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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

४८० * मत्स्यपुराण *

रुद्रदत्तं तदा दीप्तं दीप्तानलसमप्रभम्।<br>वज्रं वज्रनिभाङ्गस्य दानवस्य ससर्ज ह॥ ५३<br>तन्नन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम्।<br>पपात वक्षसि तदा वज्रं दैत्यस्य भीषणम्॥ ५४<br>स वज्रनिहतो दैत्यो वज्रसंहननोपमः।<br>पपात वज्राभिहतः शक्रेणाद्रिरिवाहतः॥ ५५<br>दैत्येश्वरं विनिहतं नन्दिना कुलनन्दिना।<br>चुक्रुशुर्दानवाः प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्च गणाधिपाः॥ ५६<br>दुःखामर्षितरोषास्ते विद्युन्मालिनि पातिते।<br>द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदाः ससृजुर्यथा॥ ५७<br>ते पीड्यमाना गुरुभिर्गिरिभिश्च गणेश्वराः।<br>कर्तव्यं न विदुः किंचिद्दुन्मद्याधार्मिका इव॥ ५८<br>ततोऽसुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो बभौ॥ ५९<br>भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्किताननाः।<br>विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्वार्यमाणा यथा तथा॥ ६०<br>मयेन मायावीर्येण वध्यमाना गणेश्वराः।<br>भ्रमन्ति बहुशब्दालाः पञ्जरे शकुनो इव॥ ६१<br>तथासुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>ददाह च बलं सर्वं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ६२<br>तारकाख्येण वार्यन्ते शरवर्षैस्तदा गणाः।<br>मयेन मायानिहतास्तारकाख्येण चेषुभिः॥ ६३<br>गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः॥ ६४<br>भूयः सम्पतते चाग्निर्गृहान् ग्राहान् भुजङ्गमान्।<br>गिरीन्द्रांश्च हरीन् व्याघ्रान् वृक्षान् सूमरवर्णकान्॥ ६५<br>शरभानष्टपादांश्च आपः पवनमेव च।<br>मयो मायाबलेनैव पातयत्येव शत्रुषु॥ ६६<br>ते तारकाक्षेण मयेन मायया<br>सम्मुह्यमाना विवशा गणेश्वराः।<br>न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं<br>यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः॥ ६७उस समय उन्होंने रुद्रद्वारा दिये गये एवं प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावशाली चमकते हुए वज्रको वज्रतुल्य कठोर शरीरवाले दानवके ऊपर चला दिया। तब नन्दीके हाथसे छूटा हुआ मोतियोंसे विभूषित वह भयंकर वज्र विद्युन्मालीके वक्षःस्थलपर जा गिरा। फिर तो वज्रके समान ठोस शरीरवाला दैत्य विद्युन्माली उस वज्रसे आहत होकर उसी प्रकार धराशायी हो गया, मानो इन्द्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ा हो। अपने कुल (वर्ग)-को आनन्दित करनेवाले नन्दीद्वारा दैत्यराज विद्युन्मालीको मारा गया देखकर दानवलोग चीत्कार करने लगे। तब गणेश्वरोंने उनपर धावा बोल दिया। विद्युन्मालीके मारे जानेपर दानव दुःख और अमर्षके कारण क्रोधसे भरे हुए थे। वे गणेश्वरोंने ऊपर बादलकी भाँति वृक्षों और पर्वतोंकी महान् वृष्टि करने लगे। विशाल पर्वतोंके प्रहारसे पीड़ित हुए सभी गणेश्वर ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये, जैसे अधार्मिक जन वन्दनीय गुरुजनोंके प्रति हो जाते हैं। तदनन्तर असुरनायक प्रतापी श्रीमान् तारकाक्ष वृक्षों एवं पर्वतोंके समान रूप धारण करके रणभूमिमें उपस्थित हुआ॥ ४९-६०॥<br><br>उस समय बहुतेरे गणेश्वरोंके मस्तक फट गये थे, किन्हींके पैर टूट गये थे और कुछके मुखोंपर घाव लगा था। वे सभी मन्त्रोंद्वारा रोके गये सर्पकी तरह शोभा पा रहे थे। मायावी मयद्वारा मारे जाते हुए गणेश्वर पिंजरेमें बंद पक्षीकी तरह अनेकों प्रकारका शब्द करते हुए चक्कर काट रहे थे। तत्पश्चात् असुरश्रेष्ठ प्रतापी श्रीमान् तारकाक्षने पार्षदोंकी सारी सेनाको उसी प्रकार जलाना प्रारम्भ किया, जैसे आग सूखे इन्धनको जला देती है। तारकाक्ष बाणोंकी वर्षा करके पार्षदगणोंको रोक देता था। इस प्रकार मयकी माया और तारकाक्षके बाणोंद्वारा गणेश्वर मारे जा रहे थे। वे पुरानी जड़वाले वृक्षोंकी तरह व्याकुल हो गये। पुनः मयने अपनी मायाके बलपर शत्रुओंके ऊपर अग्निकी वर्षा की तथा ग्रह, मकर, सर्प, विशाल पर्वत, सिंह, बाघ, वृक्ष, काले हिरन और आठ पैरोंवाले शरभों (गैंडों)-को भी गिराया, जलकी घनघोर वृष्टि की और झंझावातका भी प्रकोप उत्पन्न किया। इस प्रकार तारकाक्ष और मयकी मायासे मोहित होकर वे गणेश्वर मनसे भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। वे ऐसे निरुद्ध हो गये जैसे मुनियोंद्वारा रोके गये इन्द्रियोंके विषय।
* अध्याय १३५ *४८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महाजलाग्न्यादिसकुञ्जरोरगै-<br>र्हरीन्द्रव्याघ्रर्क्षतरक्षुराक्षसैः<br>विबाध्यमानास्तमसा विमोहिताः<br>समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः॥ ६८<br>सम्मर्द्यमानेषु गणेश्वरेषु<br>संनर्दमानेषु सुरेतरेषु।<br>ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितं<br>रिपोर्बलं संविविशुः सहायुधाः॥ ६९<br>यमो गदास्त्रो वरुणश्च भास्कर-<br>स्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः ।<br>स्वयं च शक्रः सितनागवाहनः<br>कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः ॥ ७०<br>स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरः<br>स सान्तकस्त्र्यक्षपतिर्महाद्युतिः ।<br>एते रिपूणां प्रवराभिरक्षितं<br>तदा बलं संविविशुर्मदोद्धताः॥ ७१<br>यथा वनं दर्पितकुञ्जराधिपा<br>यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः।<br>यथा च सिंहैर्विजनेषु गोकुलं<br>तथा बलं तत्रिदशैर्भिद्रुतम् ॥ ७२<br>कृतप्रहारातुरदीनदानवं<br>ततस्त्वभज्यन्त बलं हि पार्षदाः।<br>स्वर्ज्योतिषां ज्योतिरिषोष्णवान् हरि-<br>र्यथा तमो घोरतरं नराणाम्॥ ७३<br>विशान्तयामास यथा सदैव<br>निशाकरः संचितशार्वरं तमः।<br>ततोऽपकृष्टे च तमः प्रभावे<br>ह्यस्त्रप्रभावे च विवर्धमाने ॥ ७४<br>दिग्लोकपालैर्गणनायकैश्च<br>कृतो महान् सिंहरवो मुहूर्तम्।<br>संख्ये विभग्ना विकरा विपादा-<br>श्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरिताङ्गाः॥ ७५<br>देवेतरा देववरैर्विभिन्नाः<br>सीदन्ति पङ्केषु यथा गजेन्द्राः।<br>वज्रेण भीमेन च वज्रपाणिः<br>शक्त्या च शक्त्या च मयूरकेतुः ॥ ७६उस समय प्रमथगण जल और अग्निकी महान् वृष्टि, हाथी, सर्प, सिंह, व्याघ्र, रीछ, चीते और राक्षसोंद्वारा सताये जा रहे थे। मायाका इतना घना अन्धकार प्रकट हुआ, जिसमें वे ऐसे विमोहित हो गये, जैसे समुद्रके मध्यमें जलकी थाह लगानेवाले विमूढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार गणेश्वर पीड़ित किये जा रहे थे और दानवगण सिंहनाद कर रहे थे। इसी बीच प्रधान-प्रधान देवता अस्त्र धारणकर गणेश्वरोंकी रक्षा करनेके लिये शत्रुसेनामें प्रविष्ट हुए। उस अवसरपर गदाधारी यमराज, वरुण, भास्कर, एक करोड़ देवताओंके साथ कुमार कार्तिकेय, श्वेत हाथी ऐरावतपर सवार हो हाथमें वज्र लिये हुए स्वयं देवराज इन्द्र, चन्द्रमा और अपने पुत्र शनैश्चरके साथ सूर्य तथा अन्तकसहित परम तेजस्वी त्रिलोचन रुद्र—ये सभी मदोद्धत देवता उत्कृष्ट बलवानोंद्वारा सुरक्षित शत्रुओंकी सेनामें प्रविष्ट हुए। जिस प्रकार मतवाले गजेन्द्र वनमें, बादलोंसे घिरे हुए आकाशमें सूर्य और निर्जन स्थानमें स्थित गोष्ठमें सिंह प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार देवताओंने उस सेनापर धावा बोल दिया। फिर तो पार्षदगणोंने शस्त्रप्रहार करके दानवोंको ऐसा व्याकुल और दीन कर दिया कि उनका वह विशाल सेना-व्यूह उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गया जैसे स्वर्गीय ज्योतिःपुञ्जोंके महान् ज्योति उष्णरश्मि सूर्य मनुष्योंके अन्धकारका विनाश कर देते हैं तथा चन्द्रमा रात्रिके घने अन्धकारका प्रशमन कर देते हैं॥ ६१—७३ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर अन्धकारका प्रभाव नष्ट हो जाने और अस्त्रका प्रभाव बढ़नेपर दिक्पालों, लोकपालों और गणनायकोंने दो घड़ीतक महान् सिंहनाद किया। फिर तो वे युद्धमें दानवोंको विदीर्ण करने लगे। वहाँ किन्हींके हाथ कट गये तो किन्हींके पैर खण्डित हो गये, किन्हींके मस्तक कट गये तो किन्हींके शरीर बाणोंसे घिर गये। इस प्रकार देवश्रेष्ठोंद्वारा घायल किये गये दानव ऐसा कष्ट पा रहे थे, जैसे दलदलमें फँसे हुए गजराज विवश हो जाते हैं। उस समय वज्रपाणि इन्द्र अपने भयंकर वज्रसे, मयूरध्वज स्वामिकार्तिक शक्तिपूर्वक अपनी शक्तिसे,

४८२ * मत्स्यपुराण *


| दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः<br>पाशेन चोग्रेण च वारिगोप्ता।<br>शूलेन कालेन च यक्षराजो<br>वीर्येण तेजस्वितया सुकेशः॥ ७७<br>गणेश्वरास्ते सुरसंनिकाशाः<br>पूर्णाहुतीसिक्तशिखिप्रकाशाः ।<br>उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्<br>यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः॥ ७८<br>मयस्तु देवान् परिरक्षितार-<br>मुमात्मजं देववरं कुमारम्।<br>शरेण भित्त्वा स हि तारकासुतं<br>स तारकाख्यासुरमभाषे॥ ७९<br>कृत्वा प्रहारं प्रविशामि वीरं<br>पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः।<br>विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य<br>पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः॥ ८०<br>वयं हि शस्त्रक्षतविक्षताङ्गा<br>विशीर्णशस्त्रध्वजवर्मवाहाः ।<br>जयैषिणस्ते जयकाशिनश्च<br>गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च॥ ८१<br>मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो<br>वचोऽभिकाङ्क्षन् क्षतजोपमाक्षः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरं दितेः सुतैः<br>सुतैरदित्या युधि वृद्धहर्षैः ॥ ८२<br>ततः सशङ्खानकभेरिभीमं<br>ससिंहनादं हरसैन्यमाभौ।<br>मयानुगं घोरगभीरगह्वरं<br>यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम्॥ ८३ | धर्मराज अपने भयंकर दण्डसे, वरुण अपने उग्र पाशसे और पराक्रम एवं तेजसे सम्पन्न सुन्दर बालोंवाले यक्षराज कुबेर अपने काल-सदृश शूलसे प्रहार कर रहे थे। देवताओंके समान तेजस्वी एवं पूर्णाहुतिसे सिक्त हुई अग्निके समान प्रकाशमान गणेश्वर दानववृन्दपर उसी प्रकार झपटते थे मानो बिजलियाँ गिर रही हों। तत्पश्चात् मयने देवताओंकी रक्षामें तत्पर पार्वती-नन्दन एवं तारका-पुत्र सर्वश्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयको बाणसे घायल कर तारकाक्षसे कहा—'दैत्येन्द्र! हमलोगोंके शरीर शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो गये हैं तथा हमारे शस्त्रास्त्र, ध्वज, कवच और वाहन आदि भी छिन्न-भिन्न हो गये हैं। इधर गणेश्वरों तथा लोकनायक देवोंके मनमें जयकी अभिलाषा विशेषरूपसे जागरूक हो उठी है, साथ ही वे विजयी भी हो रहे हैं, अतः अब मैं इस वीरपर प्रहार करके सेनासहित नगरमें प्रवेश कर जाता हूँ और वहाँ कुछ देर विश्राम कर शक्ति-सम्पन्न होकर पुनः अनुचरोंसहित युद्ध करूँगा।' मयकी ऐसी बात सुनकर उसका पालन करता हुआ रुधिर-सरीखे लाल नेत्रोंवाला तारकाक्ष तुरंत ही आकाशमार्गसे दिति-पुत्रोंके साथ त्रिपुरमें प्रवेश कर गया। उस समय देवगण रणभूमिमें हर्षके मारे उछल पड़े। फिर तो मयका पीछा करते हुए भगवान् शंकरके सैनिक विशेष शोभा पा रहे थे। उनके शङ्ख, नगाड़े और भेरियाँ बजने लगीं तथा वे सिंहनाद करने लगे। उस समय ऐसा भीषण शब्द हो रहा था मानो हिमालय पर्वतकी भयंकर एवं गहरी गुफामें गजराज और सिंह दहाड़ रहे हों ॥ ७४-८३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे इलावृते देवदानवयुद्धवर्णने प्रहारकृतं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें इलावृतमें देव-दानव-युद्ध-प्रसङ्गमें परस्पर प्रहार नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३५॥