मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९५- माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
- अध्याय ९३ *
३२१
यथा भूमिप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।
दानान्यन्यानि मे शान्तिर्भूमिदानाद् भवत्विह ॥ ७६
एवं सम्पूजयेद् भक्त्या वित्तशाठ्येन वर्जितः।
रत्नकाञ्चनवस्त्रौघैर्धूपमाल्यानुलेपनैः ॥ ७७
अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत्।
सर्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥ ७८
यस्तु पीडाकरो नित्यमल्पवित्तस्य वा ग्रहः।
तं च यत्नेन सम्पूज्य शेषानप्यर्चयेद् बुधः ॥ ७९
ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः।
पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यवमानिताः ॥ ८०
यथा बाणप्रहाराणां कवचं भवति वारणम्।
तद्वद् दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका ॥ ८१
तस्मान्न दक्षिणाहीनं कर्तव्यं भूतिमिच्छता।
सम्पूर्णया दक्षिणया यस्माद् देवोऽपि तुष्यति ॥ ८२
सदैवायुतहोमोऽयं नवग्रहमखे स्थितः।
विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्मसु ॥ ८३
निर्विघ्नार्थं मुनिश्रेष्ठ तथोद्वेगाद्भुतेषु च।
कथितोऽयुतहोमोऽयं लक्षहोममतः शृणु ॥ ८४
सर्वकामाप्तये यस्माल्लक्षहोमं विदुर्बुधाः।
पितॄणां वल्लभं साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ८५
ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।
गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद् बुधः ॥ ८६
रुद्रायतनभूमौ वा चतुरस्रमुदङ्मुखम्।
दशहस्तमथाष्टौ वा हस्तान् कुर्याद् विधानतः ॥ ८७
प्रागुदक्प्लवनां भूमिं कारयेद् यत्नतो बुधः।
जिस प्रकार अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं
कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः भूमि-दान
करनेसे मुझे इस लोकमें शान्ति प्राप्त हो' ॥ ६४-७६ ॥
इस प्रकार कृपणता छोड़कर भक्तिपूर्वक रत्न,
सुवर्ण, वस्त्रसमूह, धूप, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे
ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे
ग्रहोंकी पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको
प्राप्त कर लेता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता
है। यदि किसी निर्धन मनुष्यको कोई ग्रह नित्य पीड़ा
पहुँचा रहा हो तो उस बुद्धिमान्को चाहिये कि उस
ग्रहकी यत्नपूर्वक भलीभाँति पूजा करके तत्पश्चात् शेष
ग्रहोंकी भी अर्चना करे; क्योंकि ग्रह, गौ, राजा और
ब्राह्मण—ये विशेषरूपसे पूजित होनेपर रक्षा करते हैं,
अन्यथा अवहेलना किये जानेपर जलाकर भस्म कर देते
हैं। जैसे बाणोंके आघातका प्रतिरोध करनेवाला कवच
होता है, उसी प्रकार दुर्दैवद्वारा किये गये उपघातोंको
निवारण करनेवाली शान्ति (ग्रह-यज्ञ) होती है। इसलिये
वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको दक्षिणासे रहित
यज्ञ नहीं करना चाहिये; क्योंकि भरपूर दक्षिणा देनेसे
(यज्ञका प्रधान) देवता भी संतुष्ट हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ!
नवग्रहोंके यज्ञमें यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही
होता है। इसी प्रकार विवाह, उत्सव, यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि
कर्मोंमें तथा चित्तकी उद्विग्रता एवं आकस्मिक विपत्तियोंमें
भी यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही बतलाया गया
है। इसके बाद अब मैं एक लाख आहुतियोंवाला हवन
बतला रहा हूँ, सुनिये। विद्वानोंने सम्पूर्ण कामनाओंकी
सिद्धिके लिये लक्षहोमका विधान किया है; क्योंकि यह
पितरोंको परम प्रिय और साक्षात् भोग एवं मोक्षरूपी
फलका प्रदाता है। बुद्धिमान् यजमानको चाहिये कि
ग्रहबल और ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा
स्वस्तिवाचन कराये और अपने गृहके पूर्वोत्तर दिशामें
अथवा शिवमन्दिरकी समीपवर्ती भूमिपर विधानपूर्वक
एक मण्डपका निर्माण कराये, जो दस हाथ अथवा आठ
हाथ लम्बा-चौड़ा चौकोर हो तथा उसका मुख (प्रवेशद्वार)
उत्तर दिशाकी ओर हो। उसकी भूमिको यत्नपूर्वक पूर्वोत्तर
दिशाकी ओर ढालू बना देना चाहिये ॥ ७७-८७ १/२ ॥
३२२ * मत्स्यपुराण *
| प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु॥ ८८ <br><br> शोभनं कारयेत् कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्। <br> चतुरस्रं समंतात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्॥ ८९ <br><br> चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्दुच्छ्रिता। <br> प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता॥ ९० <br><br> शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः। <br> मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदं भवेत्। <br> यस्मात् तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते॥ ९१ <br><br> अस्माद् दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा। <br> आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च॥ ९२ <br><br> द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः। <br> लक्षहोमे भवेत् कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्॥ ९३ <br><br> तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्। <br> प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समंततः॥ ९४ <br><br> विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा। <br> संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्॥ ९५ <br><br> द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः। <br> अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि॥ ९६ <br><br> त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः। <br> दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात् तथोपरि। <br> तस्मिन्नावाहयेद् देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डुलैः॥ ९७ <br><br> आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः। <br> स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः॥ ९८ <br><br> गरुत्मानधिकस्तत्र सम्पूज्यः श्रियमिच्छता। <br> सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः। <br> विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ९९ | तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये, जो चारों ओरसे चौकोर हो, जिसमें योनिरूप मुख बना हो और जो मेखलासे युक्त हो। यह मेखला चार अङ्गुल चौड़ी और उतनी ही ऊँची, कुण्डको चारों ओरसे घेरे हुए और पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो। सभी लोगोंके लिये ग्रह-शान्तिके निमित्त नवग्रह-यज्ञ बतलाया गया है। चूँकि उपर्युक्त परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दस गुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। विश्वकर्माने कुण्डके पूर्वोत्तर दिशामें तीन बित्तेकी दूरीपर देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो चारों ओरसे चौकोर, पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू, विष्कम्भ (कुण्डके व्यास)-के आधे परिमाणके बराबर ऊँची और तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची तथा शेष दो एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई तीन अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। मुनिश्रेष्ठ! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें (सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुड़की भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो'॥८८—९९॥ |
* कल्याण—अग्निपुराणाङ्क अ० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।
| * अध्याय ९३ * | ३२३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पूर्ववत् कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।<br>सहस्त्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।<br>घृतकुम्भवसोधारां पातयेदनलोपरि ॥ १००<br><br>औदुम्बरीं तथाऽर्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।<br>बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि।<br>घृतधारां तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत् ॥ १०१<br><br>श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम्।<br>महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत् ॥ १०२<br><br>स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।<br>दातव्या यजमानेन पूर्ववद् दक्षिणाः पृथक् ॥ १०३<br><br>कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।<br>नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः ॥ १०४<br><br>अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।<br>कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे ॥ १०५ | तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, स्रुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १। १), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५। १–२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम) सूक्त (ऋ० १। ९१) सुनाना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका पाठ कराना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नानकर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्तस्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये॥ १००–१०५॥ |
| तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।<br>कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चत्वारो वा विमत्सरः ॥ १०६<br><br>नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।<br>भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः ॥ १०७<br><br>शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च।<br>कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान् ॥ १०८<br><br>न कुर्याद् दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।<br>अददन् लोभतो मोहात् कुलक्षयमवाप्नुते ॥ १०९<br><br>अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता।<br>अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत् ॥ ११०<br><br>अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः।<br>यष्टारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १११<br><br>न वाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।<br>यस्मात् पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः ॥ ११२ | उसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल, अँगूठी और कण्ठसूत्र (हार) आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दस गुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नदानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन ऋत्विज्को और दक्षिणारहित यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये; क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। |