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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
७१ अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
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| * अध्याय ६१ * | २६९ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| चतुर्हस्तां शुभां कुर्याद् वेदीमरिनिषूदन।<br>चतुर्हस्तप्रमाणं च विन्यसेत् तत्र तोरणम्॥ ३७<br><br>आरोप्य कलशं तत्र दिक्पालान् पूजयेत् ततः।<br>छिद्रेण जलसम्पूर्णमथ कृष्णाजिनस्थितः।<br>तस्य धारां च शिरसा धारयेत् सकलां निशाम्॥ ३८<br><br>तथैव विष्णोः शिरसि क्षीरधारां प्रपातयेत्।<br>अरत्निमात्रं कुण्डं च कुर्यात् तत्र त्रिमेखलम्॥ ३९<br><br>योनिवक्त्रं च तत् कृत्वा ब्राह्मणैः यवसर्पिषी।<br>तिलांश्च विष्णुदैवत्यैर्मन्त्रैरेकाग्निवत् तदा॥ ४०<br><br>हुत्वा च वैष्णवं सम्यक् चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निष्पावार्धप्रमाणां वै धारामाज्यस्य पातयेत्॥ ४१ | शत्रुसूदन! उसके भीतर चार हाथकी सुन्दर वेदी बनवाये। वेदीके ऊपर चार हाथका तोरण लगाये। फिर (सुदृढ़ खम्भोंके आधारपर) एक कलश रखे और दिक्पालोंकी पूजा करे, उसमें नीचेकी ओर (उड़दके दानेके बराबर) छेद कर दे। तदनन्तर उसे जलसे भरे और स्वयं उसके नीचे काला मृगचर्म बिछाकर बैठ जाय। कलशसे गिरती हुई धाराको सारी रात अपने मस्तकपर धारण करे। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके सिरपर दूधकी धारा गिराये। फिर उनके निमित्त एक कुण्ड बनवाये, जो हाथभर लंबा, उतना ही चौड़ा और उतना ही गहरा हो। उसके ऊपरी किनारेपर तीन मेखलाएँ बनवाये। उसमें यथास्थान योनि और मुखके चिह्न बनवाये। तदनन्तर ब्राह्मण (कुण्डमें अग्नि प्रज्वलित कर) एकाग्निक उपासककी तरह जौ, घी और तिलोंका श्रीविष्णु-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा हवन करे। फिर गो-दुग्धसे बने हुए चरुका हवन करके विधिपूर्वक वैष्णवयागका सम्पादन करे। फिर कुण्डके मध्यमें मटरकी दालके बराबर मोटी घीकी धारा गिराये॥ ३१—४१॥ |
| जलकुम्भान् महावीर्य स्थापयित्वा त्रयोदश।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तान् सितवस्त्रैरलंकृतान्॥ ४२<br>युक्तानौदुम्बरैः पात्रैः पञ्चरत्नसमन्वितान्।<br>चतुर्भिर्बह्वृचैर्होमस्तत्र कार्य उदङ्मुखैः॥ ४३<br>रुद्रजाप्यंश्चतुर्भिश्च यजुर्वेदपरायणैः।<br>वैष्णवानि तु सामानि चतुरः सामवेदिनः।<br>अरिष्टवर्गसहितान्यभितः परिपाठयेत्॥ ४४<br>एवं द्वादश तान् विप्रान् वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूजयेदङ्गुलीयैश्च कटकैर्हेमसूत्रकैः॥ ४५<br>वासोभिः शयनीयैश्च वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>एवं क्षपातिवाह्या च गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ४६<br>उपाध्यायस्य च पुनर्द्विगुणं सर्वमेव तु।<br>ततः प्रभाते विमले समुत्थाय त्रयोदश॥ ४७<br>गां वै दद्यात् कुरुश्रेष्ठ सौवर्णमुखसंयुताः।<br>पयस्विनीः शीलवतीः कांस्यदोहसमन्विताः॥ ४८<br>रौप्यखुराः सवस्त्राश्च चन्दनेनाभिषेचिताः।<br>तास्तु तेषां ततो भक्त्या भक्ष्यभोज्यान्नतर्पितान्॥ ४९ | महावीर्य! फिर जलसे भरे हुए तेरह कलशोंकी स्थापना करे। वे नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे युक्त और श्वेत वस्त्रोंसे अलंकृत होने चाहिये। उनके साथ उदुम्बर-पात्र तथा पञ्चरत्नका होना भी आवश्यक है। वहाँ चार ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तरकी ओर मुख करके हवन करें, चार यजुर्वेदी विप्र रुद्राध्यायका पाठ करें तथा चार सामवेदी ब्राह्मण चारों ओरसे अरिष्टवर्गसहित वैष्णवसामका गान करते रहें। इस प्रकार उपर्युक्त बारह ब्राह्मणोंको वस्त्र, पुष्प, चन्दन, अँगूठी, कड़े, सोनेकी जंजीर, वस्त्र तथा शय्या आदि देकर उनका पूर्ण सत्कार करे। इस कार्यमें धनकी कृपणता न करे। इस प्रकार गीत और माङ्गलिक शब्दोंके साथ रात्रि व्यतीत करे। उपाध्याय (आचार्य या पुरोहित)-को सब वस्तुएँ अन्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा दूनी मात्रामें अर्पण करे। कुरुश्रेष्ठ! रात्रिके बाद जब निर्मल प्रभातका उदय हो, तब शयनसे उठकर (नित्यकर्मके पश्चात्) मुखपर सोनेके पत्रसे विभूषित की हुई तेरह गौएँ दान करनी चाहिये। वे सब-की-सब दूध देनेवाली और सीधी हों। उनके खुर चाँदीसे मँढ़े हुए हों तथा उन सबको वस्त्र ओढ़ाकर चन्दनसे विभूषित किया गया हो। गौओंके साथ काँसेका दोहनपात्र भी होना चाहिये। गोदानके पश्चात् उन सभी ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे |
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| २७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| कृत्वा वै ब्राह्मणान् सर्वानन्नैर्नानाविधैस्तथा।<br>भुक्त्वा चाक्षारलवणमात्मना च विसर्जयेत्॥ ५० | तृप्त करके स्वयं भी क्षार लवणसे रहित अन्नका भोजन करके ब्राह्मणोंको विदा करे॥४२—५०॥ |
| अनुगम्य पदान्यष्टौ पुत्रभार्यासमन्वितः।<br>प्रीयतामत्र देवेशः केशवः क्लेशनाशनः॥ ५१ | पुत्र और स्त्रीके साथ आठ पगोंतक उनके पीछे-पीछे जाय और इस प्रकार प्रार्थना करे—'हमारे इस कार्यसे देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीविष्णु, जो सबका क्लेश दूर करनेवाले हैं, प्रसन्न हों। |
| शिवस्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये शिवः।<br>यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्ति चायुषः॥ ५२ | श्रीशिवके हृदयमें श्रीविष्णु हैं और श्रीविष्णुके हृदयमें श्रीशिव विराजमान हैं। मैं यदि इन दोनोंमें अन्तर न देखता होऊँ तो इस धारणासे मेरी आयु बढ़े तथा कल्याण हो।' यह कहकर |
| एवमुच्चार्य तान् कुम्भान् गाश्चैव शयनानि च।<br>वासांसि चैव सर्वेषां गृहाणि प्रापयेद् बुधः॥ ५३ | बुद्धिमान् व्रती उन कलशों, गौओं, शय्याओं तथा वस्त्रोंको सब ब्राह्मणके घर पहुँचा दे। |
| अभावे बहुशय्यानामेकामपि सुसंस्कृताम्।<br>शय्यां दद्याद् द्विजातेश्च सर्वोपस्करसंयुताम्॥ ५४ | अधिक शय्याएँ सुलभ न हों तो गृहस्थ पुरुष एक ही सुसज्जित एवं सभी उपकरणोंसे सम्पन्न शय्या ब्राह्मणको दान करे। |
| इतिहासपुराणानि वाचयित्वातिवाहयेत्।<br>तद्दिनं नरशार्दूल य इच्छेद् विपुलां श्रियम्॥ ५५ | नरसिंह! जिसे विपुल लक्ष्मीकी अभिलाषा हो, उसे वह दिन इतिहास और पुराणोंके श्रवणमें ही बिताना चाहिये। |
| तस्मात् त्वं सत्त्वमालम्ब्य भीमसेन विमत्सरः।<br>कुरु व्रतमिदं सम्यक् स्नेहात् तव मयेरितम्॥ ५६ | अतः भीमसेन! तुम भी सत्त्वगुणका आश्रय ले, मात्सर्यका त्यागकर इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान करो। (यह बहुत गुप्त व्रत है, किंतु) स्नेहवश मैंने तुम्हें बता दिया है। |
| त्वया कृतमिदं वीर त्वन्नामाख्यं भविष्यति।<br>सा भीमद्वादशी ह्येषा सर्वपापहरा शुभा।<br>या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते॥ ५७ | वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगा। इसे लोग 'भीमद्वादशी' कहेंगे। यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी। प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था। |
| त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन्<br>कल्पे महावीरवरप्रधान।<br>यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं<br>विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्॥ ५८ | महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो। इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है॥५१–५८॥ |
| कृत्वा च यामप्सरसामधीशा<br>वेश्या कृता ह्यन्यभवान्तरेषु।<br>आभीरकन्यातिकुतूहलेन<br>सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ५९ | जन्मान्तरमें एक अहीरकी कन्याने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वेश्या अप्सराओंकी अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोकमें उर्वशी नामसे विख्यात है। |
| जातातथवा वैश्यकुलोद्भवापि<br>पुलोमकन्या पुरूहूतपत्नी।<br>तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं<br>मम प्रिया सम्प्रति सत्यभामा॥ ६० | इसी प्रकार वैश्यकुलमें उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्याने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव)-की पुत्रीरूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रकी पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान-कालमें जो उसकी सेविका थी, |