मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना
| * अध्याय १२९ * | ४५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दुर्गं व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।<br>कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८<br>वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।<br>यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥ २९<br>देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।<br>विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥ ३०<br>कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।<br>पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥ ३१<br>पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।<br>पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥ ३२<br>पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।<br>आयसं तु क्षितितले रजतं तु नभस्तले॥ ३३<br>राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।<br>एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।<br>शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥ ३४<br>अट्टालकैर्यन्त्रशतघ्निभिश्च<br>सचक्रशूलोपलकम्पन्नैश्च ।<br>द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-<br>शृङ्गैः सुविराजमानम्॥ ३५<br>सतारकाख्येन मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६ | दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥ २९–३१½॥<br><br>इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥ ३१–३६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२९॥
४५८ | * मत्स्यपुराण *
एक सौ तीसवाँ अध्याय
दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार सोच-विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिये, यहाँ दोनों ओर पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिये, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्तःपुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट-वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा। दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था॥ १—१०½॥ |
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| इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्।<br>चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्॥ १ | |
| प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्।<br>इह चाट्टालकद्वारमिह चाट्टालगोपुरम्॥ २ | |
| राजमार्ग इतश्चापि विपुलो भवतामिति।<br>रथ्योपरथ्याः सदृशा इह चत्वर एव च॥ ३ | |
| इदमन्तःपुरस्थानं रुद्रायतनमत्र च।<br>सवटानि तडागानि ह्यत्र वाप्यः सरांसि च॥ ४ | |
| आरामाश्च सभाश्चात्र उद्यानान्यत्र वा तथा।<br>उपनिर्गमो दानवानां भवत्यत्र मनोहरः॥ ५ | |
| इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरकल्पवित्।<br>मयेन तत्पुरं सृष्टं त्रिपुरं त्विति नः श्रुतम्॥ ६ | |
| कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्।<br>तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ ७ | |
| यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।<br>विद्युन्माली प्रभुस्तत्र विद्युन्माली त्विवाम्बुदः॥ ८ | |
| सुवर्णाधिकृतं यच्च मयेन विहितं पुरम्।<br>स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः॥ ९ | |
| तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम्।<br>विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १० |
| * अध्याय १३० * | ४५९ |
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| मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्।<br>पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा॥ ११<br><br>कृतवांस्त्रिपुरं दैत्यस्त्रिनेत्रः पुष्यकं यथा।<br>येन येन मयो याति प्रकुर्वाणः पुरं पुरात्॥ १२<br><br>प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्या मालया स्वयम्।<br>रुक्मरूप्यायसानां च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३<br><br>रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्।<br>प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च॥ १४<br><br>सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च।<br>सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च॥ १५<br><br>अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च।<br>चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च॥ १६<br><br>सप्ताष्टदशभौमानि सत्कृतानि मयेन च।<br>बहुध्वजपताकानि स्रग्दामालङ्कृतानि च॥ १७<br><br>किङ्किणीजालशब्दानि गन्धवन्ति महान्ति च।<br>सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुष्यनैवेद्यवन्ति च॥ १८<br><br>यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकलशानि च।<br>गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च॥ १९<br><br>पङ्क्तीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे।<br>मुक्ताकलापैर्लम्बद्भिर्हसन्तीव शशिश्रियम्॥ २० | जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्यककी रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूकती रहती थीं। उनमें बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ और उत्तम अटारियाँ बनी थीं। मयने क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थोंसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, नैवेद्य आदि पूजन-सामग्री सँजोयी गयी थी और जलपूर्ण कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्ज्वल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं॥ ११-२०॥ |
| मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः ।<br>पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव॥ २१ | वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। |
| हैमराजतलौहाद्यमणिरत्नाञ्जनाङ्किताः ।<br>प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभाः॥ २२ | उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्न और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए |