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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१८५- वाराणसी-माहात्म्य

७६२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गणा यत्रावतिष्ठन्ति सन्नियुक्ता विनायकाः।<br>कूष्माण्डगजतुण्डश्च जयन्तश्च मदोत्कटाः॥ ६३<br>सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद् विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः॥ ६४<br>दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणाश्चैव गणेश्वराः॥ ६५<br>महोदरा महाकाया वज्रशक्तिधरास्तथा।<br>रक्षन्ति सततं देवि ह्यविमुक्तं तपोवनम्।<br>द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्गरपाणयः॥ ६६जहाँ कूष्माण्ड, गजतुण्ड, जयन्त, उत्कट पराक्रमी विनायकगण भलीभाँति नियुक्त होकर विराजमान रहते हैं। उनमें कुछ सिंह एवं बाघके-से मुखवाले, कुछ भयंकर, कुबड़े और वामन (बोने) हैं। जहाँ नन्दी, महाकाल, चण्डघण्ट, महेश्वर, दण्डचण्डेश्वर, महाबली घण्टाकर्ण—ये एवं अन्य अनेक गणसमूह और गणेश्वरवृन्द विद्यमान रहते हैं। देवि! ये सभी विशाल उदरवाले एवं विशालकाय हैं तथा हाथमें वज्र और शक्ति धारण करके इस अविमुक्त तपोवनकी सदा रक्षा करते हैं। ये सभी हाथमें शूल और मुद्गर धारण कर प्रत्येक द्वारपर स्थित रहते हैं॥ ६१—६६॥
सुवर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां चैलाजिनपयस्विनीम्।<br>वारणस्यां तु यो दद्यात् सवत्सां कांस्यभाजनाम्॥ ६७<br>गां दत्त्वा तु वरारोहे ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>आसप्तमं कुलं तेन तारितं नात्र संशयः॥ ६८<br>यो दद्याद् ब्राह्मणे किञ्चित् तस्मिन् क्षेत्रे वरानने।<br>कनकं रजतं वस्त्रमन्नाद्यं बहुविस्तरम्॥ ६९<br>अक्षयं चाव्ययं चैव स्यातां तस्य सुलोचने।<br>शृणु तत्त्वेन तीर्थस्य विभूतिं व्युष्टिमेव च॥ ७०<br>तत्र स्नात्वा महाभागे भवन्ति नीरुजा नराः।<br>दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७१<br>तदवाप्नोति धर्मात्मा तत्र स्नात्वा वरानने।<br>बहुस्वल्पे च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे॥ ७२<br>शुभां गतिमवाप्नोति अग्निवच्चैव दीप्यते।<br>वाराणसीजाह्नवीभ्यां संगमे लोकविश्रुते॥ ७३<br>दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते।<br>एतत् ते कथितं देवि तीर्थस्य फलमुत्तमम्॥ ७४वरारोहे! जो स्वर्णजटित सींगोंवाली, चाँदीसे युक्त खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्र और मृगचर्मसे सुशोभित, दूध देनेवाली, कांस्यदोहनीसे युक्त सवत्सा गौका वाराणसीमें वेदपारङ्गत ब्राह्मणको दान करता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंको तार देता है—इसमें संदेह नहीं है। वरानने! जो उस क्षेत्रमें थोड़ा अथवा अधिक मात्रामें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, अन्न आदि ब्राह्मणको दान करता है, सुलोचने! उसका वह दान अक्षय एवं अविनाशी हो जाता है। महाभागे! इस तीर्थकी वास्तविक विभूति और विशिष्ट फलको सुनो। वहाँ स्नान कर मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं। वरानने! दस अश्वमेध याग करनेसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह उस धर्मात्मा व्यक्तिको वहाँ स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो वेदके पारङ्गत ब्राह्मणको अधिक या स्वल्प—जो भी अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है, उस दानसे उसे शुभ गति प्राप्त होती है और वह अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। जो संसारमें प्रसिद्ध वरुणा-असी और गङ्गाके संगमपर विधानपूर्वक अन्नका दान देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। देवि! मैंने इस तीर्थका यह उत्तम फल तुम्हें बतला दिया॥६७—७४॥
पुनरन्यत् प्रवक्ष्यामि तीर्थस्य फलमुत्तमम्।<br>उपवासं तु यः कृत्वा विप्रान् संतर्पयेन्नरः।<br>सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७५<br>एकाहारस्तु यस्तिष्ठेन्मासं तत्र वरानने।<br>यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति॥ ७६अब मैं पुनः इस तीर्थका अन्य उत्तम फल बतला रहा हूँ। जो मनुष्य इस तीर्थमें उपवासपूर्वक विप्रोंको भलीभाँति तृप्त करता है, वह मानव सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। वरानने! जो वहाँ एक मासतक एक समय भोजन कर जीवन व्यतीत करता है, उसका जीवनपर्यन्त किया हुआ पाप अनायास ही नष्ट हो
* अध्याय १८३ *७६३
अग्निप्रवेशं ये कुर्युुरविमुक्ते विधानतः ।<br>प्रविशन्ति मुखं ते मे निःसंदिग्धं वरानने ॥ ७७<br>कुर्वन्त्यनशनं ये तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः ।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ७८<br>अर्चयेद् यस्तु मां देवि अविमुक्ते तपोवने ।<br>तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि यदवाप्नोति मानवः ॥ ७९<br>दशाश्वमेधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः ।<br>दशसौवर्णिकं पुष्पं योऽविमुक्ते प्रयच्छति ॥ ८०<br>अग्निहोत्रफलं धूपे गन्धदाने तथा शृणु ।<br>भूमिदानेन तत्तुल्यं गन्धदानफलं स्मृतम् ॥ ८१<br>सम्मार्जने पञ्चशतं सहस्रमनुलेपने ।<br>मालया शतसाहस्रमनन्तं गीतवाद्यतः ॥ ८२जाता है। वरानने! जो इस अविमुक्तक्षेत्रमें विधानपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, वे निश्चय ही मेरे मुखमें प्रवेश करते हैं, जो मेरे भक्त यहाँ दृढ़ निश्चयपूर्वक निराहार रहते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। देवि! जो इस अविमुक्त तपोवनमें मेरी पूजा करता है, उसका धर्म बतला रहा हूँ, जो उस मनुष्यको प्राप्त होता है। वह निःसंदेह दस अश्वमेध यागके फलको प्राप्त करता है। जो इस अविमुक्तमें दस सुवर्णनिर्मित पुष्पका दान करता है तथा वहाँ धूप दान करता है, उसे अग्निहोत्रका फल प्राप्त होता है। अब गन्धदानका फल सुनो। भूमिदानके समान ही गन्ध-दानका फल कहा गया है। भलीभाँति स्नान करनेपर पाँच सौ, चन्दन लगानेसे एक हजार, माला समर्पण करनेसे एक लाख और गाने-बजानेसे अनन्त अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति होती है॥ ७५–८२॥
देव्युवाच<br>अत्यद्भुतमिदं देवं स्थानमेतत् प्रकीर्तितम् ।<br>रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थं त्वं न मुञ्चसि ॥ ८३**देवीने पूछा—**देव! जैसा आपने बतलाया है, सचमुच ही यह स्थान अतिशय अद्भुत है। अब मैं उस रहस्यको सुनना चाहती हूँ, जिसके कारण आप इस स्थानको नहीं छोड़ते॥ ८३॥
ईश्वर उवाच<br>आसीत् पूर्वं वरारोहे ब्रह्मणस्तु शिरो वरम् ।<br>पञ्चमं शृणु सुश्रोणि जातं काञ्चनसप्रभम् ॥ ८४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः ।<br>तदेवमब्रवीद् देवि जन्म जानामि ते ह्यहम् ॥ ८५<br>ततः क्रोधपरीतेन संरक्तनयनेन च ।<br>वामाङ्गुष्ठनखाग्रेण च्छिन्नं तस्य शिरो मया ॥ ८६**ईश्वरने कहा—**सुन्दर कटिभागवाली वरारोहे! सुनो। प्राचीनकालमें ब्रह्माका सुवर्णके समान कान्तिमान् पाँचवाँ सुन्दर सिर उत्पन्न हुआ। देवि! उस महात्माके उत्पन्न हुए उस पाँचवें देदीप्यमान मुखने इस प्रकार कहा कि मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ। यह सुनकर मैं क्रोधसे परिव्याप्त हो गया और मेरी आँखें लाल हो गयीं। तब मैंने बायें अँगूठेके नखके अग्रभागसे उनके सिरको काट दिया॥ ८४–८६॥
ब्रह्मोवाच<br>यदा निरपराधस्य शिरश्छिन्नं त्वया मम ।<br>तस्माच्छापसमायुक्तः कपाली त्वं भविष्यसि ।<br>ब्रह्महत्याकुलो भूत्वा चर तीर्थानि भूतले ॥ ८७**ब्रह्मा बोले—**आपने बिना अपराधके ही मेरा सिर काट दिया है, अतः आप भी शापसे युक्त हो कपाली हो जायँगे। साथ ही आप ब्रह्महत्यासे व्याकुल होकर भूतलपर तीर्थोंमें भ्रमण कीजिये।
ततोऽहं गतवान् देवि हिमवन्तं शिलोच्चयम् ।<br>तत्र नारायणः श्रीमान् मया भिक्षां प्रयाचितः ॥ ८८<br>ततस्तेन स्वकं पार्श्वं नखाग्रेण विदारितम् ।<br>स्रवतो महती धारा तस्य रक्तस्य निःसृता ॥ ८९<br>प्रयाता सातिविस्तीर्णा योजनार्धशतं तदा ।<br>न सम्पूर्णं कपालं तु घोरमद्भुतदर्शनम् ॥ ९०देवि! तब मैं हिमालय पर्वतपर चला गया और वहाँ मैंने श्रीमान् नारायणसे भिक्षाकी याचना की। इसके बाद उन्होंने नखके अग्रभागसे अपने पार्श्वभागको विदीर्ण कर दिया, तब उससे रक्तकी विपुल धारा प्रवाहित हुई। वह धारा बहती हुई पचास योजनतक परिव्याप्त हो गयी, किंतु भयंकर दीखनेवाला अद्भुत कपाल उससे नहीं भरा।

७६४ * मत्स्यपुराण *


दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता।<br>प्रोवाच भगवान् विष्णुः कपालं कुत ईदृशम्॥ ९१<br>आश्चर्यभूतं देवेश संशयो हृदि वर्तते।<br>कुतश्च सम्भवो देव सर्वं मे ब्रूहि पृच्छतः॥ ९२इस प्रकार वह धारा हजार दिव्य वर्षोंतक अनवरत प्रवाहित होती रही। तब भगवान् विष्णुने पूछा कि 'ऐसा अद्भुत कपाल आपको कहाँसे प्राप्त हुआ है? देवेश! मेरे हृदयमें संदेह हो रहा है। देव! यह कहाँसे उत्पन्न हुआ? मुझ प्रश्नकर्ताको सभी बातें बतलाइये'॥ ८७—९२॥
देवदेव उवाच<br>श्रूयतामस्य हे देव कपालस्य तु सम्भवः।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां तपस्तप्त्वा सुदारुणम्॥ ९३<br>ब्रह्मासृजद् वपुर्दिव्यमद्भुतं लोमहर्षणम्।<br>तपसश्च प्रभावेण दिव्यं काञ्चनसंनिभम्॥ ९४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः।<br>निकृत्तं तन्मया देव तदिदं पश्य दुर्जयम्॥ ९५<br>यत्र यत्र च गच्छामि कपालं तत्र गच्छति।<br>एवमुक्तस्ततो देवः प्रोवाच पुरुषोत्तमः॥ ९६**(तब) देवाधिदेव शंकर बोले—**देव! आप इस कपालकी उत्पत्तिका विवरण सुनिये। ब्रह्माने सौ हजार वर्षोंतक अतिशय घोर तपस्या कर दिव्य रोमाञ्चकारी अद्भुत शरीरकी रचना की। उन महात्मा ब्रह्माके शरीरमें तपस्याके प्रभावसे सुवर्णके समान देदीप्यमान पाँचवाँ सिर उत्पन्न हुआ। देव! मैंने उसे काट दिया। यह वही दुर्जय कपाल है। अब देखिये, मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ यह कपाल भी मेरे पीछे लगा रहता है। (इस प्रकार) ऐसा कहे जानेपर पुरुषोत्तमभगवान्ने तब कहा—॥ ९३—९६॥
श्रीभगवानुवाच<br>गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं ब्रह्माणस्त्वं प्रियं कुरु।<br>तस्मिन् स्थास्यति भद्रं ते कपालं तस्य तेजसा॥ ९७<br>ततः सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।<br>गतोऽस्मि पृथुलश्रोणि न क्वचित् प्रत्यतिष्ठत॥ ९८<br>ततोऽहं समनुप्राप्तो ह्यविमुक्ते महाशये।<br>अवस्थितः स्वके स्थाने शापश्च विगतो मम॥ ९९<br>विष्णुप्रसादात् सुश्रोणि कपालं तत् सहस्रधा।<br>स्फुटितं बहुधा जातं स्वप्नलब्धं धनं यथा॥ १००<br>ब्रह्महत्यापहं तीर्थं क्षेत्रमेतन्मया कृतम्।<br>कपालमोचनं देवि देवानां प्रथितं भुवि॥ १०१<br>कालो भूत्वा जगत् सर्वं संहरामि सृजामि च।<br>ततस्तत् पतितं तत्र शापश्च विगतो मम॥ १०२<br>कपालमोचनं तीर्थमभूद्ब्रह्महत्याविनाशनम्।<br>मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति विष्णुभक्तास्तथैव च॥ १०३<br>तत्रस्थोऽस्मि जगत् सर्वं सुकरोमि सुरेश्वरि।<br>देवेशि सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतरं मम॥ १०४<br>ये भक्ता भास्करे देवि लोकनाथे दिवाकरे।<br>तत्रस्थो यस्त्यजेद् देहं मामेव प्रविशेत् तु सः॥ १०५**श्रीभगवान् बोले—**जाइये, आप अपने स्थानको लौट जाइये और ब्रह्माको प्रसन्न कीजिये। उनके तेजसे आपका यह श्रेष्ठ कपाल वहीं स्थित हो जायगा। पृथुल-श्रोणि! इसके बाद मैं सभी तीर्थों और पुण्य क्षेत्रोंमें गया, परंतु यह कहीं भी ठहर न सका। तत्पश्चात् मैं अतिशय प्रभावशाली अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचा। वह वहाँ अपने स्थानपर स्थित हो गया और मेरा शाप समाप्त हो गया।<br>सुश्रोणि! विष्णुकी कृपासे वह कपाल स्वप्नमें प्राप्त हुए धनके समान हजारों टुकड़ोंमें टूट-फूट गया। देवि! मैंने इस तीर्थको ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला बना दिया। यह भूतलपर देवताओंके लिये कपालमोचनतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। मैं कालके रूपमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण विश्वका संहार और सृजन करता हूँ। इस प्रकार वह कपाल इस क्षेत्रमें गिरा और मेरा शाप नष्ट हुआ। इसी कारण यह कपालमोचनतीर्थ ब्रह्महत्याका विनाशक हुआ। सुरेश्वरि! मैं वहीं स्थित हूँ और सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करता हूँ। देवेशि! सभी गुप्त स्थानोंमें यह अविमुक्तक्षेत्र मेरे लिये प्रियतर है। देवि! वहाँ मेरे भक्त, विष्णुभक्त और जो लोकनाथ प्रभाशाली सूर्यके भक्त हैं, वे सभी जाते हैं। जो वहाँ रहकर शरीरका त्याग करता है, वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है॥ ९७—१०५॥
* अध्याय १८४ *७६५

| देव्युवाच | देवीने कहा—महाकान्तिशाली देव ! ब्रह्माद्वारा कथित यह विषय अत्यद्भुत है। त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीका यह प्रिय गुह्य स्थान है। अन्य जितने उत्तम तीर्थस्थान हैं, वे सभी उस स्थानकी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। जहाँ देवेश भगवान् शंकर निवास करते हैं तथा जिससे हजारों तीर्थोंसे श्रेष्ठ गङ्गाकी तुलना नहीं हो सकती, वह भी यहीं स्थित है। देवेश ! आप ही (ज्ञानात्मिका) भक्ति हैं और आप ही उत्तम गति हैं। देव ! आपने ब्रह्मा आदिकी जो सनातनी गति बतलायी है, जिसे भक्त एवं द्विजातिगण सुनते हैं, वह सब भी आपकी ही अनुकम्पा है ॥ १०६–१०९ ॥ |
| अत्यद्भुतमिदं देव यदुक्तं पद्मयोनिना।<br>त्रिपुरान्तकरस्थानं गुह्यमेतन्महाद्युते ॥ १०६<br>यान्यन्यानि सुतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>यत्र तिष्ठति देवेशो यत्र तिष्ठति शङ्करः ॥ १०७<br>गङ्गा तीर्थसहस्राणां तुल्या भवति वा न वा।<br>त्वमेव भक्तिर्देवेश त्वमेव गतिरुत्तमा ॥ १०८<br>ब्रह्मादीनां तु ते देव गतिरुक्ता सनातनी।<br>श्राव्यते यद् द्विजातीनां भक्तानामनुकम्पया ॥ १०९ | |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्यमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८३ ॥


एक सौ चौरासीवाँ अध्याय

काशीकी महिमाका वर्णन

महेश्वर उवाचभगवान् शिवने कहा—अविमुक्त-निवासियोंके इस परम श्रेष्ठ स्थानको जानकर पुनः संसारमें जन्मकी आकाङ्क्षा न रखनेवाले अनेक सिद्धगणोंने इस स्थानमें निवास किया है। महादेवका यह अतिशय गुह्य स्थान श्रेष्ठ तीर्थ तथा तपोवनस्वरूप है। जो लोग उस उत्तम क्षेत्रमें जाते हैं, वे पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करते। सत्पुरुषोंद्वारा परमानन्दको प्राप्त करनेके इच्छुक तथा ज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले व्यक्तियोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें मरनेवालेको प्राप्त होती है। इस अविमुक्तक्षेत्रमें भगवान् शंकरकी अनुपम और अनुत्तम प्रीति है, अतः यहाँ जानेसे असंख्य फल और अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है। (महा) श्मशानके* नामसे प्रसिद्ध यह अविमुक्त परम गुह्य कहा गया है। भूतलपर जो मनुष्य इसका सेवन नहीं करते, वे वस्तुतः ठगे गये हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें स्थित वायुद्वारा उड़ायी गयी पवित्र धूलके स्पर्शसे अतिशय दुष्कर्म करनेवाले व्यक्ति भी परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। जहाँ स्वयं भगवान् शंकर निवास करते हैं, उस अविमुक्तकी अनुपम महिमा होनेके कारण देवता, दानव और मनुष्य उसका वर्णन नहीं कर सकते।
सेवितं बहुभिः सिद्धैरपुनर्भवकाङ्क्षिभिः।<br>विदित्वा तु परं क्षेत्रमविमुक्तनिवासिनाम् ॥ १<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्।<br>परं स्थानं तु ते यान्ति सम्भवन्ति न ते पुनः ॥ २<br>ज्ञाने विहितनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।<br>या गतिर्विहिता सद्भिः साविमुक्ते मृतस्य तु ॥ ३<br>भवस्य प्रीतिरतुला ह्यविमुक्ते ह्यनुत्तमा।<br>असंख्येयं फलं तत्र ह्यक्षया च गतिर्भवेत् ॥ ४<br>परं गुह्यं समाख्यातं श्मशानमिति संज्ञितम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते वञ्चितास्ते नरा भुवि ॥ ५<br>अविमुक्ते स्थितैः पुण्यैः पांशुभिर्वायुनेरितैः।<br>अपि दुष्कृतकर्माणो यास्यन्ति परमां गतिम् ॥ ६<br>अविमुक्तगुणान् वक्तुं देवदानवमानवैः।<br>न शक्यतेऽप्रमेयत्वात् स्वयं यत्र भवः स्थितः ॥ ७

* काशीखण्ड एवं काशीरहस्यादिके अनुसार प्रलयकालमें सभी प्राणियोंके शमन करनेसे इसका नाम महाश्मशान है।

७६६* मत्स्यपुराण *

| अनाहिताग्निर्नो यष्टा नोऽशुचिस्तस्कुरोऽपि वा।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु स वसेदीश्वरालये॥ ८<br>तत्र नापुण्यकृत् कश्चित् प्रसादादीश्वरस्य च।<br>अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा॥ ९<br>यत्किञ्चिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना।<br>अविमुक्ते प्रविष्टस्य तत्सर्वं भस्मसाद् भवेत्॥ १० | जो अग्निका आधान नहीं करता, यज्ञ नहीं करता, अपवित्र या चोर है, वह भी यदि अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है तो मानो महेश्वरके लोकमें ही निवास कर रहा है। महेश्वरकी कृपासे वहाँ कोई भी पापकर्म नहीं करता। स्त्री अथवा पुरुषद्वारा मानव-बुद्धिके अनुसार जान या अनजानमें भी जो कुछ दुष्कर्म किया होता है, वह सब अविमुक्तक्षेत्रमें प्रवेश करते ही भस्म हो जाता है॥ ८—१०॥ |
| सरितः सागराः शैलास्तीर्थान्यायतनानि च।<br>भूतप्रेतपिशाचाश्च गणा मातृगणास्तथा॥ ११<br>श्मशानिकपरीवाराः प्रियास्तस्य महात्मनः।<br>न ते मुञ्चन्ति भूतेशं तान् भवस्तु न मुञ्चति॥ १२<br>रमते च गणैः सार्धमविमुक्ते स्थितः प्रभुः।<br>दृष्टैतान् भीतकृपणान् पापदुष्कृतकारिणः॥ १३<br>अनुकम्पया तु देवस्य प्रयान्ति परमां गतिम्।<br>भक्तानुकम्पी भगवांस्तिर्यग्यौनिगतानपि॥ १४<br>नयत्येव वरं स्थानं यत्र यान्ति च याज्ञिकाः।<br>भार्गवाङ्गिरसः सिद्धा ऋषयश्च महाव्रताः॥ १५<br>अविमुक्ताग्निना दग्धा अग्नौ तूलमिवाहितम्।<br>न सा गतिः कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ १६<br>सा गतिर्विहिता पुंसामविमुक्तनिवासिनाम्।<br>तिर्यग्योनिगताः सत्त्वा येऽविमुक्ते कृतालयाः।<br>कालेन निधनं प्राप्तास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ १७<br>मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।<br>अविमुक्तं समासाद्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्॥ १८ | नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थ, देवालय, भूत, प्रेत, पिशाच, शिवगण, मातृगण तथा श्मशान-निवासी—ये सभी उन महात्मा शिवको प्रिय हैं, अतः न तो वे भूतपति शिवको छोड़ते हैं और न शिव उनका परित्याग करते हैं। अविमुक्तमें स्थित वे प्रभु अपने प्रमथगणोंके साथ रमण करते हैं। भयसे त्रस्त, पापी, दुराचाररत अथवा तिर्यग्योनिमें ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, वे सभी अविमुक्तको देखकर महादेवकी अनुकम्पासे परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले भगवान् शंकर उन सभीको ऐसे श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचा देते हैं, जहाँ यज्ञ करनेवाले, भृगुवंशी, अंगिरागोत्री, सिद्ध तथा महाव्रती ऋषिगण जाते हैं। उनके पाप अग्निमें डाली गयी रूईके समान अविमुक्तकी अग्निसे नष्ट हो जाते हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह गति कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्कर तीर्थमें नहीं मिलती। तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जो जीव अविमुक्तमें निवास करते हैं, वे समयानुसार मृत्युको प्राप्त होनेपर परमगतिको प्राप्त करते हैं। चाहे मेरु या मन्दराचलके बराबर भी पापकर्मकी राशि क्यों न हो, वह सब-का-सब पाप अविमुक्तमें आते ही नष्ट हो जाता है॥ ११—१८॥ |
| श्मशानमिति विख्यातमविमुक्तं शिवालयम्।<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्॥ १९<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा नारायणपुरोगमाः।<br>योगिनश्च तथा साध्या भगवन्तं सनातनम्॥ २०<br>उपासन्ते शिवं मुक्ता मद्भक्ता मत्परायणाः।<br>या गतिर्ज्ञानतपसां या गतिर्यज्ञयाजिनाम्॥ २१<br>अविमुक्ते मृतानां तु सा गतिर्विहिता शुभा।<br>संहर्तारश्च कर्तारस्तस्मिन् ब्रह्मादयः सुराः॥ २२ | शिवजीका यह निवासस्थान अविमुक्त श्मशानके नामसे विख्यात है। उन देवाधिदेवका वह परम गुप्त स्थान है, वह तीर्थ है और वह तपोवन है। वहाँ नारायणसहित ब्रह्मा आदि देवगण, योगिसमूह, साध्यगण तथा जीवन्मुक्त शिवपरायण शिवभक्त सनातन भगवान् शिवकी उपासनामें रत रहते हैं। ज्ञानसम्पन्न तपस्वियों तथा यज्ञोंका विधानपूर्वक अनुष्ठान करनेवालोंको जो गति प्राप्त होती है, वही शुभ गति अविमुक्तमें मरनेवालोंके लिये कही गयी है। जगत्की सृष्टि करनेवाले तथा जगत्का संहार करनेवाले ब्रह्मा |

  • अध्याय १८४ * ७६७
सम्राड्विराण्मया लोका जायन्ते ह्यपुनर्भवाः।<br>महर्जनस्तपश्चैव सत्यलोकस्तथैव च॥ २३<br>मनसः परमो योगो भूतभव्यभवस्य च।<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य योनिः सांख्यादिमोक्षयोः॥ २४<br>येऽविमुक्तं न मुञ्चन्ति नरास्ते नैव वञ्चिताः।<br>उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च यत्॥ २५<br>क्षेत्राणामुत्तमं चैव श्मशानानां तथैव च।<br>तटाकानां च सर्वेषां कूपानां स्रोतसां तथा॥ २६<br>शैलानामुत्तमं चैतत् तडागानां तथोत्तमम्।<br>पुण्यकृद्भवभक्तैश्च ह्यविमुक्तं तु सेव्यते॥ २७आदि देवगण एवं सम्राट्, विराट् आदि मानवसमूह एवं महः, जन, तप और सत्यलोकमें निवास करनेवाले प्राणी अविमुक्तक्षेत्रमें आकर पुनर्जन्मसे छुटकारा पा जाते हैं। यह मनका तथा भूत, भविष्य और वर्तमानका, परम योग है और ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी प्राणिसमूहका तथा सांख्य आदि मोक्षका उत्पत्तिस्थान है। जो मनुष्य इस अविमुक्तका परित्याग नहीं करते, वे वञ्चित नहीं हैं। यह अविमुक्तक्षेत्र सभी तीर्थों, स्थानों, क्षेत्रों, श्मशानों, सरोवरों, सभी कूपों, नालों, पर्वतों और जलाशयोंमें उत्तम है। पुण्यकर्मा शिव-भक्त अविमुक्तका ही सेवन करते हैं॥ १९–२७॥
ब्रह्मणः परमं स्थानं ब्रह्मणाध्यासितं च यत्।<br>ब्रह्मणा सेवितं नित्यं ब्रह्मणा चैव रक्षितम्॥ २८<br>अत्रैव सप्तभुवनं काञ्चनो मेरुपर्वतः।<br>मनसः परमो योगः प्रीत्यर्थं ब्रह्मणः स तु॥ २९<br>ब्रह्मा तु तत्र भगवांस्त्रिसंध्यं चेश्वरे स्थितः।<br>पुण्यात् पुण्यतमं क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम्॥ ३०<br>आदित्योपासनं कृत्वा विप्राश्चामरतां गताः।<br>अन्येऽपि ये त्रयो वर्णा भवभक्त्या समाहिताः॥ ३१<br>अविमुक्ते तनुं त्यक्त्वा गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>अष्टौ मासान् विहारस्य यतीनां संयतात्मनाम्॥ ३२<br>एकत्र चतुरो मासान् मासौ वा निवसेत् पुनः।<br>अविमुक्ते प्रविष्टानां विहारस्तु न विद्यते॥ ३३<br>न देहो भविता तत्र दृष्टं शास्त्रे पुरातने।<br>मोक्षो ह्यसंशयस्तत्र पञ्चत्वं तु गतस्य वै॥ ३४<br>स्त्रियः पतिव्रता याश्च भवभक्ताः समाहिताः।<br>अविमुक्ते विमुक्तास्ता यास्यन्ति परमां गतिम्॥ ३५<br>अन्या याः कामचारिण्यः स्त्रियो भोगपरायणाः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ३६यह ब्रह्माका परमस्थान, ब्रह्माद्वारा अध्यासित, ब्रह्माद्वारा सदा सेवित और ब्रह्माद्वारा रक्षित है। ब्रह्माकी प्रसन्नताके लिये यहीं सातों भुवन और सुवर्णमय सुमेरु पर्वत है। यहीं मनका परम योग प्राप्त होता है। इस क्षेत्रमें भगवान् ब्रह्मा तीनों सन्ध्याओंमें शिवके ध्यानमें लीन रहते हैं। यह क्षेत्र पुण्यसे भी पुण्यतम है और पुण्यात्माओंद्वारा सेवित है। यहाँ आदित्यकी उपासना करके विप्रगण अमर हो गये हैं। जो अन्य तीनों वर्णोंके प्राणी हैं, वे भी शिव-भक्तिसे युक्त हो अविमुक्तक्षेत्रमें शरीरका परित्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। संयत आत्मावाले यतियोंके लिये आठ मासोंका विहार विहित है। वे (चातुर्मासमें) एक स्थानमें केवल चार मास या दो मासतक निवास कर सकते हैं, किंतु अविमुक्तमें निवास करनेवाले यतियोंके लिये (यह) विहारका विधान नहीं है। (वे काशीमें सदा निवास कर सकते हैं।) प्राचीन शास्त्रमें ऐसा देखा गया है कि यहाँ मरनेवालेका पुनर्जन्म नहीं होता, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो पतिव्रता स्त्रियाँ शिवजीकी भक्तिमें लीन हैं, वे इस अविमुक्तमें शरीरका त्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाती हैं। इनसे अतिरिक्त जो कामपरायण एवं भोगमें आसक्त स्त्रियाँ हैं, वे इस क्षेत्रमें यथासमय मृत्युको प्राप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो जाती हैं॥ २८–३६॥
यत्र योगश्च मोक्षश्च प्राप्यते दुर्लभो नरैः।<br>अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत् तपोवनम्॥ ३७जहाँ मनुष्य दुर्लभ योग और मोक्षको प्राप्त करते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचकर किसी अन्य तपोवनमें जानेकी आवश्यकता नहीं है।