मत्स्य महापुराण

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- अध्याय २५९ * । १९५
| श्लोक | अर्थ |
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| कृशोदरी तु दुर्भिक्षं निर्मांसा धननाशिनी।<br>वक्रनासा तु दुःखाय संक्षिप्ताङ्गी भयङ्करी ॥ १७<br>चिपिटा दुःखशोकाय अनेत्रा नेत्रनाशिनी।<br>दुःखदा हीनवक्त्रा तु पाणिपादकृशा तथा ॥ १८<br>हीनाङ्गा हीनजङ्घा च भ्रमोन्मादकरी नृणाम्।<br>शुष्कवक्त्रा तु राजानं कटिहीना च या भवेत् ॥ १९<br>पाणिपादविहीना या जायते मारको महान्।<br>जङ्घाजानुविहीना च शत्रुकल्याणकारिणी ॥ २० | दुबले उदरवाली प्रतिमा दुर्भिक्षप्रदा, कंकाल-सरीखी धननाशिनी, टेढ़ी नासिकावाली दुःखदायिनी, सूक्ष्माङ्गी भय पहुँचानेवाली, चिपटी दुःख और शोक प्रदान करनेवाली, नेत्रहीना नेत्रकी विनाशिका, मुखविहीना दुःखदायिनी तथा दुर्बल हाथ-पैरवाली या अन्य किन्हीं अङ्गोंसे हीन अथवा विशेषकर जंघेसे हीन प्रतिमा मनुष्योंके लिये भ्रम और उन्माद उत्पन्न करनेवाली कही गयी है। सूखे मुखवाली तथा कटिभागसे हीन प्रतिमा राजाको कष्ट देनेवाली कही गयी है। हाथ-पाँवसे विहीन प्रतिमा महामारीका भय उत्पन्न करनेवाली तथा जंघा और घुटनेसे विहीन शत्रु का कल्याण करनेवाली कही गयी है॥ १०—२०॥ |
| पुत्रमित्रविनाशाय हीनवक्षःस्थला तु या।<br>सम्पूर्णावयवा या तु आयुर्लक्ष्मीप्रदा सदा ॥ २१<br>एवं लक्षणमासाद्य कर्तव्यः परमेश्वरः।<br>स्तूयमानः सुरैः सर्वैः समन्ताद् दर्शयेद् भवम् ॥ २२<br>शक्रेण नन्दिना चैव महाकालेन शंकरम्।<br>प्रणता लोकपालास्तु पार्श्वे तु गणनायकाः ॥ २३<br>नृत्यद्भृङ्गिरिटिश्चैव भूतवेतालसंवृताः।<br>सर्वे हृष्टास्तु कर्तव्याः स्तुवन्तः परमेश्वरम् ॥ २४<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मथाप्सरोगुह्यकनायकानाम् ।<br>गणैरनेकैः शतशो महेन्द्रै-<br>र्मुनिप्रवीरैरपि नम्यमानम् ॥ २५<br>धृताक्षसूत्रैः शतशः प्रवाल-<br>पुष्पोपहारप्रचयं ददद्भिः।<br>संस्तूयमानं भगवन्तमीड्यं<br>नेत्रत्रयेणामरमर्त्यपूज्यम् ॥ २६ | जो वक्षःस्थलसे विहीन होती है, वह पुत्रों और मित्रोंकी विनाशिका तथा सम्पूर्ण अङ्गोंसे परिपूर्ण प्रतिमा सर्वदा आयु और लक्ष्मी प्रदान करनेवाली कही गयी है। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त भगवान् शंकरकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। उनकी प्रतिमाके चारों ओर सभी देवगणोंको स्तुति करते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। शंकरकी मूर्तिको इन्द्र, नन्दीश्वर एवं महाकालसे युक्त बनाना चाहिये। उनके पार्श्वभागमें विनम्रभावसे स्थित लोकपालों और गणेश्वरोंको दिखलाना चाहिये। भृंगी और भूत-वेतालोंकी मूर्तियाँ उनके बगलमें नाचती-गाती हुई बनायी जानी चाहिये, जो सभी हर्षपूर्वक परमेश्वर शिवकी स्तुतिमें लीन रहें। रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, प्रवाल (मूँगे) आदिकी माला तथा पुष्पादिरूप उपहारोंको समर्पित करनेवाले गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, अप्सरा और गुह्यकोंके अधीश्वरोंके अनेकों गणों तथा इन्द्र आदि सैकड़ों देवताओं और मुनिवरोंद्वारा नमस्कार एवं स्तुति किये जाते हुए तथा देवताओं और मनुष्योंके लिये पूजनीय त्रिनेत्रधारी स्तवनीय भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनायी जानी चाहिये ॥ २१—२६ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमालक्षण नामक दो सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५९॥