मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६२- प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध
| * अध्याय १६० * | ६६७ |
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| कुपितं तु यमालोक्य कालनेमिपुरोगमाः।<br>सर्वे दैत्येश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणम्॥ १३<br>स तैः प्रहारैरस्पृष्टो वृथाक्लेशो महाद्युतिः।<br>रणशौण्डास्तु दैत्येन्द्राः पुनः प्रासैः शिलीमुखैः॥ १४<br>कुमारं सामरं जघ्नुर्बलिनो देवकण्टकाः।<br>कुमारस्य व्यथा नाभूद् दैत्यास्त्रनिहतस्य तु॥ १५<br>प्राणान्तकरणो जातो देवानां दानवाहवः।<br>देवान्निपीडितान् दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत्॥ १६<br>ततोऽस्त्रैर्वारयामास दानवानामनीकिनीम्।<br>ततस्तन्निष्प्रतीकारैस्ताडिताः सुरकण्टकाः॥ १७<br>कालनेमिमुखाः सर्वे रणादासन् पराङ्मुखाः। | तदनन्तर रणमें भीषण कार्य करनेवाले उन कुमारको क्रुद्ध देखकर कालनेमि आदि सभी दैत्येश्वर उनपर प्रहार करने लगे, परंतु उन प्रहारोंका परम कान्तिमान् कुमारपर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। उनका शस्त्रास्त्र छोड़नेका श्रम व्यर्थ हो गया। पुनः युद्धनिपुण, देवकण्टक महाबली दैत्येन्द्र देवताओंसहित कुमारपर भाले और बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार दैत्यास्त्रोंद्वारा प्रहार करनेपर भी कुमारको कुछ भी पीड़ा न हुई। पर दानवोंका वह युद्ध जब देवताओंके लिये प्राणघातक-सा दीखने लगा, तब देवताओंको अत्यन्त पीड़ित देख कुमार क्रुद्ध हो उठे। फिर तो उन्होंने अपने अस्त्रोंके प्रहारसे दानवोंकी सेनाको खदेड़ दिया। उन अनिवार्य अस्त्रोंकी चोटसे कालनेमि आदि सभी देवकण्टक दानव घायल हो गये, तब वे युद्धसे विमुख हो भाग खड़े हुए॥९—१७ १/२॥ |
| विद्रुतेष्वथ दैत्येषु हतेषु च समंततः॥ १८<br>ततः क्रुद्धो महादैत्यस्तारकोऽसुरनायकः।<br>जग्राह च गदां दिव्यां हेमजालपरिष्कृताम्॥ १९<br>जघ्ने कुमारं गदया निष्प्रभकनकाङ्गदः।<br>शरैर्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखान् सुरान्॥ २०<br>तथा परैर्महाभल्लैर्मयूरं गुहवाहनम्।<br>विभेद तारकः क्रुद्धः स सैन्येऽसुरनायकः॥ २१<br>दृष्ट्वा पराङ्मुखान् देवान् मुक्तरक्तं स्ववाहनम्।<br>जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम्॥ २२<br>बाहुना हेमकेयूररुचिरेण षडाननः।<br>ततो जवान्महासेनस्तारकं दानवाधिपम्॥ २३<br>तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्बुद्धे जीवलोकं विलोकय।<br>हतोऽस्यद्य मया शक्त्या स्मर शस्त्रं सुशिक्षितम्॥ २४<br>इत्युक्त्वा च ततः शक्तिं मुमोच दितिजं प्रति।<br>सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा।<br>बिभेद दैत्यहृदयं वज्रशैलेन्द्रकर्कशम्॥ २५<br>गतासुः स पपातोर्व्यां प्रलये भूधरो यथा।<br>विकीर्णमुकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः॥ २६ | तदनन्तर चारों ओर दैत्योंके इस प्रकार मारे जाने एवं पलायन कर जानेपर असुरनायक महादैत्य तारक क्रोधमें भर गया। तब तपाये हुए स्वर्णके बने हुए बाजूबंदको धारण करनेवाले उस दैत्यने स्वर्णसमूहसे विभूषित अपनी दिव्य गदा हाथमें ली और उस गदासे कुमारपर प्रहार किया। फिर मोर-पंखसे सुशोभित बाणोंके आघातसे देवताओंको युद्ध-विमुख कर दिया। तदुपरान्त क्रोधसे भरे हुए असुरनायक तारकने उस सेनामें दूसरे भल्ल नामक विशाल बाणोंसे गुहके वाहन मयूरको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार रणभूमिमें देवताओंको युद्धविमुख और अपने वाहन मयूरको खून उगलते देखकर षडाननने वेगपूर्वक अपने स्वर्णनिर्मित केयूरसे विभूषित हाथमें स्वर्णजटित निर्मल शक्ति ग्रहण की। तत्पश्चात् देव-सेनानायक कुमार दानवेश्वर तारकको ललकारते हुए बोले—'सुदुर्बुद्धे! खड़ा रह, खड़ा रह और जीवलोककी ओर दृष्टिपात कर ले। अपने भलीभाँति सीखे हुए शस्त्रका स्मरण कर ले। अब तू मेरी शक्तिद्वारा मारा जा चुका।' ऐसा कहकर उन्होंने उस दैत्यपर अपनी शक्ति छोड़ दी। कुमारके हाथसे छूटी हुई उस शक्तिने उनके केयूरके शब्दका अनुगमन करती हुई आगे बढ़कर उस दैत्यके हृदयको, जो वज्र और पर्वतके समान अत्यन्त कठोर था, विदीर्ण कर दिया। फिर तो वह प्राणरहित हो भूतलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे प्रलयकालमें पर्वत धराशायी हो जाते हैं। उसकी पगड़ी और मुकुट छिन्न-भिन्न हो गये और सारे आभूषण पृथ्वीपर बिखर गये॥१८—२६॥ |
६६८ * मत्स्यपुराण *
| तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे।<br>नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्॥ २७<br>स्तुवन्तः षण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः।<br>जग्मुः स्वानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः ॥ २८<br>ददुश्चापि वरं सर्वे देवाः स्कन्दमुखं प्रति।<br>तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्धैस्तपोधनैः ॥ २९ | इस प्रकार उस दैत्यके मारे जानेपर देवताओंके उस महोत्सवके अवसरपर नरकोंमें भी कोई पापकर्मा प्राणी दुःखी नहीं था। परम तेजस्वी देवगण षडाननकी स्तुति करके अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित क्रीडा करते हुए उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने गृहोंको चले गये। सभी इच्छाओंकी पूर्ति हो जानेके कारण सभी देवता परम संतुष्ट थे। वे जाते समय तपोधन सिद्धोंके साथ स्कन्दको वर देते हुए बोले ॥ २७-२९॥ |
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| देवा ऊचुः<br>यः पठेत् स्कन्दसम्बद्धां कथां मर्त्यो महामतिः।<br>शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान्नरः ॥ ३०<br>बह्वायुः सुभगः श्रीमान् कान्तिमाञ्छुभदर्शनः।<br>भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः ॥ ३१<br>संध्यामुपास्य यः पूर्वा स्कन्दस्य चरितं पठेत्।<br>स मुक्तः किल्बिषैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत् ॥ ३२<br>बालानां व्याधिजुष्टानां राजद्वारं च सेवताम्।<br>इदं तत्परमं दिव्यं सर्वदा सर्वकामदम्।<br>तनुक्षये च सायुज्यं षण्मुखस्य व्रजेन्नरः॥ ३३ | देवताओंने कहा—जो महाबुद्धिमान् मरणधर्मा मनुष्य स्कन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, वह कीर्तिमान्, दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, कान्तिमान्, शुभदर्शन, सभी प्राणियोंसे निर्भय और सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जायगा। जो मनुष्य प्रातःकालिक संध्याकी उपासना करनेके बाद स्कन्दके चरित्रका पाठ करेगा वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर महान् धनराशिका स्वामी होगा। यह परम दिव्य स्कन्द-चरित बालकों, रोगियों और राजद्वारपर सेवा करनेवाले पुरुषोंके लिये सर्वदा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका पाठ करनेवाला मनुष्य शरीरान्त होनेपर षडाननकी सायुज्यताको प्राप्त हो जायगा ॥ ३०-३३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकवधो नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकवध नामक एक सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १६०॥
एक सौ एकसठवाँ अध्याय
हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
| ऋषय ऊचुः<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्।<br>नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अब हमलोग दानवराज हिरण्यकशिपुका वध तथा भगवान् नरसिंहके पापविनाशक माहात्म्यको सुनना चाहते हैं (आप उसे हमें सुनाइये) ॥ १॥ |
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| सूत उवाच<br>पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः ॥ २<br>दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च।<br>जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः ॥ ३ | सूतजी कहते हैं—विप्रवरो ! पूर्वकालमें कृतयुगमें दैत्योंके आदि पुरुष सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने महान् तप किया। उसने स्नान और मौनका व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षोंतक जलमें निवास किया। |
| * अध्याय १६१ * | ६६९ |
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| ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि।<br>ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च॥ ४<br>ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य तत्र ह।<br>विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता॥ ५<br>आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैस्तथा।<br>रुद्रैर्विश्वैस्सहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगैः॥ ६<br>दिग्भिश्चैव विदग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा।<br>नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः॥ ७<br>देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा।<br>राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ८<br>चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैर्दिवौकसैः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत्॥ ९<br>प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत।<br>वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि॥ १० | तब उसके मनःसंयम, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और नियमपालनसे ब्रह्मा प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् ब्रह्मा सूर्यके समान तेजस्वी एवं चमकीले विमानपर, जिसमें हंस जुते हुए थे, सवार होकर आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, यक्षों, राक्षसों, नागों, दिशाओं, विदिशाओं, नदियों, सागरों, नक्षत्रों, मुहूर्तों, आकाशचारी महान् ग्रहों, देवगणों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके गणोंके साथ वहाँ आये। तदुपरान्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—'सुव्रत! तुम-जैसे भक्तकी इस तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम यथेष्ट वर माँग लो और अपना मनोरथ सिद्ध करो'॥ २—१०॥ |
| हिरण्यकशिपुरुवाच | हिरण्यकशिपु बोला— |
| न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः।<br>न मानुषाः पिशाचा वा हन्युर्मां देवसत्तम॥ ११<br>ऋषयो वा न मां शापैः शपेयुः प्रपितामह।<br>यदि मे भगवान् प्रीतो वर एष वृतो मया॥ १२<br>न चास्त्रेण न शस्त्रेण गिरिणा पादपेन च।<br>न शुष्केण न चार्द्रेण न दिवा न निशाथ वा॥ १३<br>भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः।<br>सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश॥ १४<br>अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः।<br>धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः॥ १५ | देवसत्तम! देवता, असुर गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य अथवा पिशाच—ये कोई भी मुझे न मार सकें। प्रपितामह! ऋषिगण अपने शापोंद्वारा मुझे अभिशप्त न कर सकें। न अस्त्रसे, न शस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न शुष्क पदार्थसे, न गीले पदार्थसे, न दिनमें, न रातमें—अर्थात् कभी भी अथवा किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर और किम्पुरुषोंका अधीश्वर यक्ष हो जाऊँ। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही वर माँग रहा हूँ॥ ११—१५॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— |
| एते दिव्या परास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः।<br>सर्वान्कामान्सदा वत्स प्राप्स्यसे त्वं न संशयः॥ १६<br>एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाश एव हि।<br>वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम्॥ १७<br>ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह।<br>वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः॥ १८ | तात! मैंने तुम्हें इन दिव्य एवं अद्भुत वरदानोंको प्रदान कर दिया। वत्स! तुम सदा सभी मनोरथोंको प्राप्त करते रहोगे, इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित अपने वैराज नामक निवासस्थानको चले गये। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवता, नाग और गन्धर्व इस प्रकारके वरप्रदानकी बात सुनते ही पितामहके पास पहुँचे (और बोले) ॥ १६—१८॥ |