सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१०६- प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन

  • अध्याय १०२ * | ३५३
    ---|---:
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।<br>उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै॥ १३<br><br>ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै।<br>ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्॥ १४<br><br>देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः।<br>क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः॥ १५<br><br>वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः।<br>निराधाराश्च ये जीवाः पापे धर्मे रताश्च ये॥ १६<br><br>तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।<br>कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः॥ १७तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्नान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुनः जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिये। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, क्रूर सर्प, गरुड आदि पक्षी, वृक्ष, शृगाल, अन्य पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्ममें लगे हुए हैं, उन सबकी तृप्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।' तदनन्तर निवीती हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें)॥९—१७॥
मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा।<br>सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः॥ १८<br><br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा।<br>सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ १९<br><br>मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>प्रचेतं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च।<br>देवब्रह्मर्षीन् सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः॥ २०<br><br>अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले।<br>अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोषमपाः॥ २१<br><br>सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः।<br>संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः॥ २२<br><br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।<br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥ २३<br><br>औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।<br>वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।<br>दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् संतर्पयेद् बुधः॥ २४<br><br>पित्रादीन् नामगोत्रेण तथा मातामहानपि।<br>संतर्प्य विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ २५<br><br>येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।<br>ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥ २६फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है—'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख—ये सभी मेरे द्वारा दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिये। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा रखते हों, वे सभी पूर्णतया तृप्त हो जायँ'॥१८—२६॥
३५४* मत्स्यपुराण *

| ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पद्ममग्रतः।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्।<br>अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्॥ २७<br>नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।<br>सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८<br>नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल।<br>जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित॥ २९<br>पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित।<br>नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्वं विबोधसे॥ ३०<br>सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग।<br>सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥ ३१<br>दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम्।<br>द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२ | तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं, आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये। दिवाकर! आपको अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिये॥ २७—३२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे स्नानविधिर्नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०२॥


एक सौ तीनवाँ अध्याय

युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम

| नन्दिकेश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्।<br>मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥ १<br>भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः॥ २<br>भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! इसके बाद मैं प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ जिसे पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। जब महाभारत-युद्ध समाप्त हो गया और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती-नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दुःखी होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे—'हाय! जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था, |

  • अध्याय १०३ * <p align="right">३५५</p>

| अस्मान् संताप्य बहुशः सर्वे ते निधनं गताः।<br>वासुदेवं समाश्रित्य पञ्च शेषास्तु पाण्डवाः॥ ४<br>हत्वा भीष्मं च द्रोणं च कर्णं चैव महाबलम्।<br>दुर्योधनं च राजानं पुत्रभ्रातृसमन्वितम्॥ ५<br>राजानो निहताः सर्वे ये चान्ये शूरमानिनः।<br>किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ ६<br>धिक् कष्टमिति संचिन्त्य राजा वैक्लव्यमागतः।<br>निार्विचेष्टो निरुत्साहः किञ्चित् तिष्ठत्यधोमुखः॥ ७<br>लब्धसंज्ञो यदा राजा चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>कतमो विनियोगो वा नियमं तीर्थमेव च॥ ८<br>येनाहं शीघ्रमामुञ्चे महापातककिल्बिषात्।<br>यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम्॥ ९<br>कथं पृच्छामि वै कृष्णं येनेदं कारितोऽस्म्यहम्।<br>धृतराष्ट्रं कथं पृच्छे यस्य पुत्रशतं हतम्॥ १०<br>एवं वैक्लव्यमापन्ने धर्मराजे युधिष्ठिरे।<br>रुदन्ति पाण्डवाः सर्वे भ्रातृशोकपरप्लिुताः॥ ११<br>ये च तत्र महात्मानः समेताः पाण्डवाः स्मृताः।<br>कुन्ती च द्रौपदी चैव ये च तत्र समागताः।<br>भूमौ निपतिताः सर्वे रुदन्तस्तु समंततः॥ १२ | वह हमलोगोंको अनेकों बार कष्टमें डालकर अपने सभी सहायकोंके साथ कालके गालमें चला गया। श्रीकृष्णका आश्रय लेनेके कारण केवल हम पाँच पाण्डव ही शेष रह गये हैं। गोविन्द! हमलोगोंने भीष्म, द्रोण, महाबली कर्ण और पुत्रों एवं भाइयोंसमेत राजा दुर्योधनको मारकर जो अन्य शूर, मानी नरेश थे उन सबका भी संहार कर डाला, ऐसी परिस्थितिमें हमें राज्यसे क्या लेना है, अथवा भोगों एवं जीवनसे ही क्या प्रयोजन है? 'हाय! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा'—ऐसा सोचकर राजा युधिष्ठिर व्याकुल हो गये और निश्चेष्ट एवं उत्साहरहित हो कुछ देरतक नीचे मुख किये बैठे ही रह गये। जब राजा युधिष्ठिरको पुनः चेतना प्राप्त हुई तब वे इस प्रकार सोचने लगे—'ऐसा कौन-सा विनियोग (प्रायश्चित्त), नियम (व्रतोपवास) अथवा तीर्थ है, जिसका सेवन करनेसे मैं शीघ्र ही इस महापातकके पापसे मुक्त हो सकूँगा, अथवा जहाँ निवास कर मनुष्य सर्वोत्तम विष्णुलोकको प्राप्त कर सकता है। इसके लिये मैं श्रीकृष्णसे कैसे पूछूँ; क्योंकि उन्होंने ही तो मुझसे ऐसा कर्म करवाया है। दादा धृतराष्ट्रसे भी किसी प्रकार नहीं पूछ सकता; क्योंकि उनके सौ पुत्र मार डाले गये हैं।' ऐसा सोचकर धर्मराज युधिष्ठिर व्याकुल हो गये। उस समय सभी पाण्डव भ्रातृ-शोकमें निमग्न होकर रुदन कर रहे थे। उस समय राजा युधिष्ठिरके समीप जो अन्य महात्मा पुरुष आये थे तथा कुन्ती, द्रौपदी एवं अन्यान्य जो लोग आ गये थे, वे सभी रोते हुए युधिष्ठिरको घेरकर पृथ्वीपर पड़ गये॥ १—१२॥ |
| वाराणस्यां मार्कण्डेयस्तेन ज्ञातो युधिष्ठिरः।<br>यथा वैक्लव्यमापन्नो रोदमानस्तु दुःखितः॥ १३<br>अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।<br>सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे ह्यतिष्ठत॥ १४<br>द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।<br>त्वां द्रष्टुकामो मार्कण्डो द्वारि तिष्ठत्यसौ मुनिः।<br>त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादतः परम्॥ १५ | उस समय महर्षि मार्कण्डेय वाराणसीमें निवास कर रहे थे। उन्हें जिस प्रकार युधिष्ठिर दुःखी और व्याकुल हो रो रहे थे, ये सारी बातें (योगबलसे) ज्ञात हो गयीं। तब महातपस्वी मार्कण्डेय थोड़े ही समयमें हस्तिनापुर जा पहुँचे और राजद्वारपर उपस्थित हुए। उन्हें आया हुआ देखकर द्वारपालने तुरंत राजाको सूचना देते हुए कहा—'महाराज! ये महामुनि मार्कण्डेय आपसे मिलनेके लिये दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनते ही धर्म-पुत्र युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक दरवाजेपर आ पहुँचे॥ १३—१५॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>स्वागतं ते महाभाग स्वागतं ते महामुने।<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्॥ १६<br>अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि दृष्टे महामुने।<br>अद्याहं पूतदेहोऽस्मि यत् त्वया सह दर्शनम्॥ १७ | युधिष्ठिरने कहा— महाभाग! आपका स्वागत है। महामुने! आपका स्वागत है। महामुने! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया तथा आज मेरे पितर संतुष्ट हो गये। आपका जो यह (आकस्मिक) दर्शन प्राप्त हुआ, इससे आज मेरा शरीर पवित्र हो गया॥ १६-१७॥ |

३५६ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Translation
नन्दिकेश्वर उवाच<br>सिंहासने समास्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः ।<br>युधिष्ठिरो महात्मा वै पूजयामास तं मुनिम् ॥ १८<br>ततः स तुष्टो मार्कण्डः पूजितश्चाह तं नृपम् ।<br>आख्याहि त्वरितं राजन् किमर्थं रुदितं त्वया ।<br>केन वा विक्लवीभूतः का बाधा ते किमप्रियम् ॥ १९**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तत्पश्चात् महात्मा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन आदि अर्चाविधिके अनुसार उनकी पूजा की। तब पूजनसे संतुष्ट हुए मुनिवर मार्कण्डेयने राजा युधिष्ठिरसे पूछा—'राजन्! तुम किसलिये रो रहे थे? किसने तुम्हें व्याकुल कर दिया? तुम्हें कौन-सी बाधा सता रही है? तुम्हारा कौन-सा अमङ्गल हो गया? यह सब हमें शीघ्र बतलाओ'॥ १८-१९॥
युधिष्ठिर उवाच<br>अस्माकं चैव यद् वृत्तं राज्यस्यार्थे महामुने ।<br>एतत् सर्वं विदित्वा तु चिन्तावशमुपागतः ॥ २०**युधिष्ठिरने कहा—**महामुने! राज्यकी प्राप्तिके लिये हमलोगोंने जैसा-जैसा व्यवहार किया है, वही सब सोचकर मैं चिन्ताके वशीभूत हो गया हूँ॥ २०॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो क्षात्रधर्मव्यवस्थितिम् ।<br>नैव दृष्टं रणे पापं युध्यमानस्य धीमतः ॥ २१<br>किं पुना राजधर्मेण क्षत्रियस्य विशेषतः ।<br>तदेवं हृदयं कृत्वा तस्मात् पापं न चिन्तयेत् ॥ २२<br>ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।<br>पप्रच्छ विनयोपेतः सर्वपातकनाशनम् ॥ २३**मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! क्षात्रधर्मकी व्यवस्था तो सुनो। इसके अनुसार रणस्थलमें युद्ध करते हुए बुद्धिमान्‌के लिये पाप नहीं बतलाया गया है, तब फिर राजधर्मके अनुसार विशेषरूपसे युद्ध करनेवाले क्षत्रियके लिये तो पापकी बात ही क्या है। हृदयमें ऐसा विचारकर युद्धसे उत्पन्न हुए पापकी भावनाको छोड़ दो। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक समस्त पापोंका विनाश करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न किया॥ २१—२३॥
युधिष्ठिर उवाच<br>पृच्छामि त्वां महाप्राज्ञ नित्यं त्रैलोक्यदर्शिनम् ।<br>कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषात् ॥ २४**युधिष्ठिरने पूछा—**महाप्राज्ञ! आप तो नित्य त्रैलोक्यदर्शी हैं, अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप संक्षेपमें कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका पालन करनेसे पापसे छुटकारा मिल सके॥ २४॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो सर्वपातकनाशनम् ।<br>प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥ २५**मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! सुनो, पुण्यकर्मा मनुष्योंके लिये प्रयाग-गमन ही सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ साधन है॥ २५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०३ ॥