Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1009 of 1098

Read in context
Page 1009
* अध्याय २६० *९९९
श्लोकअर्थ
वर्णतः पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहुः शुभेक्षणः।<br>कमण्डलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे॥ ४१<br>वामे दण्डधरं तद्वत् स्रुवञ्चापि प्रदर्शयेत्।<br>मुनिभिर्देवगन्धर्वैः स्तूयमानं समन्ततः॥ ४२<br>कुर्वाणमिव लोकांस्त्रीञ्छुक्लाम्बरधरं विभुम्।<br>मृगचर्मधरं चापि दिव्ययज्ञोपवीतिनम्॥ ४३<br>आज्यस्थालीं न्यसेत् पार्श्वे वेदांश्च चतुरः पुनः।<br>वामपार्श्वेऽस्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम्॥ ४४<br>अग्रे च ऋषयस्तद्वत् कार्याः पितामहे पदे।उनकी प्रतिमा कमलके भीतरी भागके समान अरुण, चार भुजाओंसे युक्त और सुन्दर नेत्रवाली हो। उनके नीचेके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें स्रुवा हो। उनके ऊपरके बायें हाथमें दण्ड तथा दाहिने हाथमें भी स्रुवा* धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये। उनके चारों ओर देवता, गन्धर्व और मुनिगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। ऐसी भूमिका भी दिखाये, मानो वे तीनों लोकोंकी रचनामें प्रवृत्त हैं। वे श्वेत वस्त्रधारी, ऐश्वर्यसम्पन्न, मृगचर्म तथा दिव्य यज्ञोपवीतसे युक्त हों। उनके बगलमें आज्यस्थाली रहे और सामने चारों वेदोंकी मूर्तियाँ हों। उनकी बायीं ओर सावित्री, दाहिनी ओर सरस्वती तथा उनके अग्रभागमें मुनियोंके समूह हों॥ ४०—४४ १/२ ॥
कार्तिकेयं प्रवक्ष्यामि तरुणादित्यसप्रभम्॥ ४५<br>कमलोदरवर्णाभं कुमारं सुकुमारकम्।<br>दण्डकैश्चीरकैर्युक्तं मयूरवरवाहनम्॥ ४६<br>स्थापयेत् स्वेष्टनगरे भुजान् द्वादश कारयेत्।<br>चतुर्भुजः खर्वटे स्याद् वने ग्रामे द्विबाहुकः॥ ४७<br>शक्तिः पाशस्तथा खड्गः शरः शूलं तथैव च।<br>वरदश्चैकहस्तः स्यादथ चाभयदो भवेत्॥ ४८<br>एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूरकटकोज्ज्वलाः।<br>धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता॥ ४९<br>खेटकं ताम्रचूडं च वामहस्ते तु शस्यते।<br>द्विभुजस्य करे शक्तिर्वामे स्यात् कुक्कुटोपरि॥ ५०<br>चतुर्भुजे शक्तिपाशौ वामतो दक्षिणे त्वसिः।<br>वरदोऽभयदो वापि दक्षिणः स्यात् तुरीयकः॥ ५१अब मैं कार्तिकेयकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाको मध्यकालीन सूर्यकी भाँति परम तेजोमय, कमलके मध्यभागके समान अरुण, मयूरपर आरूढ़, दण्डों और चीरोंसे सुशोभित, सुकुमार शरीरसे युक्त और बारह भुजाओंवाली बनाना चाहिये। उसे अपने इष्ट नगरमें स्थापित करना चाहिये। खर्वट (पर्वतके समीपके ग्राम)-में इनकी चार भुजाओंवाली और वन अथवा ग्राममें दो बाहुवाली प्रतिमा स्थापित करानी चाहिये। (बारह भुजाओंवाली प्रतिमामें) उनकी दाहिनी ओरके छः हाथोंमें शक्ति, पाश, तलवार, बाण और शूल शोभायमान हों। एक हाथमें अभयमुद्रा अथवा वरदमुद्रा बनानी चाहिये। ये सभी केयूर तथा कटकसे विभूषित उज्ज्वल वर्णके होने चाहिये। बायीं ओरके छः हाथ क्रमशः धनुष, पताका, मुष्टि, फैली हुई तर्जनी, ढाल, मुर्गा—इन वस्तुओंसे युक्त और उसी वर्णके होने चाहिये। दो भुजाओंवाली प्रतिमाके बायें हाथमें शक्ति और दाहिना हाथ कुक्कुटपर न्यस्त रहना चाहिये। चतुर्भुज प्रतिमाकी बायीं ओरके दो हाथोंमें शक्ति और पाश तथा दाहिनी ओरके तीसरे हाथमें तलवार हो और चौथा हाथ अभय अथवा वरदमुद्रासे युक्त हो॥ ४५—५१॥
विनायकं प्रवक्ष्यामि गजवक्त्रं त्रिलोचनम्।<br>लम्बोदरं चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम्॥ ५२<br>ध्वस्तकर्णं बृहत्तुण्डमेकदंष्ट्रं पृथूदरम्।<br>स्वदन्तं दक्षिणकरे उत्पलं चापरे तथा॥ ५३अब मैं गणेशजीकी प्रतिमाका विधान बता रहा हूँ। उनकी प्रतिमामें हाथी-सा मुख, तीन नेत्र, लम्बा उदर, चार भुजाएँ, सर्पका यज्ञोपवीत, सिमटा हुआ कान, विशाल शुण्ड, एक दाँत और तोंद स्थूल हो। उनके ऊपरके दाहिने हाथमें अपना दाँत और निचले हाथमें कमल होना चाहिये।

* कहीं-कहीं उनके ऊपरके दाहिने हाथमें वेदग्रन्थ या स्रुक् भी निर्दिष्ट है।