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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१००- विभूतिद्वादशीके प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त

३३२* मत्स्यपुराण *

| न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः<br>फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।<br>न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं<br>यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे॥ ३६<br><br>भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद् वा सदा<br>शृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनीम्।<br>इमां शिवचतुर्दशीममरकामिनीकोटयः<br>स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमु समाचरेद् यः सदा॥ ३७<br><br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या<br>भर्तारमापृच्छ्य सुतान् गुरून् वा।<br>सापि प्रसादात् परमेश्वरस्य<br>परं पदं याति पिनाकपाणेः॥ ३८ | यदि मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हो जायँ तो भी इस चतुर्दशीके अनन्त फलका वर्णन करनेमें न तो बृहस्पति समर्थ हैं न इन्द्र, न ब्रह्मा समर्थ हैं न सिद्धगण तथा मैं भी इसका वर्णन नहीं कर सकता। जो मनुष्य मत्सररहित हो सम्पूर्ण पापोंसे विमुक्त करनेवाली इस शिवचतुर्दशीके माहात्म्यको सदा पढ़ता, स्मरण करता अथवा श्रवण करता है, उस पुण्यात्माका करोड़ों देवाङ्गनाएँ स्तवन करती हैं, फिर जो सदा इसका अनुष्ठान करता है, उसकी तो बात ही क्या है? स्त्री भी यदि अपने पति, पुत्र और गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी परमेश्वरकी कृपासे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके परमपदको प्राप्त हो जाती है*॥ ३३—३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शिवचतुर्दशीव्रतं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शिवचतुर्दशी-व्रत नामक पंचानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९५॥


छानबेवाँ अध्याय

सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य

| नन्दिकेश्वर उवाच<br>फलत्यागस्य माहात्म्यं यद् भवेच्छृणु नारद।<br>यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि तृतीयायां मुने व्रतम्।<br>द्वादश्यामथवाष्टम्यां चतुर्दश्यामथापि वा।<br>आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ २<br>अन्येष्वपि हि मासेषु पुण्येषु मुनिसत्तम।<br>सदक्षिणं पायसेन भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब कर्म-'फलत्याग' नामक व्रतका जो महत्त्व है, उसे सुनिये। वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। मुने! मङ्गलमय मार्गशीर्षमासमें शुक्लपक्षकी तृतीया, अष्टमी, द्वादशी अथवा चतुर्दशी तिथिको ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। मुनिसत्तम! इसी प्रकार यह व्रत अन्य पुण्यप्रद महीनोंमें भी किया जा सकता है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। |


* मन्वादिके अनुसार पति आदिकी आज्ञाके बिना स्त्रीको व्रत करनेका अधिकार नहीं है।

* अध्याय ९६ *३३३
संस्कृतहिन्दी
अष्टादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलकैः।<br>वर्जयेदब्दमेकं तु ऋते औषधकारणम्।<br>सवृषं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजं च कारयेत्॥ ४<br>कूष्माण्डं मातुलुङ्गं च वार्त्ताकं पनसं तथा।<br>आम्राम्रातककपित्थानि कलिङ्गमथ वालुकम्॥ ५<br>श्रीफलाश्र्वत्थबदरं जम्बीरं कदलीफलम्।<br>काश्मरं दाडिमं शक्त्या कलधौतानि षोडश॥ ६<br>मूलकामलकं जम्बूतिन्तिडी करमर्दकम्।<br>कङ्कोलैलाकतूण्डीरकरीरकुटजं शमी॥ ७<br>औदुम्बरं नारिकेलं द्राक्षाथ बृहतीद्वयम्।<br>रौप्याणि कारयेच्छक्त्या फलानीमानि षोडश॥ ८इस व्रतमें औषधके अतिरिक्त सामान्यरूपसे निन्द्य फल और मूलके साथ अठारह* प्रकारके धान्य त्याज्य—वर्जनीय माने गये हैं, अतः उन्हें एक वर्षतक त्याग देना चाहिये। पुनः रुद्र, धर्मराज और वृषभकी स्वर्णमयी मूर्ति बनवायी जाय। इसी प्रकार यथाशक्ति कूष्माण्ड, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), वार्त्ताक (भाँटा), पनस (कटहल), आम, आम्रातक (आमड़ा), कपित्थ (कैथ), कलिङ्ग (तरबूज), बालुक (पनियाला), बेल, पीपल, बेर, जम्बीर (जमीरी नींबू), केला, काश्मर (गम्भारी) और दाडिम (अनार)—ये सोलह प्रकारके फल भी सोनेके बनवाये जायें। मूली, आँवला, जामुन, इमली, करमर्दक (करौंदा), कङ्कोल (शीतलचीनीकी जातिके एक वृक्षका फल), इलायची, तुण्डीर (कुँदरू), करीर (करील), कुटज (इन्द्रयव), शमी, गूलर, नारियल, अंगूर और दोनों बृहती (बनभंटा, भटकटैया)—इन सोलहोंको अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीका बनवाना चाहिये॥ १—८॥
ताम्रं तालफलं कुर्यादगस्तिफलमेव च।<br>पिण्डारकाश्मर्यफलं तथा सूरणकन्दकम्॥ ९<br>रक्ताल्लुकाकन्दकं च कनकाह्वं च चिर्भिटम्।<br>चित्रवल्लीफलं तद्वत् कूटशाल्मलिजं फलम्॥ १०<br>आम्रनिष्पावमधुकवटमुद्गपटोलकम् ।<br>ताम्राणि षोडशैतानि कारयेच्छक्तितो नरः॥ ११<br>उदकुम्भद्वयं कुर्याद् धान्योपरि सवस्त्रकम्।<br>ततश्र्व कारयेच्छय्यां यथोपरि सुवाससी॥ १२<br>भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवृषान्वितम्।<br>धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य पुण्येऽह्नि विनिवेदयेत्॥ १३<br>यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटयः।<br>तथा सर्वफलत्यागव्रताद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे॥ १४<br>यथा शिवश्र्व धर्मश्र्व सदानन्तफलप्रदौ।<br>तद्युक्तफलदानेन तौ स्यातां मे वरप्रदौ॥ १५<br>यथा फलान्यनन्तानि शिवभक्तेषु सर्वदा।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥ १६<br>यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्।<br>तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकरः शंकरः सदा॥ १७व्रती मनुष्य सम्पत्तिके अनुकूल ताड़-फल, अगस्तफल, पिण्डारक (विकंकत या पिड़ार), काश्मर्य (गम्भारी)-फल, सूरणकन्द (जमीकन्द), रतालू, धतूरा, चिर्भिट (ककड़ी या पिहटिया), चित्रवल्ली (तेजपात)-फल, काले सेमलका फल, आम, निष्पाव (सेम या मटर), महुआ, बरगद, मूँग और परवल—इन सोलहोंका ताँबेसे निर्माण कराये। तत्पश्चात् वस्त्रसे सुशोभित दो कलश सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। वह तीन भोजन-पात्रोंसे युक्त हो और उसपर धर्मराज, रुद्र और वृषकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। साथ ही दो सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित एक शय्या भी प्रस्तुत करे। फिर उस पुण्यप्रद दिनमें यह सारा उपकरण एक गौके साथ किसी शान्त स्वभाववाले एवं कुटुम्बी सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे दान कर दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'जिस प्रकार सभी फलोंमें करोड़ों देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार सर्वफलत्याग-व्रतके अनुष्ठानसे शिवजीमें मेरी भक्ति हो। जैसे शिव और धर्म—दोनों सदा अनन्त फलके दाता कहे गये हैं, अतः उनसे युक्त फलका दान करनेसे वे दोनों मेरे लिये भी वरदायक हों। जिस प्रकार शिवभक्तोंको सदा अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहती है, उसी तरह मुझे प्रत्येक जन्ममें अनन्त फलकी प्राप्ति हो। जैसे मैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और सूर्यमें कोई भेद नहीं मानता, वैसे ही विश्वात्मा भगवान् शंकर सदा मेरे लिये कल्याणकारक हों'॥ ९—१७॥

* अठारह प्रकारके धान्योंकी बात यहाँके अतिरिक्त मत्स्यपुराणके अगले दानप्रकरणमें (विशेषकर २७६।७, २७७।११ आदिमें) भी आयी है, पर इसमें उनका पूर्ण विवरण कहीं नहीं आया है। ये अठारह धान्य—याज्ञवल्क्य-स्मृ० १।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसने० संहिता १८।१२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं—सावाँ, धान, जौ, मूँग, तिल, अणु (कँगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टाँगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिककी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।

३३४* मत्स्यपुराण *

| इति दत्त्वा च तत् सर्वमलङ्कृत्य च भूषणैः।<br>शक्तिश्चेच्छयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १८<br>अशक्तस्तु फलान्येव यथोक्तानि विधानतः।<br>तथोदकुम्भसंयुक्तौ शिवधर्मौ च काञ्चनौ॥ १९<br>विप्राय दत्त्वा भुञ्जीत वाग्यतस्तैलवर्जितम्।<br>अन्यान्नपि यथाशक्त्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ २०<br>एतद् भागवतानां तु सौरवैष्णवयोगिनाम्।<br>शुभं सर्वफलत्यागव्रतं वेदविदो विदुः॥ २१<br>नारीभिश्च यथाशक्त्या कर्तव्यं द्विजपुङ्गव।<br>एतस्मान्नापरं किञ्चिदिह लोके परत्र च।<br>व्रतमस्ति मुनिश्रेष्ठ यदनन्तफलप्रदम्॥ २२<br>सौवर्णरौप्यताम्रेषु यावन्तः परमाणवः।<br>भवन्ति चूर्ण्यमानेषु फलेषु मुनिसत्तम।<br>तावद् युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ २३<br>एतत् समस्तकलुषापहरं जनाना-<br>माजीवनाय मनुजेषु च सर्वदा स्यात्।<br>जन्मान्तरेष्वपि न पुत्रवियोगदुःख-<br>माप्नोति धाम च पुरंदरलोकजुष्टम्॥ २४<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः पठेद् वा<br>देवालयेषु भवनेषु च धार्मिकाणाम्।<br>पापैर्विमुक्तवपुरत्र पुरं मुरारे-<br>रानन्दकृत् पदमुपैति मुनीन्द्र सोऽपि॥ २५ | इस प्रकार आभूषणोंसे अलंकृत कर वह सारा सामान ब्राह्मणको दान कर दे। यदि सम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्या भी देनी चाहिये। यदि असमर्थ हो तो पूर्वोक्त फलोंका ही विधिपूर्वक दान करे। तत्पश्चात् शिव और धर्मराजकी स्वर्णमयी मूर्तिको दोनों कलशोंके साथ ब्राह्मणको दान करके स्वयं मौन होकर तैलरहित पदार्थोंका भोजन करे। इसके बाद यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन करानेका विधान है। वेदवेत्तालोग सूर्य, विष्णु और शिवके उपासक भक्तोंके लिये इस मङ्गलमय सर्वफल-त्यागव्रतको बतलाते हैं। द्विजपुंगव! स्त्रियोंको भी यथाशक्ति इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! इस लोक या परलोकमें इससे बढ़कर कोई दूसरा ऐसा व्रत नहीं है, जो अनन्त फलका प्रदायक हो। मुनिसत्तम! फलोंको चूर्ण कर देनेपर उनमें लगे हुए सोने, चाँदी और ताँबेके जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र युगोंतक व्रती रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस व्रतका जीवनपर्यन्त अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंको यह विनष्ट कर देता है, उन्हें जन्मान्तरमें भी पुत्रवियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता और मरणोपरान्त वे इन्द्रलोकमें चले जाते हैं। मुनीश्वर! जो निर्धन पुरुष देव-मन्दिरों अथवा धर्मात्मा पुरुषोंके गृहोंमें इस व्रत-माहात्म्यको सुनता अथवा पढ़ता है, उसका शरीर इस लोकमें पापसे मुक्त हो जाता है और मरणोपरान्त वह विष्णुलोकमें आनन्ददायक स्थान प्राप्त कर लेता है॥ १८-२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सर्वफलत्यागमाहात्म्यं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सर्वफलत्याग-माहात्म्य नामक छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९६॥


सत्तानबेवाँ अध्याय

आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य

| नारद उवाच<br>यदारोग्यकरं पुंसां यदनन्तफलप्रदम्।<br>यच्छान्त्यै च मर्त्यानां वद नन्दीश तद् व्रतम्॥ १ | नारदजीने पूछा— नन्दीश्वर! अब जो व्रत मृत्युलोकवासी पुरुषोंके लिये आरोग्यकारी, अनन्त फलका प्रदाता और शान्तिकारक हो, उसका वर्णन कीजिये॥ १॥ |

* अध्याय ९७ *३३५
नन्दिकेश्वर उवाचनन्दिकेश्वर बोले—
यत् तद् विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्म सनातनम्।<br>सूर्याग्निचन्द्ररूपेण तत् त्रिधा जगति स्थितम्॥ २<br>तदाराध्य पुमान् विप्र प्राप्नोति कुशलं सदा।<br>तस्मादादित्यवारेण सदा नक्ताशनो भवेत्॥ ३<br>यदा हस्तेन संयुक्तमादित्यस्य च वासरम्।<br>तदा शनिदिने कुर्यादेकभक्तं विमत्सरः॥ ४<br>नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>पत्रैर्द्वादशसंयुक्तं रक्तचन्दनपङ्कजम्॥ ५<br>विलिख्य विन्यसेत् सूर्यं नमस्कारेण पूर्वतः।<br>दिवाकरं तथाग्नेये विवस्वन्तमतः परम्॥ ६<br>भगं तु नैर्ऋते देवं वरुणं पश्चिमे दले।<br>महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यं च तथोत्तरे॥ ७<br>शान्तमीशानभागे तु नमस्कारेण विन्यसेत्।<br>कर्णिकापूर्वपत्रे तु सूर्यस्य तुरगान् न्यसेत्॥ ८<br>दक्षिणेऽर्यमनामानं मार्तण्डं पश्चिमे दले।<br>उत्तरे तु रविं देवं कर्णिकायां च भास्करम्॥ ९<br>रक्तपुष्पोदकेनार्घ्यं सतिलारुणचन्दनम्।<br>तस्मिन् पद्मे ततो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १०<br>कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः।<br>यस्मादग्नीन्द्ररूपस्त्वमतः पाहि दिवाकर॥ ११<br>अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषे त्वोर्जे च भास्कर।<br>अग्न आयाहि वरद नमस्ते ज्योतिषाम्पते॥ १२नारदजी! विश्वात्मा भगवान्‌का जो परब्रह्मस्वरूप सनातन तेज है, वह जगत्‌में सूर्य, अग्नि और चन्द्ररूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर स्थित है। विप्रवर! उनकी आराधना करके मनुष्य सदा कुशलताका भागी हो जाता है। इसलिये रविवारको रात्रिमें एक बार भोजन करना चाहिये। जब रविवार हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो शनिवारको मत्सररहित हो एक ही बार भोजन करना चाहिये। रविवारको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर नक्तभोजन (रात्रिमें एक बार भोजन करने)-का विधान है। तदनन्तर लाल चन्दनसे द्वादश दलोंसे युक्त कमलकी रचना कर उसके पूर्वदलपर सूर्यकी, अग्निकोणवाले दलपर दिवाकरकी, दक्षिणदलपर विवस्वान्‌की, नैर्ऋत्यकोणस्थित दलपर भगकी, पश्चिमदलपर वरुणदेवकी, वायव्यकोणवाले दलपर महेन्द्रकी, उत्तरदलपर आदित्यकी और ईशानकोणस्थित दलपर शान्तकी नमस्कारपूर्वक स्थापना करे। पुनः कर्णिकाके पूर्वदलपर सूर्यके घोड़ोंको, दक्षिणदलपर अर्यमाको, पश्चिमदलपर मार्तण्डको, उत्तरदलपर रविदेवको और कर्णिकाके मध्यभागमें भास्करको स्थित कर दे। तदनन्तर लाल पुष्प, लाल चन्दन और तिलमिश्रित जलसे उस कमलपर अर्घ्य प्रदान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—'दिवाकर! काल आपका ही स्वरूप है, आप समस्त प्राणियोंके आत्मा और वेदस्वरूप हैं, आपका मुख चारों दिशाओंमें है अर्थात् आप सर्वद्रष्टा हैं तथा अग्नि और इन्द्रके रूपमें आप ही वर्तमान हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! ऋग्वेदके प्रथम मन्त्र 'अग्निमीले०', यजुर्वेदके 'इषे त्वोर्जे०' तथा सामवेदके प्रथम मन्त्र 'अग्न आयाहि०' के रूपमें आप ही वर्तमान हैं, आपको नमस्कार है। वरदायक! आप ज्योतिःपुञ्जोंके अधीश्वर हैं, आपको प्रणाम है॥ २—१२॥
अर्घ्यं दत्त्वा विसृज्याथ निशि तैलविवर्जितम्।<br>भुञ्जीत वत्सरान्ते तु काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>पुरुषं च यथाशक्त्या कारयेद् द्विभुजं तथा॥ १३<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलां महार्घां<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहां सवत्साम्।<br>पूर्णे गुडस्योपरि ताम्रपात्रे<br>निधाय पद्मं पुरुषं च दद्यात्॥ १४इस प्रकार अर्घ्य देकर विसर्जन कर रातमें तैलरहित भोजन करना चाहिये। एक वर्ष पूरा होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे एक उत्तम कमल और एक दो भुजाधारी पुरुषकी मूर्ति बनवाये। फिर गुड़के ऊपर स्थित ताँबेके पूर्णपात्रपर उस कमल और पुरुषको रख दे। उस समय एक सवत्सा कपिला गौ भी प्रस्तुत करे, जो अधिक मूल्यवाली हो, जिसके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जिसके निकट कांसदोहनी भी रखी हो।