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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१८२- अविमुक्त-माहात्म्य

* अध्याय १८० *७४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणं<br>प्रमत्तनृत्याप्सरसां गणाकुलम् ।<br>प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं<br>प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् ॥ २९<br>मृगेन्द्रनादाकुलसत्त्वमानसैः<br>क्वचित्क्वचिद्द्वन्द्वकदम्बकैर्मृगैः ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः<br>सरस्तटाकैरुपशोभितं क्वचित् ॥ ३०कहीं विद्याधर, सिद्ध और चारण राग अलाप रहे हैं तो कहीं अप्सराओंका दल उन्मत्त होकर नाच रहा है। इसमें नाना प्रकारके पक्षी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। यह मतवाले हारीतसमूहसे निनादित है। कहीं-कहीं झुंड-के-झुंड मृगके जोड़े सिंहकी दहाड़से व्याकुल मनवाले होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। कहीं ऐसे तालाब शोभा पा रहे हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके सुन्दर कमल खिले हुए हैं॥ २४—३०॥
निबिडनिचुलनीलं नीलकण्ठाभिरामं<br>मदमुदितविहङ्गव्रातनादाभिरामम् ।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं<br>नवकिसलयशोभाशोभितप्रान्तशाखम् ॥ ३१यह घने बेंतकी लताओं एवं नीलमयूरोंसे सुशोभित और मदसे उन्मत्त हुए पक्षिसमूहोंके नादसे मनोरम लग रहा है। इसके खिले हुए वृक्षोंकी शाखाओंमें मतवाले भौंरे छिपे हुए हैं और उन शाखाओंके प्रान्तभाग नये किसलयोंकी शोभासे सुशोभित हैं।
क्वचिच्च दन्तिक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिबर्हिणं<br>निषेवितं किम्पुरुषव्रजैः क्वचित् ॥ ३२कहीं सुन्दर वृक्ष हाथियोंके दाँतोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं। कहीं लताएँ मनोहर वृक्षोंका आलिङ्गन कर रही हैं। कहीं भोगसे अलसाये हुए मयूरगण मन्दगतिसे विचरण कर रहे हैं। कहीं किम्पुरुषगण निवास कर रहे हैं।
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रंकषैः सितमनोहरचारुरूपैः ।<br>आकीर्णपुष्यनिकुरम्बविमुक्तहासै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः ॥ ३३जो कबूतरोंकी ध्वनिसे निनादित हो रहे थे, जिनका उज्ज्वल मनोहर रूप है, जिनपर बिखरे हुए पुष्पसमूह हासकी छटा दिखा रहे हैं और जिनपर अनेकों देवकुल निवास कर रहे हैं, उन गगनचुम्बी मनोहर शिखरोंसे सुशोभित हो रहा है।
फुल्लोत्पलागुरुसहस्रवितानयुक्तै-<br>स्तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम् ।<br>मार्गान्तरागलितपुष्यविचित्रभक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्विहगैरुपेतम् ॥ ३४खिले हुए कमल और अगुरुके सहस्रों वितानोंसे युक्त जलाशयोंसे जिसका देवमार्ग सुशोभित हो रहा है। उन मार्गोंपर पुष्प बिखरे हुए हैं और वह विचित्र भक्तिसे युक्त पक्षियोंसे सेवित गुल्मों और वृक्षोंसे युक्त है।
तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्यस्तबकभरनतप्रान्तशाखैरशोकै-<br>र्मत्तालिवातगीतश्रुतिसुखजननैर्भासितान्तर्मनोज्ञैः ।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुमप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुमद्भाङ्कुराग्रम् ॥ ३५जिनके अग्रभाग ऊँचे हैं, जिनकी शाखाओंका प्रान्तभाग नीले पुष्पोंके गुच्छोंके भारसे झुके हुए हैं तथा जिनकी शाखाओंके अन्तर्भागमें लीन मतवाले भ्रमरसमूहोंकी श्रवण-सुखदायिनी मनोहर गीत हो रही है, ऐसे अशोकवृक्षोंसे युक्त है। रात्रिमें यह अपने खिले हुए तिलक-वृक्षोंसे चन्द्रमाकी चाँदनीके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। कहीं वृक्षोंकी छायामें सोये हुए, सोकर जगे हुए तथा बैठे हुए हरिणसमूहोंद्वारा काटे गये दूर्वाङ्कुरोंके अग्रभागसे युक्त

७४८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अर्थ
हंसानां पक्षपातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रविकचकदलीवाटनृत्यन्मयूरम्।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदपि पतितै रञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विकीर्णप्रमुदितविलसन्मत्तहारीतवृक्षम्॥ ३६<br>सारङ्गैः क्वचिदपि सेवितप्रदेशं<br>संछन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किंनराङ्गनाभिः<br>क्षीबाभिः सुमधुरगीतवृक्षखण्डम्॥ ३७है। कहीं हंसोंके पंख हिलानेसे चञ्चल हुए कमलोंसे युक्त, निर्मल एवं विस्तीर्ण जलराशि शोभा पा रही है। कहीं जलाशयोंके तटपर उगे हुए फूलोंसे सम्पन्न कदलीके लतामण्डपोंमें मयूर नृत्य कर रहे हैं। कहीं झड़कर गिरे हुए चन्द्रकयुक्त मयूरोंके पंखोंसे भूतल अनुरञ्जित हो रहा है। जगह-जगह पृथक्-पृथक् यूथ बनाकर हर्षपूर्वक विलास करते हुए मतवाले हारीत पक्षियोंसे युक्त वृक्ष शोभा पा रहे हैं। किसी प्रदेशमें सारङ्ग जातिके मृग बैठे हुए हैं। कुछ भाग विचित्र पुष्पसमूहोंसे आच्छादित है। कहीं उन्मत्त हुई किंनराङ्गनाएँ हर्षपूर्वक सुमधुर गीत आलाप रही हैं, जिनसे वृक्षखण्ड मुखरित हो रहा है॥ ३१—३७॥
संसृष्टैः क्वचिदुपलिसकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात् फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ ३८कहीं वृक्षोंके नीचे मुनियोंके आवासस्थल बने हैं, जिनकी भूमि लिपी-पुती हुई है और उनपर पुष्प बिखेरा हुआ है। कहीं जिनमें जड़से लेकर अन्ततक फल लदे हुए हैं, ऐसे विशाल एवं ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे युक्त है।
फुल्लातिमुक्तकलतागृहसिद्धलीलं<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुरनादरम्यम् ।<br>रम्यप्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीषु स्खलिताम्बुकदम्बपुष्पम्॥ ३९कहीं खिली हुई अतिमुक्तक लताके बने हुए सिद्धोंके गृह शोभा पा रहे हैं, जिनमें सिद्धाङ्गनाओंके स्वर्णमय नूपुरोंका सुरम्य नाद हो रहा है। कहीं मनोहर प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर भँवरे मँडरा रहे हैं। कहीं भ्रमर-समूहोंके पंखोंके आघातसे कदम्बके पुष्प नीचे गिर रहे हैं।
पुष्पोत्करानिलविधूर्णितपादपाग्र-<br>मग्रेसरो भुवि निपातितवंशगुल्मम्।<br>गुल्मान्तरप्रभृतिलीनमृगीसमूहं<br>सम्मुह्यतां तनुभृतामपवर्गदात् ॥ ४०कहीं पुष्पसमूहका स्पर्श करके बहती हुई वायु बड़े-बड़े वृक्षोंके ऊपरकी शाखाओंको झुका दे रही है, जिनके आघातसे बाँसोंके झुरमुट भूतलपर गिर जा रहे हैं। उन गुल्मोंके अन्तर्गत हरिणियोंका समूह छिपा हुआ है। इस प्रकार यह उपवन मोहग्रस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।
चन्द्रांशुजालधवलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकराभनिचयैरथ कर्णिकारैः<br>फुल्लारविन्दरचितं सुविशालशाखैः ॥ ४१यहाँ कहीं चन्द्रमाकी किरणों-सरीखे उज्ज्वल मनोहर तिलकके वृक्ष, कहीं सिंदूर, कुंकुम और कुसुम्भ-जैसे लाल रंगवाले अशोकके वृक्ष, कहीं स्वर्णके समान पीले एवं लम्बी शाखाओंवाले कनेरके वृक्ष और कहीं खिले हुए कमलके पुष्प शोभा पा रहे हैं।
क्वचिद्रजतपर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसंकाशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ४२इस उपवनकी भूमि कहीं चाँदीके पत्र-जैसे श्वेत, कहीं मूँगे-सरीखे लाल और कहीं स्वर्ण-सदृश पीले पुष्पोंसे आच्छादित है।
पुंनागेषु द्विजगणविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनमितम् ।<br>रम्योपान्तश्रमहरपवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ४३कहीं पुंनागके वृक्षोंपर पक्षिगण चहचहा रहे हैं। कहीं लाल अशोककी डालियाँ पुष्प-गुच्छोंके भारसे झुक गयी हैं। रमणीय एवं श्रमहारी पवन शरीरका स्पर्श करके बह रहा है। उत्फुल्ल कमलपुष्पोंपर भौंरें गुञ्जार कर रहे हैं।