सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

३४- राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना

१२० * मत्स्यपुराण *


शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, वायु, यम अथवा वरुण ही क्यों न हों, आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव मैं यहाँ सर्वथा सुरक्षित हूँ।) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये—मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये॥ १२-१३॥
सोमश्चेन्द्रश्च वायुश्च यमश्च वरुणश्च वा।<br>तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति॥ १२<br>रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।<br>सा त्वां याचे प्रसाद्येह रन्तुमेहि नराधिप॥ १३
ययातिरुवाचययातिने कहा—शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो; परंतु क्या करूँ, जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना'॥ १४-१५॥
वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम्।<br>रूपं तु ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम्॥ १४<br>मामब्रवीत् तदा शुक्रो देवयानीं यदावहम्।<br>नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी॥ १५
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियोंके प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं। महाराज! गवाही देते समय किसीके पूछनेपर जो अन्यथा (असत्य) भाषण करते हैं, वे मिथ्यावादी कहलाते हैं; परंतु जहाँ दो व्यक्तियोंके (जैसे देवयानीका तथा मेरा) कल्याणका प्रसङ्ग उपस्थित हो, वहाँ एकका (अर्थात् मेरा) कल्याण न करना असत्य भाषण है, जो वक्ताकी (अर्थात् आपकी) हानि कर सकता है॥ १६-१७॥
न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति<br>न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले।<br>प्राणात्यये सर्वधनापहारे<br>पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६<br>पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा<br>भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते।<br>एकार्थतायां तु समाहितायां<br>मिथ्यावदन्नं ह्यनृतं हिनस्ति॥ १७
ययातिरुवाचययाति बोले—देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। यदि वह झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है; अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं गलत काम नहीं कर सकता॥ १८॥
राजा प्रमाणं भूतानां स विनश्येन्मृषा वदन्।<br>अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे॥ १८
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! अपना पति और सखीका पति—दोनों बराबर माने गये हैं। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया॥ १९॥
समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः।<br>समं विवाह इत्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्यतः॥ १९
ययातिरुवाचययाति बोले—याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अतः बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ॥ २०॥
दातव्यं याचमानस्य हीति मे व्रतमाहितम्।<br>त्वं च याचसि कामं मां ब्रूहि किं करवाणि तत्॥ २०
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं होते—पत्नी, दास और पुत्र। उनकी सम्पत्ति भी उसीकी होती है, जहाँ ये
अधर्मात् त्राहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय।<br>त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्॥ २१<br>त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।<br>यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्॥ २२*

*यह श्लोक स्वल्पान्तरसे मनुस्मृति ८। ४१६, नारदस्मृति ५। ३९, महाभारत १। ८२। २२ आदिमें भी है। मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, राघवानन्द आदि मनुके सभी व्याख्याता इस श्लोकका तात्पर्य धनके व्ययमें अभिभावककी सहमति लेनेमें ही चरितार्थ मानते हैं। नीलकण्ठकी व्याख्या केवल प्रस्तुत प्रसङ्गसे ही सम्बद्ध है।

* अध्याय ३१ *
१२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी।<br>सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम्॥ २३<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तस्तया राजा तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्।<br>पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रतिपादयन्॥ २४<br>स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च।<br>अन्योन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्॥ २५<br>तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्॥ २६<br>प्रजज्ञे च ततः काले राज्ञी राजीवलोचना।<br>कुमारं देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम्॥ २७जाते—जिसके अधिकारमें रहते हैं; अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है। मैं देवयानीकी सेविका हूँ और देवयानी आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं—दोनों ही आपके सेवन अपनाने योग्य हैं। इसलिये आप मुझे भी अङ्गीकार कीजिये॥ २१—२३॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठाके साथ सहवास करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये। सुन्दर भौंहोंवाली वृषपर्वा-कुमारी शर्मिष्ठाने उस सहवासमें नृपश्रेष्ठ ययातिसे प्रथम गर्भ धारण किया। शतानीक! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एवं सूर्यके समान तेजस्वी एक कुमारको उत्पन्न किया॥ २४—२७॥

॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित नामक एकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३१॥


बत्तीसवाँ अध्याय

देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>श्रुत्वा कुमारं जातं सा देवयानी शुचिस्मिता।<br>चिन्तयाविष्टदुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत॥ १<br>ततोऽभिगम्य शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>किमर्थं वृजिनं सुभ्रु कृतं ते कामलुब्धया॥ २<br><br>शर्मिष्ठोवाच<br>ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः।<br>स मया तु वरः कामं याचितो धर्मसंहतम्॥ ३<br>नाहमन्यायात् काममाचरामि शुचिस्मिते।<br>तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४शौनकजी कहते हैं— भारत! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है, तब वह दुःखसे पीड़ित हो शर्मिष्ठाके व्यवहारको लेकर बड़ी चिन्तामें पड़ गयी। वह शर्मिष्ठाके पास गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने काम-लोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला है?'॥ १-२॥<br><br>शर्मिष्ठा बोली— सखी! कोई धर्मात्मा ऋषि आये थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। मैंने उन वरदायक ऋषिसे धर्मानुसार कामकी याचना की। शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ॥ ३-४॥