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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

११७- हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन

३८६* मत्स्यपुराण *

| सर्वाः पुण्यजलाः पुण्याः सर्वाश्चैव समुद्रगाः।<br>विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वपापहराः शुभाः ॥ ३३ | ये सभी पुण्यतोया नदियाँ पुण्यप्रद, सर्वत्र बहनेवाली तथा साक्षात् या परम्परासे समुद्रगामिनी हैं। ये सब-की-सब विश्वके लिये माता-सदृश हैं तथा इन सबको कल्याणकारिणी एवं पापहारिणी माना गया है$^१$ ॥ २५—३३॥ |
| तासां नद्युपनद्यश्च शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजाङ्गलाः ॥ ३४<br>शूरसेना भद्रकारा बाह्याः सहपटच्चराः।<br>मत्स्याः किराताः कुन्त्याश्च कुन्तलाः काशिकोसलाः ॥ ३५<br>आवन्ताश्च कलिङ्गाश्च मूकाश्चैवान्धकैः सह।<br>मध्यदेशा जनपदाः प्रायशः परिकीर्तिताः ॥ ३६<br>सह्यास्यान्तरे चैते यत्र गोदावरी नदी।<br>पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥ ३७<br>यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः।<br>रामप्रीत्यर्थं स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः ॥ ३८<br>भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेऽवतारिताः।<br>ततः पुष्पवरो देशस्तेन जज्ञे मनोरमः ॥ ३९<br>बाह्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः।<br>पुरंधाश्चैव शूद्राश्च पल्लवाश्चात्तखण्डिकाः ॥ ४०<br>गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरभद्रकाः।<br>शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च पारदाहारमूर्तिकाः ॥ ४१<br>रामठाः कण्टकाराश्च कैकेय्या दशनामकाः।<br>क्षत्रियोपनिवेशाश्च वैश्याः शूद्रकुलानि च ॥ ४२<br>काम्बोजा दरदाश्चैव वर्वरा पह्लवा तथा।<br>अत्रेयाश्च भरद्वाजाः प्रस्थलाश्च कसेरकाः ॥ ४३<br>लम्पकास्तलगानाश्च सैनिकाः सह जाङ्गलैः।<br>एते देशा उदीच्यास्तु प्राच्यान् देशान् निबोधत ॥ ४४<br>अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तर्गिरिबहिर्गिरी।<br>ततः प्लवङ्गमातङ्गा यमका मालवर्णकाः।<br>सुह्योत्तराः प्रविजया मार्गवागेयमालवाः ॥ ४५<br>प्राग्ज्योतिषाश्च पुण्ड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः।<br>शाल्वमागधगोनर्दाः प्राच्या जनपदाः स्मृताः ॥ ४६ | अथवा इनकी सैकड़ों-हजारों छोटी-बड़ी सहायक नदियाँ भी हैं जिनके कछारोंमें कुरु, पाञ्चाल, शाल्व, सजाङ्गल, शूरसेन, भद्रकार, बाह्य, सहपटच्चर, मत्स्य$^२$, किरात, कुन्ती, कुन्तल, काशी, कोसल, आवन्त, कलिङ्ग, मूक और अन्धक—ये देश अवस्थित हैं, जो प्रायः मध्यदेशके जनपद कहलाते हैं। ये सह्यपर्वतके निकट बसे हुए हैं, यहाँ गोदावरी नदी प्रवाहित होती है। अखिल भूमण्डलमें यह प्रदेश अत्यन्त मनोरम है। तत्पश्चात् गोवर्धन, मन्दराचल और श्रीरामचन्द्रजीका प्रियकारक गन्धमादन पर्वत है, जिसपर मुनिवर भरद्वाजजीने श्रीरामके मनोरंजनके लिये स्वर्गीय वृक्षों और दिव्य ओषधियोंको अवतरित किया था। उन्हीं मुनिवरके प्रभावसे वह प्रदेश पुष्पोंसे परिपूर्ण होनेके कारण मनोमुग्धकारी हो गया था। बाह्लीक (बलख), वाटधान, आभीर, कालतोयक, पुरन्ध्र, शूद्र, पल्लव, आत्तखण्डिक, गान्धार, यवन, सिन्धु (सिंध), सौवीर (सिन्धका उत्तरी भाग), मद्रक (पंजाबका उत्तरी भाग), शक, द्रुह्य (ययाति-पुत्र द्रुह्युका उत्तरी भाग—पश्चिमी पंजाब), पुलिन्द, पारद, आहारमूर्तिक, रामठ, कण्टकार, कैकेय और दशनामक—ये क्षत्रियोंके उपनिवेश हैं तथा इनमें वैश्य और शूद्र-कुलके लोग भी निवास करते हैं। इनके अतिरिक्त कम्बोज (अफगानिस्तान), दरद, बर्बर, पह्लव (ईरान), अत्रि, भरद्वाज, प्रस्थल, कसेरक, लम्पक, तलगान और जाङ्गलसहित सैनिक प्रदेश—ये सभी उत्तरापथके देश हैं। अब पूर्व दिशाके देशोंको सुनिये। अङ्ग (भागलपुर), वङ्ग (बंगाल), मद्गुरक, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्लवङ्ग, मातङ्ग, यमक, मालवर्णक, सुह्म (उत्तरी असम), प्रविजय, मार्ग, वागेय, मालव, प्राग्ज्योतिष (आसामका पूर्वीभाग), पुण्ड्र (बंगलादेश), विदेह (मिथिला), ताम्रलिप्तक (उड़ीसाका उत्तरी भाग), शाल्व, मागध और गोनर्द—ये पूर्व दिशाके जनपद हैं ॥ ३४—४६ ॥ |


१. इन नदियोंका पूरा परिचय कल्याण, वराहपुराणाङ्कमें द्रष्टव्य है।
२. यहाँ पाणिनि अष्टाध्यायीके काशिका (४। १। १६०) कौमुदि (४। १। १७०) सम्प्रदायोंमें दो सूत्रोंका अन्तर होकर प्रतिलिपिकी भूलसे 'सूरमत्स्य' की जगह 'सूरमस' पाठ हो गया है। 'गणरत्नमहोदधि' में वर्द्धमानका पाठ ठीक है।

* अध्याय ११४ *३८७

| अथापरे जनपदा दक्षिणापथवासिनः।<br>पाण्ड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च ॥ ४७<br>सेतुका मूषिकाश्चैव कुपथा वाजिवासिकाः।<br>महाराष्ट्रा माहिषकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः ॥ ४८<br>आभीराश्च सहैषीका आटव्याः शबरास्तथा।<br>पुलिन्दा विन्ध्यमुलिका वैदर्भा दण्डकैः सह ॥ ४९<br>कुलीयाश्च सिरालाश्च अश्मका भोगवर्धनाः।<br>तथा तैत्तिरिकाश्चैव दक्षिणापथवासिनः ॥ ५०<br>नासिक्याश्चैव ये चान्ये ये चैवान्तरनर्मदाः।<br>भारुकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैस्तथा ॥ ५१<br>काच्छीकाश्चैव सौराष्ट्रा आनर्ता अर्बुदैः सह।<br>इत्येते अपरान्तास्तु शृणु ये विन्ध्यवासिनः ॥ ५२<br>मालवाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह।<br>औण्ड्रा माषा दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धकैः सह ॥ ५३<br>तोशलाः कोसलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा।<br>तुमुरास्तुम्बराश्चैव पद्‌मा नैषधैः सह ॥ ५४<br>अरूपाः शौण्डिकेराश्च वीतिहोत्रा अवन्तयः।<br>एते जनपदाः ख्याता विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः ॥ ५५<br>अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये।<br>निराहाराः सर्वगाश्च कुपथा अपथास्तथा ॥ ५६<br>कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णादर्वाः समुद्रकाः।<br>त्रिगर्ता मण्डलाश्चैव किराताश्चामरैः सह ॥ ५७<br>चत्वारि भारते वर्षे युगानि मुनयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।<br>तेषां निसर्गं वक्ष्यामि उपरिष्टाच्च कृत्स्नशः ॥ ५८ | इनके बाद अब दक्षिणापथके देश बतलाये जा रहे हैं। पाण्ड्य, केरल, चोल, कुल्य, सेतुक, मूषिक, कुपथ, वाजिवासिक, महाराष्ट्र, माहिषक, कलिंग (उड़ीसाका दक्षिणी भाग), आभीर, सहैषीक, आटव्य, शबर, पुलिन्द, विन्ध्यमुलिक, वैदर्भ (विदर्भ), दण्डक, कुलीय, सिराल, अश्मक (महाराष्ट्रका दक्षिण भाग), भोगवर्धन (उड़ीसाका दक्षिणभाग), तैत्तिरिक, नासिक्य तथा नर्मदाके अन्तःप्रान्तमें स्थित अन्य प्रदेश—ये दक्षिणापथके अन्तर्गतके देश हैं। भारुकच्छ, माहेय, सारस्वत, काच्छीक, सौराष्ट्र, आनर्त और अर्बुद—ये सभी अपरान्त प्रदेश हैं। अब जो विन्ध्यवासियोंके प्रदेश हैं, उन्हें सुनिये। मालव, करुष, मेकल, उत्कल, औण्ड्र (उड़ीसा), माष, दशार्ण, भोज, किष्किन्धक, तोशल, कोसल (दक्षिणकोसल), त्रैपुर, वैदिश (भेलसाराज्य), तुमुर, तुम्बर, पद्म, नैषध, अरूप, शौण्डिकेर, वीतिहोत्र तथा अवन्ति—ये सभी प्रदेश विन्ध्यपर्वतकी घाटियोंमें स्थित बतलाये जाते हैं। इसके बाद अब मैं उन देशोंका वर्णन कर रहा हूँ जो पर्वतपर स्थित हैं। उनके नाम हैं—निराहार, सर्वग, कुपथ, अपथ, कुथप्रावरण, ऊर्णादर्भ, समुद्रक, त्रिगर्त, मण्डल, किरात और चामर। मुनियोंका कथन है कि इस भारतवर्षमें सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगोंकी व्यवस्था है। अब मैं उनके वृत्तान्तका पूर्णतया वर्णन कर रहा हूँ॥ ४७–५८॥ |
| मत्स्य उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु ऋषय उत्तरं पुनरेव ते।<br>शुश्रूषवस्तमूचुस्ते प्रकामं लोमहर्षणिम् ॥ ५९ | मत्स्यभगवान्‌ने कहा— राजर्षे! सूतजीद्वारा कहे हुए इस प्रकरणको सुनकर मुनियोंको और भी आगे सुननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गयी, तब वे पुनः लोमहर्षण-पुत्र सूतजीसे बोले॥ ५९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>यच्च किम्पुरुषं वर्षं हरिवर्षं तथैव च।<br>आचक्ष्व नो यथातत्त्वं कीर्तितं भारतं त्वया ॥ ६०<br>जम्बूखण्डस्य विस्तारं तथान्येषां विदांवर।<br>द्वीपानां वासिनां तेषां वृक्षाणां प्रब्रवीहि नः ॥ ६१ | ऋषियोंने पूछा— वेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! आपने भारतवर्षका तो वर्णन कर दिया। अब हमें किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षके विषयमें बतलाइये। साथ ही जम्बूखण्डके विस्तारका तथा अन्य द्वीपोंके निवासियोंका एवं वहाँ उद्गत होनेवाले वृक्षोंका भी वर्णन हमें सुनाइये। |