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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
१८- एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि
Page 76Permalink
| ६६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उदपात्रं च कांस्यं च मेक्षणं च समित् कुशान्।<br>तिलाः पात्राणि सद्वासो गन्धधूपानुलेपनम्॥ २६<br><br>आहरेदपसव्यं तु सर्वे दक्षिणतः शनैः।<br>एवमासाद्य तत् सर्वं भवनस्याग्रतो भुवि॥ २७<br><br>गोमयेनोपलिप्तायां गोमूत्रेण तु मण्डलम्।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिस्तदभ्यर्च्य्यापसव्यवत्॥ २८<br><br>विप्राणां क्षालयेत् पादावभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>आसनेषूपक्लृप्तेषु दर्भवत्सु विधानवत्॥ २९<br><br>उपस्पृष्टोदकान् विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत्।<br>द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र च॥ ३० | इसी प्रकार अपसव्य होकर (जनेऊको बाँयें कंधेसे दाहिने कंधेपर रखकर) पीतलका जलपात्र, मेक्षण (प्रणीतापात्र), समिधा, कुश, तिल, अन्यान्य पात्र, शुद्ध नवीन वस्त्र, गन्ध, धूप, चन्दन आदिको लाकर सबको धीरेसे अपनी दाहिनी ओर रख ले। इस प्रकार सभी आवश्यक सामग्रियोंको एकत्र करके घरके दरवाजेपर गोबरसे लिपी हुई भूमिपर अपसव्य होकर गोमूत्रसे मण्डलकी रचना करे और पुष्पसहित अक्षतोंद्वारा उसकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् बारम्बार ब्राह्मणोंका अभिनन्दन करते हुए उनका पाद-प्रक्षालन करे। पुनः उन ब्राह्मणोंको कुशनिर्मित आसनोंपर बैठाकर विधिपूर्वक उन्हें आचमन या जलपान करावे। तदनन्तर उनसे श्राद्धके लिये सम्मति ले॥ १९—२९ १/२॥ |
| भोजयेदीश्वरोऽपीह न कुर्याद् विस्तारं बुधः।<br>दैवपूर्वं नियोज्याथ विप्रानर्घ्यादिना बुधः॥ ३१ | बुद्धिमान् पुरुषको देवकार्यमें दो एवं पितृकार्यमें तीन अथवा दोनों कार्योंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न होनेपर भी पार्वण श्राद्धमें विस्तार करना उचित नहीं है। पहले विश्वेदेवको अर्घ्य आदि समर्पित करके तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी अर्घ्य आदि द्वारा पूजा करे। |
| अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो विप्रैर्विप्रो यथाविधि।<br>स्वगृहोक्तविधानेन कांस्ये कृत्वा चरुं ततः॥ ३२ | पुनः श्राद्धकर्ता ब्राह्मणको चाहिये कि वह उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर चरुको काँसेके बर्तनमें रखकर अपने गृह्योक्तके विधानानुसार विधिपूर्वक अग्निमें हवन करे, |
| अग्नीषोमयमानां तु कुर्यादाप्यायनं बुधः।<br>दक्षिणाग्नौ प्रतीते वा य एकाग्निर्द्विजोत्तमः॥ ३३ | फिर बुद्धिमान् पुरुषको अग्नि, सोम और यमका तर्पण करना चाहिये। इस प्रकार एक अग्निका उपासक यज्ञोपवीतधारी श्रेष्ठ ब्राह्मण 'दक्षिण' नामक अग्निके प्रज्वलित हो जानेपर श्राद्धकर्म सम्पन्न करे। |
| यज्ञोपवीती निर्वर्त्य ततः पर्युक्षणादिकम्।<br>प्राचीनावीतिना कार्यमतः सर्वं विजानता॥ ३४ | तदनन्तर पर्युक्षण आदिसे निवृत्त होकर उपर्युक्त सारी विधियोंको समझ ले और प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर सारा कार्य सम्पन्न करे। |
| षट् च तस्माद्धविःशेषात् पिण्डान् कृत्वा ततोदकम्।<br>दद्यादुदकपात्रैस्तु सतिलं सव्यपाणिना॥ ३५ | फिर उस बचे हुए हविसे छः पिण्ड बनाकर उनपर बायें हाथसे अपने जलपात्रद्वारा तिलसहित जल गिराये |
| जान्वाच्य सव्यं यत्नेन दर्भयुक्तो विमत्सरः।<br>विधाय लेखां यत्नेन निर्वापेष्क्ववनेजनम्॥ ३६ | और ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर हाथमें कुश लेकर बायाँ घुटना मोड़कर प्रयत्नपूर्वक (वेदीपर) रेखा बनाये (एवं रेखाओंपर कुश बिछाये।) तथा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके पिण्ड रखनेके लिये बिछाये गये कुशोंपर अवनेजन (श्राद्ध-वेदीपर बिछे हुए कुशोंपर जल सींचनेका संस्कार) करे। |
| दक्षिणाभिमुखः कुर्यात् करे दर्वीं निधाय वै।<br>निधाय पिण्डमेकैकं सर्वदर्भेष्वनुक्रमात्॥ ३७ | फिर हाथमें करछुल लेकर |
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* अध्याय १६ * <div align="right">६७</div>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निनयेदथ दर्भेषु नामगोत्रानुकीर्तनैः।<br>तेषु दर्भेषु तं हस्तं विमृज्याल्लेपभागिनाम्॥ ३८<br><br>तथैव च ततः कुर्यात् पुनः प्रत्यवनेजनम्।<br>षड्भ्यस्तॄन् नमस्कृत्य गन्धधूपार्हणादिभिः॥ ३९<br><br>एवमावाह्य तत् सर्वं वेदमन्त्रैर्यथोदितैः।<br>एकाग्नेरेक एव स्यान्निर्वापो दर्विका तथा॥ ४०<br><br>ततः कृतान्तरे दद्यात् पत्नीभ्योऽन्नं कुशेषु सः।<br>तद्वत् पिण्डादिके कुर्यादावाहनविसर्जनम्॥ ४१<br><br>ततो गृहीत्वा पिण्डेभ्यो मात्राः सर्वाः क्रमेण तु।<br>तानेव विप्रान् प्रथमं प्राशयेद् यत्नतो नरः॥ ४२ | तथा क्रमशः एक-एक पिण्ड उठाकर पितरोंके गोत्र एवं नामोंका उच्चारण करके उन सभी बिछाये गये कुशोंपर एक-एक करके रख दे और लेपभागी पितरोंकी तृप्तिके लिये उन कुशोंके मूलभागमें अपने उस हाथको पोंछ दे। तत्पश्चात् पुनः पूर्ववत् उन पिण्डोंपर प्रत्यवनेजन जल छोड़े। तदुपरान्त गन्ध, धूप आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा उन छहों पितरोंका पूजन करके उन्हें नमस्कार करे और फिर यथोक्त वेद-मन्त्रोंद्वारा उनका आवाहन करे। एकाग्निक ब्राह्मणके लिये एक ही निर्वाप और एक ही करछुलका विधान है। यह सब सम्पन्न कर लेनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता कुशोंपर पितरोंकी पत्नियोंके लिये अन्न प्रदान करे और पिण्डोंपर आवाहन एवं विसर्जन आदि क्रिया पूर्ववत् करे। तत्पश्चात् श्राद्धकर्ता उन सभी पिण्डोंमेंसे थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर उन्हें सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंको खिलावे॥ ३०—४२॥ |
| यस्मादन्नाद्धृता मात्रा भक्षयन्ति द्विजातयः।<br>अन्वाहार्यकमित्युक्तं तस्मात् तच्चन्द्रसंक्षये॥ ४३<br><br>पूर्वं दत्त्वा तु तद्धस्ते सपवित्रं तिलोदकम्।<br>तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन्॥ ४४<br><br>वर्णयन् भोजयेदन्नं मिष्टं पूतं च सर्वदा।<br>वर्जयेत् क्रोधपरतां स्मरन् नारायणं हरिम्॥ ४५ | चूँकि पिण्डान्नसे निकाले गये अंशको अमावास्याके दिन ब्राह्मणलोग खाते हैं, इसीलिये इस श्राद्धको 'अन्वाहार्यक' कहा जाता है। श्राद्धकर्ता पहले पवित्रकसहित तिल और जलको उस ब्राह्मणके हाथमें देकर तत्पश्चात् पिण्डांशको समर्पित करे और 'यह हमारे पितरोंके लिये स्वधा हो' यों कहते हुए भोजन कराये। उस ब्राह्मणको चाहिये कि वह क्रोधका परित्याग करके भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए 'यह बहुत मीठा है', 'यह परम पवित्र है'—यों कहते हुए भोजन करे। |
| तृप्ता ज्ञात्वा ततः कुर्याद् विकिरन् सार्ववर्णिकम्।<br>सोदकं चान्नमुद्धृत्य सलिलं प्रक्षिपेद् भुवि॥ ४६<br><br>आचान्तेषु पुनर्दद्याज्जलपुष्पाक्षतोदकम्।<br>स्वस्तिवाचनकं सर्वं पिण्डोपरि समाहरेत्॥ ४७<br><br>देवायत्तं प्रकुर्वीत श्राद्धनाशोऽन्यथा भवेत्।<br>विसृज्य ब्राह्मणांस्तद्वत् तेषां कृत्वा प्रदक्षिणम्॥ ४८ | उन ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर तत्पश्चात् सभी वर्णोंके लिये विकिराकी क्रिया करनी चाहिये। उस समय जलसहित अन्न लेकर पृथ्वीपर जल गिरा दे। पुनः उन ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर जल, पुष्प, अक्षत आदि सभी सामग्री स्वस्तिवाचनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर डाल दे। फिर इस श्राद्धफलको भगवान्को अर्पित कर दे, अन्यथा श्राद्ध नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार उन ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे। |
| दक्षिणां दिशमाकाङ्क्षन् पितॄन् याचेत मानवः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥ ४९<br><br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।<br>अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि॥ ५० | उस समय श्राद्धकर्ता दक्षिण दिशाकी ओर मुखकरके पितरोंसे अभिलाषापूर्तिके निमित्त याचना करते हुए यों कहे—'पितृगण! हमारे दाताओं, वेदों (वेदज्ञान) और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास प्रचुर सम्पत्ति हो, हमारे अधिक-से-अधिक अन्न उत्पन्न हों, हमारे घरपर अतिथियोंका जमघट लगा रहे। |