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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२४१- अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल

९१६ * मत्स्यपुराण *


| पशवः पक्षिणश्चैव तथैव च सरीसृपाः।<br>विनाशं तस्य देशस्य कुलस्य च विनिर्दिशेत्॥ ३<br>विवासयेत् तान् नृपतिः स्वराष्ट्रात्<br>स्त्रियश्च पूज्याश्च ततो द्विजेन्द्राः।<br>किमिच्छकैर्ब्राह्मणतर्पणैश्च<br>लोके ततः शान्तिमुपैति पापम्॥ ४ | उसी प्रकार वहाँके पशु, पक्षी और रेंगनेवाले जन्तु भी बच्चे देने लगते हैं, तब उस देश और कुलका विनाश कहना चाहिये। ऐसे उपद्रवोंके घटित होनेपर राजा अपने राष्ट्रसे उन पैदा होनेवाली संतानों और स्त्रियोंको निर्वासित कर दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा करे। इस प्रकार इच्छानुसार ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे लोकमें पाप शान्तिको प्राप्त होता है॥१—४॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ प्रसववैकृत्यं नाम पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्तिप्रसङ्गमें प्रसववैकृत्य नामक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३५॥


दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय

उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति

| गर्ग उवाच<br>यान्ति यानान्ययुक्तानि युक्तान्यपि न यान्ति च।<br>चोद्यमानानि तत्र स्यान्महद्भयमुपस्थितम्॥ १<br>वाद्यमाना न वाद्यन्ते वाद्यन्ते चाप्यनाहताः।<br>अचलाश्च चलन्त्येव न चलन्ति चलानि च॥ २<br>आकाशे तूर्यनादाश्च गीतगन्धर्वनिःस्वनाः।<br>काष्ठदर्वीकुठारादि विकारं कुरुते यदि॥ ३<br>गावो लाङ्गूलसङ्घैश्च स्त्रियः स्त्री च विघातयेत्।<br>उपस्कारादिविकृतौ घोरं शस्त्रभयं भवेत्॥ ४<br>वायोस्तु पूजां द्विज सक्तुभिश्च<br>कृत्वा नियुक्तांश्च जपेच्च मन्त्रान्।<br>दद्यात् प्रभूतं परमान्नमत्र<br>सदक्षिणं तेन शमोऽस्य भूयात्॥ ५ | **गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जिस देशमें रथादि घोड़ोंके बिना जोते ही चलने लगते हैं और घोड़ोंके जोतनेपर एवं उन्हें हाँकनेपर भी नहीं चलते, वहाँ महान् भय उपस्थित होनेवाला है। बिना बजाये ही बाजे बजने लगते हैं और बजानेपर नहीं बजते, अचल वस्तुएँ चलने लगती हैं और चल अचल हो जाती हैं, आकाशमें तुरुहीकी ध्वनि और गन्धर्वोंकी गीतोंका शब्द सुनायी पड़ने लगता है, काष्ठ, करछुल एवं फावड़े आदिमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं, गौएँ पूँछसे एक-दूसरेको मारने लगती हैं, स्त्रियाँ एक-दूसरेकी हत्या करने लगती हैं और घरेलू वस्तुओंमें भी विकार उत्पन्न हो जाते हैं, उस देशमें शस्त्रास्त्रोंसे घोर भय उत्पन्न होता है। ऐसे उत्पातोंके घटित होनेपर सत्तूसे वायुदेवकी पूजा करके उनके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और प्रचुरपरिमाणमें दक्षिणासहित परमोत्तम अन्नका दान देना चाहिये। इसीसे उस उत्पातका शमन होता है॥१—५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुपस्करवैकृत्यं नाम षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें उपस्करशान्ति नामक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३६॥

* अध्याय २३७ *१९७

दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय

पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति

गर्ग उवाच
प्रविशन्ति यदा ग्राममारण्या मृगपक्षिणः।<br>अरण्यं यान्ति वा ग्राम्याः स्थलं यान्ति जलोद्भवाः॥ १<br>स्थलजाश्च जलं यान्ति घोरं वाशन्ति निर्भयाः।<br>राजद्वारे पुरद्वारे शिवाश्चाप्यशिवप्रदाः॥ २<br>दिवा रात्रिंचरा वापि रात्रावपि दिवाचराः।<br>ग्राम्यास्त्यजन्ति ग्रामं च शून्यतां तस्य निर्दिशेत्॥ ३<br>दीप्ता वाशन्ति संध्यासु मण्डलानि च कुर्वते।<br>वाशन्ति विस्वरं यत्र तदाप्येतत्फलं लभेत्॥ ४<br>प्रदोषे कुक्कुटो वाशेद्धेमन्ते वापि कोकिलः।<br>अर्कोदयेऽर्काभिमुखी शिवा रौति भयं वदेत्॥ ५<br>गृहं कपोतः प्रविशेत् क्रव्यादो मूर्ध्नि लीयते।<br>मधु वा मक्षिकाः कुर्युर्मृत्युर्गृहपतेर्भवेत्॥ ६<br>प्राकारद्वारगेहेषु तोरणापणवीथिषु।<br>केतुच्छत्रायुधाद्येषु क्रव्यादं प्रपतेद् यदि॥ ७<br>जायन्ते वाथ वल्मीका मधु वा स्यन्दते यदि।<br>स देशो नाशमायाति राजा वा म्रियते तथा॥ ८गर्गजीने कहा— ब्रह्मन्! जब जंगली पशु-पक्षी ग्रामोंमें प्रवेश करने लगें या ग्रामीण पशु-पक्षी जंगलोंमें चले जायँ, जलमें रहनेवाले जीव-जन्तु भूमिपर रेंगने लगें या भूमिके जीव जलमें चले जायँ, अमङ्गलदायक शृगाल राजद्वार या नगरद्वारपर निर्भय होकर बोलना आरम्भ कर दें, दिनमें घूमनेवाले रात्रिमें और रात्रिमें घूमनेवाले दिनमें घूमने लगें तथा ग्राममें रहनेवाले जीव ग्रामको छोड़ दें, तब उस ग्रामकी शून्यताका निर्देश करना चाहिये। जब ग्रामोंमें पशु आदि जीवगण क्रोधोन्मत्त हो मण्डल बनाकर क्रूर स्वरमें चिल्लाने लगें, तब भी यही फल प्राप्त होता है। सायंकालमें मुर्गा बाँग देने लगे, हेमन्त-ऋतुमें कोकिल बोले और सूर्योदयके समय सूर्याभिमुखी हो शृगाली चिल्लाये तो भयका आगमन कहना चाहिये। घरमें कबूतर घुस आये, मस्तकपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय और घरके भीतर मधुमक्खियाँ छत्ते लगायें तो उस घरके स्वामीकी मृत्यु होती है। यदि दुर्गादिके परकोटे, प्रवेशद्वार, राजभवन, तोरण (सिंहद्वार), बाजार, गली, पताका, ध्वज और अस्त्र-शस्त्रादिपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय अथवा घरमें बिमवट हो जाय या छत्तेसे मधु चूने लगे तो उस देशका विनाश हो जाता है तथा राजाकी मृत्यु हो जाती है॥ १—८॥
मूषकाञ्शलभान् दृष्ट्वा प्रभूतं क्षुद्रयं भवेत्।<br>काष्ठोल्मुकास्थिशृङ्गाढ्याः श्वानो मर्कटवेदनाः॥ ९<br>दुर्भिक्षं वेदना ज्ञेया काका धान्यमुखा यदि।<br>जनानभिभवन्तीह निर्भया रणवेदिनः॥ १०<br>काको मैथुनसक्तश्च श्वेतस्तु यदि दृश्यते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स च देशो विनश्यति॥ ११<br>उलूको वाशते यत्र नृपद्वारे तथा गृहे।<br>ज्ञेयो गृहपतेर्मृत्युर्धननाशस्तथैव च॥ १२चूहे और शलभ अधिक परिमाणमें दिखायी पड़ें तो दुर्भिक्ष पड़ता है। लकड़ीके लुआठे, हड्डियाँ, सींगवाले जानवर, कुत्ते और बन्दरोंकी अधिकता होनेपर देशमें व्याधियाँ फैलनेका भय रहता है। यदि कौए चोंचमें अन्न लेकर निर्भयतापूर्वक लोगोंपर टूट पड़ते हों तो दुर्भिक्ष और रण छिड़नेकी सम्भावना समझनी चाहिये। यदि श्वेत कौआ मैथुन करते हुए दिखलायी पड़ जाय तो उस देशका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है। जहाँ राजाके द्वार तथा घरपर उल्लू बोलता हो, वहाँ उस घरके स्वामीकी मृत्यु तथा सम्पत्तिका विनाश जानना चाहिये।