मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१९५- गोत्रप्रवर-निरूपण-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण
८०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततः स्मृतोऽथ देवेन धर्मरूपो वृषस्तदा।<br>स्मरणात्तस्य देवस्य वृषः शीघ्रमुपस्थितः।<br>वदंस्तु मानुषीं वाचमादेशो दीयतां प्रभो॥ २९ | दिखाकर विश्वस्त कर रहा हूँ। तत्पश्चात् शिवजीने उस समय धर्मरूपी वृषभका स्मरण किया। उन देवके स्मरण करते ही वह वृष शीघ्र ही उपस्थित हो गया और मनुष्यकी वाणीमें बोला—'प्रभो! आदेश दीजिये'॥ २८-२९॥ |
| महेश्वर उवाच<br>वल्मीकं त्वं खनस्वैनं विप्रं भूमौ निपातय।<br>योगस्थस्तु ततो ध्यायन् भृगुस्तेन निपातितः॥ ३०<br>तत्क्षणात् क्रोधसंतप्तो हस्तमुत्क्षिप्य सोऽशपत्।<br>एवं सम्भाषमाणस्तु कुत्र गच्छसि भो वृष।<br>अद्याहं सम्प्रकोपेण प्रलयं त्वां नये वृष॥ ३१<br>धर्षितस्तु तदा विप्रश्चान्तरिक्षं गतो वृषम्।<br>आकाशे प्रेक्षते विप्र एतदद्भुतमुत्तमम्॥ ३२<br>तत्र प्रहसितो रुद्र ऋषिरग्रे व्यवस्थितः।<br>तृतीयलोचनं दृष्ट्वा वैलक्ष्यात् पतितो भुवि।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३३ | महेश्वरने कहा—तुम इस विमवटको खोद डालो और विप्रको भूमिपर गिरा दो। तब वृषने ध्यान करते हुए योगस्थ भृगुको भूमिपर गिरा दिया। उसी क्षण क्रोधसे जले-भुने भृगु हाथ उठाकर शाप देते हुए इस प्रकार बोले—'भो वृष! तुम कहाँ जा रहे हो? वृष! अभी मैं क्रोधके बलसे तुम्हारा संहार कर डालता हूँ।' तब वह वृषभ उस विप्रको परास्तकर आकाशमें चला गया। उसे आकाशमें देखते हुए भृगु सोचने लगे—'यह तो महान् आश्चर्य है।' इतनेमें ही वहाँ भगवान् रुद्र हँसते हुए ऋषिके सम्मुख उपस्थित हो गये। तब तृतीय नेत्रधारी रुद्रको देखकर भृगु व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दण्डके समान भूमिपर लेटकर प्रणाम कर भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे॥ ३०-३३॥ |
| प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं त्वामहं दिव्यरूपम्।<br>भवातीतो भुवनपते प्रभो तु विज्ञापये किञ्चित्॥ ३४<br><br>तद्गुणनिकरान् वक्तुं कः शक्तो भवति मानुषो नाम।<br>वासुकिरपि हि कदाचिद् वदनसहस्रं भवेद् यस्य॥ ३५<br><br>भक्त्या तथापि शंकर भुवनपते त्वत्स्तुतौ मुखरः।<br>वदतः क्षमस्व भगवन् प्रसीद मे तव चरणपतितस्य॥ ३६<br><br>सत्त्वं रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्त्योर्विनाशने देव।<br>त्वां मुक्त्वा भुवनपते भुवनेश्वर नैव दैवतं किञ्चित्॥ ३७<br><br>यमनियमयज्ञदानवेदाभ्यासाश्च धारणा योगः।<br>त्वद्भक्तेः सर्वमिदं नार्हति हि कलासहस्त्रांशम्॥ ३८<br><br>उच्छिष्टरससायनखड्गाञ्जनपादुकाविवरसिद्धिर्वा।<br>चिह्नं भवव्रतानां दृश्यति चेह जन्मनि प्रकटम्॥ ३९ | त्रिभुवनके स्वामी प्रभो! आप प्राणिवर्गके स्वामी, संसारके उद्भवस्थान, दिव्य रूपधारी और जन्म-मरणसे परे हैं, मैं आपको प्रणाम करके कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। यद्यपि कदाचित् किसी मानवको वासुकि समान हजार मुख हो जाय तो भी ऐसा कोई भी मनुष्य आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, तथापि भुवनपते शंकर! मैं भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करनेके लिये उद्यत हूँ। भगवन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए मुझपर प्रसन्न हो जाइये और बोलते समय घटित हुई त्रुटियोंके लिये मुझे क्षमा कीजिये। देव! विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लयमें आप ही सत्त्व, रज और तमस्वरूप हैं। भुवनपते! आपको छोड़कर अन्य कोई देवता नहीं है। भुवनेश्वर! यम, नियम, यज्ञ, दान, वेदाभ्यास, धारणा और योग—ये सभी आपकी भक्तिकी एक कलाके हजारवें अंशकी समता नहीं कर सकते। उच्छिष्ट, रस-रसायन, खड्ग, अञ्जन, पादुका और विवरसिद्धि—ये सभी महादेवकी आराधना करनेवालोंके चिह्न हैं, जो इस जन्ममें व्यक्त-रूपसे देखे जाते हैं॥ ३४-३९॥ |
| शाठ्येन नमति यद्यपि ददासि त्वं भूतिमिच्छतो देव।<br>भक्तिर्भवभेदकरी मोक्षाय विनिर्मिता नाथ॥ ४० | देव! यद्यपि भक्त शठतापूर्वक नमस्कार करता है, तथापि आप उसे इच्छानुसार ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। नाथ! आपने मोक्ष प्रदान करनेके लिये संसारको नष्ट करनेवाली |
- अध्याय १९३ * | ८०९
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| परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःखशोकसंतप्तम्।<br>परवदनवीक्षणपरं परमेश्वर मां परित्राहि॥ ४१<br><br>मिथ्याभिमानदग्धं क्षणभङ्गुरदेहविलसितं क्रूरम्।<br>कुपथ्याभिमुखं पतितं त्वं मां पापात् परित्राहि॥ ४२<br><br>दीने द्विजगणसार्थे बन्धुजनेनैव दूषिता ह्याशा।<br>तृष्णा तथापि शंकर किं मूढं मां विडम्बयति॥ ४३<br><br>तृष्णां हरस्व शीघ्रं लक्ष्मीं प्रदत्स्व यावदासिनीं नित्यम्।<br>छिन्धि मदमोहपाशान्नुत्तारय मां महादेव॥ ४४<br><br>करुणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम्।<br>यः पठति भक्तियुक्तस्तस्य तुष्येद् भृगोर्यथा च शिवः॥ ४५ | भक्तिका निर्माण किया है। परमेश्वर! मैं परायी स्त्री और पराये धनमें रत रहनेवाला, दूसरे द्वारा किये गये अनादरसे उत्पन्न हुए दुःख और शोकसे सन्तप्त और परमुखापेक्षी हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं मिथ्या अभिमानसे सन्तप्त, क्षणभङ्गुर शरीरके विलासमें रत, निष्ठुर, कुमार्गगामी और पतित हूँ, आप इस पापसे मेरी रक्षा कीजिये। यद्यपि द्विजगणोंके साथ-साथ मैं दीन हूँ और बन्धुजनोंने ही मेरी आशाको दूषित कर दिया है, तथापि शंकर! तृष्णा मुझ मोहग्रस्तकी विडम्बना क्यों कर रही है? महादेव! आप इस तृष्णाको शीघ्र दूर कर दें, नित्य चिरस्थायिनी लक्ष्मी प्रदान करें, मद और मोहके पाशको काट दें और मेरा उद्धार करें। यह 'करुणाभ्युदय' नामक दिव्य स्तोत्र सभी सिद्धियोंको देनेवाला है, जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसपर भृगु (पर प्रसन्न होने)-के समान ही शिवजी प्रसन्न होते हैं॥ ४०—४५॥ |
| अहं तुष्टोऽस्मि ते वत्स प्रार्थयस्वेप्सितं वरम्।<br>उमया सहितो देवो वरं तस्य ह्यादापयत्॥ ४६ | भगवान् शंकरने कहा—वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वर माँग लो। इस प्रकार उमासहित महादेवजी भृगुको वरदान देनेके लिये उद्यत हुए॥ ४६॥ |
| भृगुरुवाच<br>यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम।<br>रुद्रवेदी भवेदेवमेतत् सम्पादयस्व मे॥ ४७ | भृगु बोले—देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि यह स्थान रुद्रवेदीके नामसे प्रसिद्ध हो जाय॥ ४७॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु विप्रेन्द्र क्रोधस्त्वां न भविष्यति।<br>न पितापुत्रयोश्चैव त्वैकमत्यं भविष्यति॥ ४८<br><br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्याः सर्वे देवाः सकिन्नराः।<br>उपासते भृगोस्तीर्थं तुष्टो यत्र महेश्वरः॥ ४९<br><br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।<br>अवशाः स्ववशा वापि म्रियन्ते यत्र जन्तवः॥ ५०<br><br>गुह्यातिगुह्या सुगतिस्तेषां निःसंशयं भवेत्।<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५१<br><br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>उपानहौ च छत्रं च व्यमन्त्रं च काञ्चनम्॥ ५२<br><br>भोजनं च यथाशक्त्या ह्यक्षयं च तथा भवेत्।<br>सूर्योपरागे यो दद्याद् दानं चैव यथेच्छया॥ ५३ | शिवजीने कहा—विप्रश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा और अब तुम्हें क्रोध नहीं होगा। साथ ही तुम पिता और पुत्रमें सहमति नहीं होगी। तभीसे किन्नरोंसहित ब्रह्मा आदि सभी देवगण, जहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे, उस भृगुतीर्थकी उपासना करते हैं। उस तीर्थका दर्शन करनेसे मनुष्य तत्काल ही पापसे मुक्त हो जाता है। स्वाधीन या पराधीन होकर भी जो प्राणी यहाँ मरते हैं, उन्हें निःसंदेह गुह्यातिगुह्य उत्तम गति प्राप्त होती है। यह अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करके मानव स्वर्गको प्राप्त होते हैं तथा जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। वहाँ यथाशक्ति जूता, छाता, अन्न, सोना और खाद्य पदार्थका दान देना चाहिये; क्योंकि वह अक्षय हो जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय वहाँ इच्छानुसार जो कुछ दान |
८९० * मत्स्यपुराण *
| दीयमानं तु तद् दानमक्षयं तस्य तद् भवेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु यत्फलं त्वमरकण्टके॥ ५४<br>तदेव निखिलं पुण्यं भृगुतीर्थे न संशयः।<br>क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानतपःक्रियाः॥ ५५<br>न क्षरेत् तु तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर।<br>यस्य वै तपसोग्रेण तुष्टेनैव तु शम्भुना॥ ५६<br>सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु यत्र तुष्टो महेश्वरः॥ ५७<br>एवं तु वदतो देवीं भृगुतीर्थमनुत्तमम्।<br>न जानन्ति नरा मूढा विष्णुमायाविमोहिताः॥ ५८<br>नर्मदायां स्थितं दिव्यं भृगुतीर्थं नराधिप।<br>भृगुतीर्थस्य माहात्म्यं यः शृणोति नरः क्वचित्॥ ५९<br>विमुक्तः सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति। | देता है, उसका वह दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टकमें जो फल प्राप्त होता है, वही सम्पूर्ण पुण्य निःसंदेह भृगुतीर्थमें सुलभ हो जाता है। युधिष्ठिर! सभी प्रकारके दान तथा यज्ञ, तप और कर्म—ये सभी नष्ट हो जाते हैं, किंतु भृगुतीर्थमें किया गया तप नष्ट नहीं होता। नराधिप! उस भृगुकी उग्र तपस्यासे संतुष्ट हुए शम्भुने उस भृगुतीर्थमें अपनी नित्य उपस्थिति बतलायी है, इसलिये वह भृगुतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है; क्योंकि वहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे। नराधिप! इस प्रकार महेश्वरने पार्वतीसे श्रेष्ठ भृगुतीर्थके विषयमें कहा है, किंतु विष्णुकी मायासे मोहित हुए मूढ़ मनुष्य नर्मदामें स्थित इस दिव्य भृगुतीर्थको नहीं जानते। जो मनुष्य कहीं भी भृगुतीर्थका माहात्म्य सुनता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है॥ ४८—५९ १/२ ॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम्॥ ६०<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः।<br>काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते॥ ६१ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ गौतमेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला मनुष्य सुवर्णमय विमानसे ब्रह्मलोकमें जाकर पूजित होता है। |
| धौतपापं ततो गच्छेत् क्षेत्रं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां कृतं राजन् सर्वपातकनाशनम्॥ ६२<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां विमुञ्चति।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः॥ ६३<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च शिवतुल्यबलो भवेत्।<br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः॥ ६४<br>कालेन महता प्राप्तः पृथिव्यामेकराड् भवेत्। | राजन्! तदनन्तर धौतपाप नामक क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। स्वयं नन्दीने नर्मदामें इस क्षेत्रका निर्माण किया था, जो सभी पातकोंका नाशक है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे विमुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राण-त्याग करता है, वह चार भुजा और तीन नेत्रोंसे युक्त हो शिवके समान बलशाली हो जाता है और शिवके समान पराक्रमी होकर दस सहस्र कल्पोंसे भी अधिक कालतक स्वर्गमें निवास करता है। बहुत कालके बाद पृथ्वीपर आनेपर वह एकच्छत्र राजा होता है। |
| ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम्॥ ६५<br>प्रयागे यत् फलं दृष्टं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>तत् फलं लभते राजन् स्नातमात्रो हि मानवः॥ ६६ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ ऐरण्डीतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! मार्कण्डेयजीके द्वारा प्रयागमें जो पुण्य बतलाया गया है, वही पुण्य वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्यको सुलभ हो जाता है। |
| मासि भाद्रपदे चैव शुक्लपक्षे चतुर्दशी।<br>उपोष्या रजनीमेकां तस्मिन् स्नानं समाचरेत्।<br>यमदूतैर्न बाध्येत रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६७ | जो भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको एक रात उपवास कर वहाँ स्नान करता है, उसे यमदूत पीड़ित नहीं करते और वह रुद्रलोकको जाता है। |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>हिरण्यद्वीपविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ६८ | राजेन्द्र! तदुपरान्त सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हिरण्यद्वीप नामसे विख्यात तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दनने |