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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
४५- वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तक-मणिकी कथा
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१५२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष नागं मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः।<br>कर्कोटकसुतं जित्वा पुर्यां तत्र न्यवेशयत्॥ २९ | मनुष्योंमें महान् तेजस्वी अर्जुनने कर्कोटक नागके पुत्रको जीतकर अपनी माहिष्मती पुरीमें बाँध रखा था। |
| एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै।<br>क्रीडन्नेव सुखोद्विग्नः प्रतिस्रोतो महीपतिः॥ ३० | भूपाल अर्जुन वर्षा-ऋतुमें प्रवाहके सम्मुख सुखपूर्वक क्रीडा करते हुए ही समुद्रके वेगको रोक देता था। |
| ललनाः क्रीडता तेन प्रतिस्रग्दाममालिनीः।<br>ऊर्मिभ्रुकुटिसंत्रासाच्चकिताभ्येति नर्मदा॥ ३१ | ललनाओंके साथ जलविहार करते समय उसके गलेसे टूटकर गिरी हुई मालाओंको धारण करनेवाली तथा लहररूपी भ्रुकुटियोंके व्याजसे भयभीत-सी हुई नर्मदा चकित होकर उसके निकट आ जाती थी। |
| एको बाहुसहस्रेण वगाहे स महार्णवः।<br>करोत्युद्वृत्तवेगां तु नर्मदां प्रावृडुद्धताम्॥ ३२ | वह अकेला ही अपनी सहस्र भुजाओंसे अगाध समुद्रको विलोडित कर देता था एवं वर्षाकालमें वेगसे बहती हुई नर्मदाको और भी उद्धत वेगवाली बना देता था। |
| तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ।<br>भवन्त्यतीव निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः॥ ३३ | उसकी हजारों भुजाओं द्वारा विलोडन करनेसे महासागरके क्षुब्ध हो जानेपर पातालनिवासी बड़े-बड़े असुर अत्यन्त निश्चेष्ट हो जाते थे। |
| चूर्णीकृतमहावीचिलीनमीनमहातिमिम् ।<br>मारुताविद्धफेनौघमावर्ताक्षिप्तदुःसहम् ॥ ३४<br><br>करोत्यालोडयन्नेव दोःसहस्रेण सागरम्।<br>मन्दरक्षोभचकिता ह्यमृतोत्पादशङ्किताः॥ ३५<br><br>तदा निश्चलमूर्धानो भवन्ति च महोरगाः।<br>सायाह्ने कदलीखण्डा निर्वातस्तिमिता इव॥ ३६ | अपनी सहस्र भुजाओंसे महासागरका विलोडन करते समय वह समुद्रकी उठती हुई विशाल लहरोंके मध्य आयी हुई मछलियों और बड़े-बड़े तिमिङ्गिलोंके चूर्णसे उसे व्याप्त कर देता था तथा वायुके झकोरेसे उठे हुए फेनसमूहसे फेनिल और भँवरोंके चपेटसे दुःसह बना देता था। उस समय पूर्वकालमें मन्दराचलके मन्थनके विक्षोभसे चकित एवं पुनः अमृतोत्पादनकी आशङ्कासे सशङ्कित-से हुए बड़े-बड़े नागोंके मस्तक इस प्रकार निश्चल हो जाते थे, जैसे सायंकाल वायुके स्थगित हो जानेपर केलेके पत्ते प्रशान्त हो जाते हैं। |
| एवं बद्ध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।<br>लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्॥ ३७<br><br>निर्जित्य बद्ध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।<br>ततो गत्वा पुलस्त्यस्तु ह्यर्जुनः सम्प्रसादयत्॥ ३८ | इसी प्रकार अर्जुनने एक बार लंकामें जाकर अपने पाँच बाणोंद्वारा सेनासहित रावणको मोहित कर दिया और उसे बलपूर्वक जीतकर अपने धनुषकी प्रत्यञ्चामें बाँध लिया, फिर माहिष्मती पुरीमें लाकर उसे बंदी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्यने माहिष्मतीपुरीमें जाकर अर्जुनको अनेकों प्रकारसे समझा-बुझाकर प्रसन्न किया। |
| मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्वितम्।<br>तस्य बाहुसहस्रेण बभूव ज्यातलस्वनः॥ ३९ | तब अर्जुनने महर्षि पुलस्त्यद्वारा सान्त्वना दिये जानेपर उस पुलस्त्य-पौत्र राक्षसराज रावणको बन्धनमुक्त कर दिया। |
| युगान्ताभ्रसहस्रस्य आस्फोटस्त्वशनेरिव।<br>अहो बत विधेर्वीर्यं भार्गवोऽयं यदाच्छिनत्॥ ४०<br><br>तद् वै सहस्रं बाहूनां हेमतालवनं यथा।<br>यत्रापवस्तु संक्रुद्धो ह्यर्जुनं शप्तवान् प्रभुः॥ ४१ | उसकी हजारों भुजाओं द्वारा धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेपर ऐसा भयंकर शब्द होता था, मानो प्रलयकालीन सहस्रों बादलोंकी घटाके मध्य वज्रकी गड़गड़ाहट हो रही हो; परंतु विधिको पराक्रम धन्य है जो भृगुकुलोत्पन्न परशुरामजीने उसकी हजारों भुजाओंको हेमतालके वनकी भाँति काटकर छिन्न-भिन्न कर दिया। इसका कारण यह है कि एक बार सामर्थ्यशाली महर्षि आपव* (वसिष्ठ)-ने क्रुद्ध होकर अर्जुनको शाप देते हुए कहा था— |
| यस्माद् वनं प्रदग्धं वै विश्रुतं मम हैहय।<br>तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हरिष्यति॥ ४२ | 'हैहय! चूँकि तुमने मेरे लोकप्रसिद्ध वनको जलाकर भस्म कर दिया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा किये गये इस दुष्कर कर्मका फल कोई दूसरा |
* आप शब्द वरुणका वाचक है। उनके पुत्र मैत्रावरुणिके होनेसे यहाँ महर्षि वसिष्ठ ही महाभारत, हरिवंश, देवीभागवत तथा उसके व्याख्याताओंके अनुसार 'आपव' नामसे निर्दिष्ट हैं।
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| * अध्याय ४३ * | १५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| च्छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रथमं तरसा बली।<br>तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां स वधिष्यति भार्गवः॥ ४३ | हरण कर लेगा। भृगुकुलमें उत्पन्न एक तपस्वी एवं बलवान् ब्राह्मण पहले तुम्हारी सहस्रों भुजाओंको काटकर फिर तुम्हारा वध कर देगा'॥ २९—४३॥ |
| सूत उवाच<br>तस्य रामस्तदा त्वासीन्र्मृत्युः शापेन धीमतः।<br>वरश्चैवं तु राजर्षेः स्वयमेव वृतः पुरा॥ ४४<br>तस्य पुत्रशतं त्वासीत् पञ्च तत्र महारथाः।<br>कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबलाः॥ ४५<br>शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टः क्रोष्टुस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च वैकर्ता अवन्तिश्च विशांपते॥ ४६<br>जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः।<br>तस्य पुत्रशतान्येव तालजङ्घा इति श्रुताः॥ ४७<br>तेषां पञ्च कुलाः ख्याता हैहयानां महात्मनाम्।<br>वीतिहोत्राश्च शार्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा॥ ४८<br>कुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजङ्घास्तथैव च।<br>वीतिहोत्रसुतश्चापि आनर्तो नाम वीर्यवान्।<br>दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्शनः॥ ४९<br>सद्भावेन महाप्राज्ञः प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान्॥ ५०<br>येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही।<br>यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः॥ ५१<br>न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः।<br>कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः।<br>यथावत् स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते॥ ५२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस शापके कारण परशुरामजी उसकी मृत्युके कारण तो अवश्य हुए, परंतु पूर्वकालमें उस राजर्षिने स्वयं ही ऐसे वरका वरण किया था। राजन्! सहस्रार्जुनके पुत्र तो एक सौ हुए, परंतु उनमें पाँच महारथी थे। उनके अतिरिक्त शूरसेन, शूर, धृष्ट, क्रोष्टु, जयध्वज, वैकर्ता और अवन्ति—ये सातों अस्त्रविद्यामें निपुण, बलवान्, शूरवीर, धर्मात्मा और महान् पराक्रमशाली थे। जयध्वजका पुत्र महाबली तालजङ्घ हुआ। उसके एक सौ पुत्र हुए जो तालजङ्घके नामसे विख्यात हुए। हैहयवंशी इन महात्मा नरेशोंका कुल विभक्त होकर पाँच भागोंमें विख्यात हुआ। उनके नाम हैं—वीतिहोत्र, शार्यात, भोज, आवन्ति तथा पराक्रमी कुण्डिकेर। ये ही तालजङ्घके भी नामसे प्रसिद्ध थे। वीतिहोत्रका पुत्र प्रतापी आनर्त (गुजरातका शासक) हुआ। उसका पुत्र दुर्जय हुआ जो शत्रुओंका विनाशक था। अमित बुद्धिसम्पन्न एवं सहस्रभुजाधारी कृत्तवीर्य-नन्दन राजा अर्जुन सद्भावना एवं धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता था। उसने अपने धनुषके बलसे सागरपर्यन्त पृथ्वीपर विजय पायी थी। जो मानव प्रातःकाल उठकर उसका नाम स्मरण करता है उसके धनका नाश नहीं होता और यदि नष्ट हो गया है तो पुनः प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य कार्तवीर्य अर्जुनके जन्म-वृत्तान्तको कहता है उसका आत्मा यथार्थरूपसे पवित्र हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें प्रशंसित होता है॥ ४४—५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे सहस्रार्जुनचरिते त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें सहस्रार्जुनचरित नामक तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४३॥
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१५४ * मत्स्यपुराण *
चौवालीसवाँ अध्याय
कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं तद् वनं दग्धमापवस्य महात्मनः।<br>कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत प्रब्रूहि तत्त्वतः॥ १<br>रक्षिता स तु राजर्षिः प्रजानामिति नः श्रुतम्।<br>स कथं रक्षिता भूत्वा अदहत् तत् तपोवनम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! कार्तवीर्यने बलपूर्वक महात्मा आपवके उस वनको किस कारण जलाया था? अभी-अभी हम लोगोंने सुना है कि वे राजर्षि कार्तवीर्य प्रजाओंके रक्षक थे तो फिर रक्षक होकर उन्होंने महर्षिके तपोवनको कैसे जला दिया?॥ १-२॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः।<br>तृप्तिमेकां प्रयच्छस्व आदित्योऽहं नरेश्वर॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक बार सूर्य* ब्राह्मणका रूप धारण करके कार्तवीर्यके निकट पहुँचे और कहने लगे—'नरेश्वर! मैं सूर्य हूँ, आप मुझे एक बार तृप्ति प्रदान कीजिये'॥ ३॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर।<br>कीदृशं भोजनं दद्मि श्रुत्वा तु विदधाम्यहम्॥ ४ | राजाने पूछा—भगवन्! किस पदार्थसे आपकी तृप्ति होगी? दिवाकर! मैं आपको किस प्रकारका भोजन प्रदान करूँ? आपकी बात सुनकर मैं उसी प्रकारका विधान करूँगा॥ ४॥ |
| आदित्य उवाच<br>स्थावरं देहि मे सर्वमाहारं ददतां वर।<br>तेन तृप्तो भवेयं वै सा मे तृप्तिर्हि पार्थिव॥ ५ | सूर्य बोले—दानिशिरोमणे! मुझे समस्त स्थावर अर्थात् वृक्ष आदिको आहाररूपमें प्रदान कीजिये। मैं उसीसे तृप्त होऊँगा। राजन्! वही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ तृप्ति होगी॥ ५॥ |
| कार्तवीर्य उवाच<br>न शक्याः स्थावराः सर्वे तेजसा च बलेन च।<br>निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ तेन त्वां प्रणमाम्यहम्॥ ६ | कार्तवीर्यने कहा—तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ सूर्य! ये समस्त वृक्ष मेरे तेज और बलद्वारा जलाये नहीं जा सकते; अतः मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ६॥ |
| आदित्य उवाच<br>तुष्टस्तेऽहं शरान् दद्मि अक्षयान् सर्वतोमुखान्।<br>ये प्रक्षिप्ता ज्वलिष्यन्ति मम तेजः समन्विताः॥ ७<br>आविष्टा मम तेजोभिः शोषयिष्यन्ति स्थावरान्।<br>शुष्कान् भस्मीकरिष्यन्ति तेन तृप्तिर्नराधिप॥ ८ | सूर्य बोले—नरेश्वर! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, इसलिये मैं आपको ऐसे अक्षय एवं सर्वतोमुखी बाण दे रहा हूँ, जो मेरे तेजसे युक्त होनेके कारण चलाये जानेपर स्वयं जल उठेंगे और मेरे तेजसे परिपूर्ण हुए वे सारे वृक्षोंको सुखा देंगे; फिर सूख जानेपर उन्हें जलाकर भस्म कर देंगे। उससे मेरी तृप्ति हो जायगी॥ ७-८॥ |
| सूत उवाच<br>ततः शरांस्तदादित्यस्त्वर्जुनाय प्रयच्छत।<br>ततो ददाह सम्प्राप्तान् स्थावरान् सर्वमेव च॥ ९<br>ग्रामांस्तथाऽऽश्रमांश्चैव घोषाणि नगराणि च।<br>तपोवनानि रम्याणि वनान्युपवनानि च॥ १०<br>एवं प्राचीनमन्वदहं ततः सर्वां सदक्षिणाम्।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्हता घोरेण तेजसा॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर सूर्यने कार्तवीर्य अर्जुनको अपने बाण प्रदान कर दिये। तब अर्जुनने सम्मुख आये हुए समस्त वृक्षों, ग्रामों, आश्रमों, घोषों, नगरों, तपोवनों तथा रमणीय वनों एवं उपवनोंको जलाकर राखका ढेर बना दिया। इस प्रकार पूर्व दिशाको जलाकर फिर समूची दक्षिण दिशाको भी भस्म कर दिया। उस भयंकर तेजसे पृथ्वी वृक्षों एवं तृणोंसे रहित होकर नष्ट- |
* यहाँ आदित्य सूर्य हैं, पर हरिवंशपु० १।३३ आदिके अनुसार अग्निदेव ही ब्राह्मणवेषमें आये थे।