मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८३- अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर
| * अध्याय १८० * | ७४९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरिपुत्र्याः सार्द्धमिष्टैर्गणेशैः ।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्यपुष्ट-<br>मुपवनतरुरम्यं दर्शयामास देव्याः ॥ ४४ | इस प्रकार समस्त भुवनोंके पालक जगदीश्वर शंकरने अपने प्रिय गणेश्वरोंको साथ लेकर उस विविध प्रकारके विशाल वृक्षोंसे युक्त तथा उन्मत्त और हर्ष प्रदान करनेवाले उपवनको हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवीको दिखाया ॥ ३८—४४ ॥ |
| देव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव शोभया परया युतम् ।<br>क्षेत्रस्य तु गुणान् सर्वान् पुनर्वक्तुमिहार्हसि ॥ ४५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य तत्त्वतः ।<br>श्रुत्वापि हि न मे तृप्तिरतो भूयो वदस्व मे ॥ ४६ | देवीने पूछा— देव! अनुपम शोभासे युक्त इस उद्यानको तो आपने दिखला दिया। अब आप पुनः इस क्षेत्रके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कीजिये। इस क्षेत्रका तथा अविमुक्तका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥ |
| देवदेव उवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम ।<br>सर्वेषामेव भूतानां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥ ४७<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः ।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४८<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः ।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगकूजिते ॥ ४९<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते ।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे ॥ ५०<br>रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु ।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः ॥ ५१<br>यथा मोक्षमिहाप्नोति ह्यान्यत्र न तथा क्वचित् ।<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत् ॥ ५२<br>ब्रह्मादयस्तु जानन्ति येऽपि सिद्धा मुमुक्षवः ।<br>अतः प्रियतमं क्षेत्रं तस्माच्चेह रतिर्मम ॥ ५३<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन ।<br>महत् क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिदं स्मृतम् ॥ ५४<br>नैमिषेऽथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे ।<br>स्नानात् संसेविताद् वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः ॥ ५५<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद् विशिष्यते ।<br>प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ॥ ५६ | देवाधिदेव शंकर बोले— देवि! मेरा यह वाराणसी क्षेत्र परम गुह्य है। यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका कारण है। देवि! इस क्षेत्रमें नाना प्रकारका स्वरूप धारण करनेवाले नित्य मेरे लोकके अभिलाषी मुक्तात्मा जितेन्द्रिय सिद्धगण मेरा व्रत धारण कर परम योगका अभ्यास करते हैं। अब इस नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त, अनेकविध पक्षियोंद्वारा निनादित, कमल और उत्पलके पुष्पोंसे भरे हुए सरोवरोंसे सुशोभित और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सदा संसेवित इस शुभमय उपवनमें जिस हेतुसे मुझे सदा निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मेरा भक्त मुझमें मन लगाकर और सारी क्रियाएँ मुझमें समर्पित कर इस क्षेत्रमें जैसी सुगमतासे मोक्ष प्राप्त कर सकता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त कर सकता। यह मेरी महान् दिव्य नगरी गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि जो सिद्ध मुमुक्षु हैं, वे इसके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं। अतः यह क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और इसी कारण इसके प्रति मेरी विशेष रति है। चूँकि मैं कभी भी इस विमुक्त क्षेत्रका त्याग नहीं करता, इसलिये यह महान् क्षेत्र अविमुक्त नामसे कहा जाता है। नैमिष, कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्करमें निवास करने तथा स्नान करनेसे यदि मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती तो इस क्षेत्रमें वह प्राप्त हो जाता है, इसीलिये यह उनसे विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा मेरा आश्रय ग्रहण करनेसे काशीमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ४७—५६ ॥ |
| ७५० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादिदमेव महत् स्मृतम्।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं योगतः स महातपाः॥ ५७<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् भक्त्या च मम भावनात्।<br>जैगीषव्यो मुनिश्रेष्ठो योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५८<br>ध्यायत्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्द्रीप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानाम्पि दुर्लभम्॥ ५९<br>अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभो देवदानवैः॥ ६०<br>तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि भोगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ६१<br>कुबेरस्तु महायक्षस्तथा सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंवसनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ६२<br>संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्त्या ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ६३<br>पाराशरसुतो योगी ऋषिर्व्यासो महातपाः।<br>धर्मकर्ता भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ६४<br>रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वायुर्दिवाकरः॥ ६५<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः।<br>उपासन्ते महात्मानः सर्वे मामेव सुव्रते॥ ६६<br>अन्येऽपि योगिनः सिद्धाश्छन्नरूपा महाव्रताः।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा॥ ६७ | यह तीर्थश्रेष्ठ प्रयागसे भी महान् कहा जाता है। महातपस्वी जैगीषव्य मुनि यहाँ परा सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। मुनिश्रेष्ठ जैगीषव्य इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा भक्तिपूर्वक मेरी भावना करनेसे योगियोंके स्थानको प्राप्त कर लिये हैं। वहाँ नित्य मेरा ध्यान करनेसे योगाग्नि अत्यन्त उदीप्त हो जाती है, जिससे देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। यहाँ सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता एवं अव्यक्त चिह्नवाले मुनियोंद्वारा देवों और दानवोंके लिये दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया जाता है। मैं ऐसे मुनियोंको सर्वोत्तम भोग, ऐश्वर्य, अपना सायुज्य और मनोवाञ्छित स्थान प्रदान करता हूँ। महायक्ष कुबेर, जिन्होंने अपनी सारी क्रियाएँ मुझे अर्पित कर दी थीं, इस क्षेत्रमें निवास करनेके कारण ही गणाधिपत्यको प्राप्त हुए हैं। देवि! जो संवर्तनामक ऋषि होंगे, वे भी मेरे ही भक्त हैं। वे यहीं मेरी आराधना करके सर्वश्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करेंगे। पद्माक्षि! जो योगसम्पन्न, धर्मके नियामक और वैदिक कर्मकाण्डके प्रवर्तक होंगे, महातपस्वी मुनिश्रेष्ठ पराशरनन्दन महर्षि व्यास भी इसी क्षेत्रमें निवास करेंगे। सुव्रते! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, वायु, सूर्य, देवराज इन्द्र तथा जो अन्यान्य देवता हैं, सभी महात्मा मेरी ही उपासना करते हैं। दूसरे भी योगी, सिद्ध, गुप्त रूपधारी एवं महाव्रती अनन्यचित्त होकर यहाँ सदा मेरी उपासना करते हैं॥ ५७—६७॥ |
| अलर्कश्च पुरीमेतां मत्प्रसादादवाप्स्यति।<br>स चैनां पूर्ववत्कृत्वा चातुर्वर्ण्याश्रमाकुलाम्॥ ६८<br>स्फीतां जनसमाकीर्णां भक्त्या च सुचिरं नृपः।<br>मयि सर्वार्पितप्राणो मामेव प्रतिपत्स्यते॥ ६९<br>ततः प्रभृति चार्वङ्गि येऽपि क्षेत्रनिवासिनः।<br>गृहिणो लिङ्गिनो वापि मद्भक्ता मत्परायणाः॥ ७०<br>मत्प्रसादाद् भजिष्यन्ति मोक्षं परमदुर्लभम्।<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः॥ ७१<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारं न पुनविशेत्।<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः॥ ७२ | अलर्क भी मेरी कृपासे इस पुरीको प्राप्त करेंगे। वे नरेश इसे पहलेकी तरह चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त, समृद्धिशालिनी और मनुष्योंसे परिपूर्ण कर देंगे। तत्पश्चात् चिरकालतक भक्तिपूर्वक मुझमें प्राणोंसहित अपना सर्वस्व समर्पित करके मुझे ही प्राप्त कर लेंगे। सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तभीसे इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले जो भी मत्परायण मेरे भक्त, चाहे वे गृहस्थ हों अथवा संन्यासी, मेरी कृपासे परम दुर्लभ मोक्षको प्राप्त कर लेंगे। जो मनुष्य धर्मत्यागका प्रेमी और विषयोंमें आसक्त चित्तवाला भी हो, वह भी यदि इस क्षेत्रमें प्राणत्याग करता है तो उसे पुनः संसारमें नहीं आना पड़ता। सुव्रते! फिर जो ममतारहित, धैर्यशाली, पराक्रमी, जितेन्द्रिय, |
| * अध्याय १८० * | ७५१ |
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| व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः।<br>देहभङ्गं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः।<br>गता एव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते॥ ७३<br>जन्मान्तरसहस्रेषु युञ्जन् योगमवाप्नुयात्।<br>तमिहैव परं मोक्षं मरणादधिगच्छति॥ ७४<br>एतत् संक्षेपतो देवि क्षेत्रस्यास्य महत्फलम्।<br>अविमुक्तस्य कथितं मया ते गुह्यमुत्तमम्॥ ७५<br>अतः परतरं नास्ति सिद्धिगुह्यं महेश्वरि।<br>एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा ये च योगेश्वरा भुवि॥ ७६<br>एतदेव परं स्थानमेतदेव परं शिवम्।<br>एतदेव परं ब्रह्म एतदेव परं पदम्॥ ७७<br>वाराणसी तु भुवनत्रयसारभूता<br>रम्या सदा मम पुरी गिरिराजपुत्रि।<br>अत्रागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि<br>पापक्षयाद् विरजसः प्रतिभान्ति मर्त्याः॥ ७८<br>एतत्स्मृतं प्रियतमं मम देवि नित्यं<br>क्षेत्रं विचित्रतरुगुल्मलतासुपुष्पम्।<br>अस्मिन् मृतास्तनुभृतः पदमाप्नुवन्ति<br>मूर्खागमेन रहितापि न संशयोऽत्र॥ ७९ | व्रतधारी, आरम्भरहित, बुद्धिमान् और आसक्तिहीन हैं, वे सभी मुझमें मन लगाकर यहाँ शरीरका त्याग करके मेरी कृपासे परम मोक्षको ही प्राप्त हुए हैं। हजारों जन्मोंमें योगका अभ्यास करनेसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह परम मोक्ष यहाँ मरनेसे ही प्राप्त हो जाता है। देवि! मैंने तुमसे इस अविमुक्त क्षेत्रके इस उत्तम, गुह्य एवं महान् फलको संक्षेपरूपसे वर्णन किया है। महेश्वरि! भूतलपर इससे बढ़कर सिद्धिदाता दूसरा कोई गुह्य स्थान नहीं है। इसे जो योगेश्वर एवं योगके ज्ञाता हैं, वे ही जानते हैं। यही परमोत्कृष्ट स्थान है, यही परम कल्याणकारक है, यही परब्रह्म है और यही परमपद है। गिरिराजपुत्रि! मेरी रमणीय वाराणसीपुरी तो सदा त्रिभुवनकी सारभूता है। अनेकों प्रकारके पाप करनेवाले मानव भी यहाँ आकर पापोंके नष्ट हो जानेसे पापमुक्त हो सुशोभित होने लगते हैं। देवि! विचित्र वृक्षों, गुल्मों, लताओं और सुगन्धित पुष्पोंसे युक्त यह क्षेत्र मेरे लिये सदा प्रियतम कहा जाता है। वेदाध्ययनसे रहित मूर्ख प्राणी भी यदि यहाँ मरते हैं तो परम पदको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७९॥ |
| सूत उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे देवो देवीं प्राह गिरीन्द्रजाम्।<br>दातुं प्रसादाद् यक्षाय वरं भक्ताय भामिनि॥ ८०<br>भक्तो मम वरारोहे तपसा हतकिल्बिषः।<br>अहो वरमसौ लब्धुमस्मत्तो भुवनेश्वरि॥ ८१<br>एवमुक्त्वा ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसन्ततः॥ ८२<br>ततस्तं गुह्यकं देवी दृष्टिपातैर्निरीक्षती।<br>श्वेतवर्णं विचर्माणं स्नायुबद्धास्थिपञ्जरम्॥ ८३<br>देवी प्राह तदा देवं दर्शयन्ती च गुह्यकम्।<br>सत्यं नाम भवानुग्रो देवैरुक्तस्तु शङ्कर॥ ८४<br>ईदृशे चास्य तपसि न प्रयच्छसि यद्वरम्।<br>अतः क्षेत्रे महादेव पुण्ये सम्यगुपासिते॥ ८५<br>कथमेवं परिक्लेशं प्राप्तो यक्षकुमारकः।<br>शीघ्रमस्य वरं यच्छ प्रसादात् परमेश्वर॥ ८६<br>एवं मन्वादयो देव वदन्ति परमर्षयः।<br>रुष्टाद् वा चाथ तुष्टाद् वा सिद्धिस्तुभयतो भवेत्।<br>भोगप्राप्तिस्तथा राज्यमन्ते मोक्षः सदाशिवात्॥ ८७ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसी बीच महादेवजीने गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीसे भक्तराज यक्षको कृपारूप वर प्रदान करनेके लिये यों कहा—'भामिनि! वह मेरा भक्त है। वरारोहे! तपस्यासे उसके पाप नष्ट हो चुके हैं, अतः भुवनेश्वरि! वह अब हमलोगोंसे वर प्राप्त करनेका अधिकारी हो गया है।' तदनन्तर ऐसा कहकर जगदीश्वर महादेव पार्वतीदेवीके साथ उस स्थानके लिये चल पड़े, जहाँ धमनियोंसे व्याप्त दुर्बल यक्ष वर्तमान था। वहाँ पहुँचकर पार्वती देवी दृष्टि घुमाकर उस गुह्यककी ओर देखने लगीं, जिसका शरीर श्वेत रङ्गका हो गया था, चमड़ा गल गया था और अस्थिपंजर नसोंसे आबद्ध था। तब उस गुह्यकको दिखलाती हुई देवीने महादेवजीसे कहा—'शंकर! इस प्रकारकी घोर तपस्यामें निरत इसे आप जो वर नहीं प्रदान कर रहे हैं, इस कारण देवतालोग आपको जो अत्यन्त निष्ठुर बतलाते हैं, वह सत्य ही है। महादेव! इस पुण्यक्षेत्रमें भलीभाँति उपासना करनेपर भी इस यक्षकुमारको इस प्रकारका महान् कष्ट कैसे प्राप्त हुआ? अतः परमेश्वर! कृपा करके इसे शीघ्र ही वरदान दीजिये। देव! मनु आदि परमर्षि ऐसा कहते हैं कि सदाशिव चाहे रुष्ट हों अथवा तुष्ट—दोनों प्रकारसे उनसे सिद्धि, भोगकी प्राप्ति, राज्य तथा अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति होती ही है।' |
| ७५२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| एवमुक्तस्ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसंततः॥ ८८<br><br>तं दृष्ट्वा प्रणतं भक्त्या हरिकेशं वृषध्वजः।<br>दिव्यं चक्षुरदात् तस्मै येनापश्यत् स शङ्करम्॥ ८९<br><br>अथ यक्षस्तदादेशाच्छनैरुन्मील्य चक्षुषी।<br>अपश्यत् सगणं देवं वृषध्वजमुपस्थितम्॥ ९० | ऐसा कहे जानेपर जगदीश्वर महादेव पार्वतीके साथ उस स्थानके निकट गये जहाँ धमनियोंसे व्याप्त कृशकाय यक्ष स्थित था। (उनकी आहट पाकर यक्ष उनके चरणोंपर गिर पड़ा।) इस प्रकार उस हरिकेशको भक्तिपूर्वक चरणोंमें पड़ा हुआ देखकर शिवजीने उसे दिव्य चक्षु प्रदान किया जिससे वह शंकरका दर्शन कर सके। तदनन्तर यक्षने महादेवजीके आदेशसे धीरेसे अपने दोनों नेत्रोंको खोलकर गणसहित वृषभध्वज महादेवजीको सामने उपस्थित देखा॥८८-९०॥ |
| देवदेव उवाच<br>वरं ददामि ते पूर्वं त्रैलोक्ये दर्शनं तथा।<br>सावर्ण्यं च शरीरस्य पश्य मां विगतज्वरः॥ ९१ | देवाधिदेव शंकरने कहा— यक्ष! अब तुम कष्टरहित होकर मेरी ओर देखो। मैं तुम्हें पहले वह वर देता हूँ जिससे तुम्हारे शरीरका वर्ण सुन्दर हो जाय तथा तुम त्रिलोकीमें देखनेयोग्य हो जाओ॥ ९१॥ |
| सूत उवाच<br>ततः स लब्ध्वा तु वरं शरीरेणाक्षतेन च।<br>पादयोः प्रणतस्तस्थौ कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ ९२<br>उवाचाथ तदा तेन वरदोऽस्मीति चोदितः।<br>भगवन् भक्तिमव्यग्रां त्वय्यननन्यां विधत्स्व मे॥ ९३<br>अन्नदत्वं च लोकानां गाणपत्यं तथाक्षयम्।<br>अविमुक्तं च ते स्थानं पश्येयं सर्वदा यथा॥ ९४<br>एतदिच्छामि देवेश त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ ९५ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तत्पश्चात् वरदान पाकर वह अक्षत शरीरसे युक्त हो चरणोंपर गिर पड़ा, फिर मस्तकपर हाथ जोड़कर सम्मुख खड़ा हो गया और बोला—'भगवन्! आपने मुझसे कहा है कि 'मैं वरदाता हूँ' तो मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि आपमें मेरी अनन्य एवं अटल भक्ति हो जाय। मैं अक्षय अन्नका दाता तथा लोकोंके गणोंका अधीश्वर हो जाऊँ, जिससे आपके अविमुक्त स्थानका सर्वदा दर्शन करता रहूँ। देवेश! मैं आपसे यही उत्तम वर प्राप्त करना चाहता हूँ॥ ९२-९५॥ |
| देवदेव उवाच<br>जरामरणसंत्यक्तः सर्वरोगविवर्जितः।<br>भविष्यसि गणाध्यक्षो धनदः सर्वपूजितः॥ ९६<br>अजेयश्चापि सर्वेषां योगैश्वर्यं समाश्रितः।<br>अन्नदश्चापि लोकेभ्यः क्षेत्रपालो भविष्यसि॥ ९७<br>महाबलो महासत्त्वो ब्रह्मण्यो मम च प्रियः।<br>त्र्यक्षश्च दण्डपाणिश्च महायोगी तथैव च॥ ९८<br>उद्भ्रमः सम्भ्रमश्चैव गणौ ते परिचारकौ।<br>तवाज्ञया करिष्येते लोकस्योद्भ्रमसम्भ्रमौ॥ ९९ | देवदेवने कहा— यक्ष! तुम जरा-मरणसे विमुक्त, सम्पूर्ण रोगोंसे रहित, सबके द्वारा सम्मानित धनदाता गणाध्यक्ष होओगे। तुम सभीके लिये अजेय, योगैश्वर्यसे युक्त, लोकोंके लिये अन्नदाता, क्षेत्रपाल, महाबली, महान् पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, मेरा प्रिय, त्रिनेत्रधारी, दण्डपाणि तथा महायोगी होओगे। उद्भ्रम और सम्भ्रम—ये दोनों गण तुम्हारे सेवक होंगे। ये उद्भ्रम और सम्भ्रम तुम्हारी आज्ञासे लोकका कार्य करेंगे॥ ९६-९९॥ |
| सूत उवाच<br>एवं स भगवांस्तत्र यक्षं कृत्वा गणेश्वरम्।<br>जगाम वासं देवेशः सह तेन महेश्वरः॥ १०० | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इस प्रकार देवेश भगवान् महेश्वर वहाँ उस यक्षको गणेश्वर बनाकर उसके साथ अपने निवासस्थानको लौट गये॥ १००॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये दण्डपाणिवरप्रदानं नामाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वाराणसी-माहात्म्यमें दण्डपाणि-वरप्रदान नामक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८०॥
| * अध्याय १८१ * | ७५३ |
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एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय
अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी)-का माहात्म्य
| सूत उवाच<br>इमां पुण्योद्भवां स्निग्धां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे सुविशुद्धास्तपोधनाः॥ १<br>गणेश्वरपतिं दिव्यं रुद्रतुल्यपराक्रमम्।<br>सनत्कुमारो भगवानपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्॥ २<br>ब्रूहि गुह्यं यथातत्त्वं यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>माहात्म्यं सर्वभूतानां परमात्मा महेश्वरः॥ ३<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः।<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतो महेश्वरः॥ ४ | सूतजी कहते हैं— परम विशुद्ध हृदयवाले तपस्वी ऋषियो! आप सब लोग इस उत्तम कथाको जो पापकी विनाशिनी और पुण्यको उत्पन्न करनेवाली है, सुनिये! एक बार भगवान् सनत्कुमारने रुद्रके ही समान पराक्रमी तथा गणेश्वरोंके स्वामी दिव्य नन्दिकेश्वरसे पूछा—'जो सभी जीवोंके परमात्मा महेश्वर तथा देवताओं एवं दानवोंद्वारा दुष्प्राप्य हैं, वे महात्मा शंकर घोर स्वरूपको धारण कर सृष्टिसे प्रलयपर्यन्त स्थाणुरूपमें जहाँ नित्य अवस्थित रहते हैं, उस गोपनीय (स्थान)-को आप रहस्यपूर्वक हमलोगोंको बतलाइये'॥ १—४॥ |
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| नन्दिकेश्वर उवाच<br>पुरा देवेन यत् प्रोक्तं पुराणं पुण्यमुत्तमम्।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम्॥ ५<br>ततो देवेन तुष्टेन उमायाः प्रियकाम्यया।<br>कथितं भुवि विख्यातं यत्र नित्यं स्वयं स्थितः॥ ६<br>रुद्रस्यार्धासनगता मेरुशृङ्गे यशस्विनी।<br>महादेवं ततो देवी प्रणता परिपृच्छति॥ ७ | नन्दिकेश्वरने कहा— पूर्वकालमें महादेवने पुण्य प्रदान करनेवाले जिस श्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था, वह सब मैं महेश्वरको नमस्कार कर वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय उमाको प्रसन्न करनेकी इच्छासे प्रसन्नमना महादेवने जिस स्थानपर वे सदा स्वयं विराजमान रहते हैं, उस विश्वविख्यात स्थानका वर्णन किया था। एक बार सुमेरुके शिखरपर रुद्रके आधे आसनपर विराजमान यशस्विनी देवी उमाने विनयभावसे महादेवजीसे प्रश्न किया॥ ५—७॥ |
| देव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश चन्द्रार्धकृतशेखर।<br>धर्मं प्रब्रूहि मर्त्यानां भुवि चैवोध्वैरेतसाम्॥ ८<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानाध्ययनसम्पन्नं कथं भवति चाक्षयम्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम्।<br>कथं तत् क्षयमायाति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर॥ १०<br>यस्मिन् व्यवस्थितो भक्त्या तुष्यसि त्वं महेश्वर।<br>व्रतानि नियमाश्चैव आचारो धर्म एव च॥ ११<br>सर्वसिद्धिकरं यत्र ह्यक्षयगतिदायकम्।<br>वक्तुमर्हसि तत् सर्वं परं कौतूहलं हि मे॥ १२ | देवीने पूछा— अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले देवदेवेश्वर भगवन्! भूतलपर वर्तमान ऊर्ध्वरेता प्राणियोंके धर्मको विस्तारसे बतलाइये। साथ ही यह भी बतलाइये कि जप, दान, हवन, यज्ञ, तपस्या, शुभ कर्म, ध्यान और अध्ययन आदि किस प्रकार अक्षयभावको प्राप्त होते हैं? शंकर! हजारों पूर्वजन्मोंमें जो पाप सञ्चित हुए हैं, वे किस प्रकार नष्ट होते हैं? यह आप मुझे स्पष्ट बतलाइये। महेश्वर! जिस स्थानपर स्थित होकर आप भक्तिसे प्रसन्न होते हैं तथा व्रत, नियम, आचार और धर्म जहाँ सभी सिद्धियोंके प्रदाता बन जाते हैं एवं अनश्वर गति प्रदान करते हैं, ये सभी बातें आप बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी ही उत्कण्ठा है॥८—१२॥ |
७५४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महेश्वर उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रियं मम ॥ १३<br>अष्टषष्टिः पुरा प्रोक्ता स्थानानां स्थानमुत्तमम्।<br>यत्र साक्षात् स्वयं रुद्रः कृत्तिवासाः स्वयं स्थितः ॥ १४<br>यत्र संनिहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम्।<br>तत्क्षेत्रं न मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् ॥ १५<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परा गतिः।<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥ १६<br>ध्यानमध्ययनं दानं सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥ १७<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्।<br>अविमुक्ताग्निना दग्धमग्नौ तूलमिवाहितम् ॥ १८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः।<br>कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ १९<br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते शृणु प्रिये ॥ २०<br>चन्द्रार्धमौलिनः सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ २१<br>अकामो वा सकामो वा ह्यपि तिर्यग्गतोऽपि वा।<br>अविमुक्ते त्यजन् प्राणान् मम लोके महीयते ॥ २२<br>अविमुक्तं यदा गच्छेत् कदाचित् कालपर्ययात्।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा तत्रैव निधनं व्रजेत् ॥ २३<br>अविमुक्तं गतो देवि न निर्गच्छेत् ततः पुनः।<br>सोऽपि मत्पदमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २४ | महेश्वरने कहा— देवि! सुनो, मैं तुम्हें गुप्तसे भी गुप्त उत्तम विषय बतला रहा हूँ। सभी क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी) मुझे परम प्रिय है। पहले मैं अड़सठ श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर चुका हूँ, जहाँ गजचर्म धारण कर मैं साक्षात् रुद्रस्वरूपसे विराजमान रहता हूँ; परंतु अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में मैं नित्य-निरन्तर निवास करता हूँ। उस क्षेत्रको मैं कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये इसे अविमुक्त कहा जाता है। उस अविमुक्त क्षेत्रमें परा सिद्धि और परमगति प्राप्त होती है। वहाँ किया गया जप, दान, हवन, यज्ञ, तप, शुभ कर्म, ध्यान, अध्ययन, दान आदि सभी अक्षय हो जाते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिके हजारों पूर्व जन्मोंमें जो पाप संचित होते हैं वे सभी नष्ट हो जाते हैं। वे अविमुक्तारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल जाते हैं जैसे अग्निमें समर्पित की हुई रूई। प्रिये! यदि अविमुक्त क्षेत्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि, म्लेच्छ एवं अन्य निम्नस्तरके पापयोनिवाले कीट, चींटें, पशु, पक्षी आदि कालके वशीभूत हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, (तो उनकी क्या गति होती है, उसे) सुनो। देवि! वे सभी मानव-शरीर धारणकर मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, ललाटमें तृतीय नेत्रसे युक्त शिवस्वरूप होकर मेरे शिवपुरमें जन्म लेते हैं। चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा तिर्यग्योनिगत ही क्यों न हो, यदि वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करता है तो मेरे लोकमें पूजित होता है। देवि! यदि मनुष्य कालक्रमानुसार कभी अविमुक्त क्षेत्रमें पहुँच जाय तो वहाँ पत्थरसे अपने चरणोंको तोड़कर स्थित रहे और पुनः अविमुक्त क्षेत्रसे बाहर न जाय, वहीं मृत्युको प्राप्त हो जाय तो वह भी मेरे पदको प्राप्त होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ १३—२४॥ |
| वस्त्रापथं रुद्रकोटिं सिद्धेश्वरमहालयम्।<br>गोकर्णं रुद्रकर्णं च सुवर्णाक्षं तथैव च ॥ २५<br>अमरं च महाकालं तथा कायावरोहणम्।<br>एतानि हि पवित्राणि सांनिध्यात् संध्ययोर्द्वयोः ॥ २६<br>कालिञ्जरवनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्।<br>एतानि च पवित्राणि सांनिध्याद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः ॥ २७<br>हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाप्रातकेश्वरम्।<br>जालेश्वरं परं गुह्यं गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ॥ २८ | प्रिये! वस्त्रापथ (जूनागढ़, गिरिनार), रुद्रकोटि, सिद्धेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण तथा सुवर्णाक्ष, अमरकण्टक, महाकाल (उज्जैनी) और कायावरोहण (कारावार, गुजरात)—ये सभी स्थान प्रातः और संध्याकालमें मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। इसी प्रकार कालिंजरवन, शङ्कुकर्ण और स्थलेश्वर (थानेश्वर)—ये भी मेरी संनिधिके कारण ही पवित्र हैं। वरारोहे! अविमुक्त क्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें स्थित रहता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। प्रिये! हरिश्चन्द्र, आप्रातकेश्वर, जालेश्वर, श्रीपर्वत, |
* अध्याय १८२ * | ७५५
| महालयं तथा गुह्यं कृमिचण्डेश्वरं शुभम्।<br>गुह्यातिगुह्यं केदारं महाभैरवमेव च॥ २९<br>अष्टावेतानि स्थानानि सांनिध्याद्विद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः॥ ३०<br>यानि स्थानानि श्रूयन्ते त्रिषु लोकेषु सुव्रते।<br>अविमुक्तस्य पादेषु नित्यं संनिहितानि वै॥ ३१<br>अथोत्तरां कथां दिव्यमविमुक्तस्य शोभने।<br>स्कन्दो वक्ष्यति माहात्म्यमृषीणां भावितात्मनाम्॥ ३२ | महालय तथा शुभदायक कृमिचण्डेश्वर, केदार और महाभैरव—ये आठ स्थान परम गुह्य हैं और मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। किंतु सुन्दरि! अविमुक्तक्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें निवास करता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। सुव्रते! तीनों लोकोंमें जो भी पवित्र स्थान सुने जाते हैं, वे सभी अविमुक्त क्षेत्रके चरणोंमें सदा उपस्थित रहते हैं। शोभने! अविमुक्त क्षेत्रकी इसके बादकी दिव्य कथा और माहात्म्य स्कन्द आत्मद्रष्टा ऋषियोंसे कहेंगे॥ २५—३२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्त-माहात्म्य नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८१॥
एक सौ बयासीवाँ अध्याय
अविमुक्त-माहात्म्य
| सूत उवाच<br>कैलासपृष्ठमासीनं स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>पप्रच्छुरृषयः सर्वे सनकाद्यास्तपोधनाः॥ १<br>तथा राजर्षयः सर्वे ये भक्तास्तु महेश्वरे।<br>ब्रूहि त्वं स्कन्द भूर्लोके यत्र नित्यं भवः स्थितः॥ २<br><br>स्कन्द उवाच<br>महात्मा सर्वभूतात्मा देवदेवः सनातनः।<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः॥ ३<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतः स्थितः प्रभुः।<br>गुह्यानां परमं गुह्यमविमुक्तमिति स्मृतम्॥ ४<br>अविमुक्ते सदा सिद्धिर्यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यं यदुक्तं त्वीश्वरेण तु॥ ५<br>स्थानान्तरं पवित्रं च तीर्थमायतनं तथा।<br>श्मशानसंस्थितं वेश्म दिव्यमन्तर्हितं च यत्॥ ६<br>भूर्लोके नैव संयुक्तमन्तरिक्षे शिवालयम्।<br>अयुक्तास्तु न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥ ७<br>ब्रह्मचर्यव्रतोपेताः सिद्धा वेदान्तकोविदाः।<br>आदेहपतनाद् यावत् तत् क्षेत्रं यो न मुञ्चति॥ ८ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक समय सनक आदि तपस्वी ब्रह्मर्षिगण, सकल राजर्षिवृन्द एवं महेश्वरके भक्तगणोंने कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दसे पूछा—'स्कन्द! मृत्युलोकमें जहाँ भगवान् शंकर सदैव विराजमान रहते हैं, वह स्थान आप (हमें) बतलाइये॥ १-२॥<br><br>स्कन्दने कहा—सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, महात्मा, सनातन, देवाधिदेव, सामर्थ्यशाली, महादेव देवता एवं दानवोंसे दुष्प्राप्य, घोररूप धारणकर प्रलयपर्यन्त जहाँ स्थिररूपसे निवास करते हैं, उसे अत्यन्त गुप्त अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। जहाँ शिव सदा स्थित रहते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें सिद्धि सदा सुलभ है। इस स्थानका जो माहात्म्य भगवान् शङ्करने स्वयं कहा है, उसे सुनिये। यह स्थान परम पवित्र तीर्थ और देवालय है। महाश्मशानपर स्थित जो दिव्य एवं सुगुप्त मन्दिर है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध नहीं है। वह शिवका मन्दिर अन्तरिक्षमें है। योगी व्यक्ति ही ज्ञानद्वारा उसका साक्षात्कार कर पाते हैं, किंतु जो योगसे रहित हैं वे उसे नहीं देख पाते। जो ब्रह्मचारी, सिद्ध और वेदान्तको जाननेवाले मृत्युपर्यन्त उस स्थानका परित्याग नहीं करते, |
७५६ * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्मचर्यव्रतैः सम्यक् सम्यगिष्टं मखैर्भवेत्।<br>अपापात्मा गतिः सर्वा या तूक्ता च क्रियावताम्॥ ९<br>यस्तत्र निवसेद् विप्रोऽसंयुक्तात्मासमाहितः।<br>त्रिकालमपि भुञ्जानो वायुभक्षसमो भवेत्॥ १०<br>निमेषमात्रमपि यो ह्यविमुक्ते तु भक्तिमान्।<br>ब्रह्मचर्यसमायुक्तः परमं प्राप्नुयात् तपः॥ ११<br>योऽत्र मासं वसेद् धीरो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।<br>सम्यक् तेन व्रतं चीर्णं दिव्यं पाशुपतं महत्॥ १२<br>जन्ममृत्युभयं तीर्त्वा स याति परमां गतिम्।<br>नैःश्रेयसीं गतिं पुण्यां तथा योगगतिं व्रजेत्॥ १३<br>न हि योगगतिर्दिव्या जन्मान्तरशतैरपि।<br>प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छंकरस्य तु॥ १४ | उन्हें वह पवित्र गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मचर्यपूर्वक यज्ञोंद्वारा भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर क्रियासम्पन्न व्यक्तियोंके लिये कही गयी है। जो विप्र समाधिसे रहित, योगसे शून्य एवं तीनों समय भोजन करते हुए भी वहाँ निवास करता है वह वायुभक्षीके समान माना जाता है। इस अविमुक्त क्षेत्रमें क्षणभर भी ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करनेवाला भक्तिमान् व्यक्ति परम तपको प्राप्त करता है। जो धीर पुरुष अल्प भोजन करते हुए इन्द्रियोंको वशमें कर एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह (मानो) महान् दिव्य पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है। वह पुरुष जन्म और मृत्युके भयको पारकर परमगतिको प्राप्त करता है तथा पुण्यदायक मोक्ष एवं योगगतिका अधिकारी हो जाता है। जिस दिव्य योगगतिको सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं प्राप्त किया जा सकता, वह स्थानके माहात्म्य और शंकरके प्रभावसे यहाँ प्राप्त हो जाती है॥ ३—१४॥ |
| ब्रह्महा योऽभिगच्छेत्तु अविमुक्तं कदाचन।<br>तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् ब्रह्महत्या निवर्तते॥ १५<br>आदेहपतनाद् यावत् क्षेत्रं यो न विमुञ्चति।<br>न केवलं ब्रह्महत्या प्राक्कृतं च निवर्तते॥ १६<br>प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते।<br>अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्चति॥ १७<br>तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां स तत्र वसति प्रभुः॥ १८<br>सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः॥ १९<br>अविमुक्ते परा सिद्धिर्विमुक्ते परं पदम्।<br>अविमुक्तं निषेवेत देवर्षिगणसेवितम्॥ २०<br>यदीच्छेन्मानवो धीमान् न पुनर्जायते क्वचित्।<br>मेरोः शक्तो गुणान् वक्तुं द्वीपानां च तथैव च॥ २१<br>समुद्राणां च सर्वेषां नाविमुक्तस्य शक्यते।<br>अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु॥ २२<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते।<br>अविमुक्ते ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम्॥ २३<br>कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति।<br>मणिकर्ण्यां त्यजन् देहं गतिमिष्टां व्रजेन्नरः॥ २४ | ब्रह्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी यदि किसी समय इस अविमुक्तक्षेत्रमें चला जाता है तो इस क्षेत्रके प्रभावसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है। जो मृत्युपर्यन्त इस क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं, अपितु पहलेके किये हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह भगवान् विश्वेश्वरको प्राप्तकर पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करता। जो अनन्यचित्त हो अविमुक्त क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसपर भगवान् शङ्कर सदा प्रसन्न रहते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। जो सांख्य और योगका द्वारस्वरूप है उस स्थानपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शङ्कर गणोंके साथ निवास करते हैं। अविमुक्त क्षेत्र श्रेष्ठ स्थान है। अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है। अविमुक्तमें रहनेसे परम सिद्धि प्राप्त होती है और अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। यदि बुद्धिमान् मनुष्य यह चाहता हो कि मेरा पुनर्जन्म न हो तो उसे देवर्षिगणोंसे सेवित अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। मेरु पर्वत, सभी द्वीपों तथा समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है, किंतु अविमुक्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मृत्युके समय वायुसे प्रेरित मनुष्योंके मर्मस्थानोंके छिन्न हो जानेपर स्मृति नहीं उत्पन्न होती, किंतु अविमुक्तमें अन्तसमय कर्मोंसे प्रेरित भक्तोंके कानमें स्वयं ईश्वर मन्त्रका जाप करते हैं। मनुष्य मणिकर्णिकामें शरीरका |