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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन

* अध्याय १४० *५०७
गृहप्रतापैः क्वथितं समन्तात्<br>तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम्।<br>वित्रासयामास तिमीन् सनक्रां -<br>स्तिमिङ्गिलांस्तक्वथितांस्तथान्यान्॥ ७२<br>सगोपुरो मन्दरपादकल्पः<br>प्राकारवर्यस्त्रिपुरे च सोऽथ।<br>तैरैव सार्धं भवनैः पपात<br>शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे॥ ७३<br>सहस्रशृङ्गैर्भवनैर्यदासीत्<br>सहस्रशृङ्गः स इवाचलेशः।<br>नामावशेषं त्रिपुरं प्रजज्ञे<br>हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ७४<br>प्रदह्यमानेन पुरेण तेन<br>जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम्।<br>दुःखं महत्प्राप्य जलावमग्नं<br>हित्वा महान् सौधवरो मयस्य॥ ७५<br>तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा।<br>शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः॥ ७६<br>असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्।<br>भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः॥ ७७<br>यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः।<br>द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं खण्डं तत्रेदं नाशगा जनाः।<br>तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम्॥ ७८उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे मगरमच्छ, नाक, तिमिंगिल तथा अन्यान्य जलजन्तु संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका महान् भवन ही बच गया था। अदिति-नन्दन वज्रधारी देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले—'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्निकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोंसे रहित है॥ ६८–७८॥
ऋषय ऊचुः<br>भगवन् स मयो येन गृहेण प्रपलायितः।<br>तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव ॥ ७९ऋषियोंने पूछा— चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी ! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई ? यह हमें बतलाइये ॥ ७९ ॥
सूत उवाच<br>दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम्।<br>देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः।<br>ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः॥ ८०<br>तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः।<br>तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् ॥ ८१सूतजी कहते हैं— ऋषियो ! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त वहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी।
५०८* मत्स्यपुराण *

| शिवः सृष्ट्वा गृहं प्रादान्मयायैव गृहार्थिने ।<br>विरराम सहस्राक्षः पूजयामास चेश्वरम् ।<br>पूज्यमानं च भूतेशं सर्वे तुष्टुवुरीश्वरम् ॥ ८२<br>सम्पूज्यमानं त्रिदशैः समीक्ष्य<br>गणैर्गणेशाधिपतिं तु मुख्यम् ।<br>हर्षाद्ववल्गुर्जहसुश्च देवा<br>जग्मुर्ननर्दुस्तु विषक्तहस्ताः ॥ ८३<br>पितामहं वन्द्य ततो महेशं<br>प्रगृह्य चापं प्रविसृज्य भूतान् ।<br>रथाच्च सम्पत्य हरेषुदग्धं<br>क्षिप्तं पुरं तन्मकरालये च ॥ ८४<br>य इमं रुद्रविजयं पठते विजयावहम् ।<br>विजयं तस्य कृत्येषु ददाति वृषभध्वजः ॥ ८५<br>पितॄणां वापि श्राद्धेषु य इमं श्रावयिष्यति ।<br>अनन्तं तस्य पुण्यं स्यात् सर्वयज्ञफलप्रदम् ॥ ८६<br>इदं स्वस्त्ययनं पुण्यमिदं पुंसवनं महत् ।<br>इदं श्रुत्वा पठित्वा च यान्ति रुद्रसलोकताम् ॥ ८७ | तब भक्तवत्सल शंकरजीने एक उत्तम पुर और गृहका निर्माण कर गृहार्थी मयको प्रदान कर दिया। यह देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र शान्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने महेश्वरकी पूजा की। उस समय सभी देवताओंने पूजित होते हुए भूतपति शंकरकी स्तुति की। तदनन्तर देवताओं और गणेश्वरोंद्वारा प्रधान गणेशाधिपति महेश्वरकी पूजा होते देखकर देवगण हाथ उठाकर हर्षपूर्वक जय-जयकार, अट्टहास और सिंहनाद करने लगे। इसके बाद रथसे निकलकर उन्होंने ब्रह्मा और शंकरजीकी वन्दना की। फिर हाथमें धनुष ग्रहणकर और भूतगणोंसे विदा होकर वे अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हुए; क्योंकि शंकरजीके बाणसे भस्म हुआ त्रिपुर महासागरमें निमग्न हो चुका था। जो मनुष्य विजय प्रदान करनेवाले इस रुद्रविजयका पाठ करता है, उसे भगवान् शंकर सभी कार्योंमें विजय प्रदान करते हैं। जो मनुष्य पितरोंके श्राद्धोंके अवसरपर इसे पढ़कर सुनाता है उसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाले अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। यह रुद्रविजय महान् मङ्गलकारक, पुण्यप्रद और संतानप्रदायक है। इसे पढ़ और सुनकर लोग रुद्रलोकमें चले जाते हैं ॥ ८०–८७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिपुरदाहो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें त्रिपुरदाह नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥


एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय

पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृतर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—सूतजी! इलानन्दन महाराज पुरूरवा प्रति मासकी अमावस्याको किस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते हैं और वहाँ अपने पितरोंको कैसे तृप्त करते हैं? उन बुद्धिमान् नरेशके इस प्रभावको हमलोग सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
कथं गच्छत्यमावास्यां मासि मासि दिवं नृपः ।<br>ऐलः पुरूरवाः सूत तर्पयेत कथं पितॄन् ।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुं प्रभावं तस्य धीमतः ॥ १
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें महाराज मनुने भगवान् मधुसूदनसे यही प्रश्न किया था। उस समय भगवान्ने उन सूर्यपुत्र मनुके प्रति जो कुछ कहा था, वही मैं बतला रहा हूँ, आपलोग ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥
एतदेव तु पप्रच्छ मनुः स मधुसूदनम् ।<br>सूर्यपुत्राय चोवाच यथा तन्मे निबोधत ॥ २

* अध्याय १४१ * ५०९


मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! मैं इलापुत्र पुरूरवाका
तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभावं विस्तरेण तु।<br>ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता॥ ३प्रभाव, स्वर्गलोकमें उसका बुद्धिमान् चन्द्रमाके साथ संयोग, उन चन्द्रमासे अमृतकी उपलब्धि तथा पितृतर्पणकी बात विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। सौम्य, बर्हिषद्, काव्य
सोमाच्चैवामृतप्राप्तिः पितॄणां तर्पणं तथा।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ ४तथा अग्निष्वात्तसंज्ञक पितरों तथा नक्षत्रोंपर विचरण करते हुए सूर्य और चन्द्रमा जिस समय अमावास्या
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागतौ।<br>अमावास्यां निवसतः एकस्मिन्नथ मण्डले॥ ५तिथिको एक मण्डल अर्थात् एक राशिपर स्थित होते हैं, उस समय वह प्रत्येक अमावास्याको सूर्य और चन्द्रमाका
तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाकरौ।<br>अमावास्याममावास्यां मातामहपितामहौ॥ ६दर्शन करनेके लिये स्वर्गमें जाता है और वहाँ मातामह (नाना) और पितामह (बाबा)—दोनोंको अभिवादन कर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ कुछ दिनतक ठहरा
अभिवाद्य तु तौ तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति।<br>प्रचस्कन्द ततः सोममर्चयित्वा परिश्रमत्॥ ७रहता है। चन्द्रमासे अमृतके क्षरण होनेपर उससे परिश्रमपूर्वक पितरोंकी पूजा करके लौटता है। किसी महीनेमें श्राद्ध
ऐलः पुरूरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया।<br>ततः स दिवि सोमं वै ह्युपतस्थे पितॄनपि॥ ८करनेकी इच्छासे इलानन्दन विद्वान् पुरूरवा स्वर्गलोकमें चन्द्रमा और पितरोंके निकट गया और दो लवमात्र कुहू
द्विलवं कुहुमात्रं च तावुभौ तु निधाय सः।<br>सिनीवालीप्रमाणाल्यकुहूमात्रव्रतोदये ॥ ९अमावास्यामें उसने दोनोंको स्थापित किया; क्योंकि पितृ-व्रतमें जब सिनीवालीका प्रमाण थोड़ा तथा कुहू (अमावास्या) प्रशस्त मानी गयी है। अतः कुहूका समय प्राप्त हुआ
कुहूमात्रं पितॄद्देशं ज्ञात्वा कुहूमुपासते।<br>तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते॥ १०जानकर वह पितरोंके उद्देश्यसे कुहूकी उपासना करता है। उसकी उपासना करनेके पश्चात् वह कालकी प्रतीक्षा
स्वधामृतं तु सोमाद् वै वसंस्तेषां च तृप्तये।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधामृतपरिस्त्रवैः।<br>कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ ११करता हुआ चन्द्रमाकी भी प्रतीक्षा करता है। वहाँ रहते हुए उसे पितरोंकी तृप्तिके लिये चन्द्रमासे स्वधारूप अमृत प्राप्त होता है। चन्द्रमाकी पंद्रह किरणोंसे स्वधामृतका क्षरण होता है। कृष्णपक्षमें श्राद्धभोजी पितरोंका उन श्रेष्ठ
सद्योऽभिक्षरता तेन सौम्येन मधुना च सः।<br>निवापेष्वथ दत्तेषु पित्र्येण विधिना तु वै॥ १२किरणोंसे बड़ा प्रेम रहता है तथा अन्य पितर उनसे द्वेष करते हैं। पुरूरवा तुरंत अभिक्षरित हुए उस उत्तम मधुको पितृ-श्राद्धकी विधिके अनुसार श्राद्धके समय पितरोंको
स्वधामृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन्।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ १३प्रदान करता है। इस प्रकार वह उत्तम स्वधामृतसे सौम्य, बर्हिषद्, काव्य तथा अग्निष्वात्त पितरोंको तृप्त करता
ऋतुरग्निः स्मृतो विप्रैर्ऋतुं संवत्सरं विदुः।<br>जज्ञिरे ऋतवस्तस्मादृर्तुभ्यो ह्यार्तवाऽभवन्॥ १४रहता है। महर्षियोंने ऋतुको अग्नि बतलाया है और ऋतुको संवत्सर भी कहते हैं। उस संवत्सरसे ऋतुकी उत्पत्ति होती है और ऋतुओंसे उत्पन्न हुए पितर आर्तव
पितरोऽर्तवोऽर्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः।<br>पितामहास्तु ऋतवो ह्यमावास्याब्दसूनवः।<br>प्रपितामहाः स्मृता देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः सुताः॥ १५कहलाते हैं। आर्तव और अर्धमास पितरोंको ऋतुका पुत्र तथा ऋतुस्वरूप पितामह और अमावास्याको संवत्सरका पुत्र जानना चाहिये। प्रपितामह और पञ्च संवत्सररूप देवगण ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं॥३—१५॥

५१० * मत्स्यपुराण *

सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्ता इति त्रिधा।<br>गृहस्था ये तु यज्वानो हविर्यज्ञार्तवाश्च ये।<br>स्मृता बर्हिषदस्ते वै पुराणे निश्चयं गताः॥ १६<br>गृहमेधिनश्च यज्वानो अग्निष्वात्तार्तवाः स्मृताः।<br>अष्टकापतयः काव्याः पञ्चाब्दांस्तु निबोधत॥ १७<br>तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः।<br>सोमस्त्विड्वत्सरश्चैव वायुश्चैवानुवत्सरः॥ १८<br>रुद्रस्तु वत्सरस्तेषां पञ्चाब्दा ये युगात्मकाः।<br>कालेनाधिष्ठितस्तेषु चन्द्रमाः स्रवते सुधाम्॥ १९<br>एते स्मृता देवकृत्याः सोमपाश्चोष्मपाश्च ये।<br>तांस्तेन तर्पयामास यावदासीत् पुरूरवाः॥ २०<br>यस्मात्प्रसूयते सोमो मासि मासि विशेषतः।<br>ततः स्वधामृतं तद्वै पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत् तदमृतं सोममवाप मधु चैव हि॥ २१<br>ततः पीतसुधं सोमं सूर्योऽसावेकरश्मिना।<br>आप्यायते सुषुम्णेन सोमं तु सोमपायिनम्॥ २२<br>निःशेषं वै कलाः पूर्वा युगपद्ध्यापयन्पुरा।<br>सुषुम्णाऽऽप्यायमानस्य भागं भागमहःक्रमात्॥ २३<br>कलाः क्षीयन्ति कृष्णास्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ २४<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः।<br>एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेऽप्यहःक्रमात्।<br>देवैः पीतसुधं सोमं पुरा पश्चात्पिबेद् रविः॥ २५<br>पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः।<br>आप्यायत्सुषुम्णेन भागं भागमहःक्रमात्॥ २६<br>सुषुम्णाप्यायमानस्य शुक्ला वर्धयन्ति वै कलाः।<br>तस्माद्घ्रसन्ति वै कृष्णाः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च॥ २७<br>एवमाप्यायते सोमः क्षीयते च पुनः पुनः।<br>समृद्धिरेवं सोमस्य पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ २८<br>इत्येष पितृमान् सोमः स्मृतस्तद्वत्सुधात्मकः।<br>कान्तः पञ्चदशैः सार्धं सुधामृतपरिस्त्रवैः॥ २९सौम्य, बर्हिषद्, काव्य और अग्निष्वात्त—पितरोंके ये तीन भेद हैं। इनमें जो गृहस्थ, यज्ञकर्ता और हवन करनेवाले हैं, वे आर्तव पितर पुराणमें बर्हिषद् नामसे निश्चित किये गये हैं। गृहस्थाश्रमी और यज्ञकर्ता आर्तव पितर अग्निष्वात्त कहलाते हैं। अष्टकापति आर्तव पितरोंको काव्य कहा जाता है। अब पञ्चाब्दोंको सुनिये। इनमें, अग्नि संवत्सर, सूर्य परिवत्सर, सोम इड्वत्सर, वायु अनुवत्सर और रुद्र वत्सर हैं। ये पञ्चाब्द युगात्मक होते हैं। समयानुसार इनपर स्थित हुए चन्द्रमा अमृतका क्षरण करते हैं। ये देवकर्म कहे जाते हैं। जबतक पुरूरवा वहाँ रहता था तबतक वह जो सोमप और ऊष्मप पितर हैं, उनको भी उसी अमृतसे तृप्त करता था। चूँकि चन्द्रमा प्रत्येक मासमें विशेषरूपसे अमृतका क्षरण करते हैं और वह सोमपायी पितरोंको स्वधामृतरूपसे प्राप्त होता है। इसीलिये वह अमृतस्वरूप मधु सोमको प्राप्त होता है। इस प्रकार पितरोंद्वारा चन्द्रमाका अमृत पी लिये जानेपर सूर्यदेव अपनी एकमात्र सुषुम्णा नामकी किरणद्वारा उन सोमपायी चन्द्रमाको पुनः परिपूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार सूर्य सुषुम्णाद्वारा पूर्ण किये जाते हुए चन्द्रमाकी पहलेकी सम्पूर्ण कलाओंको दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा करके पूर्ण करते हैं। चन्द्रमाकी कलाएँ कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं और शुक्लपक्षमें वे पुनः पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे चन्द्रमाका शरीर पूर्ण होता रहता है। इसी कारण शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे परिपूर्ण किये गये चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल पूर्णिमा तिथिको श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। पहले देवगण चन्द्रमासे स्रवित हुए अमृतको पीते हैं, उसके बाद सूर्य भी सोमका पान करते हैं। सूर्य अपनी एक किरणसे पंद्रह दिनोंतक सोमको पीते हैं और पुनः दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा कर सुषुम्णा किरणद्वारा उसे पूर्ण कर देते हैं। इसी कारण शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्षमें वे क्षीण होती हैं, यही इनका क्रम है। इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह दिनोंतक बढ़ते हैं और पुनः पंद्रह दिनतक क्षीण होते रहते हैं। चन्द्रमाकी इस प्रकारकी समृद्धि और ह्रास शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्षके आश्रयसे होते हैं। इस प्रकार सुधामृतस्रावी पंद्रह किरणोंसे सुशोभित ये चन्द्रमा सुधात्मक एवं पितृमान् कहे जाते हैं॥ १६—२९॥
* अध्याय १४१ *५११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अतः परं प्रवक्ष्यामि पर्वाणां संधयश्च याः।<br>यथा ग्रथ्नन्ति पर्वाणि आवृत्तादिक्षुवेणुवत्॥ ३०<br>तथाब्दमासाः पक्षाश्च शुक्लाः कृष्णास्तु वै स्मृताः।<br>पौर्णमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थयः संधयस्तथा॥ ३१<br>अर्धमासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च।<br>अग्न्याधानक्रिया यस्तान्नीयन्ते पर्वसंधिषु॥ ३२<br>तस्मात्तु पर्वणो ह्यादौ प्रतिपद्यादिसंधिषु।<br>सायाह्ने अनुमत्याश्च द्वौ लवौ काल उच्यते।<br>लवौ द्वावेव राकायाः कालो ज्ञेयोऽपराह्निकः॥ ३३<br>प्रकृतिः कृष्णपक्षस्य कालेऽतीतेऽपराह्रिके।<br>सायाह्ने प्रतिपद्येष स कालः पौर्णमासिकः॥ ३४<br>व्यतीपाते स्थिते सूर्ये लेखादूर्ध्वं युगान्तरम्।<br>युगान्तरोदिते चैव चन्द्रे लेखोपरि स्थिते॥ ३५<br>पूर्णमासव्यतीपातो यदा पश्येत्परस्परम्।<br>तौ तु वै प्रतिपद्यावत्तस्मिन्काले व्यवस्थितौ॥ ३६<br>तत्कालं सूर्यमुद्दिश्य दृष्ट्वा संख्यातुमर्हसि।<br>स चैव सत्क्रियाकालः षष्ठः कालोऽभिधीयते॥ ३७<br>पूर्णेन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसंधिषु पूर्णिमा।<br>तस्मादाप्यायते नक्तं पौर्णमास्यां निशाकरः॥ ३८<br>यदान्योन्यवतो पाते पूर्णिमा प्रेक्षते दिवा।<br>चन्द्रादित्यौऽपराह्ने तु पूर्णत्वात्पूर्णिमा स्मृता॥ ३९<br>यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।<br>तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता॥ ४०<br>अत्यर्थं राजते यस्मात्पौर्णमास्यां निशाकरः।<br>रञ्जनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः॥ ४१<br>अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरौ।<br>एका पञ्चदशी रात्रिरमावास्या ततः स्मृता॥ ४२इसके बाद अब मैं पर्वोंकी जो संधियाँ हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ। जैसे गन्ने और बाँसमें गोलाकार गाँठें बनी रहती हैं वैसे ही वर्ष, मास, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, अमावास्या और पूर्णिमाके भेद—ये सभी पर्वकी ग्रन्थियाँ और संधियाँ हैं। (प्रत्येक पक्षमें) प्रतिपद्-द्वितीया आदि पंद्रह तिथियाँ होती हैं। चूँकि अग्न्याधान आदि क्रियाएँ पर्वसंधियोंमें सम्पन्न की जाती हैं, अतः उन्हें (अमा, पूर्णिमा) पर्वकी तथा प्रतिपदाकी संधियोंमें करना चाहिये। चतुर्दशी और पूर्णिमा आदिके दो लवको पर्वकाल कहा जाता है तथा राकाके दूसरे दिनमें आनेवाले दो लवको पर्वकाल जानना चाहिये। कृष्णपक्षके अपराह्निक कालके व्यतीत हो जानेपर सायंकालमें प्रतिपदाके योगमें जो काल आता है उसे पौर्णमासिक कहते हैं। सूर्यके लेखा (विषुव)-के ऊपर व्यतीपातमें स्थित होनेपर युगान्तर कहलाता है। उस समय चन्द्रमा लेखाके ऊपर स्थित युगान्तरमें उदित होते हैं। इस प्रकार जब चन्द्रमा और व्यतीपात परस्पर एक-दूसरेको देखें और प्रतिपदा तिथितक उसी अवस्थामें स्थित रहें तो उस समय सूर्यके उद्देश्यसे उस समयको देखकर गणना करनी चाहिये। उसे सत्क्रियाकाल नामक छठा काल कहते हैं। शुक्लपक्षके पूर्ण होनेपर रात्रिकी संधिमें जब पूर्णचन्द्र उदय होते हैं, तब उसे पूर्णिमा कहते हैं। इसीलिये चन्द्रमा पूर्णिमाकी रातमें अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमा तिथिकी ह्रास-वृद्धि होती रहती है, अतः यदि वृद्धिके समय दूसरे दिन सूर्य और चन्द्र दिनमें पूर्णिमामें दीखते हैं तो वह तिथि पूर्ण होनेके कारण पूर्णिमा कहलाती है। यदि दूसरे दिन प्रतिपदाका योग होनेमें चन्द्रमाकी एक कला हीन हो गयी तो उस पूर्णिमाको अनुमति कहते हैं। यह अनुमति देवताओंसहित पितरोंको परम प्रिय है। चूँकि पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा अत्यन्त सुशोभित होते हैं, इसलिये चन्द्रमाको प्रिय होनेके कारण उस पूर्णिमाको विद्वानोंने राका नामसे अभिहित किया है। कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं रात्रिको जब सूर्य और चन्द्र एक साथ एक नक्षत्रपर स्थित होते हैं, तब उसे अमावास्या कहा जाता है॥ ३०-४२॥
उद्दिश्य ताममावास्यां यदा दर्श समागतौ।<br>अन्योन्यं चन्द्रसूर्यौ तु दर्शनाद् दर्श उच्यते॥ ४३उस अमावास्याको लक्ष्य कर जब सूर्य और चन्द्रमा दर्शपर आ जाते हैं और परस्पर एक-दूसरेको देखते हैं, तब उसे दर्श कहते हैं।