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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२१- ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन

७२* मत्स्यपुराण *
निधाय दर्भान् विधिवद् दक्षिणाग्रान् प्रयत्नतः।<br>सर्ववर्णेन चान्नेन पिण्डांस्तु पितृयज्ञवत्॥ ४६<br>अवनेजनपूर्वं तु नामगोत्रेण मानवः।<br>गन्धधूपादिकं दद्यात् कृत्वा प्रत्यवनेजनम्॥ ४७<br>जान्वाच्य सव्यं सव्येन पाणिनाथ प्रदक्षिणम्।<br>पित्र्यमानीय तत् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना॥ ४८<br>दीपप्रज्वालनं तद्वत् कुर्यात् पुष्पार्चनं बुधः।<br>अथाचान्तेषु चाचम्य वारि दद्यात् सकृत् सकृत्॥ ४९<br>अथ पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च।<br>सतिलं नामगोत्रेण दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ५०<br>गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च।<br>दद्याद् यदिष्टं विप्राणामात्मनः पितुरेव च॥ ५१<br>वित्तशाठ्येन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।<br>ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु चोदकम्॥ ५२<br>दत्त्वाशीः प्रतिगृह्णीयाद् विश्वेभ्यः प्राङ्मुखो बुधः।<br>अघोराः पितरः सन्तु सन्त्वित्युक्तः पुनर्द्विजैः॥ ५३<br>गोत्रं तथा वर्धतां नस्तथेत्युक्तश्च तैः पुनः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत्॥ ५४<br>एताः सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तश्च तैः पुनः।<br>स्वस्तिवाचनकं कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तितः॥ ५५<br>उच्छेषणं तु तत् तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः।<br>ततो ग्रहबलिं कुर्यादिति धर्मव्यवस्थितिः॥ ५६<br>उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्यास्तिकस्य च।<br>दासवर्गस्य तत् पित्र्यं भागधेयं प्रचक्षते॥ ५७<br>पितृभिर्निर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा।<br>अपुत्राणां सपुत्राणां स्त्रीणामपि नराधिप॥ ५८<br>ततस्तानग्रतः स्थित्वा परिगृह्योदपात्रकम्।<br>वाजे वाज इति जपन् कुशाग्रेण विसर्जयेत्॥ ५९<br>बहिः प्रदक्षिणां कुर्यात् पदान्यष्टावनुव्रजन्।<br>बन्धुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासन्वितः॥ ६०कुशोंको विधिपूर्वक दक्षिणाभिमुख बिछा दे। तब श्राद्धकर्ता पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करके पहले (कुशोंपर) अवनेजन दे (पिण्डकी वेदीपर कुशसे जल छिड़के), फिर पितृ-यज्ञकी भाँति सभी प्रकारके अन्नोंसे बने हुए पिण्डोंको उन कुशोंपर रख दे। पुनः गन्ध, पुष्प आदिसे पिण्ड-पूजा करके उनपर प्रत्यवनेजनका जल छोड़े और बायाँ घुटना टेककर बायें हाथसे प्रदक्षिणा करे; फिर कुश हाथमें लेकर विधिपूर्वक पितृकार्य सम्पन्न करे। बुद्धिमान् श्राद्धकर्ताको पूर्वोक्त विधिके अनुसार दीप जलाना एवं पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर स्वयं भी आचमन करके उनके हाथोंपर एक-एक बार जल, पुष्प, अक्षत और तिलसहित अक्षय्योदक डालकर यथाशक्ति उन्हें दक्षिणा दे। पुनः कंजूसी छोड़कर पितरोंको प्रसन्न करते हुए गौ, पृथ्वी, सोना, वस्त्र, सुन्दर शय्याएँ तथा जो वस्तु अपने तथा पिताको अभीष्ट रही हो, वह सब ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। तदुपरान्त स्वधाका उच्चारण करके विद्वान् श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो विश्वेदेवोंको जल प्रदान करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करे। उस समय ब्राह्मणोंसे कहे—'हमारे पितर सौम्य हों।' पुनः ब्राह्मण लोग कहें—'सन्तु—हों'॥ ४०—५३॥<br><br>(पुनः यजमान कहे) 'हमारे गोत्रकी वृद्धि हो तथा हमारे दाताओंकी अभिवृद्धि हो।' यों कहे जानेपर पुनः वे ब्राह्मण कहें—'वैसा ही हो।' पुनः प्रार्थना करे—'ये आशीर्वाद सत्य हों।' ब्राह्मणलोग कहें—'सन्तु—(सत्य) हों'। पुनः उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और पिण्डोंको उठाकर भक्तिपूर्वक ग्रहबलि करे—यही धर्मकी मर्यादा है। जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण विसर्जित किये जाते हैं, तबतक सभी वस्तुएँ उच्छिष्ट रहती हैं। कपटरहित एवं आस्तिक ब्राह्मणोंका जूठन और पितृकार्यमें भूमिपर बिखरे हुए अन्न नौकरोंके भाग हैं—ऐसा कहा जाता है। नरेश्वर! पितरोंद्वारा व्यवस्थित यह तर्पणरूप कार्य पुत्रहीनों, पुत्रवानों तथा स्त्रियोंके लिये भी है। तदनन्तर ब्राह्मणोंको आगे खड़ा करके जलपात्रको हाथमें लेकर 'वाजे वाजे'—यों कहते हुए कुशोंके अग्रभागसे पितरोंका विसर्जन करे तथा बाहर जाकर पुत्र, स्त्री और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर आठ पग तक उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलकर उनकी प्रदक्षिणा करे।

* अध्याय १७ *
७३


| निवृत्य प्रणिपत्याथ पर्युक्ष्याग्निं समन्त्रवत्।<br>वैश्वदेवं प्रकुर्वीत नैत्यकं बलिमेव च॥ ६१<br><br>ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यसुतबान्धवः।<br>भुञ्जीतातिथिसंयुक्तः सर्वं पितृनिषेवितम्॥ ६२<br><br>एतच्चानुपनीतोऽपि कुर्यात् सर्वेषु पर्वसु।<br>श्राद्धं साधारणं नाम सर्वकामफलप्रदम्॥ ६३<br><br>भार्याविरहितोऽप्येतत् प्रवासस्थोऽपि भक्तिमान्।<br>शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः॥ ६४<br><br>तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते।<br>उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोद्वाहादिमङ्गले॥ ६५ | वहाँसे लौटकर अग्निको प्रणाम करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका पर्युक्षण करे तथा वैश्वदेव और नित्य बलि प्रदान करे। वैश्वदेवबलि समाप्त कर लेनेके बाद अपने नौकर-चाकर, पुत्र, भाई-बन्धु और अतिथियोंके साथ सभी प्रकारके पितृ-सेवित (जिन्हें पहले पितरोंको समर्पित किया जा चुका है) पदार्थोंका भोजन करे। इस सामान्य पार्वण नामक श्राद्धको, जो सभी प्रकारके मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है, उपनयन-संस्कारसे रहित व्यक्ति भी सभी पर्वोंके अवसरपर कर सकता है। बुद्धिमान् पितृ-भक्त पुरुष पत्नीरहित अवस्थामें तथा परदेशमें स्थित रहनेपर भी इस श्राद्धका विधान कर सकता है। शूद्रको भी पूर्वोक्त विधिके अनुसार मन्त्ररहित ही इस श्राद्धको करनेका अधिकार है। ऋषियो! अब तीसरे प्रकारके पार्वण श्राद्धको, जो आभ्युदयिक वृद्धिश्राद्धके नामसे कहा जाता है, बतला रहा हूँ। यह श्राद्ध किसी उत्सव, हर्ष-संयोग, यज्ञ, विवाह आदिके शुभ अवसरपर किया जाता है॥ ५४—६५ ॥ |
| मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनन्तरम्।<br>ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च॥ ६६<br><br>प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डान् दूर्वया च कुशैर्यतान्॥ ६७<br><br>सम्पन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्घ्यं द्वयोर्द्वयोः।<br>युग्मा द्विजातयः पूज्या वस्त्रकार्त्तस्वरादिभिः॥ ६८<br><br>तिलार्थस्तु यवैः कार्यो नान्दीशब्दानुपूर्वकः।<br>माङ्गल्यानि च सर्वाणि वाचयेद् द्विजपुङ्गवैः॥ ६९<br><br>एवं शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सर्वदा।<br>नमस्कारेण मन्त्रेण कुर्यादामात्रतः सदा॥ ७०<br><br>दानप्रधानः शूद्रः स्यादित्याह भगवान् प्रभुः।<br>दानेन सर्वकामाप्तिरस्य संजायते यतः॥ ७१ | राजन्! इस श्राद्धमें प्रथमतः माताओंकी पूजा करके तत्पश्चात् पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर मातामह (नाना) और विश्वेदेवोंके पूजनका विधान है। श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो प्रदक्षिणा करके दही, अक्षत, फल और जल आदि सामग्री-समेत दूर्वा और कुशोंसे संयुक्त पिण्डोंको समर्पित करे। इस आभ्युदयिक श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके दोनों प्रकारके पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय वस्त्र, सुवर्ण आदि सामग्रियोंसे दो ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। तिलके स्थानपर 'नान्दी' शब्दके उच्चारणपूर्वक यवसे ही कार्य सम्पन्न करे और श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा सभी प्रकारके माङ्गलिक सूक्तों अथवा स्तोत्रोंका पाठ कराये। इसी प्रकार इस सामान्य वृद्धिश्राद्धमें शूद्र भी सदा-सर्वदा नमस्काररूपी मन्त्रके उच्चारणसे तथा आमान्न-दानसे (बिना पके हुए कच्चे अन्नके दानसे) कार्य सम्पन्न कर सकता है। शूद्रको विशेषरूपसे दानप्रधान (दानमें तत्पर, दानशील) होना चाहिये; क्योंकि दानसे उसके सभी मनोरथोंकी पूर्ति हो जाती है—ऐसा सर्वसमर्थ भगवान्ने कहा है॥ ६६—७१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे साधारणाभ्युदयकीर्तनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें साधारणाभ्युदयश्राद्ध-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७॥

७४ * मत्स्यपुराण *


अठारहवाँ अध्याय

एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके उपरान्त अब मैं उस 'एकोद्दिष्ट'¹ श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका वर्णन स्वयं भगवान् चक्रपाणि विष्णुने किया है। पिताकी मृत्यु हो जानेपर पुत्रोंको शौचपर्यन्त जैसा कार्य करना चाहिये, उसे सुनिये॥ १॥
एकोद्दिष्टमतो वक्ष्ये यदुक्तं चक्रपाणिना।<br>मृते पुत्रैर्यथा कार्यमाशौचं च पितर्यपि॥ १ब्राह्मणोंमें दस दिनके अशौचका विधान है। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें बारह दिनका, वैश्योंमें पन्द्रह दिनका और शूद्रोंमें एक मासका अशौच लगता है। इस अशौचका विधान सगोत्रमें ही किया गया है। जिसका मुण्डन-संस्कार नहीं हुआ हो, ऐसे बच्चेका मरणाशौच एक राततक तथा इससे बड़ी अवस्थावालेका तीन राततक बतलाया गया है। इसी प्रकार जननाशौच भी सर्वदा सभी वर्णोंके लिये होता है। मरणाशौचमें अस्थिसञ्चयनके उपरान्त (परिवारवालोंका) अङ्गस्पर्श करनेका विधान है। प्रेतात्माके लिये बारह दिनोंतक पिण्डदान करना चाहिये; क्योंकि वे पिण्ड उस प्रेतके लिये पाथेय (मार्गका कलेवा) बतलाये गये हैं, अतः अतिशय सुखदायी होते हैं। इसी कारण वह प्रेतात्मा बारह दिनोंतक प्रेतपुर (यमपुरी)—को नहीं ले जाया जाता। वह बारह दिनोंतक अपने गृह, पुत्र और पत्नीको देखता रहता है। इसलिये उसके समस्त दाहोंकी शान्ति तथा मार्गकी थकावटका विनाश करनेके निमित्त दस राततक आकाशमें (पीपलके वृक्षमें बँधा हुआ) जलघट रखना चाहिये। तत्पश्चात् ग्यारहवें दिन ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसी प्रकार क्षत्रिय आदि अन्य वर्णवालोंको भी अपने-अपने सूतककी समाप्तिपर (विषम-संख्यक) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पुनः दूसरे अर्थात् बारहवें दिन पूर्ववत् विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्धका समारम्भ करे। इसमें आवाहन, अग्निमें पिण्डदान तथा विश्वेदेवोंका पूजन निषिद्ध है। इस श्राद्धमें एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्डका विधान है। इसके पश्चात् 'उपतिष्ठताम्' इस शब्दका उच्चारण करके तिलसहित जल प्रदान करे और 'स्वदितम्०' इस सम्पूर्ण मन्त्रको बोलकर अन्नको पृथ्वीपर बिखेर दे तथा विसर्जनके समय 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे। इस प्रकार वेदज्ञ पुत्रको अपने पिताका शेष श्राद्ध-कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। इसी विधिसे प्रतिमास (पिताकी मृत्यु-तिथिपर) सारा कार्य सम्पादित करना चाहिये। सूतक समाप्त होनेके पश्चात् दूसरे दिन
दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणेषु विधीयते।<br>क्षत्रियेषु दश द्वे च पक्षं वैश्येषु चैव हि॥ २
शूद्रेषु मासमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।<br>नैशं वाकृतचूडस्य त्रिरात्रं परतः स्मृतम्॥ ३
जननेऽप्येवमेव स्यात् सर्ववर्णेषु सर्वदा।<br>तथास्थिसञ्चयनादूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते॥ ४
प्रेताय पिण्डदानं तु द्वादशाहं समाचरेत्।<br>पाथेयं तस्य तत् प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत्॥ ५
तस्मात् प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहं¹ न नीयते।<br>गृहं पुत्रं कलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति॥ ६
तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा।<br>सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥ ७
तत एकादशाहे तु द्विजानेकादशैव तु।<br>क्षत्रादिः सूतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान्॥ ८
द्वितीयेऽह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्टं समाचरेत्।<br>आवाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः॥ ९
एकं पवित्रमेकोऽर्घ्य एकः पिण्डो विधीयते।<br>उपत्तिष्ठतामित्येतद् देयं पश्चात्तिलोदकम्॥ १०
स्वदितं विकिरेद् ब्रूयाद् विसर्गे चाभिरम्यताम्।<br>शेषं पूर्ववदत्रापि कार्यं वेदविदा पितुः॥ ११
अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत्।<br>सूतकान्ताद् द्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ १२

१. 'कहीं-कहीं द्वादशाहेन नीयते' पाठ भी है। वहाँ १२ दिनोंमें यमपुरी या पितृपुर ले जाया जाता है, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
२. पिता आदि केवल एक व्यक्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाला श्राद्ध 'एकोद्दिष्ट' है।

* अध्याय १८ * ७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्वितम्।<br>सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः॥ १३<br><br>वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा।<br>उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः॥ १४<br><br>यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे सपिण्डीकरणं भवेत्॥ १५<br><br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रेतः पार्वणभाग् भवेत्।<br>वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्ततः॥ १६काञ्चनपुरुष (सोनेकी प्रतिमा) और फल-वस्त्रसे समन्वित विलक्षण शय्याका दान करना चाहिये। उसी समय अनेकविध वस्त्राभूषणोंसे द्विज-दम्पतीका पूजन करे। तत्पश्चात् वृषोत्सर्ग (साँड़ छोड़ने)-का काम सम्पन्न करे। उस समय एक सुन्दर कपिला गौका दान करे। नरश्रेष्ठ! पुनः अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त एक जलपात्र, जो तिल और जलसे परिपूर्ण हो, दान करे। इस प्रकारके जलपात्रका दान वर्षपर्यन्त करना चाहिये। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध किया जाता है। सपिण्डीकरण श्राद्धके पश्चात् प्रेतात्मा पार्वणश्राद्धका भागी हो जाता है तथा पूर्वकथित आभ्युदयिक आदि वृद्धि श्राद्धोंमें भाग पानेके योग्य एवं गृहस्थ हो जाता है॥ २—१६॥
सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्।<br>पितॄनेवासयेत् तत्र पृथक् प्रेतं विनिर्दिशेत्॥ १७<br><br>गन्धोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात् पात्रचतुष्टयम्।<br>अर्घार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्॥ १८<br><br>तद्वत् संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तथा।<br>ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यं तु विभजेत् तथा॥ १९<br><br>चतुर्थस्य पुनः कार्यं न कदाचिदतो भवेत्।<br>ततः पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः॥ २०<br><br>अग्निष्वात्तादिमध्यत्वं प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम्।<br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्मै तस्मान्न दीयते॥ २१<br><br>पितृष्वेव तु दातव्यं तत्पिण्डो येषु संस्थितः।<br>ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादिपर्वसु॥ २२<br><br>त्रिपिण्डमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टे मृतेऽहनि।<br>एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत्॥ २३<br><br>सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशकः।<br>मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानवः॥ २४<br><br>सम्पृक्तेष्वाकुलीभावः प्रेतेषु तु यतो भवेत्।<br>प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्टं समाचरेत्॥ २५सपिण्डीकरण श्राद्धमें सर्वप्रथम विश्वेदेवोंको नियुक्त करे। तत्पश्चात् पितरोंको स्थान दे और प्रेतका स्थान उनसे अलग निश्चित करे। फिर अर्घ्य देनेके लिये चन्दन, जल और तिलसे युक्त चार पात्र तैयार करे और प्रेतपात्रके जलसे पितृपात्रोंको सिक्त कर दे। (अर्थात् प्रेतपात्रके जलको तीन भागमें विभक्त करके उन्हें पितृपात्रोंमें डाल दे।) इसी प्रकार पिण्डदाता चार पिण्डोंका निर्माण करके उन्हें संकल्पपूर्वक (पितरों और प्रेतके स्थानोंपर पृथक्-पृथक्) रख दे। फिर 'ये समानाः०' (वाजस० १९।४५-४६)—इन दो मन्त्रोंद्वारा अन्तके (चौथे प्रेतके) पिण्डको (स्वर्णशलाका या कुशसे) तीन भागोंमें विभक्त कर दे (और एक-एक भागको क्रमशः पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे)। इसके पश्चात् उस चौथे पिण्डका कहीं भी कोई उपयोग नहीं रह जाता। इसके बाद वह प्रेतात्मा सब ओरसे संतुष्ट होकर पितृरूपमें परिवर्तित हो जाता है और 'अग्निष्वात्त' आदि देवपितरोंके मध्य उत्तम एवं अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है। इसी कारण सपिण्डीकरणके पश्चात् उसे कुछ नहीं दिया जाता। वह प्रेतात्मा जिन पितरोंके बीच स्थित है, उसके पिण्डके तीनों भागोंको उन्हीं पितरोंके पिण्डोंमें मिला देना चाहिये। तत्पश्चात् संक्रान्ति अथवा ग्रहण आदि पर्वोंके समय त्रिपिण्ड श्राद्ध ही करना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धको प्रेतात्माकी मृत्युके दिन करनेका विधान है। जो श्राद्धकर्ता पिताकी मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग कर (केवल) अन्य श्राद्धोंको करता है, वह सदैव पितृघाती तथा माता और भाईका विनाशक हो जाता है। पिताकी क्षयातिथिपर पार्वण श्राद्ध करनेवाला मानव अधम-से-अधम गतिको प्राप्त होता है। चूँकि प्रेतोंसे सम्बन्धित हो जानेसे पितृगण व्याकुल हो जाते हैं, इसलिये प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये।