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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१०८- प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व
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| * अध्याय १०५ * | ३५९ |
|---|
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव च।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १<br>आर्त्तानां हि दरिद्राणां निश्चितव्यवसायिनाम्।<br>स्थानमुक्तं प्रयागं तु नाख्येयं तु कदाचन॥ २<br>व्याधितो यदि वा दीनो वृद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ ३<br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैः सूर्यवर्चसैः।<br>गन्धर्वाप्सरसां मध्ये स्वर्गे मोदति मानवः।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ४<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणैः॥ ५<br>गीतवाद्यविनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ६<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले।<br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति॥ ७<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशस्थोऽथवा गृहे।<br>प्रयागं स्मरमाणोऽपि यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ८ | **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! पुनः प्रयागके माहात्म्यका ही वर्णन सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। दुःखियों, दरिद्रों और निश्चित व्यवसाय करनेवालोंके कल्याणके लिये प्रयागक्षेत्र ही प्रशस्त कहा गया है। इसे कभी (कहीं) प्रकट नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ ऋषियोंका कथन है कि जो मनुष्य रोगग्रस्त, दीन अथवा वृद्ध होकर गङ्गा और यमुनाके संगममें प्राणोंका त्याग करता है, वह तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले एवं सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा स्वर्गमें जाकर गन्धर्वों और अप्सराओंके मध्यमें आनन्दका उपभोग करता है और अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित, अनेकों रंगोंकी ध्वजाओंसे मण्डित, अप्सराओंसे खचाखच भरे हुए शुभ लक्षणसम्पन्न दिव्य विमानोंमें बैठकर आनन्द मनाता है तथा माङ्गलिक गीतों और बाजोंके शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार जबतक वह अपने जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है। इस प्रकार स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ वह जीव सुवर्ण-रत्नसे परिपूर्ण एवं समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है और समयानुसार पुनः उसी तीर्थका स्मरण करता है तथा स्मरण आनेसे पुनः उस प्रयागक्षेत्रकी यात्रा करता है। ऋषिवरोंका कथन है कि मनुष्य चाहे देशमें हो अथवा विदेशमें, घरमें हो अथवा वनमें, यदि वह प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्यग करता है तो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ १-८॥ |
| सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ९<br>स्त्रीसहस्रावृते रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते ऋषिभिः सार्धं सुकृतेनेह कर्मणा॥ १०<br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ११ | वह ऐसे लोकमें जाता है, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है, जहाँके वृक्ष इच्छानुसार फल देनेवाले हैं और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धलोग निवास करते हैं। वहाँ वह अपने इस जन्ममें किये हुए पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सहस्रों स्त्रियोंसे युक्त, मङ्गलमय एवं रमणीय मन्दाकिनीके तटपर ऋषियोंके साथ सुख भोगता है। स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ सिद्ध, चारण और गन्धर्व उसकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् (पुण्य क्षीण होनेपर) वह स्वर्गसे च्युत होकर |
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३६० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः॥ १२<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु गां सम्प्रयच्छति।<br>स गोरोमसमाब्दानि लभते स्वर्गमुत्तमम्॥ १३<br>स्वकार्ये पितृकार्ये वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>यस्तु गां प्रतिगृह्णाति गङ्गायमुनसङ्गमे॥ १४<br>सुवर्णमणिमुक्ताश्च यदि वान्यत् परिग्रहम्।<br>विफलं तस्य तत्तीर्थं यावत् तद्धनमश्नुते॥ १५<br>एवं तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्व्यायनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु ह्यप्रमत्तो भवेद् द्विजः॥ १६ | भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है। इस जन्ममें उसे बारंबार अपने शुभकर्मोंका स्मरण होता है, जिससे वह निस्संदेह गुणवान् और धनसम्पन्न होता है तथा वह मनुष्य मन-वचन-कर्मसे सत्यधर्ममें स्थित रहता है। जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके संगमपर कार्योंमें अपने मङ्गलके निमित्त या पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले अथवा देवपूजन आदि कार्योंमें गोदान करता है, वह उस गौके रोमतुल्य वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि कोई वहाँ गोदान लेता है या स्वर्ण, मणि, मोती अथवा अन्य जो कुछ सामग्री दानरूपमें ग्रहण करता है, तो जबतक वह धन उसके पास रहता है, तबतक उसका वह तीर्थ विफल होता है। इस प्रकार (तीर्थयात्रीको) तीर्थमें, पुण्यमय देव-मन्दिरोंमें तथा सभी निमित्तों (दानपर्वों)-में दान लेना कदापि उचित नहीं है। इसके लिये ब्राह्मणको विशेषरूपसे सावधान रहना चाहिये॥ ९-१६॥ |
| कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां कांस्यदोहां पयस्विनीम्॥ १७<br>प्रयागे श्रोत्रियं सन्तं ग्राहयित्वा यथाविधि।<br>शुक्लाम्बरधरं शान्तं धर्मज्ञं वेदपारगम्॥ १८<br>सा गौस्तस्मै प्रदातव्या गङ्गायमुनसङ्गमे।<br>वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥ १९<br>यावद् रोमाणि तस्या गोः सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ २०<br>यत्रासौ लभते जन्म सा गौस्तस्याभिजायते।<br>न च पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ २१<br>गवां शतसहस्रेभ्यो दद्यादेकां पयस्विनीम्।<br>पुत्रान् दारांस्तथा भृत्यान् गौरैका प्रति तारयेत्॥ २२<br>तस्मात् सर्वेषु दानेषु गोदानं तु विशिष्यते।<br>दुर्गमे विषमे घोरे महापातकसम्भवे।<br>गौरैव कुरुते रक्षां तस्माद् देया द्विजोत्तमे॥ २३ | जो मनुष्य प्रयागमें जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए हों, निकटमें काँसेकी दोहनी भी रखी हो, ऐसी लाल रंगकी दुधारू कपिला* गौका दान करना चाहता हो तो उसे वह गौ गङ्गा-यमुनाके संगमपर विधिपूर्वक ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जो श्रोत्रिय, साधुस्वभाव, श्वेत वस्त्र धारण करनेवाला, शान्त, धर्मज्ञ और वेदोंका पारगामी विद्वान् हो। उसके साथ बहुमूल्य वस्त्र और अनेकों प्रकारके रत्न भी दान करने चाहिये। राजसत्तम! ऐसा करनेसे उस गौके अङ्गोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् जहाँ वह जन्म लेता है, वहीं वह गौ भी उसके घर उत्पन्न होती है। उस पुण्यकर्मके प्रभावसे उसे नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु-प्रदेशको पाकर अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। लाखों गौओंकी अपेक्षा एक ही दुधारू गौका दान प्रशस्त माना गया है; क्योंकि वह एक ही गौ पुत्रों, स्त्रियों और नौकरोंतकका उद्धार कर देती है। यही कारण है कि समस्त दानोंमें गो-दानका विशेष महत्त्व बतलाया जाता है। दुर्गम स्थानपर, भयंकर विषम परिस्थितिमें और महापातकके घटित हो जानेपर केवल गौ ही रक्षा कर सकती है, अतः मनुष्यको श्रेष्ठ ब्राह्मणको गो-दान देना चाहिये॥ १७-२३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०५॥
* कपिला गौ 'स्वर्णकपिला' आदिके भेदसे दस प्रकारकी होती है। इसका विस्तृत वर्णन महाभारत, आश्वमेधिक, वैष्णवधर्म-पर्व, अ० ९५ गीताप्रेसमें दाक्षि० प्र० के श्लोकमें तथा वृद्ध गौतमस्मृतिमें अ० ९-१० में देखना चाहिये।
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* अध्याय १०६ * | ३६१
एक सौ छठा अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन
| युधिष्ठिर उवाच | |
|---|---|
| यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया।<br>तथा तथा प्रमुच्येऽहं सर्वपापैर्न संशयः॥ १<br>भगवन् केन विधिना गन्तव्यं धर्मनिश्चयैः।<br>प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि महामुने॥ २ | युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप ज्यों-ज्यों प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं, त्यों-त्यों मैं निःसंदेह समस्त पापोंसे मुक्त होता जा रहा हूँ। महामुने! धर्ममें सुदृढ़ बुद्धि रखनेवाले मनुष्योंको किस विधिसे प्रयागकी यात्रा करनी चाहिये? इसके लिये शास्त्रोंमें जिस विधिका वर्णन किया गया है, वह मुझे बतलाइये॥ १-२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! मैंने ऋषिप्रणीत विधिके अनुसार जैसा देखा एवं जैसा सुना है, उसीके अनुरूप प्रयागतीर्थकी यात्रा-विधिका क्रम बतला रहा हूँ। जो मनुष्य कहींसे भी प्रयागतीर्थकी यात्राके लिये हृष्ट-पुष्ट बैलपर सवार होकर प्रस्थान करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। गो-वंशको कष्ट देनेवाला वह मनुष्य अत्यन्त घोर नरकमें निवास करता है तथा उस प्राणीके पितर उसका दिया हुआ जल नहीं ग्रहण करते; क्योंकि गौओंका क्रोध बड़ा भयानक होता है। जो विधिके अनुसार पुत्रों तथा बालकोंको प्रयागमें स्नान कराता है, गङ्गाजलका पान कराता है तथा अपनी ही तरह ब्राह्मणोंको सारा दान दिलाता है (वह तीर्थ-फलका भागी होता है)। जो मनुष्य ऐश्वर्यके लोभसे अथवा मोहवश सवारीपर बैठकर प्रयागकी यात्रा करता है, उसका वह तीर्थफल नष्ट हो जाता है, इसलिये सवारीका परित्याग कर देना चाहिये। जो गङ्गा-यमुनाके संगमपर ऋषिप्रणीत विवाह-विधिसे अपनी सम्पत्तिके अनुसार कन्या-दान करता है, उसे उस पुण्यकर्मके फलस्वरूप पूर्वोक्त घोर नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु देशमें जाकर अक्षय-कालतक आनन्दका उपभोग करता है और उसे धर्मात्मा एवं सौन्दर्यशाली स्त्री-पुत्रोंकी भी प्राप्ति होती है। इसलिये राजेन्द्र! अपनी सम्पत्तिके अनुकूल प्रयागमें दान अवश्य करना चाहिये। इससे तीर्थका फल बढ़ जाता है और वह दाता प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥ ३—१०॥ |
| कथयिष्यामि ते राजंस्तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण विधिनानेन यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३<br>प्रयागतीर्थं यात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दसमारूढः शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ४<br>नरके वसते घोरे गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ५<br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ६<br>ऐश्वर्यलोभान्मोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ७<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेणैव विवाहेन यथाविभवसम्भवम्॥ ८<br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्।<br>पुत्रान् दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान्॥ ९<br>तत्र दानं प्रकर्तव्यं यथाविभवसम्भवम्।<br>तेन तीर्थफलं चैव वर्धते नात्र संशयः।<br>स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १० | |
| वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ११ | जो मनुष्य प्रयागस्थित अक्षयवटके नीचे पहुँचकर प्राणोंका त्याग करता है, वह अन्य सभी पुण्यलोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको चला जाता है। |