मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९- शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको सन्तुष्ट करना
| * अध्याय २६ * | १०५ |
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| शुक्र उवाच | |
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| यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-<br>न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः।<br>अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-<br>दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६२ | शुक्राचार्यने कहा— आजसे (इस जगत्का) जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इहलोक और परलोक—दोनोंमें निन्दित होगा। धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें ॥ ६२-६३ ॥ |
| मया चेमां विप्रधर्मोक्तसीमां<br>मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।<br>सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां<br>देवा दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६३ | |
| शौनक उवाच | |
| इतीदमुक्त्वा स महाप्रभाव-<br>स्ततो निधीनां निधिरप्रमेयः।<br>तान् दानवांश्चैव निगूढबुद्धी-<br>निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६४ | शौनकजी कहते हैं— ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने, दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था, उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा ॥ ६४ ॥ |
| शुक्र उवाच | |
| आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ<br>शिष्यः कचो वत्स्यति मत्समीपे।<br>संजीवनीं प्राप्य विद्यां मयायं<br>तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ६५ | शुक्राचार्यने कहा— 'दानवो! तुम सब (बड़े) मूर्ख हो। मैं तुम्हें बताये देता हूँ—(महात्मा) कच मुझसे संजीवनी-विद्या पाकर सिद्ध हो गया है। इसका प्रभाव मेरे ही समान है। यह ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप है ॥ ६५ ॥ |
| शौनक उवाच | |
| गुरोरुष्य सकाशे च दशवर्षशतानि सः।<br>अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ६६ | शौनकजी कहते हैं— कचने (इस प्रकार) एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब (गुरुसे) घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर उसने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ६६ ॥ |
॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय देवयानीने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥ |
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| समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा।<br>प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत् ॥ १ |
१०६ * मत्स्यपुराण *
| देवयान्युवाच<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च।<br>भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च॥ २<br>ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः।<br>तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः॥ ३<br>एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद् ब्रवीमि तपोधन।<br>व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि॥ ४<br>स समापितविद्यो मां भक्तां न त्यक्तुमर्हसि।<br>गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्॥ ५ | देवयानी बोली—महर्षि अङ्गिराके पौत्र! तुम सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हो। महायशस्वी महर्षि अङ्गिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ, उसपर विचार करो। तुम जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, (आशा है,) उसे तुम भूले नहीं होगे। अब तुम व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो; अतः वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण करो॥ २–५॥ |
| कच उवाच<br>पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव।<br>तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता॥ ६<br>आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः।<br>त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम॥ ७<br>यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव।<br>देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि॥ ८ | कचने कहा—निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे मेरी सदा पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ६–८॥ |
| देवयान्युवाच<br>गुरुपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः।<br>तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम॥ ९<br>असुरैर्हन्यमाने तु कच त्वयि पुनः पुनः।<br>तदाप्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्व मे॥ १०<br>सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्।<br>न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसाम्॥ ११ | देवयानी बोली—द्विजोत्तम! तुम मेरे गुरुके पुत्र हो, मेरे पिताके नहीं; (अतः मेरे भाई नहीं लगते, पर) मेरे पूजनीय और माननीय हो। कच! जब असुर तुम्हें बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक तुम्हारे प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे तुम्हीं स्मरण करो। तुम्हें मेरे सौहार्द और अनुराग तथा मेरी उत्तम भक्तिका परिचय मिल चुका है। तुम धर्मके ज्ञाता भी हो। मैं तुम्हारे प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। तुम्हें मेरा त्याग करना (कदापि) उचित नहीं है॥ ९–११॥ |
| कच उवाच<br>अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभव्रते।<br>प्रसीद सुभ्रु मह्यं त्वं गुरोर्गुरुतरा शुभे॥ १२<br>यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने।<br>तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि॥ १३<br>भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने।<br>सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम॥ १४ | कचने कहा—उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरि! तुम मुझे ऐसे कार्यमें प्रवृत्त कर रही हो, जो कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहन हो; अतः शुभानने! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणि! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है। |