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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 994 of 1098

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Page 994

९८४ * मत्स्यपुराण *


श्लोकहिन्दी अर्थ
न भस्माङ्गारकाष्ठेन नखशस्त्रेण चर्मभिः।<br>न शृङ्गास्थिकपालैश्च क्वचिद् वास्तु विलेखयेत्॥ १४<br><br>एभिर्विलिखितं कुर्याद्दुःखशोकभयादिकम्।<br>यदा गृहप्रवेशः स्याच्छिल्पी तत्रापि लक्षयेत्॥ १५<br><br>स्तम्भसूत्रादिकं तद्वच्छुभाशुभफलप्रदम्।<br>आदित्याभिमुखं रौति शकुनिः परुषं यदि॥ १६<br><br>तुल्यकालं स्पृशेदङ्गं गृहभर्तुर्यदात्मनः।<br>वास्त्वङ्गे तद् विजानीयान्नरशल्यं भयप्रदम्॥ १७<br><br>अङ्कनानन्तरं यत्र हस्त्यश्वश्वापदं भवेत्।<br>तदङ्गसम्भवं विन्द्यात् तत्र शल्यं विचक्षणः॥ १८<br><br>प्रसार्यमाणे सूत्रे तु श्वा गोमायुर्विलङ्घते।<br>तत्तु शल्यं विजानीयात् खरशब्देऽतिभैरवे॥ १९<br><br>यदीशाने तु दिग्भागे मधुरं रौति वायसः।<br>धनं तत्र विजानीयाद् भागे वा स्वाम्यधिष्ठिते॥ २०<br><br>सूत्रच्छेदे भवेन्मृत्युर्व्याधिः कीले त्वधोमुखे।<br>अङ्गारेषु तथोन्मादं कपालेषु च सम्भ्रमम्॥ २१<br><br>कम्बुशल्येषु जानीयात्पौँश्चल्यं स्त्रीषु वास्तुवित्।<br>गृहभर्तुर्गृहस्यापि विनाशः शिल्पिसम्भ्रमे॥ २२<br><br>स्तम्भे स्कन्धच्युते कुम्भे शिरोरोगं विनिर्दिशेत्।<br>कुम्भापहारे सर्वस्य कुलस्यापि क्षयो भवेत्॥ २३<br><br>मृत्युः स्थानच्युते कुम्भे भग्ने बन्धं विदुर्बुधाः।<br>करसंख्याविनाशे तु नाशं गृहपतेर्विदुः॥ २४<br><br>बीजौषधिविहीने तु भूतेभ्यो भयमादिशेत्।<br>ततः प्रदक्षिणेनान्यान्यसेत् स्तम्भान् विचक्षणः॥ २५<br><br>यस्माद् भयंकरा नृणां योजिता ह्यप्रदक्षिणम्।राख, अंगार, काष्ठ, नख, शास्त्र, चर्म, सींग, हड्डी, कपाल—इन वस्तुओंद्वारा कहीं भी वास्तुके चिह्न नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि इनके द्वारा बनाया गया चिह्न दुःख, शोक और भय आदि उत्पन्न करता है। जिस समय गृहप्रवेश हो, उस समय कारीगरका भी रहना उचित है। स्तम्भारोपण और सूत्रपातके समय पूर्ववत् शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले शुक होते हैं। यदि ऐसे अवसरोंपर कोई पक्षी सूर्यकी ओर मुख कर कठोर वाणी बोलता है या उस समय गृहपति अपने शरीरके किसी अङ्गपर हाथ रखता है तो समझ लेना चाहिये कि वास्तुके उसीपर भय प्रदान करनेवाली मनुष्यकी हड्डी पड़ी हुई है। सूत्र अङ्कित कर देनेके बाद यदि गृहपति अपने किसी अङ्गका स्पर्श करता है तो वास्तुके उसी अङ्गमें हाथी, अश्व तथा कुत्तेकी हड्डियाँ हैं, ऐसा बुद्धिमान् पुरुषको समझ लेना चाहिये। सूत्रको फैलाते समय उसे शृगाल या कुत्ता लाँघ जाता है और गदहा अत्यन्त भयंकर चीत्कार करता है तो ठीक उस स्थानपर हड्डी जाननी चाहिये। यदि सूत्रपातके समय ईशान कोणमें कौआ मीठे स्वरसे बोलता हो तो वास्तुके उस भागमें या जहाँ गृहपति खड़ा है, वहाँ धन है—ऐसा जानना चाहिये। सूत्रपातके समय यदि सूत्र टूट जाता है तो गृहपतिकी मृत्यु होती है। वास्तुवेत्ताको ऐसा समझना चाहिये कि कीलके नीचेकी ओर झुक जानेपर व्याधि, अंगार दिखायी पड़नेपर उन्माद, कपाल दीख पड़नेपर भय और शङ्ख या घोंघेकी हड्डी मिलनेपर कुलाङ्गनाओंमें व्यभिचारकी सम्भावना रहती है। भवन-निर्माणके समय कारीगरके पागल हो जानेपर गृहपति और घरका विनाश हो जाता है। स्थापित किये हुए स्तम्भ या कुम्भके कंधेपर गिर जानेसे गृहपतिके सिरमें रोग होता है तथा कलशकी चोरी हो जानेपर समूचे कुलका विनाश हो जाता है। कुम्भके अपने स्थानसे च्युत हो जानेपर गृहस्वामीकी मृत्यु होती है तथा फूट जानेपर वह बन्धनमें पड़ता है—ऐसा पण्डितोंने कहा है। गृहारम्भके समय हाथोंकी परिमाण-संख्या नष्ट हो जानेपर गृहपतिका नाश समझना चाहिये। बीज और ओषधियोंसे विहीन होनेपर भूतोंसे भय होता है। अतः विचारवान् पुरुष प्रदक्षिण-क्रमसे अन्य स्तम्भोंकी स्थापना करे; क्योंकि प्रदक्षिणक्रमके बिना स्थापित किये गये स्तम्भ मनुष्योंके लिये भयदायक होते हैं॥ १४–२५१/२॥