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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७४- देवताओंका युद्धार्थ अभियान

* अध्याय १७१ *७०५

| दत्ता भद्राय धर्माय ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा।<br>या तु रूपवती पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी॥ ३४<br>सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता।<br>ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः॥ ३५<br>लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तमः।<br>जज्ञिरे च सुतास्तस्यां विपुला धूमसन्निभाः॥ ३६<br>नक्तंसन्ध्याभ्रसङ्काशा प्रादहंस्तिग्मतेजसः।<br>ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्तः पितामहम्॥ ३७<br>रोदनाद् द्रवणाच्चैव रुद्रा इति ततः स्मृताः।<br>निर्ऋतिश्चैव शम्भुवैं तृतीयश्चापराजितः॥ ३८<br>मृगव्याधः कपर्दी च दहनोऽथेश्वरश्च वै।<br>अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापि पिङ्गलः॥ ३९<br>सेनानीश्च महातेजा रुद्रास्त्वेकादश स्मृताः।<br>तस्यामेव सुरभ्यां च गावो यज्ञेश्वराश्च वै॥ ४०<br>प्रकृष्टाश्च तथा मायाः सुरभ्याः पशवोऽक्षराः।<br>अजाश्चैव तु हंसाश्च तथैवामृतमुत्तमम्॥ ४१<br>ओषध्यः प्रवरायाश्च सुरभ्यास्ताः समुत्थिताः।<br>धर्माल्लक्ष्मीस्तथा कामं साध्या साध्यान् व्यजायत॥ ४२<br>भवं च प्रभवं चैव हीशं चासुरहं तथा।<br>अरुणं चारुणिं चैव विश्वावसुबलध्रुवान्॥ ४३<br>हविष्यं च वितानं च विधानशमितावपि।<br>वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम्॥ ४४<br>सुपर्वाणं बृहत्कान्तिः साध्या लोकनमस्कृता।<br>तमेवानुगता देवी जनयामास वै सुरान्॥ ४५<br>वरं वै प्रथमं दैवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम्।<br>विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम्॥ ४६<br>ततोऽनुरूपमायं च यमस्तस्मादनन्तरम्।<br>सप्तमं च तथा वायुमष्टमं निर्ऋतं वसुम्॥ ४७<br>धर्मस्यापत्यमेतद् वै सुदेव्यां समजायत।<br>विश्वे देवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः॥ ४८<br>दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्वन एव च।<br>चाक्षुषस्तु मनुश्चैव तथा मधुमहोरगौ॥ ४९<br>विश्रान्तकवपुर्बालो विष्कम्भश्च महायशाः।<br>गरुडश्चातिसत्त्वौजा भास्करप्रतिमद्युतिः॥ ५०<br>विश्वान् देवान् देवमाता विश्वेशाजनयत् सुतान्। | इसी बीच ब्रह्माकी स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एवं हितकारिणी सुन्दरी पत्नी सुरभिका रूप धारण कर ब्रह्माके निकट उपस्थित हुई। तब लोक-सृष्टिके कारणोंके ज्ञाता लोकपूजित देवश्रेष्ठ ब्रह्माने गौओंकी उत्पत्तिके निमित्त उसके साथ मानसिक समागम किया। उससे धूमकी-सी कान्तिवाले विशालकाय पुत्र उत्पन्न हुए। उनका वर्ण रात्रि और संध्याके संयोगकालमें छाये हुए बादलोंके समान था। वे अपने प्रचण्ड तेजसे सबको जला रहे थे और ब्रह्माकी निन्दा करते हुए रोते-से वे इधर-उधर दौड़ रहे थे। इस प्रकार रोने और दौड़नेके कारण वे 'रुद्र' कहे जाते हैं। निर्ऋति, शम्भु, तीसरे अपराजित, मृगव्याध, कपर्दी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, पिंगल और महातेजस्वी सेनानी—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं॥ २९-३९ १/२॥<br><br>तदनन्तर उसी श्रेष्ठ सुरभिसे यज्ञकी साधनभूता गौएँ, प्रकृष्ट माया, अविनाशी पशुगण, बकरियाँ, हंस, उत्तम अमृत और ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। धर्मके संयोगसे लक्ष्मीने कामको और साध्याने साध्यगणोंको जन्म दिया। भव, प्रभव, ईश, असुरहन्ता, अरुण, आरुणि, विश्वावसु, बल, ध्रुव, हविष्य, वितान, विधान, शमित, वत्सर, सम्पूर्ण असुरोंके विनाशक भूति और सुपर्वा—इन देवताओंको लोकनमस्कृता परम सुन्दरी साध्यादेवीने धर्मके संयोगसे जन्म दिया। इसी प्रकार प्रथम वर, दूसरे अविनाशी ध्रुव, तीसरे विश्वावसु, चौथे ऐश्वर्यशाली सोम, पाँचवें अनुरूपमाय, तदनन्तर छठे यम, सातवें वायु और आठवें वसु निर्ऋति—ये सभी धर्मके पुत्र सुदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। धर्मके संयोगसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है—ऐसा सुना जाता है। महाबाहु दक्ष, पुष्करस्वन, चाक्षुष मनु, मधु, महोरग, विश्रान्तकवपु, बाल, महायशस्वी विष्कम्भ और सूर्यकी-सी कान्तिवाले अत्यन्त पराक्रमी एवं तेजस्वी गरुड—इन विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वेशाने पुत्ररूपमें जन्म दिया॥ ४०—५० १/२॥ |

७०६ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत् सुतान्॥ ५१<br>अग्निं चक्षुं रविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च।<br>अमरं शरवृष्टिं च सुकर्षं च महाभुजम्॥ ५२<br>विराजं चैव वाचं च विश्वावसुमतिं तथा।<br>अश्वमित्रं चित्ररश्मिं तथा निषधनं नृप॥ ५३<br>ह्वन्तं वाडवं चैव चारित्रं मन्दपन्नगम्।<br>बृहन्तं वै बृहद्रूपं तथा वै पूतनानुगम्॥ ५४<br>मरुत्वती पुरा जज्ञे एतान् वै मरुतां गणान्।<br>अदितिः कश्यपाज्जज्ञ आदित्यान् द्वादशैव हि॥ ५५<br>इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणो हार्यमा रविः।<br>पूषा मित्रश्च धनदो धाता पर्जन्य एव च॥ ५६<br>इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः।<br>आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ॥ ५७<br>तपःश्रेष्ठौ गुणिश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यापि सम्मतौ।<br>दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत॥ ५८<br>काला तु वै कालकेयानसुरान् राक्षसांस्तु वै।<br>अनायुषायास्तनया व्याधयः सुमहाबलाः॥ ५९<br>सिंहिका ग्रहमाता वै गन्धर्वजननी मुनिः।<br>ताम्रा त्वप्सरसां माता पुण्यानां भारर्तोद्भव॥ ६०<br>क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचांश्चैव पार्थिव।<br>जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशाम्पते॥ ६१इसी प्रकार मरुत्वतीने मरुत् देवताओंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया। अग्नि, चक्षु, रवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाभुज सुकर्ष, विराज, वाच, विश्वावसु, मति, अश्वमित्र, चित्ररश्मि, निषधन, ह्वन्त, वाडव, चारित्र, मन्दपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा पूतनानुग—इन मरुद्गणोंको पूर्वकालमें मरुत्वतीने जन्म दिया था। अदितिने कश्यपके संयोगसे बारह आदित्योंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, धनद, धाता और पर्जन्य। ये बारह आदित्य देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ, गुणवानोंमें प्रधान और देवताओंके लिये भी पूजनीय कहे जाते हैं। दनुने दानवोंको और दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेय नामक असुरों और राक्षसोंको जन्म दिया। अत्यन्त बलवती व्याधियाँ अनायुषाकी संतान हैं। सिंहिका राहुग्रहकी माता है और मुनि गन्धर्वोंकी जननी कही जाती है। भरतकुलोत्पन्न राजन्! ताम्रा पवित्रात्मा अप्सराओंकी माता है। क्रोधासे सभी भूत और पिशाच पैदा हुए। विशाम्पते! क्रोधाने यक्षगणों और राक्षसोंको भी जन्म दिया था॥ ५१—६१॥
चतुष्पदानि सत्त्वानि तथा गावस्तु सौरभाः।<br>सुपर्णान् पक्षिणश्चैव विनता चाप्यजायत॥ ६२<br>महीधरान् सर्वनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत।<br>एवं वृद्धिं समगमन् विश्वे लोकाः परंतप॥ ६३<br>तदा वै पौष्करो राजन् प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>प्रादुर्भावो पौष्करस्ते मया द्वैपायनेरितः॥ ६४<br>पुराणः पुरुषश्चैव मया विष्णुर्हरिः प्रभुः।<br>कथितस्तेऽनुपूर्व्येण संस्तुतः परमर्षिभिः॥ ६५<br>यश्चेदमग्र्यं शृणुयात् पुराणं<br>सदा नरः पर्वसु गौरवेण।<br>अवाप्य लोकान् स हि वीतरागः<br>परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते॥ ६६<br>चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।<br>प्रसादयति यः कृष्णं तं कृष्णोऽनुप्रसीदति॥ ६७राजन्! सभी चौपाये जीव तथा गौएँ सुरभीकी संतान हैं। विनताने सुन्दर पंखधारी पक्षियोंको पैदा किया। कद्रूदेवीने पृथ्वीको धारण करनेवाले सभी प्रकारके नागोंको उत्पन्न किया। परंतप! इसी प्रकार विश्वमें लोकसृष्टि वृद्धिको प्राप्त हुई है। राजन्! यही महात्मा विष्णुका पुष्करसम्बन्धी प्रादुर्भाव है। व्यासद्वारा कहे गये इस पौष्कर प्रादुर्भावका तथा जो पुराणपुरुष, सर्वव्यापी और महर्षियोंद्वारा संस्तुत हैं, उन भगवान् श्रीहरिका वर्णन मैंने तुम्हें आनुपूर्वी सुना दिया। जो मनुष्य सदा पर्वोंके समय गौरवपूर्वक इस श्रेष्ठ पुराणको श्रवण करता है, वह वीतराग होकर लौकिक सुखोंका उपभोग करके परलोकमें स्वर्गफलोंका भोग करता है। जो मनुष्य श्रीकृष्णको नेत्र, मन, वचन और कर्म—इन चारों प्रकारोंसे प्रसन्न करता है तो श्रीकृष्ण भी उसे उसी प्रकार आनन्दित करते हैं।
* अध्याय १७२ *७०७

| राजा च लभते राज्यमधनश्चोत्तमं धनम्।<br>क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामः सुतं तथा॥ ६८<br>यज्ञा वेदास्तथा कामास्तपांसि विविधानि च।<br>प्राप्नोति विविधं पुण्यं विष्णुभक्तो धनानि च॥ ६९<br>यद्यत्कामयते किञ्चित् तत्तल्लोकेश्वराद् भवेत्।<br>सर्वं विहाय य इमं पठेत् पौष्करकं हरेः॥ ७०<br>प्रादुर्भावं नृपश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत्।<br>एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>कीर्तितस्ते महाभाग व्यासश्रुतिनिदर्शनात्॥ ७१ | राजाको राज्यकी, निर्धनको उत्तम धनकी, क्षीणायुको दीर्घायुकी तथा पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। विष्णुभक्त मनुष्य यज्ञ, वेद, कामनापूर्ति, अनेकविध तप, विविध पुण्य और धनको प्राप्त करता है। नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य सबका परित्याग करके श्रीहरिके इस पौष्कर-प्रादुर्भावका पाठ करता है, वह जो-जो कामनाएँ करता है, वह सब कुछ उस लोकेश्वरभगवान्‌से प्राप्त हो जाता है और उसका कभी अमङ्गल नहीं होता। महाभाग! इस प्रकार मैंने तुमसे महात्मा विष्णुके पुष्कर या कमलके प्रादुर्भावका वर्णन कर चुका। यह व्यासके वचनों तथा श्रुतियोंका निदर्शन है॥ ६२—७१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावो नामैकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ एकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७१॥


एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय

तारकामय-संग्रामकी भूमिका एवं भगवान् विष्णुका महासमुद्रके रूपमें वर्णन, तारकादि असुरोंके अत्याचारसे दुःखी होकर देवताओंकी भगवान् विष्णुसे प्रार्थना और भगवान्‌का उन्हें आश्वासन

| मत्स्य उवाच<br>विष्णुत्वं शृणु विष्णोश्च हरित्वं च कृते युगे।<br>वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च॥ १<br>ईश्वरस्य हि तस्यैषा कर्मणां गहना गतिः।<br>सम्प्रात्यतीतान् भव्यांश्च शृणु राजन् यथातथम्॥ २<br>अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः।<br>नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च॥ ३<br>एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः।<br>ब्रह्मा वायुश्च सोमश्च धर्मः शक्रो बृहस्पतिः॥ ४<br>अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन।<br>एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजो विभुः॥ ५<br>प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम्।<br>वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम्॥ ६<br>प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।<br>सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुराकल्पे प्रजापतीन्॥ ७ | मत्स्यभगवान्‌ने कहा— राजन्! अब मैं कृतयुगमें घटित हुए भगवान् विष्णुके विष्णुत्व एवं हरित्व, देवताओंमें वैकुण्ठत्व और मनुष्योंमें कृष्णत्वका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो। उस ईश्वरके कर्मोंकी यह गति बड़ी गहन है। इस समय तुम विष्णुके भूत एवं भावी अवतारोंके विषयमें यथार्थरूपसे श्रवण करो। जो ये ऐश्वर्यशाली अव्यक्तस्वरूप भगवान् हैं, वे ही व्यक्तरूपमें भी प्रकट होते हैं। वे ही नारायण अनन्तात्मा, सबके उत्पत्तिस्थान और अविनाशी भी कहे जाते हैं। ये सनातन नारायण श्रीहरि ब्रह्मा, वायु, सोम, धर्म, इन्द्र और वृहस्पति के रूपमें भी प्रकट होते हैं। रविनन्दन! ये सर्वव्यापी विष्णु अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रके अनुज 'उपेन्द्र' के नामसे विख्यात होते हैं। इन सर्वव्यापीका अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके दो कारण हैं—एक तो अदितिपर कृपा करना और दूसरा देवशत्रु दैत्यों, दानवों और राक्षसोंका वध करना। इन प्रधानात्मा प्रभुने सर्वप्रथम ब्रह्माको उत्पन्न किया। उन पूर्वपुरुषने पूर्व कल्पमें प्रजापतियोंकी सृष्टि की। |

७०८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
असृजन्मानवांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान्।<br>तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्॥ ८<br><br>एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम्।<br>कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ९तत्पश्चात् ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न होनेवाले सर्वश्रेष्ठ मानवोंको उत्पन्न किया। उन महात्माओंके सम्पर्कसे एक ही शाश्वत ब्रह्म अनेक रूपोंमें विभक्त हो गया। लोकोंमें वर्णन करनेयोग्य भगवान् विष्णुके कर्मोंका यह अनुकीर्तन परम आश्चर्यजनक है। मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो॥ १—९॥
वृत्ते वृत्रवधे तत्र वर्तमाने कृते युगे।<br>आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः॥ १०<br><br>यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्ज्जयाः।<br>घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान्॥ ११<br><br>ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे।<br>त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम्॥ १२<br><br>एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्चसः।<br>सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम्॥ १३<br><br>चण्डविद्युद्गणोपेता घोरनिर्ह्रादकारिणः।<br>अन्योन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः॥ १४<br><br>दीप्ततोयाशनिघनैर्वज्रवेगानलानिलैः।<br>रवैः सुघोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम्॥ १५<br><br>तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि।<br>दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ १६<br><br>चतुर्युगान्ते पर्याये लोकानां यद्भयं भवेत्।<br>अरूपवन्ति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे॥ १७<br><br>जातं च निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किञ्चन।<br>तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश॥ १८<br><br>विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता।<br>द्यौर्नभात्यभिभूतार्का घोरेण तमसावृता॥ १९राजन्! कृतयुगकी स्थितिके समय वृत्रासुरका वध हो जानेके पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात तारकामय संग्राम हुआ था। जिसमें संग्राममें कठिनतासे जीते जानेवाले सभी भयंकर दानव यक्ष, नाग और राक्षसोंसहित सभी देवगणोंका संहार कर रहे थे। इस प्रकार मारे जाते हुए वे देवगण शस्त्ररहित हो युद्धसे विमुख हो गये और मनसे अपने रक्षक सामर्थ्यशाली भगवान् नारायणकी शरणमें गये। इसी बीच बुझते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले मेघोंने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगणोंसमेत आकाशमण्डलको आच्छादित कर लिया। वे प्रचण्ड बिजलियोंसे युक्त थे तथा भयंकर गर्जना कर रहे थे। पुनः एक-दूसरेके वेगसे आहत हो सातों प्रकारकी वायु बहने लगी। उस समय कौंधती हुई बिजली और जलसे युक्त बादलों, वज्रके समान वेगशाली अग्नि और वायुके झकोरोंने तथा अत्यन्त भयंकर शब्दोंसे युक्त उत्पातोंद्वारा आकाश जलता हुआ-सा दीख रहा था। आकाशमें उड़ती हुई हजारों उल्काएँ भूतलपर गिरने लगीं। दिव्य विमान लड़खड़ाते हुए गिरने लगे। चारों युगोंकी समाप्तिके समय लोकोंके लिये जैसा भयकारी विनाश उपस्थित होता है, वैसा ही उत्पात उस समय भी घटित हुआ। सभी रूपवती वस्तुएँ विकृत हो गयीं। सारा जगत् प्रकाशहीन हो गया, जिससे कुछ भी जाना नहीं जा सकता था। घने अन्धकारसे ढकी हुई दसों दिशाएँ शोभाहीन हो गयीं। उस समय काले मेघोंके अवगुण्ठनसे युक्त काला रूप धारण करनेवाली देवी आकाशमें प्रविष्ट हुई। घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण सूर्यके छिप जानेसे आकाशमण्डलकी शोभा जाती रही॥ १०—१९॥
तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामाक्षिप्य स प्रभुः।<br>वपुः सन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः॥ २०<br><br>बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम्।<br>तेजसा वपुषा चैव कृष्णां कृष्णमिवाचलम्॥ २१<br><br>दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम्।<br>धूमान्धकारवपुषं युगान्ताग्निमिवोत्थितम्॥ २२उसी समय सामर्थ्यशाली भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे अन्धकारसहित घन-समूहोंको दूर हटाकर कृष्णवर्णका दिव्य शरीर प्रकट किया। उसकी कान्ति काले मेघ और कज्जलके समान थी, उसके रोएँ भी काले मेघ-जैसे थे, वह तेज और शरीर-दोनोंसे कज्जलगिरिकी भाँति कृष्ण था, उसपर उद्दीप्त पीताम्बर शोभा पा रहा था, वह तपाये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, धुएँके अन्धकारकी-सी कान्तिसे युक्त तथा