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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१२३- गोमेदकद्वीप और पुष्करद्वीपका वर्णन

  • अध्याय १२२ *
    ४१५

तत्र संवर्तको नाम सोऽग्निः पिबति तज्जलम्।<br>अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौ वडवामुखः<sup>१</sup>॥ ७७इसे बडवाग्नि कहते हैं। जिसका मुख घोड़ीके समान है। (वह भी समुद्रके जलको सोखता रहता है।) पूर्वकालमें जब इन्द्र पर्वतोंका पक्षच्छेदन कर रहे थे, उस समय ये चारों पर्वत इन्द्रके भयसे भीत होकर लवणसागरमें भागकर छिप गये थे। ये पर्वत चन्द्रमाके शुक्लपक्षमें आनेपर दीखते हैं एवं कृष्णपक्ष आनेपर समुद्रमें डूब जाते हैं। भारतवर्षके जो भेद दीख पड़ते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया। अन्य वर्षोंका वर्णन अन्यत्र किया जा चुका है। इन वर्षोंमें प्रत्येक वर्ष एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणोंमें अधिक है। इन वर्षोंमें सभी प्राणी विभागपूर्वक आरोग्य और आयुके प्रमाणसे तथा धर्म, काम और अर्थसे युक्त होकर निवास करते हैं। उन सभी वर्षोंमें उन प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ भी हैं। इस प्रकार इस विश्व एवं इस जगत्को धारण करती हुई पृथ्वी स्थित है॥ ७२—८२॥
इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।<br>छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥ ७८
तेषां तु दृश्यते चन्द्रे शुक्ले कृष्णे समाप्लुतिः।<br>ते भारतस्य वर्षस्य भेदा येन प्रकीर्तिताः॥ ७९
इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः।<br>उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणैः॥ ८०
आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भागशः॥ ८१
वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै।<br>इत्येतद् धारयद् विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता॥ ८२

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें जम्बूद्वीपवर्णन नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२१॥


एक सौ बाईसवाँ अध्याय

शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन<sup>२</sup>

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिह निश्चयम्।<br>कथ्यमानं निबोधध्वं शाकं द्वीपं द्विजोत्तमाः॥ १द्विजवरो! अब मैं शाकद्वीपका निश्चितरूपसे यथार्थ वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग मेरे कथनानुसार शाकद्वीपके विषयमें जानकारी प्राप्त करें। शाकद्वीपका विस्तार जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुना है और चारों ओरसे उसका फैलाव विस्तारसे भी तिगुना है। उस द्वीपसे यह लवणसागर घिरा हुआ है। शाकद्वीपमें अनेकों पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी लम्बी आयु भोग कर मरते हैं। भला, उन क्षमाशील एवं तेजस्वी जनोंके प्रति दुर्भिक्षकी सम्भावना कहाँसे हो सकती है।
जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहः समन्ततः॥ २
तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वीपेन लवणोदधिः।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः॥ ३

१. आर्यभट्टीय आदिके अनुसार वडवामुख दक्षिणी ध्रुवके पास एक स्थान है, जिस मार्गसे लोग पातालमें प्रवेश करते थे। बडवाग्निको वडवाचक्र, वडवाभृगु; हुतृ आदि भी कहा गया है। महावीरचरितमें इसके रूप आदिका भी वर्णन है।
२. प्रायः सभी पुराणोंके भुवनकोश-प्रकरणमें इन सभी द्वीपोंका वर्णन है, पर मत्स्यपुराणसे उनके नामक्रमादिमें कुछ भेद है। W. Kirifel के भुवनकोश—(Das Pnrana Von, Weltge-banden P, III.F. Bharatvarsha 1931) ग्रन्थमें इन सबका एकत्र सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्त्वका है।

४१६ * मत्स्यपुराण *

| कुत एव च दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुतेष्विह।<br>तत्रापि पर्वताः शुभ्राः सप्तैव मणिभूषिताः॥ ४<br>शाकद्वीपादिषु त्वेषु सप्त सप्त नगास्त्रिषु।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ ५<br>रत्नाकूराद्रिनामानः सानुमन्तो महाचिताः।<br>समोदिताः प्रतिदिशं द्वीपविस्तारमानतः॥ ६<br>उभयत्रावगाढौ च लवणक्षीरसागरौ।<br>शाकद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्॥ ७<br>देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते।<br>प्रागायतः स सौवर्ण उदयो नाम पर्वतः॥ ८<br>तत्र मेघास्तु वृष्ट्यर्थं प्रभवन्त्यपयान्ति च।<br>तस्यापरेण सुमहाञ्जलधारो महागिरिः॥ ९<br>स वै चन्द्रः समाख्यातः सर्वौषधिसमन्वितः।<br>तस्मान्नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम्॥ १०<br><br>नारदो नाम चैवोक्तो दुर्गशैलो महाचितः।<br>तत्राचलौ समुत्पन्नौ पूर्वं नारदपर्वतौ॥ ११<br>तस्यापरेण सुमहाञ्श्यामो नाम महागिरिः।<br>यत्र श्यामत्वमापन्नाः प्रजाः पूर्वमिमाः किल॥ १२<br>स एव दुन्दुभिर्नाम श्यामपर्वतसंनिभः।<br>शब्दमृत्युः पुरा तस्मिन् दुन्दुभिस्ताडितः सुरैः॥ १३<br>रत्नमालान्तरमयः शाल्मलश्चान्तरालकृत्।<br>तस्यापरेण रजतो महानस्तो गिरिः स्मृतः॥ १४<br>स वै सोमक इत्युक्तो देवैर्यत्रामृतं पुरा।<br>सम्भृतं च हृतं चैव मातुरर्थे गरुत्मता॥ १५<br>तस्यापरे चाम्बिकेयः सुमनाश्चैव स स्मृतः।<br>हिरण्याक्षो वराहेण तस्मिञ्शैले निषूदितः॥ १६<br>आम्बिकेयात् परो रम्यः सर्वौषधिनिषेवितः।<br>विभ्राजस्तु समाख्यातः स्फाटिकस्तु महान् गिरिः॥ १७ | इस द्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित श्वेत रंगके सात पर्वत हैं। शाकद्वीप आदि तीन द्वीपोंमें सात-सात पर्वत हैं, जो चारों दिशाओंमें सीधे फैले हुए हैं। ये ही वहाँ वर्षपर्वत कहलाते हैं। ये रत्नाकूराद्रि नामवाले वर्षपर्वत ऊँचे शिखरोंसे युक्त तथा वृक्षोंसे सम्पन्न हैं। ये द्वीप विस्तारके परिमाणकी समानतामें चारों दिशाओंमें फैले हुए हैं और एक ओर क्षीरसागरतक तथा दूसरी ओर लवणसागरतक पहुँच गये हैं। अब मैं शाकद्वीपके सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनमें पहला पर्वत मेरु कहा जाता है, जो देवो, ऋषियों और गन्धर्वोंसे सुसेवित है। वह स्वर्णमय पर्वत पूर्व दिशामें फैला हुआ है। उसका दूसरा नाम 'उदयगिरि' है। वहाँ मेघगण वृष्टि करनेके लिये आते हैं और (जल बरसाकर) चले जाते हैं। उसके पार्श्वभागमें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न जलधार नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है। वह चन्द्र नामसे भी विख्यात है। उसी पर्वतसे इन्द्र नित्य अधिक-से-अधिक जल ग्रहण करते हैं॥ १—१०॥<br><br>वहीं महान् समृद्धिशाली नारद नामक पर्वत है, जिसे दुर्गशैल भी कहते हैं। पूर्वकालमें ये दोनों नारद और दुर्गशैल पर्वत यहीं उत्पन्न हुए थे। उसके बाद श्याम नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें ये सारी प्रजाएँ श्यामलतको प्राप्त हो गयी थीं। श्यामपर्वतके सदृश काले रंगवाला वहीं दुन्दुभि पर्वत भी है, जिसपर प्राचीनकालमें देवताओंद्धारा दुन्दुभिके बजाये जानेपर उसके शब्दसे ही (शत्रुओंकी) मृत्यु हो जाती थी। इसके अन्तःप्रदेशमें रत्नोंके समूह भरे पड़े हैं और यह सेमलके वृक्षोंसे सुशोभित है। उसके बाद महान् अस्ताचल है, जो रजतमय है। उसे सोमक भी कहते हैं। इसी पर्वतपर पूर्वकालमें गरुड़ने अपनी माताके हितार्थ देवताओंद्धारा संचित किये गये अमृतका अपहरण किया था। उसके बाद आम्बिकेय नामक महापर्वत है, जिसे सुमना भी कहते हैं। इसी पर्वतपर वराहभगवान्‌ने हिरण्याक्षक वध किया था। आम्बिकेय पर्वतके बाद सम्पूर्ण ओषधियोंसे परिपूर्ण एवं स्फटिककी शिलाओंसे व्याप्त परम रमणीय महान् पर्वत है, जो विभ्राज नामसे विख्यात है। इससे अग्नि विशेष उद्दीप्त होती है, इसी |

* अध्याय १२२ *४१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः।<br>सैवेह केशवत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च॥ १८कारण इसे विभ्राज कहते हैं। इसीको 'केशव' भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है॥ ११–१८॥
तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः॥ १९<br>द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा।<br>उदयस्योदयं वर्षं जलधारेति विश्रुतम्॥ २०<br>नाम्ना गतभयं नाम वर्षं तत् प्रथमं स्मृतम्।<br>द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम्॥ २१<br>तदेव शैशिरं नाम वर्षं तत् परिकीर्तितम्।<br>नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम्॥ २२<br>श्यामपर्वतवर्षं तदनीचक्रमिति स्मृतम्।<br>आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्॥ २३<br>सोमकस्य शुभं वर्षं विज्ञेयं कुसुमोत्करम्।<br>तदेवासितमित्युक्तं वर्षं सोमकसंज्ञितम्॥ २४<br>आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्।<br>तदेव ध्रुवमित्युक्तं वर्षं विभ्राजसंज्ञितम्॥ २५द्विजवरो ! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षोंका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोंके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिये। उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं। (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विभ्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है॥ १९–२५॥
द्वीपस्य परिणाहं च ह्रस्वदीर्घत्वमेव च।<br>जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये वनस्पतिम्॥ २६<br>शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः।<br>एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः॥ २७<br>विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः॥ २८<br>तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः।<br>द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधाः स्मृताः॥ २९शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूद्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोंमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं। इनमें प्रत्येक वर्षमें समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं।
प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिवजला शुभा।<br>अनुप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता॥ ३०<br>सुकुमारी तपःसिद्धा द्वितीया नामतः सती।<br>नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता॥ ३१<br>शिबिका च चतुर्थी स्याद् द्विविधा च पुनः स्मृता।<br>इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः॥ ३२मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है। इक्षुको पाँचवीं गङ्गा समझना चाहिये। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं।

४१८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वेणुका चामृता चैव षष्ठी सम्परिकीर्तिता ।<br>सुकृता च गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता ॥ ३३<br>एताः सप्त महाभागाः प्रतिवर्षं शिवोदकाः ।<br>भावयन्ति जनं सर्वं शाकद्वीपनिवासिनम् ॥ ३४<br>अभिगच्छन्ति ताश्चान्या नदनद्यः सरांसि च ।<br>बहूदकपरिस्रावा यतो वर्षति वासवः ॥ ३५छठी गङ्गा वेणुका और अमृता नामसे प्रसिद्ध हैं। सातवीं गङ्गाको सुकृता और गभस्ती कहा जाता है। कल्याणमय जलसे परिपूर्ण एवं महान् भाग्यशालिनी ये सातों गङ्गाएँ शाकद्वीपके प्रत्येक वर्षके सभी प्राणियोंको पवित्र करती हैं। दूसरे बड़े-बड़े नद, नदियाँ और सरोवर भी इन्हीं गङ्गाकी धाराओंमें आकर मिलते हैं, जिसके कारण ये सभी अथाह जल बहानेवाली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ २६-३५॥
तासां तु नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।<br>न शक्यं परिसंख्यातुं पुण्यास्ताः सरिदुत्तमाः ॥ ३६<br>ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ।<br>एते शान्तमयाः प्रोक्ताः प्रमोदा ये च वै शिवाः ॥ ३७<br>आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाश्च नवैः सह ।<br>वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुताः ॥ ३८<br>आरोग्या बलिनश्चैव सर्वे मरणवर्जिताः ।<br>अवसर्पिणी न तेष्वस्ति तथैवोत्सर्पिणी पुनः ॥ ३९<br>न तत्रास्ति युगावस्था चतुर्युगकृता क्वचित् ।<br>त्रेतायुगसमः कालः सदा तत्र प्रवर्तते ॥ ४०<br>शाकद्वीपादिषु ज्ञेयं पञ्चस्वेतेषु सर्वशः ।<br>देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकः स्मृतः ॥ ४१<br>न तेषु सङ्करः कश्चिद् वर्णाश्रमकृतः क्वचित् ।<br>धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजाः ॥ ४२<br>न तेषु माया लोभो वा ईर्ष्यासूया भयं कुतः ।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति तद्वै स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ४३<br>कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः ।<br>स्वधर्मेण च धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ४४उन सहायक नदियोंके नाम और परिमाणकी गणना नहीं की जा सकती। ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पुण्यतोया हैं। इनके तटपर निवास करनेवाले जनपदवासी सदा हर्षपूर्वक इनका जल पीते हैं। उनके तटपर स्थित शान्तमय, प्रमोद, शिव, आनन्द, सुख, क्षेमक और नव—ये सात विश्व-विख्यात देश हैं। यहाँ वर्ण और आश्रमके धर्मोंका सुचारूरूपसे पालन होता है। यहाँके सभी निवासी नीरोग, बलवान् और मृत्युसे रहित होते हैं। उनमें अवसर्पिणी (अधोगामिनी) तथा उत्सर्पिणी (ऊर्ध्वगामिनी) क्रिया नहीं होती है। वहाँ कहीं भी चारों युगोंद्वारा की गयी युगव्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा त्रेतायुगके समान ही समय वर्तमान रहता है। शाकद्वीप आदि इन पाँचों द्वीपोंमें ऐसी ही दशा जाननी चाहिये; क्योंकि देशके विचारसे ही कालकी स्वाभाविक गति जानी जाती है। उन द्वीपोंमें कहीं भी वर्ण एवं आश्रमजन्य संकर नहीं पाया जाता। इस प्रकार धर्मका परित्याग न करनेके कारण वहाँकी प्रजा एकान्त सुखका अनुभव करती है। उनमें न तो माया (छल-कपट) है, न लोभ, तब भला ईर्ष्या, असूया और भय कैसे हो सकते हैं? उनमें धर्मका विपर्यय भी नहीं देखा जाता। धर्म तो उनके लिये स्वाभाविक कर्म माना गया है। उनपर कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वहाँ न तो दण्डका विधान है, न कोई दण्ड देनेवाला ही है। वहाँके निवासी धर्मके ज्ञाता हैं, अतः वे स्वधर्मानुसार परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते रहते हैं॥ ३६-४४॥
परिमण्डलस्तु सुमहान् द्वीपो वै कुशसंज्ञकः ।<br>नदीजलैः परिवृतः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः ॥ ४५<br>सर्वधातुविचित्रैश्च मणिविद्रुमभूषितैः ।<br>अन्यैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ ४६कुश नामक द्वीप अत्यन्त विशाल मण्डलवाला है। उसके चारों ओर नदियोंका जल प्रवाहित होता रहता है। वह बादल-सदृश रंगवाले, सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त होनेके कारण रंगे-बिरंगे तथा मणियों और मूँगोंसे विभूषित पर्वतोंद्वारा घिरा हुआ है। उसमें चारों ओर विभिन्न आकारवाले रमणीय जनपद तथा फूल-फलोंसे लदे हुए

* अध्याय १२२ *
४१९

वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सर्वतो धनधान्यवान्।<br>नित्यं पुष्पफलोपेतः सर्वरत्नसमावृतः॥ ४७<br>आवृतः पशुभिः सर्वैर्ग्राम्यारण्यैश्च सर्वशः।<br>आनुपूर्व्यात् समासेन कुशद्वीपं निबोधत॥ ४८<br>अथ तृतीयं वक्ष्यामि कुशद्वीपं च कृत्स्नशः।<br>कुशद्वीपेन क्षीरोदः सर्वतः परिवारितः॥ ४९<br>शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्वितः।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः॥ ५०<br>रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु।<br>द्विनामानश्च ते सर्वे शाकद्वीपे यथा तथा॥ ५१<br>प्रथमः सूर्यसंकाशः कुमुदो नाम पर्वतः।<br>विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः॥ ५२<br>सर्वधातुमयैः शृङ्गैः शिलाजालसमन्वितैः।<br>द्वितीयः पर्वतस्तत्र उन्नतो नाम विश्रुतः॥ ५३<br>हेमपर्वत इत्युक्तः स एव च महीधरः।<br>हरितालमयैः शृङ्गैर्द्वीपमावृत्य सर्वशः॥ ५४<br>बलाहकस्तृतीयस्तु भात्यञ्जनमयो गिरिः।<br>द्युतिमान् नामतः प्रोक्तः स एव च महीधरः॥ ५५<br>चतुर्थः पर्वतो द्रोणो यत्रौषध्यो महाबलाः।<br>विशल्यकरणी चैव मृतसंजीवनी तथा॥ ५६<br>पुष्यवान् नाम सैवोक्तः पर्वतः सुमहाचितः।<br>कङ्कस्तु पञ्चमस्तेषां पर्वतो नाम सारवान्॥ ५७<br>कुशेशय इति प्रोक्तः पुनः स पृथिवीधरः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतो दिव्यवीरुत्समन्वितः॥ ५८<br>षष्ठस्तु पर्वतस्तत्र महिषो मेघसंनिभः।<br>स एव तु पुनः प्रोक्तो हरिरित्यभिविश्रुतः॥ ५९<br>तस्मिन् सोऽग्निर्निवसति महिषो नाम योऽप्सुजः।<br>सप्तमः पर्वतस्तत्र ककुद्मान् स हि भाष्यते॥ ६०वृक्षोंके समूह शोभायमान हो रहे हैं। वह धन-धान्यसे परिपूर्ण है। वह सदा पुष्पों और फलोंसे युक्त रहता है। उसमें सभी प्रकारके रत्न पाये जाते हैं। वह सर्वत्र ग्रामीण एवं जंगली पशुओंसे भरा हुआ है। उस कुशद्वीपका संक्षेपमें आनुपूर्वी वर्णन सुनिये। अब मैं तीसरे कुशद्वीपका समग्ररूपसे वर्णन कर रहा हूँ। कुशद्वीपसे क्षीरसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। यह शाकद्वीपके दुगुने विस्तारसे युक्त है। यहाँ भी रत्नोंकी खानोंसे युक्त सात पर्वत जानना चाहिये। यहाँकी नदियाँ भी रत्नोंकी भण्डार हैं। अब मुझसे उनका नाम सुनिये। जैसे शाकद्वीपमें सभी पर्वतों और नदियोंके दो नाम थे, वैसे ही यहाँके भी पर्वत एवं नदी दो नामवाली हैं। पहला सूर्यके समान चमकीला कुमुद नामक पर्वत है। वह पर्वत विद्रुमोच्चय नामसे भी कहा जाता है। वहाँ दूसरा पर्वत उन्नत नामसे विख्यात है। वह सम्पूर्ण धातुओंसे परिपूर्ण एवं शिला-समूहोंसे समन्वित शिखरोंसे युक्त है। वही पर्वत हेमपर्वत नामसे अभिहित होता है॥ ४५—५३ १/२ ॥<br><br>तीसरा बलाहक पर्वत है, जो अञ्जनके समान काला है। यह अपने हरितालमय शिखरोंसे सर्वत्र द्वीपको आवृत किये हुए है। यही पर्वत द्युतिमान् नामसे भी पुकारा जाता है। चौथा पर्वत द्रोण है। इस महान् गिरिपर विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी आदि महाबलवती ओषधियाँ पायी जाती हैं। वही महान् समृद्धिशाली पर्वत पुष्यवान् नामसे विख्यात है। उनमें पाँचवाँ कङ्क पर्वत है, जो सारयुक्त पदार्थोंसे सम्पन्न है। इस पर्वतको कुशेशय भी कहते हैं। वहाँ छठा महिष पर्वत है, जो मेघ-सदृश काला है। वह दिव्य पुष्पों एवं फलोंसे युक्त तथा दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न है। वही पुनः हरि नामसे विख्यात है। उस पर्वतपर महिष नामक अग्नि, जो जलसे उत्पन्न हुआ है, निवास करता है। वहाँ सातवें पर्वतको ककुद्मान् कहा जाता है। उसीको मन्दर जानना चाहिये। वह