनुयात्येको न सुहृन्न च बान्धवाः।<br>क्रिया सौभाग्यलावण्यं सर्वं धर्मेण लभ्यते॥ ६<br><br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रशर्वेन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् ।<br>वस्वश्विधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः॥ ७<br><br>धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक।<br>मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च॥ ८<br><br>प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः।<br>नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानि यानि च॥ ९<br><br>तानि पुण्येन लक्ष्यन्ते नाकपृष्ठं तथा नरैः।<br>विमानानि विचित्राणि तथैवाप्सरसः शुभाः॥ १०देवश्रेष्ठ! धर्मोपार्जनके कार्यमें कैसी ग्लानि और कैसा कष्ट? आपके चरणमूलकी सेवा ही परम धर्मका कारण है। देव! ज्ञानी पुरुषको सर्वदा धर्मोपार्जन करना चाहिये; क्योंकि उसका लाभ सभी लाभोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। प्रभो! धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों एक साथ संसारमें जन्म लेनेके फल हैं; क्योंकि धर्महीन पुरुषके अर्थ और काम वन्ध्याके पुत्रकी भाँति निष्फल हैं। धर्मसे अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा धर्मसे ही दोनों लोक सिद्ध होते हैं। जहाँ-कहीं भी जानेवाले प्राणीके पीछे अकेले धर्म ही जाता है। अन्य सभी वस्तुएँ शरीरके साथ ही नष्ट हो जाती हैं। प्राणी अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। एक धर्म ही उसके पीछे-पीछे जाता है, मित्र एवं भाई-बन्धु कोई भी साथ नहीं देता। कार्योंमें सफलता, सौभाग्य और सौन्दर्य आदि सब कुछ धर्मसे ही प्राप्त होते हैं। पुरुषान्तक! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, शिव, चन्द्रमा, यम, सूर्य, अग्नि, वायु, वरुण, वसुगण, अश्विनीकुमार एवं कुबेर आदि देवताओंके जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले लोक हैं, उन सबको मनुष्य धर्मके द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य मनोहर द्वीपों एवं सुखदायी वर्षोंको धर्मके द्वारा ही प्राप्त करते हैं। देवताओंके जो नन्दनादि मुख्य उद्यान हैं, वे भी मनुष्योंको पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग, विचित्र विमान और सुन्दर अप्सराएँ पुण्यसे ही प्राप्त होती हैं॥ १–१०॥

* अध्याय २१२ *

श्लोकअर्थ
तेजसानि शरीराणि सदा पुण्यवतां फलम्।<br>राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्धिस्तथेप्सिता ॥ ११<br>संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते।पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि तथा मुख्य संस्कार—ये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं।
रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानि च ॥ १२<br>चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्।देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं।
पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना ॥ १३<br>धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा।पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है।
जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः ॥ १४<br>वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः।विजयकी सूचना देनेवाले शङ्ख-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है।
वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ १५<br>रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः।उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, मालाएँ, चन्दन, रत्न तथा बहुमूल्य वस्त्र—ये सब पुण्यकर्मोंके फल हैं।
रूपौदार्यगुणोपेताः स्त्रियश्चातिमनोहराः ॥ १६<br>वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्।सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त अतिशय मनोहर स्त्रियाँ और उच्च महलोंपर निवास शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं।
सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ १७<br>वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा।देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं।
हेमकक्षैश्च मातङ्गैश्चलत्पर्वतसंनिभैः ॥ १८<br>खेलद्भिः पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा।चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती है।
सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे ॥ १९<br>वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा।देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हैं।
तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ॥ २०<br>ब्रह्मचर्यं तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्।<br>स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् ॥ २१<br>गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २२उसकी प्राप्तिके उपाय हैं—यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोंकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रूषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य।
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् ॥ २३इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं।
बाल एव चरेद् धर्ममनित्यं देव जीवितम्।<br>को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति ॥ २४देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी।
पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्।<br>अमरस्येव चरितमत्याश्चर्यं सुरोत्तम ॥ २५सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है—यह महान् आश्चर्य है।
युवत्वापेक्षया बालो वृद्धत्वापेक्षया युवा।<br>मृत्योरुत्सङ्गमारूढः स्थविरः किमपेक्षते ॥ २६युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है।
८५४* मत्स्यपुराण *
तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गतिः।<br>न भयं मरणं चैव प्राणिनामभयं क्वचित्।<br>तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः॥ २७<br><br>यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणान् वरं वरय मा चिरम्॥ २८<br><br>सावित्र्युवाच<br>वरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम्।<br>अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते॥ २९<br><br>यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सफलं यथोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्यात्<br>तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ ३०इतनेपर भी जो मृत्युसे रक्षाके उपाय सोचते हैं, उनकी क्या गति होगी? प्राणधारियोंको इस जगत्में केवल मृत्युसे भय ही नहीं है, उनके लिये कहीं अभयस्थान भी नहीं है। तथापि पुण्यवान् सत्पुरुष सर्वदा निर्भय होकर संसारमें जीवित रहते हैं॥ १९–२७॥<br><br>यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारी इन धर्मयुक्त बातोंसे मैं विशेष संतुष्ट हूँ, अतः तुम सत्यवान्‌के प्राणोंके अतिरिक्त अन्य वर माँग लो, देर मत करो॥ २८॥<br><br>सावित्रीने कहा— देव! मैं आपसे अपनी कोखसे उत्पन्न होनेवाले सौ पुत्रोंका वरदान माँगती हूँ; क्योंकि लोकोंमें पुत्रहीनकी सद्गति नहीं होती॥ २९॥<br><br>यमराज बोले— भद्रे! अब तुम शेष अभीष्ट कामनाको छोड़कर लौट जाओ, तुम्हारी यह याचना भी सफल होगी। इस प्रकार तुम्हारे अनुगमनसे मेरे कार्योंमें विघ्न होगा और तुम्हें भी कष्ट होगा, इसीलिये मैं तुमसे इस समय ऐसा कह रहा हूँ॥ ३०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने तृतीयवरलाभो नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें तृतीय वर-लाभ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१२॥


दो सौ तेरहवाँ अध्याय

सावित्रीकी विजय और सत्यवान्‌की बन्धन-मुक्ति

सावित्र्युवाच<br>धर्माधर्मविधानज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक।<br>त्वमेव जगतो नाथः प्रजासंयमनो यमः॥ १<br>कर्मणामनुरूपेण यस्माद् यमयसे प्रजाः।<br>तस्माद् वै प्रोच्यसे देव यम इत्येव नामतः॥ २<br>धर्मेणेमाः प्रजाः सर्वा यस्माद् रञ्जयसे प्रभो।<br>तस्मात् ते धर्मराजेति नाम सद्भिर्निगद्यते॥ ३<br>सुकृतं दुष्कृतं चोभे पुरोधाय यदा जनाः।<br>त्वत्सकाशं मृता यान्ति तस्मात् त्वं मृत्युरुच्यते॥ ४<br>कालं कलार्धं कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि।<br>तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः॥ ५<br>सर्वेषामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान्।<br>तस्मात् त्वमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवैर्महाद्युते॥ ६सावित्रीने कहा— धर्म-अधर्मके विधानको जाननेवाले एवं सभी धर्मोंके प्रवर्तक देव! आप ही जगत्‌के स्वामी तथा प्रजाओंका नियमन करनेवाले यम हैं। देव! चूँकि आप कर्मोंके अनुरूप प्रजाओंका नियमन करते हैं, इसलिये 'यम' नामसे पुकारे जाते हैं। प्रभो! चूँकि आप धर्मपूर्वक इस सारी प्रजाको आनन्दित करते हैं, इसीलिये सत्पुरुष आपको धर्मराज नामसे पुकारते हैं। लोग मरनेपर अपने सत्-असत्—दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने आगे रखकर आपके समीप जाते हैं, इसलिये आप मृत्यु कहलाते हैं। आप सभी प्राणियोंके क्षण, कला आदिसे कालकी गणना करते रहते हैं, इसीलिये तत्त्वदर्शी लोग आपको 'काल' नामसे पुकारते हैं। महादीप्तिसम्पन्न! चूँकि आप संसारके सभी चराचर जीवोंके महान् अन्तकर्ता हैं, इसीलिये आप सभी देवताओंकेद्वारा 'अन्तक' कहे जाते हैं।
  • अध्याय २१३ *
    ८५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रथमं परिकीर्तितः।<br>तस्माद् वैवस्वतो नाम्ना सर्वलोकेषु कथ्यसे ॥ ७<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे गृह्णासि प्रसभं जनम्।<br>तदा त्वं कथ्यसे लोके सर्वप्राणहरेति वै ॥ ८<br>तव प्रसादाद् देवेश त्रयीधर्मो न नश्यति।<br>तव प्रसादाद् देवेश धर्मे तिष्ठन्ति जन्तवः।<br>तव प्रसादाद् देवेश संकरो न प्रजायते ॥ ९<br>सतां सदा गतिर्देव त्वमेव परिकीर्तितः।<br>जगतोऽस्य जगन्नाथ मर्यादापरिपालकः ॥ १०<br>पाहि मां त्रिदशश्रेष्ठ दुःखितां शरणागताम्।<br>पितरौ च तथैवास्य राजपुत्रस्य दुःखितौ ॥ ११आप विवस्वान्‌के प्रथम पुत्र कहे गये हैं, अतः सम्पूर्ण विश्वमें वैवस्वत नामसे कहे जाते हैं। आयुकर्मके क्षीण हो जानेपर आप लोगोंको हठात् पकड़ लेते हैं, इसी कारण लोकमें सर्वप्राणहर नामसे कहे जाते हैं। देवेश! आपकी कृपासे ऋक्, साम और यजुः—इन तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका विनाश नहीं होता। देवेश! आपकी महिमासे सभी प्राणी अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते हैं। देवेश! आपकी सत्कृपासे वर्णसंकर संततिकी उत्पत्ति नहीं होती। देव! आप ही सदा सत्पुरुषोंकी गति बतलाये गये हैं। जगन्नाथ! आप इस जगत्‌की मर्यादाका पालन करनेवाले हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ! अपनी शरणमें आयी हुई मुझ दुखियाकी रक्षा कीजिये। इस राजपुत्रके माता-पिता भी दुःखी हैं॥१—११॥
यम उवाच<br>स्तवेन भक्त्या धर्मज्ञे मया तुष्टेन सत्यवान्।<br>तव भर्त्ता विमुक्तोऽयं लब्धकामा व्रजाबले ॥ १२<br>राज्यं कृत्वा त्वया सार्धं वर्षाणां शतपञ्चकम्।<br>नाकपृष्ठमथारुह्य त्रिदशैः सह रंस्यते ॥ १३<br>त्वयि पुत्रशतं चापि सत्यवान् जनयिष्यति।<br>ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १४<br>मुख्यास्त्वन्नाम पुत्रस्ते भविष्यन्ति हि शाश्वताः।<br>पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥ १५<br>मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः।<br>भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १६<br>स्तोत्रेणानेन धर्मज्ञे कल्पमुत्थाय यस्तु माम्।<br>कीर्तयिष्यति तस्यापि दीर्घमायुर्भविष्यति ॥ १७यमराज बोले—धर्मज्ञे! तुम्हारी स्तुति तथा भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हारे पति इस सत्यवान्‌को विमुक्त कर दिया है। अबले! अब तुम सफलमनोरथ होकर लौट जाओ। यह सत्यवान् तुम्हारे साथ पाँच सौ वर्षोंतक राज्यसुख भोगकर अन्तकालमें स्वर्गलोकमें जायगा और देवताओंके साथ विहार करेगा। सत्यवान् तुम्हारे गर्भसे सौ पुत्रोंको भी उत्पन्न करेगा, वे सब-के-सब देवताओंके समान तेजस्वी तथा क्षत्रिय राजा होंगे। वे चिरकालतक जीवित रहते हुए तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होंगे। तुम्हारे पिताको भी तुम्हारी माताके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। वे तुम्हारे भाई मालवा (मध्यदेश)-में उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे और चिरकालतक जीवित रहते हुए पुत्र-पौत्रादिसे युक्त होंगे तथा देवताओंके समान ऐश्वर्यसम्पन्न एवं क्षत्रियोचित गुणोंका पालन करेंगे। धर्मज्ञे! जो कोई पुरुष प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन करेगा, उसकी भी आयु दीर्घ होगी ॥ १२—१७ ॥
मत्स्य उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् यमस्तु<br>प्रमुच्य तं राजसुतं महात्मा।<br>अदर्शनं तत्र यमो जगाम<br>कालेन सार्धं सह मृत्युना च ॥ १८मत्स्यभगवान्‌ने कहा—राजन्! इतनी बातें कहकर ऐश्वर्यशाली महात्मा यमराज उस राजपुत्र सत्यवान्‌को छोड़कर काल तथा मृत्युके साथ वहीं अदृश्य हो गये॥१८॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने यमस्तुतिसत्यवज्जीवितलाभो नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें यमस्तुति और सत्यवान्‌का जीवन-लाभ नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २१३ ॥