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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1006 of 1098

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Page 1006

९९६ * मत्स्यपुराण *


दो सौ साठवाँ अध्याय

विविध देवताओंकी प्रतिमाओंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि अर्धनारीश्वरं परम्।<br>अर्धेन देवदेवस्य नारीरूपं सुशोभनम्॥ १<br>ईशार्धे तु जटाभागो बालेन्दुकलया युतः।<br>उमार्धे चापि दातव्यौ सीमन्ततिलकावुभौ॥ २<br>वासुकिं दक्षिणे कर्णे वामे कुण्डलमादिशेत्।<br>बालिका चोपरिष्टात् तु कपालं दक्षिणे करे।<br>त्रिशूलं वापि कर्तव्यं देवदेवस्य शूलिनः॥ ३<br>वामतो दर्पणं दद्यादुत्पलं तु विशेषतः।<br>वामबाहुश्च कर्तव्यः केयूरवलयान्वितः॥ ४<br>उपवीतं च कर्तव्यं मणिमुक्तामयं तथा॥ ५<br>स्तनभारं तथार्धे तु वामे पीतं प्रकल्पयेत्।<br>परार्धमुज्ज्वलं कुर्याच्छ्रोण्यर्धं तु तथैव च॥ ६<br>लिङ्गार्धमूर्ध्वगं कुर्याद् व्यालाजिनकृताम्बरम्।<br>वामे लम्बपरीधानं कटिसूत्रत्रयान्वितम्॥ ७<br>नानारत्नसमोपेतं दक्षिणे भुजगान्वितम्।<br>देवस्य दक्षिणं पादं पद्मोपरि सुसंस्थितम्॥ ८<br>किञ्चिदूर्ध्वं तथा वामं भूषितं नूपुरेण तु।<br>रत्नैर्विभूषितान् कुर्यादङ्गुलीष्वङ्गुलीयकन्॥ ९<br>सालक्तकं तथा पादं पार्वत्या दर्शयेत् सदा।<br>अर्धनारीश्वरस्येदं रूपमस्मिन्नुदाहृतम्॥ १०ऋषियो! अब मैं भगवान् शिवके अर्धनारीश्वर रूपका वर्णन कर रहा हूँ। इसमें देवाधिदेव शंकरकी बायीं ओर आधे भागमें अत्यन्त सुन्दर स्त्रीका रूप होता है तथा अर्धभागमें दाहिनी ओर पुरुषरूप। पुरुषभागमें प्रतिमाको जटाजूट तथा बालचन्द्रकी कलासे युक्तकर उमाके अर्धभागमें मस्तकपर सीमन्त (माँग)-में सिन्दूर और ललाटपर तिलक निर्मित करे। दाहिने कानमें वासुकि नाग और बायें कानमें कुण्डलकी रचना की जानी चाहिये। वहीं ऊपरकी ओर केशोंके आभूषण तथा कानमें बाली बनानी चाहिये। देवदेवेश्वर शिवके दाहिने हाथमें कपाल या त्रिशूल तथा बायें हाथमें दर्पण और कमल बनाये। विशेषतया बायें बाहुको बाजूबंद और कङ्कणसे युक्त बनाना चाहिये और दाहिनी ओरके भागमें मणियों और मोतियोंका यज्ञोपवीत बनाना चाहिये। प्रतिमाके बायें भागकी ओर स्तन तथा दाहिना भाग पीले वर्णका बनाये। ऊपरका आधा भाग उज्ज्वल हो, नितम्बका आधा भाग श्वेतवर्णका होना चाहिये। लिंगसे ऊपरका भाग सिंहके चर्मसे आवृत हो। बायें भागमें नाना प्रकारके रत्नोंसे बनी हुई तीन लड़ियोंवाली करधनी और साड़ी पहनानी चाहिये। दाहिना भाग सर्पोंसे युक्त हो। शिवजीका दाहिना पैर कमलके ऊपर स्थापित हो तथा नूपुरसे विभूषित बायाँ पैर उससे कुछ ऊपरकी ओर हो। उसकी अंगुलियोंको रत्ननिर्मित अँगूठियोंसे विभूषित करे। पार्वतीके चरण सर्वदा महावरसे युक्त प्रदर्शित किये जायें। इस प्रकार इस प्रसङ्गमें मैंने अर्धनारीश्वरके रूपका वर्णन किया॥ १—१०॥
उमामहेश्वरस्यापि लक्षणं शृणुत द्विजाः।<br>संस्थानं तु तयोर्वक्ष्ये लीलाललितविभ्रमम्॥ ११<br>चतुर्भुजं द्विबाहुं वा जटाभारेन्दुभूषितम्।<br>लोचनत्रयसंयुक्तमुमैकस्कन्धपाणिनम् ॥ १२<br>दक्षिणेनोत्पलं शूलं वामे कुचभरे करम्।<br>द्वीपिचर्मपरीधानं नानारत्नोपशोभितम्॥ १३ब्राह्मणो! अब आपलोग उमामहेश्वर-मूर्तिके लक्षण सुनिये। मैं उन दोनोंकी स्थितिका वर्णन कर रहा हूँ। उमामहेश्वरकी प्रतिमा मनोहर लीलाओंसे युक्त हो। उसे जटाओंके भार और चन्द्रमासे विभूषित दो या चार बाहुओं तथा तीन नेत्रोंसे युक्त बनाना चाहिये। उसमें भगवान् शिवका एक हाथ उमाके कंधेपर विराजमान होना चाहिये। मूर्तिके दाहिने हाथमें कमल या शूल हो, बायाँ हाथ स्तनपर न्यस्त होना चाहिये। उसे विविध प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, व्याघ्रचर्मसे युक्त,
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